<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706</id><updated>2012-01-17T22:38:07.373-08:00</updated><category term='आंदोलन'/><category term='मंदी की मार'/><category term='एडमिशन धांधली'/><category term='निफ्ट'/><category term='मध्यवर्ग'/><category term='खबर पर नजर'/><category term='राजनीति'/><category term='शहर'/><category term='बहस'/><category term='रंगविदूषक'/><category term='माफीनामा'/><category term='पूर्णिया'/><category term='असहमति का साहस'/><category term='नाटक'/><category term='गंदा है पर धंधा है'/><category term='माओवाद'/><category term='आवाज दो'/><category term='जंतर-मंतर'/><category term='रंगमंच'/><category 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type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>70</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-7361223130666222441</id><published>2012-01-10T05:13:00.000-08:00</published><updated>2012-01-10T05:14:38.448-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रंगविदूषक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रंगमंच'/><title type='text'>नैन नचैया- नाचते रहे नैन !</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-7JgYyR8bKcs/Tww5tMEYxMI/AAAAAAAAAFM/SCkONNtRwH8/s1600/nain3.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 244px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-7JgYyR8bKcs/Tww5tMEYxMI/AAAAAAAAAFM/SCkONNtRwH8/s400/nain3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5695991077213357250" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भारत रंग महोत्सव का दूसरा दिन। अभिमंच सभागार में नैन नचैया। मंच पर पात्रों के साथ ही नैन भी पूरे नाटक के दौरान नाचते ही रहते हैं। रंग विदूषक के नाटकों में जो खिलंदड़ापन होता है, वो इस नाटक में शुरू से अंत तक नजर आता है, पूरी ऊर्जा और रंगमच के तमाम तत्वों के साथ। चेहरे का मेकअप पहले की तुलना में थोड़ा हलका हुआ है, जिससे मंच पर मौजूद हर कलाकार अब पहचाना जा सकता है। उसकी भाव-भंगिमाएं, करतब और हरकतें कुछ और मुखर होकर सामने आती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक का केंद्रीय पात्र है बेढंग प्रसाद जो बाबा घोटालू बन जाता है। नाटक में बेढंग की याद्दाश्त खो जाती है, लेकिन उसके व्यक्तित्व का मूल प्रेम और प्रेम करने की सतत प्रवृत्ति बरकरार रहती है। बाबा घोटालू का नाटक के अलग-अलग दृश्यों में अलग-अलग नारियों के साथ प्रेम काफी रोमांचक और मजेदार अनुभव से रूबरू कराता है। बाबा घोटालू की भूमिका में रंग विदूषक के वरिष्ठ कलाकार उदय शहाणे हमेशा की तरह दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करते हैं। उदय शहाणे के संवाद और उनके हास्य पंच इतने सटीक हैं, कि लोग हंस-हंस कर लोटपोट हो जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजा अटकलपुंजी तक बेढंग की पत्नी सेवनिया की फरियाद पहुंचती है और फिर राजा के आदेश से पूरे राज्य में सघन तलाशी अभियान शुरू होता है। सैनिकों की टुकड़ी जो नाटक को सूत्र में पिरोए रखती है, एक्रोबेटिक्स और लट्ठ के अलग-अलग प्रयोगों से अच्छा समा बांधती है। नाटक में फगुनिया की एंट्री के बाद नया ट्विस्ट आता है। फगुनिया पर बाबा घोटालू, राज्य के सेनापति और महाराजा के मुंहलग्गू हंसतु तीनों का दिल आ जाता है। इसके बाद तेजी से सारा घटनाक्रम बदलता है और बाबा घोटालू की याद्दाश्त वापस आ जाती है और वो सेवनिया के पास फिर पहुंच जाते हैं लेकिन फगुनिया को राजा खुद अपनी सेवा में सु्रक्षित रख लेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी सरल है और उसे पेश उससे भी ज्यादा सरल तरीके से किया गया है। आधुनिक संदर्भों में कुछ और मायनीखेज बनाते हुए। नाटक का निर्देशन-फरीद बज्मी का है, जो लंबे वक्त से रंग-विदूषक से जुड़े रहे हैं। फरीद बज्मी ने कलाकारों को समूह के बीच भी उनकी अलग पहचान देने की कोशिश की है। सैनिकों में कोई भूत से डरता रहता है तो एक सैनिक हमेशा अपनी शेखी बघारता रहता है। वहीं एक सैनिक बोल न पाने की वजह से सैनिकों के बीच ठिठोली का पात्र बना रहता है। हर्ष की महाराजा के तौर पर छोटी किंतु प्रभावी एंट्री है। वहीं अमित रिछारिया भी टुकड़ों-टुकड़ों में नाटक में अपनी मौजूदगी दर्ज करते रहते हैं। संगीत अंजना पुरी का है, जो काफी विविधता लिए हुए है। इसके साथ ही सुरेन्द्र वानखेड़े भी वाद्य यंत्रों के जरिए नाटक को गति देने का काम बखूबी कर गए हैं। रंगविदूषक के लिए सबसे अच्छी बात ये है कि नए कलाकारों की एक टीम फिर बन गई है, जो काफी उम्मीदें जगाती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-7361223130666222441?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/7361223130666222441/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=7361223130666222441' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/7361223130666222441'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/7361223130666222441'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='नैन नचैया- नाचते रहे नैन !'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-7JgYyR8bKcs/Tww5tMEYxMI/AAAAAAAAAFM/SCkONNtRwH8/s72-c/nain3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-1312645422816329578</id><published>2011-10-20T19:02:00.000-07:00</published><updated>2011-10-20T19:17:08.226-07:00</updated><title type='text'>अंधा युग- रह रह कर दोहराता है!</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-2F6GU7iV5nQ/TqDV7LgMOLI/AAAAAAAAAFA/qOA02DOq_WE/s1600/Image1224.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-2F6GU7iV5nQ/TqDV7LgMOLI/AAAAAAAAAFA/qOA02DOq_WE/s400/Image1224.