सोमवार, 30 सितंबर 2013

शिरीष खरे की पुस्तक 'तहकीकात' का विमोचन

इंदौर. युवा पत्रकार और मध्य प्रदेश में तहलका के वरिष्ठ संवाददाता शिरीष खरे की खोजी पत्रकारिता पर आधारित पहली पुस्तक ‘तहकीकात’ का विमोचन किया गया. इस दौरान देश के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई, दूरदर्शन के महाप्रबंधक त्रिपुरारी शरण, जाने-माने न्यूज एंकर आशुतोष, एक्सचेंज फॉर मीडिया के संपादक अनुराग बत्रा, सकाल (मराठी) के सलाहकार संपादक विजय नायक, नई दुनिया के समूह संपादक श्रवण गर्ग, अजय उपाध्याय, सुरेश बाफना और सीमा मुस्तफा जैसी हस्तियां मौजूद थीं. ‘तहकीकात’ पुस्तक में मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई बड़े घोटालों के खुलासों से जुड़ी बातों पर प्रकाश डाला गया है. यह पुस्तक युवा पत्रकार की उन विशेष रिपोर्टों पर आधारित हैं जो उन्होंने बीते दो सालों के दौरान इन राज्यों में पत्रकारिता करते हुए तैयार की हैं. इसमें खास तौर से इन राज्यों के राजनीतिक मूल्यों में आई गिरावट को समझने की कोशिश की गई है और उन्हें संदर्भों सहित रखा गया है.

गौरतलब है कि मीडिया के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी यह सभी हस्तियां  इंदौर के होटल फॉरच्यून लेंड मार्क में इंदौर प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित ‘पत्रकारिता की नई चुनौतियां’ में शामिल हुई थीं. इस दौरान उन्होंने खास तौर से युवा पत्रकारों के सामने आ रही चुनौतियों को लेकर अपने अनुभव और विचारों को भी लोगों के साथ साझा किया.

पुस्तक के बारे में :
'तहकीकात' यह पुस्तक मुखौटों के पीछे का ऐसा सच है जिसमें रिपोर्ट दर रिपोर्ट कई बड़े घोटालों का खुलासा हुआ है. साथ ही भ्रष्ट व्यवस्था के ऊंचे सोपान पर बैठे व्यक्तियों के दोहरे चरित्र की पड़ताल भी की गई है. यह पुस्तक मुख्यतः उन विशेष रिपोर्टों पर आधारित है जो लेखक ने बीते दो सालों में मध्य प्रदेश और राजस्थान रहते हुए लिखी थीं. अपने समय की तस्वीरें बताती हैं कि देश के विकसित होते इन राज्यों में आर्थिक घटनाक्रम किस तेजी से बदल रहा है. इसकी वजह से खास तौर पर राजनीतिक मूल्यों में किस हद तक गिरावट आई है. रिपोर्टिंग के पीछे मकसद था कि ऐसी स्थितियों की प्रक्रियाओं को जाना जाए और उन्हें संदर्भ के रुप में रखा जाए. दूसरे शब्दों में यह अपने समय का लघु दस्तावेज है. एक युवा पत्रकार के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है कि पत्रकारिता के पहले ही दौर में उसने जो लिखा उसकी गूंज सियासी गलियारों से लेकर सदन तक हुई. इस मामले में मध्य प्रदेश के साथ ही राजस्थान के उन संस्कारों का धन्यवाद जहां असली शक्ल दिखाने के बावजूद आईना तोड़ने का चलन अभी पनपा नहीं है. उम्मीद है कि यह प्रयास अपने समय के मुद्दों को संदर्भ और विश्लेषण के साथ समझने में मदद करेगा.

लेखक के बारे में :
जनपक्षीय पत्रकारिता में बीते बारह सालों से सक्रिय. इस दौरान दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के गांवों को देखा-समझा. गरीबी, समाज के उत्पीडि़त वर्ग पर होने वाले अत्याचारों और सत्ता के ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की अराजकता की वजह से आम आदमी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को पत्रकारिता का विषय बनाया. 2002 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विष्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त की. प्रतिष्ठित लाडली मीडिया पुरस्कार और सेंट्रल स्टडी ऑफ डवल्पमेंट सोसाइटी, नई दिल्ली द्वारा मीडिया फेलोशिप सम्मान.
(मेल से प्राप्त... इसे विज्ञप्ति की श्रेणी में रखा जा सकता है।)

बुधवार, 10 जुलाई 2013

केसला के वो दो दिन

सुखतवा, केसला के जंगलों को रात के अंधेरे में चीरती हुई हमारी गाड़ी रात करीब डेढ से दो बजे के बीच प्रदान के कैंपस में पहुंची। पेट में चूहे दौड़ रहे थे और उनींदी सी रोली शिवहरे पुरानी चिरपरिचित गर्मजोशी से सभी साथियों का स्वागत कर रहीं थीं। बावजूद इसके इतनी रात गए ये बेतकल्लुफी कौन करता... कौन ये कहता कि हमें भूख भी लग रही है, सो हम सभी अपने-अपने कमरों में जा विराजे। कुछ देर बाद अखलाक ने मेरा दरवाजा खटखटाया, वो बिस्किट का एक डिब्बा कहीं से जुगाड़ लाया था। तब तक मैं भी अपने बैग से बिस्किट के एक आध-पैकेट ढूंढ चुका था। खैर, दो चार बिस्किट चबाए, पानी गटका और सो गए।
 


सुबह नींद खुली तो... सतपुड़ा के जंगलों का पिछले साल सा एहसास। आंखें रूम के कमरों से ही वो पंडाल भी ढूंढने लगीं जो पचमढ़ी में तना था। नास्ता हुआ और कुछ देर बाद हम उस हॉल में जा पहुंचे, जहां सातवां विकास संवाद शुरू हो चुका था। साथियों के परिचय का सिलसिला जारी था। सत्र की औपचारिक शुरुआत के साथ ही संचालक चिन्मय मिश्र ने वो बात कह डाली, जो मन में उमड़-घुमड़ रही थी- पचमढ़ी का एक्सटेंशन है केसला। सच, वही सतपुड़ा की पहाड़ियां और वैसे ही सघन सत्र। बंदरों की धींगामुश्ती इस बार के सत्रों में व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पाई क्योंकि पंडाल का विस्तार प्रदान के पक्के सभागृह में तब्दील था।

सुनील भाई ने 'संघर्षों के राष्ट्रीय संदर्भ' से अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि निराशाजनक संकेतों के साथ ही आशाजनक संकेत भी मिल रहे हैं। विकास के मौजूदा ढांचे और उसके गुणगान पर उन्होंने सवाल उठाए। विकास की बलि चढ़ने वाले लोग कोई और हैं और उनका फायदा गिनाने वाले कोई और। मीडिया के चरित्र की विडंबना को उन्होंने रेखांकित किया। नक्सली आंदोलन में जब बड़ी हिंसात्मक घटना होती है तो पूरा मीडिया उस पर टूट पड़ता है लेकिन अहिंसक तरीके से चलने वाले आंदोलन और अनशन के कवरेज की मीडिया को फुर्सत नहीं होती। 'शक्तिमान' परियोजना के उद्धाटन की मिसाल पेश करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान मुकेश खन्ना की मौजूदगी का 'स्टार कवरेज' हुआ लेकिन परियोजना का विरोध कर रहे लोगों, उनके धरने और उनकी गिरफ्तारी के लिए एक दो लाइन लिखना भी पत्रकारों ने मुनासिब नहीं समझा। मंच से उन्होंने अन्ना और उनके साथियों के लिए एक सवाल भी उछाल दिया- भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन को व्यापक कवरेज मिली लेकिन आंदोलनकारियों ने इसके बाद भ्रष्टाचार की जड़ें कहां हैं, इस पर कोई सेमिनार क्यों नहीं करवाया?

'संवैधानिक तंत्र का बदलता चेहरा' विषय पर परिचर्चा की शुरुआत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति वी के कुठियालाजी की 'सुख की अनुभूति' के साथ हुई। कुठियालाजी ने अपने व्याख्यान को इतने आयाम और इतना विस्तार दे दिया कि उनकी 'सुख की अनुभूति' में श्रोता अपने लिए 'सुख' तलाशते रह गए। स्वतंत्रता प्राप्ति का नशा ख़त्म होने के बाद के लोगों के इस जमावड़े के सामने उन्होंने मछलियों को डूबने से बचाने के बंदर के प्रयास की मिसाल रखी। वैज्ञानिक विकास, हरित क्रांति, न्यूक्लियर विकास से लेकर क्रायोजेनिक ईंजन तक कई मोर्चों पर मिली विजय को उन्होंने बड़ी उपलब्धि बताया। मनुष्य के नवजात शिशु को उन्होंने सबसे ज्यादा हेल्पलेस प्राणी करार दिया और इस सिलसिले में संवाद की महती भूमिका को रेखांकित किया।

संचालक चिन्मय मिश्र ने रवीन्द्र नाथ टैगोर की एक कविता से कुठियालाजी के भाषण का समअप किया, लेकिन इस दौरान माइक ने व्यवधान पैदा कर दिया। तभी भीड़ से एक जुमला उछला- 'ये वर्तमान मीडिया की कविता है।' हल्की-फुल्की टिप्पणियों के इस मिजाज को अगले वक्ता अनिल बैरवाल ने अपने अंदाज में 'मैनटेन' किये रखा। हॉल में बैठे एक साथी की टी शर्ट पर लिखी चंद लाइनों पर उनकी नज़रें जा टिकीं- 'लव इज़ लाइक चाइनीज़ मोबाइल, नो गारंटी।' इसे उन्होंने विस्तार दे दिया- 'पॉलिटिक्स इज़ लाइक चाइनीज़ मोबाइल, नो गारंटी।' हालांकि उनका अपना ऑब्जर्बेशन कुछ ऐसा है कि आज़ादी के पहले प्यार और पॉलीटिक्स दोनों ही चाइनीज़ मोबाइल की तरह नहीं थे।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच, जैसे मिनी मूवमेंट चला रहे अनिल बैरवाल ने बातों ही बातों में मौजूदा राजनीतिक तंत्र और राजनेताओं की कुंठाओं और विंडबनाओं को भी बेपर्दा करना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि कैसे संसद में एक दूसरे के ख़िलाफ़ हो-हंगामा मचाने वाले राजनीतिक दल, तब एक सुर में बातें करने लगते हैं, जब उनकी जवाबदेही तय करने का सवाल सामने आता है। 1991 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने एक पीआईएल दायर कर चुनावी मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने की मांग उठाई थी। साल 2002 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मांग को जायज ठहराया। सारे राजनीतिक दल इस मुद्दे पर एक हो गए और हाईकोर्ट के फ़ैसले को बेअसर करने के लिए एक अध्यादेश लेकर आए। राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार इस पर हस्ताक्षर नहीं किया, तो कैबिनेट ने दोबारा इसे उनके पास भेजा। हालांकि सरकारी ये कोशिशें सुप्रीम कोर्ट में जाकर बेकार साबित हुईं। राजनेताओं को जवाबदेह बनाना इस वक़्त की सबसे बड़ी चुनौती है।