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5665763543908890802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के फिरोज शाह कोटला में 'अंधा युग' एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है। पचास साल बाद एक बार फिर किले में गूंज रहे हैं वो संवाद, जो अंदर तक झकझोर कर रख देते हैं। महाभारत के युद्ध के अट्ठारहवें दिन के घटनाक्रम को धर्मवीर भारती ने जिस रूप में पिरोया है, वो हर देश-काल में अपने मायने तलाश लेता है... आज के इस दौर में भी। आज भी जब सत्ता अपने मद में अक्सरां 'अंधी' हो जाती है और सरकार के 'महारथी' अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा की तरह या तो अपने 'पागलपन' में 'हत्यारे' की भूमिका अख्तियार कर लेते हैं, या फिर बिना विचारे अपने सारे 'ब्रह्मास्त्र' विरोधियों पर छोड़ देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये महज इत्तफाक ही था, कि 18 अक्टूबर, मंगलवार की संध्या दिल्ली की कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित दर्शक दीर्घा में मौजूद थीं, और मंच से 'शासकों' के 'दोमुंहेपन' और सत्ता की 'मदांधता' पर ऐसे संवाद गूंज रहे थे, जो एक साथ कई संदर्भों में चोट कर रहे थे। सत्ता को उसकी 'मर्यादा' का पाठ पढ़ाया जा रहा था। हालांकि मुख्यमंत्री के लिए ये उत्सव है-"इस वर्ष कोटला फिरोजशाह में ऐतिहासिक परिवेश में महाभारत पर आधारित महान नाटक अंधायुग हम सभी के लिए एक अत्यंत उत्साहजनक घटना... उत्सव की बेला है यह।" (मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का संदेश, ब्रोशर से) वाकई अंधायुग सत्ता के 'अंधेपन' का 'उत्सव' है! इसमें क्या संदेह रह जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक देखते हुए, कई बार हालिया टीम अन्ना का आंदोलन और उस दौरान देश की सरकार का रवैया भी समानांतर मन में कई तरह की हलचल पैदा करता रहा। ये तो एक बानगी है, देश में ऐसे कई आंदोलन चल रहे हैं और कमोबेश हर जगह सरकार की भूमिका और उसकी प्रतिक्रिया ऐसी ही रही है। शायद नाटक के निर्देशक भानु भारती का ये कथन कि उन्होंने नाटक को मौजूदा परिस्थितियों में और प्रासंगिक बनाने की कोशिश की है, इन्हीं प्रसंगों में कुछ और मायने तलाशता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक में 'महाराज' धृतराष्ट्र का एक संवाद आता है कि वो अपनी वैयक्तिकता में इस कदर उलझे कि उन्हें न तो बाह्य मानदंडों का खयाल रह गया और न ही वो उन शब्दों के मायने समझ पाए जो 'संजय' उनके सामने बार-बार दोहरा रहे थे। सत्ता को इस बात का एहसास होने में काफी वक्त लग जाता है कि वैयक्तिक सीमाओं से बाहर भी 'सत्य' होता है। धृतराष्ट्र की भूमिका निभा रहे मोहन महर्षि ने अपने अभिनय, भंगिमाओं और हरकतों से अपनी छटपटाहट और हार की वजहों को लेकर चल रहे आत्ममंथन को दर्शकों तक काफी बेहतर तरीके से संप्रेषित किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोटला के किले में जैसे-जैसे नाटक आगे बढ़ता है, पात्रों का अंतर्द्वंद्व भी तीर्वतर होता जाता है। बिलकुल मध्य से कोरस गान, मंच के दाईं तरफ धृतराष्ट्र का महल और बाईं तरफ वो 'स्पेस' जहां अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्य अपनी इस हार से बौखलाए, पगलाए से छटपटा रहे हैं। पिता द्रोण की धोखे से हुई हत्या के बाद अश्वत्थामा ने सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया, उसके लिए बस एक ही लक्ष्य है- पाण्डवों का समूल नाश, और इसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकता है। अश्वत्थामा की भूमिका निभा रहे टीकम जोशी ने बदले की आग में जलते एक शख्स के मनोभावों को बखूबी निभाया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अश्वत्थामा के द्वारा संजय पर हमला, एक वृद्ध याचक का 'वध', और पांडव शिविर पर हमला। ये सारे मनोभाव और परिस्थितियां धीरे-धीरे उद्धाटित होती हैं। एक तरफ जहां, धृतराष्ट्र सैनिकों को सहला कर युद्ध की पीड़ा को महसूस कर व्यथित हो उठते हैं तो वहीं पुत्रमोह में गांधारी अश्वत्थामा के कुकृत्यों का विवरण बड़े 'रस' से सुनती रहती हैं। उन्हें इसमें विदुर की ओर से पैदा किया गया कोई व्यवधान रास नहीं आता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधारी की भूमिका में उत्तरा बावकर को देखना, वाकई उस मां से होकर गुजरना है, जो युद्ध की इस बेला में अपनी हार स्वीकार नहीं कर पाती, अपने बेटे दुर्योधन को मरते हुए देखना नहीं चाहती, अपने घर आए बेटे युयुत्सु को आशीष के दो वचन नहीं सुना सकती और अंतत: उस कृष्ण को भी शापित कर देती है जिस पर पुत्र से भी ज्यादा मोह है। कृष्ण और गांधारी के बीच के संवाद में ओमपुरी की आवाज और उत्तरा बावकर के जवाब, सिहरन पैदा कर जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक, हर पल, हर क्षण सत्ता के मद और उसके द्वारा निर्मित 'युद्ध' की परिस्थितियों पर नरम-नरम चोट करता है। इस तनाव पूर्ण परिस्थितियों में भी दो प्रहरी (मौजूदा पुलिस और प्रशासन) की विवशता कटु हास्य पैदा करती है। दाएं से बाएं और बाएं से दाएं... दाएं से बाएं और बाये से दाएं... वाकई सत्ता ने यही काम तो प्रहरियों के जिम्मे छोड़ रखा है। नाटक के एक अन्य दृश्य में युयुत्सु प्रहरियों के हथियार से आत्महत्या कर लेता है। उस वक्त प्रहरी कहते हैं- जो अस्त्र-शस्त्र दुश्मनों के लिए थे, वो अब खुद अपनों के बीच तन गए हैं, चलो अच्छा हुआ ये अस्त्र जो हमारे पास थे आज कुछ काम तो आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाटक समाप्त होता है... वहां जहां आशाओं के दीप जल रहे हैं। नाटक में हिस्सा ले रहे सभी कलाकार एक एक कर मंच के अलग-अलग कोनों से हाथ में दीप लिए आते हैं। दीवाली से पहले कोटला में एक दीपोत्सव मनता है। इस वक्त वृद्ध याचक का एक संवाद फिर मन में उठता है- हर क्षण इतिहास बदलने का क्षण होता है... लेकिन क्या वाकई इस क्षण में हम इतिहास बदलने को तैयार हैं या फिर, रह-रह कर दोहराएंगे एक और 'अंधा युग'।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पशुपति शर्मा&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-1312645422816329578?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/1312645422816329578/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=1312645422816329578' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1312645422816329578'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1312645422816329578'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='अंधा युग- रह रह कर दोहराता है!'