अनिल बैरवाल ने सवाल उठाया कि राजनीतिक दल इस बात के लिए राजी क्यों नहीं होते कि उन्हें आरटीआई के दायरे में लाया जाए? राजनीतिक दल ये बताने को तैयार क्यों नहीं होते कि उनके पास पैसा कहां से आ रहा है? राजनीतिक दल ये क्यों नहीं बताते कि सरकार से उन्हें कितना पैसा या सुविधाएं मिल रही हैं? सुप्रीम कोर्ट जब आरटीआई के दायरे में आ सकता है तो फिर राजनीतिक पार्टियां इसके लिए क्यों हामी नहीं भरतीं? इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जब सज़ायाफ़्ता चुनाव नहीं लड़ सकते तो फिर सज़ा के एलान के बाद विधायकों सांसदों को हटाए जाने की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं?

भोजन के पूर्व सत्र के आख़िरी वक्ता के तौर पर दैनिक हिंदुस्तान के पूर्व संपादक अरविंद मोहन ने मंच संभाला। संवैधानिक तंत्र के बदलते चेहरे पर बेहद अहम टिप्पणी के साथ उन्होंने अपनी बात शुरू की- अब कानून अपराधियों के साथ कॉरपोरेट हाउस और उनके दलाल बना रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की मजबूती को देश की जनता में स्थापित करने के लिए टी एन शेषन की तारीफ की तो वहीं सीएजी रिपोर्ट के जरिए एक के बाद एक प्राकृतिक संसाधनों की सार्वजनिक लूट को जगजाहिर करने के लिए विनोद राय के काम की सराहना की। हालांकि इस सिलसिले में मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर चुटकी भी ली- 'वो तो प्लानिंग कमीशन में बेरोजगारी के दिन काट रहे हैं वरना देश के वित्त मंत्री होते'।

अरविंदजी ने कहा कि जेनुइन डेमोक्रेसी की लड़ाई अभी बाकी है लेकिन अन्ना के आंदोलन से ये भरोसा भी पैदा होता है कि कोई भी पीढ़ी ख़ामोश नहीं रहती, वो हस्तक्षेप जरूर करती है। डेमोक्रेसी की परिभाषा को उन्होंने दो स्तरों पर समझाया- एक तो सांस्थानिक डेमोक्रेसी और दूसरी- दिल की डेमोक्रेसी। जब तक हम दिल से लोकतंत्र को स्वीकार नहीं करते, अपने व्यवहार में उसे नहीं लाते, सांस्थानिक लोकतंत्र मजबूत होता नहीं दिखेगा।

भोजन उपरांत का सत्र- 'बाबा बागदेव' के पाठ के साथ हुआ। पचमढ़ी में भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'सतपुड़ा के घने जंगल' का जो वाचन प्रशांत ने किया था, यहां उसे कश्मीर उप्पल ने अपनी ही कविता के जरिए विस्तार दिया।

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कभी किसी ने

बाघ नहीं कहा उन्हें

न ही कहा शेर

बाबा के बारे में

बोलते लोगों की आंखें

चमकने लगतीं

सांस भर आती

....

बाबा मायाराम ने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों और उनकी नियति पर संक्षेप में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ये अजीब विडंबना है कि मानव एक तरफ मंगल पर जीवन तलाश रहा है और दूसरी तरफ पृथ्वी पर जीवन के ख़ात्मे में सहभागी बना बैठा है। टाइगर रिजर्व में वन विभाग के अधिकारियों की एक अजीबोगरीब दलील का जिक्र किया- मछली से बाघ चमकता है इसलिए मछली पालन का काम इस इलाके से ख़त्म कर दिया जाए। विस्थापन के नाम पर आदिवासियों के साथ हो रही लूट-खसोट को उन्होंने बेहद दुखद घटना बताया।

इसके बाद फागराम ने आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि लकड़ी-गट्ठे के झूठे केस में पुलिस ने उन्हें जेल भेजा और सताया। ग्रामीण शिक्षा के बारे में बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि 150 बच्चों पर एक गुरूजी। ऐसे में गुरूजी की हालत बेहद दयनीय हो जाती है- इते देखईं कि उते देखईं। अब ऐसे में मास्टरसाहब क्या तो 'मास्टरप्लान' समझेंगे और समझाएंगे। बिना लड़े इस देश में कुछ नहीं मिलता, राह-ए-संघर्ष चुननी ही पड़ेगी।

चाय के उपरांत, दिन के तीसरे सत्र में 'मौजूदा दलीय लोकतंत्र-कितना संवैधानिक' विषय पर 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के संपादक अरुण त्रिपाठी ने अपनी बातें रखीं। उन्होंने 1975 और उसके बाद 1992 को भारतीय लोकतंत्र के लिहाज़ से दो ख़तरनाक 'काल' बताया। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को परिवारवाद, पक्षपात, तानाशाही का गढ़ बताया तो वहीं क्षेत्रीय दलों के उभार का भी जिक्र किया। इस बात पर अफसोस भी जाहिर किया कि उत्तरप्रदेश जैसे सूबे की दो बड़ी पार्टियां चाहें सवारी हाथी या साईकिल की कर रही हों, परसुराम जयंती मनाने में दोनों ही दलों के कार्यकर्ताओं का उत्साह एक सा है।