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-2F6GU7iV5nQ/TqDV7LgMOLI/AAAAAAAAAFA/qOA02DOq_WE/s72-c/Image1224.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-1055369189870706946</id><published>2011-08-25T19:03:00.000-07:00</published><updated>2011-08-25T21:14:32.424-07:00</updated><title type='text'>देश जागा ! ...तो मर गई सरकार !</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-Y3NgNM0LEpM/TlcB_2uGUhI/AAAAAAAAAE4/XcSB94t6RvI/s1600/Photo0299.jpg"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 300px; DISPLAY: block; HEIGHT: 400px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5644982854464459282" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-Y3NgNM0LEpM/TlcB_2uGUhI/AAAAAAAAAE4/XcSB94t6RvI/s400/Photo0299.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;strong&gt;देश के जागने पर सरकार के मरने का एहसास क्या होता है ? ये रामलीला मैदान में बैठे अन्ना हजारे और उनके लाखों समर्थकों से पूछिए। ये बात उन करोड़ों लोगों से पूछिए जो देश भर में 'अन्ना नहीं आंधी है... देश का दूसरा गांधी है...' के नारे लगा रहे हैं। ये बात उन छोटे-छोटे बच्चों से पूछिए जो 'ट्विंकल ट्विंकल लिट्ल स्टार.... खत्म हो ये भ्रष्टाचार' के बोल गुनगुना रहे हैं...! इससे पहले, कम से कम आज की युवा पीढ़ी को ये एहसास इतना तीव्रतर हो कर नस्तर की तरह नहीं चुभ रहा था कि सरकार मर चुकी है... और वो 'लोकतंत्र की चिता' पर अपनी 'अय्याशी का कबाब' सेंक रही है। हद तो ये है कि बकायदा ये 'कबाब' रामलीला मैदान में भूखे बैठे अन्ना की फिक्र छोड़कर प्रधानमंत्री की इफ्तार पार्टी में चबाया जा रहा है और लोकतंत्र का ठेका संभाले सांसदों में इसका स्वाद लेने की होड़ मची है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता पक्ष ने लोकतंत्र की मौत का इंतजाम किया और उसका मर्सिया पढ़ने की बारी आई तो बाकी पार्टियों को भी अपने साथ कर लिया। पहले टीम अन्ना के साथ सलमान खुर्शीद और प्रणब मुखर्जी ने जनलोकपाल पर मीटिंग-मीटिंग का नाटक खेला, सरकार के रटे-रटाए जुमले दोहराए, झूठे-सच्चे वादे किए और महज 24 घंटे में उन वादों को ऑल पार्टी मीटिंग में चाय कॉफी के साथ गटक लिया। टीम अन्ना को कह दिया कि जो मांग आप कर रहे हैं, ये मुमकिन नहीं है। एक पल में देश के लाखों करोड़ों लोगों के मन में जो उम्मीद जगी थी, सरकार में जो भरोसा जगा था, उसको लोकतंत्र के तमाम तकाजों के साथ ही कब्र में दफना दिया।&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;सरकार की पहली मौत&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस सरकार की धड़कन उस दिन बंद हो गई, जब पीएम को लोकपाल के दायरे से बाहर कर दिया गया। उस सरकार को जिंदा कैसे माना जा सकता है जो अपने आका को जांच से बचाने की जुगाड़ करती दिखे।&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;सरकार की दूसरी मौत&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार दूसरी बार तब मरी जब मनीष तिवारी जैसे प्रवक्ता को लड़ाई के मोर्चे पर आगे किया । लोकतांत्रिक व्यवस्था में समर्थन-विरोध की परंपरा को कुचलते हुए मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे पर ओछे आरोप लगाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सरकार की तीसरी मौत &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार की तीसरी बार मौत तब हुई जब उसने अन्ना हजारे को अनशन की जगह देने से इंकार कर दिया। सरकार ने दिल्ली पुलिस के जरिए अन्ना पर 22 नाजायज शर्तें थोप दीं। उस सरकार को कैसे जिंदा माना जाए जिसमें अपना विरोध सहने का माद्दा ना हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;सरकार की चौथी मौत &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार की चौथी मौत तिहाड़ जेल में हुई । सरकार ने अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया। वो सरकार जो अपने जननायकों से ऐसा बर्ताव करे, उसे जिंदा कैसे माना जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सरकार की पांचवीं मौत&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सरकार की पांचवी मौत तब हुई जब सरकार के तीन-तीन मंत्री चिदंबरम, सिब्बल और अंबिका सोनी देश को अन्ना की गिरफ्तारी की मजबूरियां बताने लगे। जब देश के गृहमंत्री ये झूठ बोलने लगे कि उन्हें नहीं मालूम कि इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस क्या करती रही और अन्ना को गिरफ्तार कर कहां रखा गया। उस सरकार को जिंदा कैसे माना जाए जो देश में इतनी बड़ी उथल-पुथल से आंखें मूंदें बैठी हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सरकार की छठी मौत&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सरकार की सांसें छठी बार तब थमीं, जब अन्ना हजारे ने तिहाड़ जेल से बाहर आने से ही मना कर दिया। जो सरकार सुबह अन्ना को देश की शांति के लिए खतरा बना कर गिरफ्तार करवा रही थी, वही सरकार शाम होने तक रिरियाती रही और अन्ना तिहाड़ जेल में ही अनशन पर डट गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सरकार की सातवीं मौत&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सातवीं बार सरकार दिल्ली ही नहीं देश भर के कई शहरों की सड़कों पर मरी। देश भर में लोग अन्ना के समर्थन में उतर आए। सरकार के खिलाफ नारे लगने शुरू हो गए। अन्ना के समर्थन में उमड़े जनसैलाब के आगे सरकार पूरी तरह दम तोड़ गई ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सरकार की आठवीं मौत&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अन्ना के अनशन के आठवें दिन सिर्फ सरकार ही नहीं संसदीय सिस्टम की मौत हो गई। तीन दिन की छुट्टियों में पघुराए सांसद जब संसद भवन पहुंचे तो जनलोकपाल और अन्ना के अनशन पर चर्चा के बहाने राजनीतिक रोटियां सेंकने लगे और किसी ने भी खुलकर कोई स्टैंड नहीं लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सरकार की नौवीं मौत&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सरकार की नौवीं मौत तब हुई जब टीम अन्ना के साथ सरकार विश्वासघात और छल पर उतर आई। सरकार ने पहले दिन जो मुहजबानी वादे किए, उसे दूसरे दिन लिख कर देने से साफ मना कर दिया। ये सरकार पर भरोसे की आखिरी मौत थी...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff6666;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सरकार की दसवीं मौत&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सरकार की दसवीं पर शोक संवेदना व्यक्त करने के लिए आप भी आमंत्रित हैं.... तारीख आप खुद तय कर लें... ये महज एहसास का सवाल है....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;पशुपति शर्मा/बजरंग झा &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;(अन्ना के आंदोलन पर प्रकाशित पत्रिका 'अनायास अन्ना' से उद्धृत)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-1055369189870706946?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/1055369189870706946/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=1055369189870706946' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1055369189870706946'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1055369189870706946'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='देश जागा ! ...तो मर गई सरकार !'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-Y3NgNM0LEpM/TlcB_2uGUhI/AAAAAAAAAE4/XcSB94t6RvI/s72-c/Photo0299.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-2747046259277808363</id><published>2011-07-13T18:46:00.000-07:00</published><updated>2011-07-13T18:47:36.477-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाजार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेट्रो'/><title type='text'>मेट्रो ये तो बताए पचास रुपये का गुनाह क्या है ?</title><content type='html'>जिस समय सरकार देश से चार आने को विदा कर रही थी, और भारी मन से आठ आने की जान बख्स रही थी, उसी वक्त देश की राजधानी की एक बड़ी कॉरपोरेट फर्म बड़े चुपके से पचास रूपये के नोट को उसकी औकात बता रही थी। सरकार ने चवन्नी को अलविदा किया तो अखबारों में खबरें भी आईं, फीचर भी छपे ... यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी बड़े तामझाम के साथ चवन्नी की विदाई का गम या जश्न जो भी समझें, महसूस कराया। लेकिन ये क्या दिल्ली मेट्रो की छोटी से छोटी खबर को अखबार की लीड बना कर परोसने वाले मीडिया ने इस बात का जिक्र तक नहीं किया कि अब जेब में पचास रूपये का नोट लेकर मेट्रो स्मार्ट कार्ड रिचार्ज कराने पहुंच रहे लोगों को काउंटर से बैरंग लौटाया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जी हां, दिहाड़ी मजदूर जो पचास रूपये का कूपन रिचार्ज करा कर दो चार दफा बिना लाइन में लगे मेट्रो का आरामदायक सफर कर लेता था, उसकी जेब में अगर सौ रूपये का नोट नहीं हो तो उसे लंबी लाइन में लग कर टोकन लेना पड़ेगा। लोग भले ही पूरे सफर एसी का मजा लेते रहें लेकिन वो बेचारा ये सोच कर ही पसीने-पसीने होते रहेगा कि दस रूपये के सफर में एक रूपये की जो बचत हो पाती, वो आज नहीं हो पाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही आलम उन छात्रों का भी होगा, जो यार दोस्तों से सौ-पचास उधार लेकर कहीं घूम आने के लिए मेट्रो का इस्तेमाल किया करते थे। मैं उन रईसपुत्रों की बात नहीं कर रहा, जिनके लिए एक दिन में हजार दो हजार खर्च कर देना कोई बड़ी बात नहीं है। मैं तो यूपी और बिहार से आने वाले ऐसे छात्रों की बात कर रहा हूं जो घर से अगले ड्राफ्ट के इंतजार में बड़ी मुश्किल से अपनी जरूरतें पूरी कर पाते हैं। इन सभी जरूरतमंदों की जरूरत से बेफिक्र एसी वाली मेट्रो के एसी में पघुराते अधिकारियों ने ये फैसला कर लिया कि अब पचास रूपये से स्मार्ट कूपन रिचार्ज नहीं होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महीने में अपने पतियों के साथ एक बार घर से बाहर निकलने वाली गृहणियों के लिए भी मेट्रो का ये फैसला किसी झटके से कम नहीं। घर के बजट से जोड़-जाड़ के, पति से लड़-झगड़ कर उन्होंने अपना मेट्रो कार्ड बनवाया था, जिसे वो सहेज कर रखतीं। घूमना-फिरना होता तो अपना कार्ड लेकर चलतीं और पचास रूपये रिचार्ज करवा कर घर तक लौट आतीं। पचास रूपये के रिचार्ज कूपन की अहमियत क्या होती है, मेट्रो अधिकारियों को एक बार इन महिलाओं से भी पूछ कर देख लेना चाहिए था। ऐसी न जाने कितनी महिलाएं होंगी, जो पहली दफा मेट्रो काउंटर पर हाथ से लिखी नई नोटिस देखकर मायूस होकर लौटीं होंगी... इसका हिसाब मेट्रो के पास कतई नहीं होगा। हां, उनसे आप पूछें न पूछें, आनंदविहार से वैशाली तक मेट्रो चालू होते ही पहले दिन कितने और लोगों ने मेट्रो का खजाना भरा, ये आंकड़ा वो आपके बिना पूछे भी मुहैया करा देंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई मेट्रो अधिकारियों से ये पूछेगा कि आखिर क्या सोच कर उन्होंने मेट्रो स्मार्ट कार्ड के रिचार्ज वैल्यू से पचास रूपये को विदा कर दिया? जो मेट्रो दस-दस रूपये के कूपन काउंटर से बेच रहा है, उसे एक मुसाफिर के पचास रूपये के रिचार्ज को नकारने का अधिकार किसने दिया ? वो मुसाफिर जिसने सौ रुपये में पहली बार मेट्रो स्मार्ट कार्ड खरीदा था, उसकी अनुमति के बिना उसका पचास का रिचार्ज क्यों बंद किया गया? क्या ये उपभोक्ताओं के अधिकार का हनन नहीं ? क्या ये मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा नहीं ? क्या ये देश की अर्थव्यवस्था में प्रचलित नोटों को मनमाने तरीके से अपमानित और अवमूल्यित करने की साजिश नहीं ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मेट्रो के सौ गुनाह भी माफ हैं... क्योंकि ई श्रीधरन जैसे काबिल लोगों ने रिकॉर्ड समय में मेट्रो का काम पूरा कर इसे विश्वस्तरीय उपलब्धि बना दिया है। ऐसे ग्लोबल उत्साह में किसी आम आदमी की मायूसी से उपजे सवालों पर चर्चा करना ही गुनाह है। कम से कम हमारे मीडिया में ऐसे सवालों के लिए कोई नहीं जगह नहीं, क्योंकि मेट्रो के पीआर अधिकारियों ने सब कुछ इतनी खूबसूरती से मैनेज कर रखा है कि मेट्रो मतलब... सुहाना ही सुहाना... मेट्रो मतलब खजाना ही खजाना.... ऐसे में आठ आने के सौ गुना मूल्य वाले पचास के नोट को मेट्रो स्मार्ट कार्ड काउंटर से बेआबरू होकर लौट आना पड़े तो किसी को मायूस नहीं होना चाहिए... लोगों को तो बस इस बात पर खुश होते रहना चाहिए कि मेट्रो ने पचास के नोट को इतनी इज्जत बख्स रखी है कि वो अकेले नहीं, एक हमसफर के साथ आए और सौ रुपये का रिचार्ज करा कर लौट जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-2747046259277808363?