बातचीत के क्रम में अरुण त्रिपाठी ने बीडी शर्मा का एक कथन उद्धृत किया- संविधान ने लोगों को आज़ादी दी, आदिवासियों को गुलामी। इसके साथ ही इस बात पर चिंता भी जाहिर की कि देश की सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका ऐसी भी लंबित है, जिसमें संविधान से 'समाजवाद' शब्द को हटाने की गुहार लगाई गई है। त्रिपाठीजी ने कहा कि अब लोकतंत्र में भागीदारी के लिए भी बड़ी पूंजी चाहिए। दिनोंदिन पूंजी का बोलबाला बढ़ा है और बौद्धिक लोगों की उपेक्षा हर मोर्चे और हर पार्टी में नजर आने लगी है। सबसे बड़ी विडंबना तो ये है कि देश का नेता भी विदेश में तय होने लगा है।

इस सत्र में हस्तक्षेप के तौर पर एशियन ह्यूमन राइट्स के सदस्य समर अनार्य ने अन्ना के आंदोलन को मौजूदा दौर का सबसे गैर-लोकतांत्रिक आंदोलन बताया। सत्र की अध्यक्षता कर रहे अखलाक अहमद ने कहा कि विदेशी शक्तियों का दखल केंद्र सरकार ही नहीं राज्य सरकारों का मुखिया तय करने में भी बढ़ रहा है, जो चिंता का विषय है। पहले दिन का आखिरी और खुला सत्र कश्मीर उप्पल, रजनी बख्शी, सुनील, सचिन जैन और राकेश दीवान की टिप्पणियों के साथ समाप्त हुआ।

दूसरे दिन के पहले सत्र की शुरुआत गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अनुपम मिश्र के प्रजेंटेशन से हुई। पानी और उनके संरक्षण के कई उदाहरण चित्रों के जरिए सामने आए और उनके साथ अनुपमजी की लाइव कमेंट्री चलती रही। पानी के संरक्षण को जितने सुंदर चित्रों में सहेजा गया था, उतनी ही कोमल वाणी में उसका महात्म्य बखाना जा रहा था। हॉल में बैठे लोग मंत्रमुग्ध से कभी सेलुलाइड के चित्रों को और कभी अनुपम मिश्र को निहार रहे थे। पानी के इसी जनतांत्रिक संरक्षण के जरिए उन्होंने 'समाज के लोकतंत्र और संवैधानिक लोकतंत्र' के फर्क को बड़ी सरलता और सहजता से मन में उतार दिया।

इस सत्र में कश्मीर उप्पल ने नागार्जुन, श्रीकृष्ण कुमार और सच्चिदाननंद सिन्हा के कुछ पत्रों का वाचन किया। ये वो पत्र थे, जिनसे पत्रकारिता के क्षरण का इतिहास झांक रहा था। पशुपति शर्मा ने बतौर हस्तक्षेप एक पत्रकार के स्टाइलशीटिया बन जाने पर अफसोस जताया। अख़बारों के संपादकों से जैसा तादात्म्य आम लोगों का था, ठीक वैसा ही चैनलों के संपादकों के साथ क्यों नहीं?, ये सवाल भी उठाया।

इस सत्र के खत्म होते-होते हॉल में वो शख्स दाखिल हो गया, जो पत्रकारिता जगत में एक आदर्श नायक की तरह स्थापित है। 70 के दशक के अमिताभ (गरीब, मजलूम और किसानों के हक की लड़ाई का प्रतीक नायक) सरीखा कद हासिल कर चुके पी साईंनाथ मंच पर आसीन थे। 'कॉरपोरेट हस्तक्षेप और मीडिया' पर अपनी बात इस मुनादी के साथ शुरू की कि असहमति का कोई भी सुर, कोई भी सवाल बीच व्याख्यान में मुमकिन है। पी साईंनाथ ने कहा कि विकास संवाद की परिचर्चा के इन तीन दिनों में देश में समानांतर रूप से जो कुछ घटित हो रहा है, वो काफी चिंतनीय है। इन तीन दिनों में देश के 147 किसान आत्महत्या कर चुके होंगे, इन तीन दिनों में 3000 बच्चे कुपोषण और उसकी वजह से होने वाली बीमारियों से दम तोड़ चुके होंगे।


मीडिया को उन्होंने राजनीतिक रूप से स्वतंत्र लेकिन मुनाफे का गुलाम बताया। शारदा चिटफंड से लेकर एनडीटीवी प्रॉफिट से पत्रकारों की छंटनी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की नौकरी की किसी को चिंता नहीं है बल्कि इस पूरे गोरखधंधे में मीडिया हाउसेस कॉरपोरेट घरानों की मनमर्जी और इशारे के तहत काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने मीडिया मॉनोपॉली को कॉरपोरेट मोनोपॉली का एक हिस्सा बताया।

पी साईंनाथ ने कहा कि अब मीडिया हाउसेस रिपोर्टिंग पर खर्च कम करते जा रहे हैं। यही वजह है कि चैनलों पर टॉक शो की बाढ़ आ गई है क्योंकि इसमें खर्च कम है। इसी तरह संपादकों की जगह सीईओ, मैनेजिंग एडिटर, एक्जक्यूटिव एडिटर जैसे पदों के गठन को भी उन्होंने पत्रकारिता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। मीडिया हाउसेस और कॉरपोरेट हाउसेस के बीच होने वाली 'प्राइवेट ट्रीटी' को भी उन्होंने पत्रकारिता की आजादी में बाधक बताया। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे मीडिया घरानों के हित बाजार के हित के साथ जुड़ते जाएंगे, एक तरह का खतरनाक नेक्सस खबरों को दबाने, छिपाने और उन्हें विकृत करने में सक्रिय होता जाएगा।