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/2747046259277808363/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=2747046259277808363' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/2747046259277808363'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/2747046259277808363'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='मेट्रो ये तो बताए पचास रुपये का गुनाह क्या है ?'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-1311781893839574946</id><published>2011-04-07T19:55:00.000-07:00</published><updated>2011-04-07T20:16:51.724-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जंतर-मंतर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आंदोलन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्ना हजारे'/><title type='text'>ये दाग दाग उजाला</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-E_iXk8d7nUE/TZ56yTlNFzI/AAAAAAAAAEs/5w5o_N0hLCE/s1600/BL06_04_ANNA_522024f.jpg"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; DISPLAY: block; HEIGHT: 265px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5593042791909103410" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-E_iXk8d7nUE/TZ56yTlNFzI/AAAAAAAAAEs/5w5o_N0hLCE/s400/BL06_04_ANNA_522024f.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-f0DSYY3H4JM/TZ55rMsxh2I/AAAAAAAAAEk/yXKcB58lyYg/s1600/2010081859570201.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;युवा साथी विश्वदीपक ने जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन की एक 'सुबह' को कुछ यूं बयां किया।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt; &lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैमरे खामोश थे. और मीडिया वाले ऊंघ रहे थे. कुछ चाय की चुस्कियों से अपनी थकान मिटाने की कोशिश कर रहे थे. तो कुछ चहलकदमी करके पैरो में सिमट आई एकरसता तोड़ रहे थे. सूरज आसमान में चढ़ रहा था. और जिंदगी फुटपाथ पर उतरने लगी थी. सुबह साफ और चमकदार थी. ये अन्ना के आमरण अनशन की पहली सुबह थी। &lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले चौबीस घंटे से जो 129 लोग आमरण अनशन पर थे उनके चेहरे पर थोड़ी थकान थी. अन्ना अभी तक मंच पर नहीं थे. मंच के नीछे कुछ जाने पहचाने चेहरे मिले. कुछ ने गले लगाकर स्वागत किया तो कुछ ने बस एक मीठी मुस्कान का तोहफा दिया. शायद लगा कि हां, सुबह जानदार है. शायद इसी तरह कोई सुबह आएगी जब भ्रष्टाचार की सियाही मिट जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;अन्ना के अनशन के समर्थन में बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर के बैनर भी मंच के ऊपर लहरा रहा है. पुलिस की मौजूदगी न के बराबर है। लगता है यूपीए सरकार भी अपरोक्ष रूप से अनशन में शामिल है. वक्त की सुई थोड़ा और आगे खिसकती है. सूरज थोड़ा और ऊपर चढ़ता है.लोगों की आवक जावक थोड़ी और बढ़ती है. कि तभी लोग मंच की तरफ भगाने लगते हैं. पता चलता है कि अन्ना मंच पर आ चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;कल के अन्ना और आज के अन्ना में एक महीन सा फर्क नजर आता है. उनकी चमड़ी का रंग थोड़ा और तांबई हो गया है. लेकिन हौसला और पक्का लग रहा है। &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;मंच के पास जाने का हौसला नहीं होता क्योंकि वहां की जगह कैमरों ने छीन ली है. खुद को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहने वाला मीडिया किस तरह अराजक है ये एक बार फिर स्थापित हुआ. हर कोई अन्ना से कुछ एक्सक्लूसिव चाह रहा था. जबकि इसमें कुछ भी एक्सक्लूसिव हो ही नहीं सकता। &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल जब अन्ना ने् अनशन का ऐलान किया था तब करीब दो हजार लोग जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए थे. हर वो आदमी जो किसी भी तरह से इस व्यवस्था के नीचे घुटन महसूस करता है अन्ना के अनशन से राहत महसूस कर रहा है। अन्ना से बातचीत की इच्छा दबाए वापस लौट पड़ता हूं. रास्ते में वो कुछ भी नहीं मिलता जो जाते वक्त मिला था. न वो हौसला और न ही वो उम्मीद। शायह हर यात्रा का अंत ऐसे ही होता है... तो क्या अन्ना की यात्रा का भी यही अंत होगा...?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-1311781893839574946?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/1311781893839574946/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=1311781893839574946' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1311781893839574946'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1311781893839574946'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='ये दाग दाग उजाला'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-E_iXk8d7nUE/TZ56yTlNFzI/AAAAAAAAAEs/5w5o_N0hLCE/s72-c/BL06_04_ANNA_522024f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-8390851130616868789</id><published>2011-03-29T10:19:00.000-07:00</published><updated>2011-03-29T10:37:42.181-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><title type='text'>खेल को 'खेल' रहने दो</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-MkDI7NvXi7Y/TZIW1EfUCEI/AAAAAAAAAEc/kX861tfSJsY/s1600/Image0864.jpg"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 300px; DISPLAY: block; HEIGHT: 400px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5589555188514162754" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-MkDI7NvXi7Y/TZIW1EfUCEI/AAAAAAAAAEc/kX861tfSJsY/s400/Image0864.jpg" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;div&gt;जो तुमसे बना है &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;उसे झुकाओ मत &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जरा सम्मान दो &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;थोड़ी तारीफ करो। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वो हमसे अलग नहीं&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रूप-रंग एक है &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;खेल भी है एक &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;इसे बस खेल रहने दो &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;युद्ध न बनाओ। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;ये नेताओं की रोटी है &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;उन्हें ही हज़म होती है &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;अगर खेल से बात बनती है &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;तो खेलो &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;भावना के मैदान पर। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जीत की जिद बेकार है &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;और दो दिन का है &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हार का मातम &lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;काश ऐसा हो &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक दूसरे का दिल जीतें &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;भारत और पाकिस्तान &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;प्रेम का रिश्ता हो आबाद &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;गले मिलें &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दिल्ली और इस्लामाबाद। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;भारत-पाक 'युद्ध' के बीच कविताई के ये बोल एक टीवी चैनल पर सुनाई दें तो थोड़ा अचरज होता है। थोड़ी हैरानी होती है, लेकिन एक सुखद एहसास भी होता है। भीड़ के शोर में कहीं कोई आवाज तो है, जिसमें किसी पत्रकार के एहसास और उसके तर्क सांसें ले रहे हैं। मोहाली में मुंबई की 'टीस' निकाल रहे टीवी शोज के बीच 29 मार्च (विश्वकप की सबसे बड़ी जंग से एक दिन पहले) को सीएनईबी ने एक कार्यक्रम पेश किया- खेल को खेल ही रहने दो, उससे खिलवाड़ मत करो। ये वाकई साहस का काम है। ये साहस टीआरपी की दौड़ में न होने की वजह से है या फिर अपनी अलग पहचान की तलाश की वजह से... वजह चाहे जो भी हो कार्यक्रम काबिले तारीफ जरूर है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;कहां मिसाइलें दागी जा रहीं हैं, रणभेरी बज रही है... तोप और टैंकर निकल गए हैं और कहां एक चैनल प्राइम टाइम में दिल्ली और इस्लामाबाद के दिल मिलाने की बात कर रहा है। कहते हैं भीड़ की एक साइक्लॉजी होती है, जिसमें सारे सही और गलत काम होते चले जाते हैं और किसी को कोई अपराध बोध नहीं होता। यही वजह है कि ज्यादातर बड़े चैनलों में मोहाली का मैच 'महासंग्राम' बन चुका है और खिलाड़ी 'योद्धा'। शब्दावली लगभग एक सी है, उन्माद लगभग एक सा है, अपराधबोध लगभग सभी जगह सिरे से नदारद। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बहरहाल सीएनईबी ने मंगलवार की रात 8.30 से 9.30 के बीच एक ऐसा शो प्रसारित किया, जिसे कम से कम मीडियाकर्मी मीडिया की संजीदगी की मिसाल के तौर पर पेश कर सकेंगे। भारत-पाक मैच को खेल भावना के तौर पर देखने की वकालत करते इस शो में वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र रंजन और सीएनईबी के वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी देवांशु झा ने बड़े संतुलित तरीके से दर्शकों के मानस को झकझोरा। सत्येंद्र रंजन ने बेहद वाजिब सवाल उठाया कि पिछले 3-4 दिनों से जो उन्माद फैलाया जा रहा है, कल मैच के बाद अगर उसकी परिणति किसी हिंसक घटना के रूप में हुई तो उसका जिम्मेदार कौन होगा ? &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सत्येंद्र रंजन ने मीडिया की दिक्कतों का भी हवाला दिया और कहा कि जब क्रिेकेट पर लगातार कवरेज होगी तो अलग-अलग एंगल निकालने ही होंगे। ऐसे में कब पत्रकारीय मर्यादा की सीमाएं दरक जाती हैं, पता ही नहीं चलता। जाहिर है, जब मनुष्य की आदिम हिंसा भड़कती है तो वो बढ़ती ही चली जाती है। तीर, तलवार से तोप तक पहुंचती है और फिर बम गोला बारूद से होती हुई मिसाइल हमले शुरू कर देती है। अभी क्रिकेट के पिच पर परमाणु बम फटने बाकी हैं। सचिन के शतकों के शतक के साथ हो सकता है, मोहाली की पिच पर जापान का रेडिएशन भी पसर जाए।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;शो के दौरान देवांशु झा ने दोस्ती की पिच पर 'हरी घास' के बेहद संवेदनशील जुमले का इस्तेमाल किया। वाकई खून के लाल रंग के बीच दोस्ती की हरी घास आंखों को काफी सुकून दे जाती है। देवांशु झा ने कहा कि क्रिकेट को हमारी कुंठा निकालने का मौका नहीं समझना चाहिए। उनका सवाल बेहद वाजिब है कि मैदान में क्रिकेट खेल रहे शाहिद आफरीदी किस ब्रिगेड में शामिल हैं, उमर गुल फौज की किस आर्टिलरी का हिस्सा हैं? &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;हालांकि अभी दो दिन पहले तक सीएनईबी की जुबान पर भी दबे सुर में ही सही रण के शोले सुलग जरूर रहे थे... आप खुद देखिए चैनल पर प्रसारित इन पंक्तियों में कैसे 'सब के सब के मारे जाने' की धमकी छिपी है.... &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रण में जब तुम उतरोगे &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मन डोल डोल जाएगा &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सब व्यूह छिन्न हो जाएंगे &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सब के सब मारे जाएंगे &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;गनीमत ये है कि 'युद्ध' के अंत से पहले चैनल की चेतना जाग गई... उन्हें ये एहसास हो गया कि बाजार की भाषा और भाव तो हर दिन हावी रहते हैं एक दिन अंतरात्मा की आवाज सुनने में क्या हर्ज है... एक दिन दोस्ती का तराना गुनगुनाने से क्यों गुरेज करें? &lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;पशुपति शर्मा &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-8390851130616868789?