पी साईंनाथ ने कहा कि हाल के दिनों में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कोई बड़ी ख़बर ब्रेक की हो, इसके उदाहरण बेहद कम मिलते हैं। मीडिया के पतन के साथ पत्रकार 'कॉमेडियन रिलीफ' देने का काम करते नजर आते हैं। ऐसे में पत्रकारों को गुरिल्ला जर्नलिज्म की आदत डाल लेनी चाहिए। संस्थानों में रहते हुए वो कैसे समाज और आम आदमी की बात सामने रख पाते हैं, ये उनकी निजी काबिलियत का विषय है।

इसके साथ ही उन्होंने पेड न्यूज को लेकर भी अपनी राय रखी। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इलेक्शन के दौरान पेड न्यूज की पकड़ आसान हो जाती है लेकिन बहुत बड़ा हिस्सा नॉन इलेक्शन पेड न्यूज का भी है। उन्होंने पत्रकारिता जगत में आने वाले युवाओं से वैकल्पिक मीडिया को अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि एक पत्रकार को एक से ज्यादा हुनर का मास्टर होना चाहिए ताकि वो अलग-अलग माध्यमों से अपनी बात कह सके। उन्होंने अपनी ओर से किए जा रहे आर्काइव प्रोग्राम की एक झलक भी दिखाई। पी साईंनाथ ने उन लोगों के दिमाग के तारों को झंकृत कर दिया जो न्यूज रूम के शोर में भी सोने की आदत पाले बैठे हैं।

विकास संवाद में इसके बाद के सत्रों में भी कुछ बातें हुईं लेकिन पी साईंनाथ ने मीडिया के इतने आयाम खोल दिए कि दिमाग में लंबे समय तक वो उमड़ते घुमड़ते रहेंगे।

केसला से वापसी में एक अलग तरह की भूख का एहसास तीव्रतर हो गया। 'भूख' उदर से कुछ ऊपर शिफ्ट हो चुकी थी। विकास संवाद की सार्थकता बस इतनी है कि वो इस भूख को जगा तो सकता है मिटा नहीं सकता। भूखे पेट भजन भले न हो भूखे मन में नए गीत गूंजते हैं... शायद हममें से कोई साथी कभी ऐसा ही कोई नया गीत गुनगुनाएं तो इस आयोजन की सार्थकता और ज्यादा बढ़ जाएगी।

पशुपति शर्मा

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

भोपाल में बिखरी 'मोहनिया' की यादें

 

नम आंखें और उन आंखों से ढलकतीं विनय की यादें। भोपाल के गांधी भवन के मोहनिया बाल गृह में सुबह एक-एक कर साथियों का आना शुरू हो गया। विनय की याद में आयोजित कार्यक्रम को लेकर बने पोस्टर और बैनर मंच पर एक-एक कर टांके गए। इसी दौरान दो टेबल पलट कर उस पर एक-एक चादर डाली गई। अखलाक ने जो दो पोस्टरनुमा तस्वीरें मुजफ्फरपुर से बनवाकर लाईं थीं, उसे दो कोने पर जैसे ही लगाया गया, वो मंच तैयार हो गया... जहां विनय की यादें एक-एक कर बिखरने लगीं।

पहला अनौपचारिक सत्र-विनय स्मरण का रहा। राजू नीरा ने चंद लफ़्जों में विनय को याद किया और जैसे ही पुष्पांजलि के लिए साथियों को न्यौता दिया गया, कई आंखें डबडबा गईं। राजू नीरा ने इस अनौपचारिक सत्र की शुरुआत इस प्रस्ताव के साथ की कि विनय की याद के इस सिलसिले को अब किस दायरे में आगे बढ़ाया जाए। माखनलाल तक ही इसे सीमित रखा जाए या इसमें बाहर के लोगों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इसी सिलसिले में राजू ने माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के एक और सीनियर साथी वेदव्रत गिरि के असामयिक निधन पर शोक जाहिर किया। राजू ने जरूरतमंद और संकटग्रस्त साथियों के लिए एक को-ऑपरेटिव जैसी व्यवस्था विकसित करने की बात भी कही।

मुजफ्फरपुर दैनिक जागरण से जुड़े अखलाक अहमद ने कार्यक्रम में स्थानीय साथियों की कम भागीदारी पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि पिछले चार साल से चल रहे इस कार्यक्रम को जारी रखा जाना चाहिए और एक नेशनल नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। विनय के बहाने अलग-अलग विषयों पर पुस्तिका प्रकाशन पर भी उन्होंने जोर दिया।

बीबीसी से जुड़ीं शेफाली चतुर्वेदी ने लगे हाथ अगला आयोजन दिल्ली में करने का प्रस्ताव रखा, जिस पर करतल ध्वनि से सभी ने हामी भर दी। एक्शन एड के साथ काम कर रहे उमेश चतुर्वेदी ने भी दिल्ली में कार्यक्रम की जिम्मेदारी लेने की तत्परता दिखाई और कार्यक्रम स्थल के तौर पर गांधी शांति प्रतिष्ठान का नाम सुझाया। मुजफ्फरपुर से आए साथी अमरेन्द्र तिवारी ने आयोजन का समय एक दिन से बढ़ाकर दो दिन करने की इच्छा जाहिर की। इसके साथ ही उन्होंने बीच-बीच में वर्कशॉप किए जाने की जरूरत भी रेखांकित की।

एनडीटीवी, मुंबई में कार्यरत साथी अनुराग द्वारी के चंद बोलों ने विचार में डूबते-उतराते लोगों को फिर भावुक कर दिया। अनुराग ने ये जब ये सवाल किया कि फूलों से भी इतनी तकलीफ़ हो सकती है... तो इसका जवाब आंखें दे रहीं थीं। भोपाल के साथी अरुण सूर्यवंशी ने पिछली बार के कार्यक्रम में न शामिल हो पाने का अफसोस जाहिर किया और कहा कि 'टू बी कनेक्टेड' की स्थिति बनी रहनी चाहिए।

नई दुनिया, इंदौर में कार्यरत सचिन श्रीवास्तव ने विनय के नाम पर किसी फोरम के गठन को लेकर आपत्तियां जाहिर कीं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति आधारित संस्थाएं कब तक और कितनी दूर तक चल पातीं हैं, इसका इतिहास अच्छा नहीं रहा है। वहीं दैनिक जागरण, भोपाल के खेल प्रभारी शशि शेखर ने इन सबसे से परे विनय के सरल-सहज स्वभाव को जिंदा रखने को ही आयोजन की सार्थकता बताया। सहारा न्यूज चैनल के एंकर संदीप ने फेसबुक पर एक पेज बनाकर साथियों को जोड़े रखने की बात कही और उन्होंने ये जिम्मा खुद अपने कंधों पर ले लिया। पशुपति शर्मा ने विनय के नाम पर हो रहे आयोजनों को मौजूदा स्वरूप में ही जारी रखने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव जैसी व्यवस्थाएं कई बार काम आगे बढ़ाने की बजाय अड़चनें पैदा करने लगती हैं। दस्तक के रोल मॉडल की तरह की विनय स्मरण कार्यक्रम भी यूं ही जारी रखा जाए तो बेहतर होगा।

बिहार में प्रभात खबर के साथ लंबे वक्त से काम रहे अखिलेश्वर पांडेय ने एक ईमानदार आदमी की सतत मौजूदगी को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज भी प्रभात खबर के साथ विनय को याद कर भावुक हो उठते हैं। उससे काम में जुटे रहने और जिम्मेदारियां ओढ़ लेने की प्रेरणा लेते हैं।

न्यू सोशलिस्ट इनीशिएटिव, दिल्ली के साथी सुभाष गाताडे ने विनय की याद में इस तरह के कार्यक्रम को एक जरूरी पहल बताया। इसके साथ ही औपचारिक संगठन से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि विनय के लेखों के संकलन के बारे में गंभीरता से सोचा जाना चाहिए।

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर पुष्पेंद्र पाल सिंह ने एक रोचक प्रसंग से अपनी बात शुरू की। विनय के निधन के बाद दोस्तों ने जिस शिद्दत से उसे याद किया, उसने कई लोगों को प्रभावित किया। उन्होंने बताया कि कैसे अभिलाष खांडेलकर ने उनसे फोन कर पूछा कि आखिर ये विनय कौन है, क्या बात थी इस युवा पत्रकार में कि उसे साथी इतने भावुक होकर याद कर रहे हैं। पुष्पेंद्र पाल सिंह ने कहा कि इस आयोजन की सबसे बड़ी बात ये है कि ये ईमानदारी, अच्छाई और सादगी में लोगों के विश्वास को पुख्ता करता है। ये आस्था बलवती होती है कि समाज में अच्छे लोग हैं तो उनका सम्मान भी है। पहला सत्र साथियों को आगे बढ़ते रहने के पीपी सिंह के इसी संदेश के साथ संपन्न हो गया।

दूसरा सत्र, करीब ढ़ाई बजे... ये फैसले का वक्त है, आ कदम मिला के बोल के साथ शुरू हुआ। मुजफ्फरपुर के सांस्कृतिक संगठन गांव ज्वार के साथी सुनील और अखलाक ने ये गीत गया। इसके बाद शेफाली चतुर्वेदी ने सचिन श्रीवास्तव की कविता 'अफसोस विनय अफसोस' का वाचन किया। पशुपति शर्मा ने आरंभिक उद्बोधन में मोहनिया बाल गृह में अपने मोहनिया को याद करने की बात कही। विनय तरुण का स्वभाव ही ऐसा है कि वो कभी मोहनिया बन कर सामने आ जाता है तो कभी आनंद के राजेश खन्ना की तरह लोगों को हंसता-हंसाता आंखों के सामने तैरने लगता है। विनय की याद में ये कार्यक्रम उसकी सादगी, उसकी सहजता, उसकी ईमानदारी, उसकी दृढ़ता का उत्सव है।

अब बारी सुभाष गाताडे की थी, जिन्हें अस्मिताओं का संघर्ष और पत्रकारिता पर अपनी बात रखनी थी। गाताडे ने विनय की याद में आयोजित इस व्याख्यान पर साथियों को साधुवाद दिया। उन्होंने कहा- ये बड़ी बात है कि साथियों ने विनय के न होने के गम को सयापे में नहीं बदला बल्कि संकल्पशक्ति में तब्दील किया है। ऐसे दौर में जब पत्रकारिता कमीशनखोरी में तब्दील हो गई हो, अपनी भूमिका तलाशने की ऐसी कोशिशें काफी ताकत देने वाली है।