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/8390851130616868789/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=8390851130616868789' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8390851130616868789'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8390851130616868789'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2011/03/blog-post_29.html' title='खेल को &apos;खेल&apos; रहने दो'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-MkDI7NvXi7Y/TZIW1EfUCEI/AAAAAAAAAEc/kX861tfSJsY/s72-c/Image0864.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-5995307200101995277</id><published>2011-03-13T07:00:00.000-07:00</published><updated>2011-03-13T07:08:20.140-07:00</updated><title type='text'>हिन्दी को मांजो... रगड़ो... बदलो... और चला दो</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-DUXzV1aOCFA/TXzO_le3rKI/AAAAAAAAAEU/kcCF7jzXCUA/s1600/Image0858.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; FLOAT: left; HEIGHT: 400px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5583565229821242530" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-DUXzV1aOCFA/TXzO_le3rKI/AAAAAAAAAEU/kcCF7jzXCUA/s400/Image0858.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;('हिन्दी बदलेगी तो चलेगी!' विषय पर 12 मार्च की शाम दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुई परिचर्चा पर एक रिपोर्ट।) &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;12 मार्च की शाम, इंडिया हैबिटेट सेंटर के एम्फी थियेटर में हिन्दी को बदलने और बदल कर चलाने की फिक्र में हिन्दी जगत के सुधी पाठक, लेखक और शुभचिंतकों की जमात जमा हुई। कार्यक्रम की शुरुआत वैशाली माथुर की चंद लाइनों से हुईं। वैशाली ने हिन्दी के 'महानुभावों' का स्वागत करते हुए कार्यक्रम का संचालन पेंगुइन हिन्दी के संपादक सत्यानंद निरुपम को सौंप कर अपना 'पिंड' छुड़ाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्यानंद निरुपम ने माइक थामते ही एक 'सत्यनुमा' सवाल दागा या यूं कहें कि एक बयान दे डाला कि - 'हिंदी जैसे चल रही है, वैसे नहीं चल सकती।' दूसरी बात उन्होंने कही कि हिन्दी के साथ कई दिक्कतें हैं, जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। सत्यानंद निरुपम के मुताबिक हिंदी के सबसे बड़े हितैषी अकादमिक क्षेत्र के लोग हैं। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी चिंता जाहिर की कि हिन्दी में कोई ऐसी पत्रिका क्यों नहीं जिसे एक लाख लोग खरीद कर पढ़ते हों। परिचर्चा के दौरान बीच-बीच में निरुपम कुछ ऐसे ही 'तराने' छेड़ते रहे जिससे 'हिन्दी मन' उद्वेलित होता रहा। जाहिर है उनके हर बयान से सहमति और असहमति दोनों की पर्याप्त गुंजाइश थी और शायद यही निरुपम का मकसद भी था। बहस चल निकली और बड़ी गर्मजोशी के साथ चलती रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली विश्वविद्यालय के व्याख्याता आशुतोष कुमार ने पहली पंक्ति में हिन्दी साहित्य का हिन्दी समाज से रिश्ता तोड़ डाला। उनकी माने तो अब साहित्य और समाज में वो जान-पहचान नहीं रही जो इस भाषा की जान भी थी और पहचान भी। इसके लिए उन्होंने रामचंद्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास को अकादमिक क्षेत्र का बुनियादी ग्रंथ बनाए जाने को जिम्मेदार ठहराया। आशुतोष कुमार के मुताबिक रामचंद्र शुक्ल के इतिहास ने खड़ी बोली की परंपरा को हिन्दी के इतिहास से बाहर निकाल दिया। दूसरी तरफ बोलियों के 'क्लासिकल' साहित्य को इतिहास में समाहित किया लेकिन आधुनिक साहित्य को सिरे से खारिज कर दिया। इससे हिन्दी भाषा की रवानगी और उसका सहज विकास बाधित हुआ। इसके साथ ही आशुतोष ने अखबारी हिन्दी में 'ग्लोबिश भाषा' के बनते या बिगड़ते स्वरूप को समझने और गंभीरता से देखने की जरूरत पर जोर दिया। उनका धाराप्रवाह विचार कुछ देर और प्रवाहित हो सकता था लेकिन निरुपम ने 'रुकावट के लिए खेद है' के अंदाज में दखल दे दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद बारी लेखिका नूर जहीर की आई। नूर ने भाषा को मजहब से जोड़ने को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि मजहब के साथ जुड़कर दोनों ही भाषाओं का नुकसान हुआ है। आज दोनों भाषाओं के पैरोकार अंग्रेजी के करीब जाने में हिचक महसूस नहीं करते लेकिन एक-दूसरे से 'भाषाई दुश्मनी' बखूबी निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उर्दू जबान में 'सेक्रेटरी' का इस्तेमाल तो हो सकता है लेकिन 'सचिव' से तौबा कर ली गई है। हालांकि उन्होंने इसके लिए 'राजनीति' से ज्यादा व्यक्तिगत 'ईगो' को जिम्मेदार बताया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कवयित्री अनामिका ने अपने छोटे से भाषण में प्रेशर कुकर की एक सीटी में पकने वाली 'भाषा की खिचड़ी' सिझाई और उसे सुपाच्य बना कर लोगों के गले से नीचे 'ससार' दिया। उन्होंने कहा कि हिन्दी में जितने भी भाषा के शब्द 'फेटे' जा सकते हैं, फेटे जाने चाहिए। उन्होंने अपने वक्तव्य में भी 'टुईयां', 'ठस्सा' और 'धड़का' जैसे शब्द फेटे और भाषा की ताकत का एहसास कराया। सबसे अच्छी बात ये रही कि उन्होंने भाषा को लेकर, बोली को लेकर मन का 'धड़का' खत्म करने की वकालत की। वाकई अगर ये धड़का खत्म हो गया तो फिर हिन्दी और हिन्दीवालों की कई सारी दिक्कतें खुद ब खुद हल हो जाएंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सराय' के साथ लंबे वक्त से जुड़े रविकांत ने हिन्दी भाषा की शब्दावली को लेकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कंप्यूटर जैसे नए क्षेत्रों के लिए अपनी जबान की शब्दावली होनी ही चाहिए। उन्होंने 'इनबॉक्स' के लिए 'आई डाक' और 'आउट बॉक्स' के लिए 'गई डाक' जैसे शब्द बनाने, तलाशने और तराशने के अपने अनुभव साझा किए। हालांकि दीर्घा में मौजूद फिल्मकार के विक्रम सिंह को उनका ये प्रयोग 'दकियानूसी' लगा। के विक्रम सिंह ने ये सवाल उठाया कि आखिर हिन्दी वालों को 'इन बॉक्स' और 'आउट बॉक्स' से परेशानी क्यों होती है? जाहिर है, विक्रम सिंह जैसे लोगों का एक वर्ग है जो ये मानता है कि अगर चलने के लिए हिन्दी को बदलना है तो उसे ऐसे 'शब्दों' या 'बदलावों' से परहेज क्यों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर में हिन्दी के 'एलिट' मीडियाकर्मी रवीश कुमार (आपकी स्वीकारोक्ति है) ने 'हिन्दी में अंग्रेजी झाड़ने' का अपना अनुभव भी साझा किया और मीडिया में हिन्दी को बतौर भाषा बरतने को लेकर अपनी चिंता भी जाहिर भी की। 