उन्होंने कहा कि अस्मिताओं के संघर्ष का सवाल आज ज्यादा मौजूं है। 80-90 के दशक में दलित और स्त्री अस्मिता का उभार हुआ। हिंदी पट्टी के सबसे बड़े सूबे में मायावती अस्मिताओं के इस संघर्ष के बाद सत्ता पर काबिज हुईं। 90 के दशक में हिंदू अस्मिता का उभार हुआ। और अब आज के दौर में जब हम गुजरात दंगे बनाम विकास की बहस में उलझे हैं, अस्मिताओं से जुड़े ऐसे कई सवाल बार-बार सिर उठाते हैं।

पत्रकारिता के ढांचे का जिक्र करते हुए सुभाष गाताडे ने कहा कि यहां अभी भी पुरुष वर्चस्व कायम है। पत्रकारिता संस्थानों में तमाम अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इस सिलसिले में उन्होंने 2006 में हुए एक सर्वे का जिक्र किया। 35 चैनलों के 300 सीनियर मीडियाकर्मियों का विश्लेषण प्रतिनिधित्व के लिहाज से बेहद गैर-लोकतांत्रिक नज़र आया। 71 फीसदी पदों पर हिन्दू उच्च जाति का कब्जा था।

हस्तक्षेप के तौर पर देविन्दर कौर उप्पल ने भी कमज़ोर और सशक्त की लड़ाई में हमेशा कमज़ोर के साथ खड़े रहने की प्रतिबद्धता पर जोर दिया। बिहार से आए पत्रकार साथी श्याम लाल ने नक्सली लिंक के शक में प्रताड़ित किए जाने की 'व्यथाकथा' शेयर की।

अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया ने मीडिया घरानों की मोनोपॉली ख़त्म करने को एक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर की कि पत्रकारों को सबसे कम फ्रीडम न्यूज़ रूम में हासिल होती है। पत्रकार संगठनों के अभाव में हक की लड़ाई जारी रखना भले ही मुश्किल हो गया हो लेकिन हरदेनियाजी ने हर पत्रकार को वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को समझने और उसे पढ़ने की नसीहत दी। कई मायने में निजी पूंजी से बेहतर सरकारी पूंजी है। उन्होंने स्मरण से किसी पुराने उद्धरण का जिक्र किया कि यदि पत्रकार अपने आर्थिक हालात को लेकर चिंतित रहने लगे तो फिर देश का भविष्य अंधकारमय होना तय है।

अहा जिंदगी के संपादक आलोक श्रीवास्तव की व्यवस्तताओं की वजह से व्याख्यान का एक और सत्र तो मुमकिन नहीं हो पाया लेकिन पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक शाम कविताओं के नाम रही। आलोक श्रीवास्तव, कुमार अंबुज और रवींद्र स्वप्निल प्रजापति ने अपनी कुछ चुनींदा कविताओं का पाठ किया। इसके साथ ही राजू नीरा, सचिन श्रीवास्तव ने कविताएं पढ़ीं और नदीम खान ने कुछ शेर गुनगुनाए।

शाम ढ़लते-ढ़लते विनय की याद में गुजरे एक दिन पर भी धुंधलका छाने लगा... साथी अपने घर को लौट चले।

रविवार, 3 मार्च 2013

माफ कर देना माई!


हरे रामा, हरे कृष्णा, कृष्णा-कृष्णा हरे-हरे। वृंदावन के उस आश्रम के बाहर हमारे कदम पड़े तो ये बोल कानों में गूंजने लगे। अंदर गए तो सफेद कपड़ों में लिपटीं महिलाओं का झुंड। कुछ घेरा बनाकर भजन गा रहीं थीं, झूम रहीं थीं और कुछ इस घेरे से बाहर गुमसुम बैठीं थीं। दूर कोने में कुछ वृद्ध महिलाएं फूलों की माला गूंथ रहीं थीं। कुछ के हाथों में धागा था और वो न जाने उनमें कौन से मोती पिरो रहीं थीं, अपने गम के या कान्हा के नाम के। इन सबके बीच एक वृद्ध भी झूम रहा था, लाल बंडी और सफेद सा कुर्ता पहने। बाद में पता चला वो विंदेश्वरी पाठक थे। विंदेश्वरी पाठक जिन्हें, सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी के बाद वृंदावन में अपने आखिरी दिन गुजारने पहुंचीं विधवाओं की देखरेख का जिम्मा सौंपा गया है।

कुछ देर तक तो कदम ऐसे ठिठके कि दिमाग सुन्न सा हो गया। भजन के बोलों से परे कब विधवाओं को देख-देख उनके गम की दुनिया दिमाग में कौंधने लगीं, पता ही नहीं चला। आंखें डबडबाने को थीं, कि चेतन मन जाग उठा। दुख कैसे कभी-कभी उत्सव का मौका भी दे जाते हैं, वो पल मेरे सामने थे। सुलभ इंटरनेशनल ने 24 फरवरी 2013 को ये छोटा सा कार्यक्रम इन विधवाओं की जिंदगी में खुशी के थोड़े से पल तलाशने के लिए रखा था। विंदेश्वरी पाठक ने पहले हिंदी में कहा- ''रात बीत गई और अब एक नई सुबह होने को है।'' एक बांग्लाभाषी ने इसे बांग्ला में अनुवाद कर दिया। वो इस लिहाज से भी जरूरी था कि वृंदावन में आने वाली विधवाओं में कइयों की दुख की बोली-बाणी अभी भी बंगला ही है। पाठक जी ने कहा - "जो बीत गया उसे सपने की तरह भूल जाओ, अब नया जीवन शुरू होगा।" उनकी इस घोषणा के साथ जुड़ी थी, दो हजार रुपये की वो सहयोग राशि, जो हर माह विधवाओं को दी जाएगी। एक हजार की अनुग्रह राशि अचानक दो हजार कर दी गई थी। इस छोटी सी शर्त के साथ कि अब पांच-पांच रुपये के लिए भजन गायन करने ये विधवाएं कहीं नहीं जाएंगी।

इसके बाद सिलाई मशीनें बांटी गईं। मैं दूर खड़ा देख रहा था। वो महिलाएं जो अब तक झुंड बनाकर नाच-गा रहीं थीं, इस बार भी अगली कतार में वो हीं थीं। इक्का दुक्का विधवाओं ने बीच से हाथ उठाया। उन्हें भी आगे वाली कतार में बुला लिया गया, एक मशीन उनके सामने भी रख दी गई। हॉल के आखिरी कोने में अब भी कोई हलचल नहीं थी। इसके बाद कैंची आई, कुछ  रंगीन धागे भी बांटे गए। घोषणाएं होती रहीं। सुलभ इंटरनेशनल की तरफ से सिलाई सिखाने के लिए एक टीचर। इसके अलावा दो तीन शिक्षिकाओं का परिचय भी हुआ जो इन विधवाओं को हिंदी, बांग्ला और अंग्रेजी भी सिखाएंगी। राधा, सुनंदा और नयन, इन तीनों पर ये जिम्मेदारी डाली गई। इसी बीच ये भी बताया गया कि विधवा जिन्हें यहां माई कहते हैं, के लिए टीवी भी लगाई जा रही है, ताकि वो कुछ देर स्क्रीन के सामने भी बिता सकें।

इसी दौरान एक पत्रकार साथी ने आवाज लगाई- ''चलिए जरा इनके रहने का ठौर-ठिकाना भी देख आएं।'' अंदर गया। नए-नए से पर्दे टंगे थे, जिनकी चिन्दियां उधेड़ी जाएं तो न जाने माई के कितने फटे पुराने दिन इनमें सिमटे हों। अंदर एक हॉल। वहां हॉस्टल की तरह एक के बाद एक खाट। उस पर बिछा बिस्तर। खाट के नीचे बर्तन-बासन। थोड़ा और जरूरी सामान। सब करीने से सजा हुआ। हो सकता है, आज आए मेहमानों की वजह से भी माई ने अपना बिखरा सामान ही नहीं दुख भी सहेज कर बिस्तरे के नीचे डाल दिया हो।

यहीं थोड़ी हिम्मत कर दो माइयों से छोटी सी बात हुई। एक ने कहा- "शाहजहानपुर, यूपी से आई हूं। घर कोई खुशी से तो छोड़ता नहीं। बेटा-बेटी का अपना खर्च ही पूरा नहीं होता तो मेरा पेट कहां से भरते। दो-चार महीने पर घर से कोई आ जाता है, मुलाकात हो जाती है। बस और क्या?" दूसरी माई ने बताया- "मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल से आई हूं। 32-33 साल से वृंदावन की गलियां ही ठिकाना रही हैं।" अंदाजा लगाया, इस माई की उम्र 60-65 के बीच रही होगी। आधी जिंदगी कान्हा की नगरी में बीती है। बच्चे जो छोटे थे, बड़े हो गए लेकिन वो दुनिया इनके लिए तब भी बेगानी थी और आज भी बेगानी ही है।

बाहर निकला तो बोर्ड पर नजर पड़ी। मीरा सहभागिनी महिला आश्रम सदन। कहते हैं मीरा ने आखिरी दिन कान्हा के भजन गाते यहीं वृंदावन में गुजारे थे। विधवा आश्रमों में माई और मीरा को लेकर कई तरह की धारणाएं भी हैं। बोर्ड के ठीक नीचे डॉक्टर साहब की कुर्सी टेबल। माई का बीपी चेक हो रहा था। डॉक्टर साहब बड़े प्यार से बातें कर दवाईयां दे रहे थे। अच्छा लग रहा था, कम से कम इनका इतना केयर तो हो रहा है।

भूख लगने लगी थी। इस कार्यक्रम के लिए खास तौर पर दिल्ली से आए कई पत्रकार साथियों ने भोजन की इच्छा जाहिर की तो आयोजकों ने बाहर बुलाया। हम चल दिए। होटल बसेरा में खाने का इंतजाम था। पनीर की सब्जी, दाल फ्राई, और भी दो तीन तरह की सब्जियां, रोटी, मिस्सी रोटी, नान, पुलाव। मीठे में गुलाब जामुन और आईस्क्रीम भी। निवाला गटकते हुए सोच रहा था, आज माई ने क्या खाया होगा? क्या एक दिन माई के साथ एक थाली हमारी नहीं लग सकती थी? जिनके साथ कुछ पल गुजारने आए थे, उनके साथ एक वक्त का खाना क्यों नहीं?

खैर। वृंदावन से लौटते वक्त एक्सप्रेसवे पर गाड़ी फर्राटे भर रही थी। इसके साथ ही माइयों के चेहरे भी बड़ी तेजी से धुंधले होते जा रहे थे। हॉस्टल में बिताए दिनों को याद कर सोच रहा था कि सामूहिकता में दुख खत्म भले न हो, कम जरूर हो जाता है। हां फर्क बस इतना था कि स्कूल डेज में हॉस्टल के ये दिन अपनी नई जिंदगी शुरू करने के लिए बेहद अहम थे, जबकि माइयों का ये हॉस्टल तो जिंदगी के आखिरी दिनों को सुकून से काट लेने भर का जरिया है।

माई... दिल्ली आ गया है... हो सके तो तुम्हारे इस दुख के सभी गुनहगारों को माफ कर देना... मुझे भी।

- पशुपति शर्मा