'जापान में कुदरत का डबल अटैक' जब टेलीविजन की स्क्रीन पर नजर आता है तो हिन्दी जबान और उसकी संवेदनात्मक, भावात्मक अभिव्यक्ति की क्षमता को भी 'दिल का डबल अटैक' पड़ता है, लेकिन ये बात कोई समझने को तैयार नहीं। 'माइग्रेशन' के साथ भाषा में बन रही खिचड़ी का सौंधापन रवीश कुमार को भी पसंद है लेकिन जब ये भाषा 'संघर्ष' के बजाय 'समझौते पर समझौते' करने लगती है तो उनका मन कहीं कचोटता जरूर है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंच पर आसीन 'महानुभावों' के बोल चुकने के बाद दीर्घा में बैठे महानुभावों की बारी आई। इनमें वरिष्ठ पत्रकार अजीत राय की टिप्पणी विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। अजीत राय का दर्द ये है कि हिन्दी में नाट्य समीक्षा, फिल्म समीझा की कोई कद्र नहीं है। इसके साथ ही वो ये कहना भी नहीं भूलते- "अगर मैंने हिन्दी में किए अपने काम की तुलना में 5 फीसदी काम भी अंग्रेजी में किया होता तो आज यहां नहीं होता... आज आपका भाषण नहीं सुन रहा होता... कहीं और होता....।" हिन्दी वाले की 'कहीं ओर चले जाने की ललक' भी लगता है हिन्दी का थोड़ा बहुत नुकसान तो कर ही रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर! बहस दो जाम साथ लगाने की अर्जी के साथ खत्म हो गई। एक जाम शायद उस सवाल के नाम की कि जब बहस हिन्दी पर हो रही है तो मंच के पीछे लगे बोर्ड पर हिन्दी का कोई शब्द क्यों नहीं? और दूसरा जाम 'बदलने का सबक' सीखने के लिए। आखिर अंग्रेजी के साथ चलने के लिए हिन्दी को कुछ नए 'दस्तूर' भी तो सीखने होंगे। वरना हिन्दी पट्टी में किसी संगोष्ठी के बाद खुले तौर पर जाम का न्यौता कहां मिल पाता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- पशुपति शर्मा&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-5995307200101995277?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/5995307200101995277/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=5995307200101995277' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5995307200101995277'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5995307200101995277'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='हिन्दी को मांजो... रगड़ो... बदलो... और चला दो'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-DUXzV1aOCFA/TXzO_le3rKI/AAAAAAAAAEU/kcCF7jzXCUA/s72-c/Image0858.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-6194971795029024781</id><published>2011-02-01T20:53:00.000-08:00</published><updated>2011-02-01T20:55:22.526-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सूरज का सातवां घोड़ा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पाठक मन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मध्यवर्ग'/><title type='text'>सूरज का सातवां घोड़ा-प्रेम का सतरंगा एहसास</title><content type='html'>मध्यवर्ग और प्रेम, मध्यवर्ग और उसकी विडंबनाएं, प्रेम और उसकी विडंबनाएं- जो धर्मवीर भारती के उपन्यास " सूरज का सातवां घोड़ा " की निष्कर्षवादी कहानियों के जरिए सामने आईं, उनमें 5 दशकों के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ा है। मध्यवर्ग के दोस्तों के जमावड़े में आज भी राजनीति के बाद प्रेम ही दूसरा सबसे अहम चर्चा का मुद्दा होता है। आखिर प्रेम की बतरसी में ऐसा क्या आनंद है कि तमाम मुद्दे पीछे छूट जाते हैं? ये सवाल हमारे मन में भी उठता है और यही सवाल उपन्यास में भी रखा गया है- 'जिन्दगी में अधिक से अधिक दस बरस ऐसे होते हैं जब हम प्रेम करते हैं। उन दस बरसों में खाना-पीना, आर्थिक संघर्ष, सामाजिक जीवन, पढ़ाई-लिखाई, घूमना-फिरना, सिनेमा और साप्ताहिक पत्र, मित्र गोष्ठी इन सबसे जितना समय बचता है, उतने में हम प्रेम करते हैं। फिर इतना महत्व उसे क्यों दिया जाए?' (पृष्ठ संख्या-16) &lt;br /&gt;यहीं हम थोड़ा धोखा खा जाते हैं, दरअसल प्रेम किसी न किसी रूप में हमारी इन सभी क्रियाओं में मौजूद रहता है। आर्थिक संघर्ष में भी प्रेम निहित होता है और सामाजिक जीवन में भी प्रेम अपने अवसर तलाश लेता है। ऐसे में चाहे-अनचाहे प्रेम की गिरफ्त में आप आ ही जाते हैं और उससे बचने के तमाम उपाय बेकार साबित हो जाते हैं। तभी तो माणिक मुल्ला कहते हैं- "प्रेम नामक भावना कोई रहस्यमय, आध्यात्मिक या सर्वथा वैयक्तिक भावना न होकर वास्तव में एक सर्वथा मानवीय सामाजिक भावना है, अतः समाज व्यवस्था से अनुशासित होती है और उसकी नींव आर्थिक संगठन और वर्ग संबंध पर स्थापित होती है।" (पृष्ठ संख्या-18)&lt;br /&gt;ये भी सच है कि "प्रेम में खरबूजा चाहे चाकू पर गिरे, चाहे चाकू खरबूजे पर, नुकसान हमेशा चाकू का ही होता है। अत: जिसका व्यक्तित्व चाकू की तरह तेज और पैना हो, उसे हर हालत में उस उलझन से बचना चाहिए।" (पृष्ठ संख्या-15) लेकिन कौन है जो इस उलझन से बच पाया है? खास कर वो व्यक्ति जिसका 'व्यक्तित्व चाकू की तरह तेज और पैना' है, वो तो कतई नहीं बच सकता। ये बात माणिक मुल्ला की कहानियों में बार-बार सामने आती है। नायक चाह कर भी जमुना, सत्ती या फिर लिली के सुख-दुख का साझीदार बनने से खुद को रोक नहीं पाता और कहीं न कहीं प्रेम की टीस भरी आह को सीने में दफ्न करने की जद्दोजहद से गुजरता रहता है।&lt;br /&gt;उपन्यास में 'पहली दोपहर' की कहानी जमुना, तन्ना और माणिक के ईर्द-गिर्द घूमती है। महेसर दलाल का बेटा तन्ना पिता की डांट के बाद जमुना से किनारा कर लेता है तो गोत और खानदान की दुहाई देकर जमुना की मां रिश्ते के लिए ना कर देती है। दो प्यार करने वाले दिल टूट जाते हैं और जमुना को माणिक मुल्ला का कंधा रोने-धोने को मिल जाता है। कीर्तन की वजह से जमुना को रात में कुछ तन्हाई मिल जाती है तो गऊग्रास की वजह से माणिक को हर दिन जमुना के पास जाने की 'सजा'। ये करीबियां 'प्रेम' की तरफ बढ़ने लगती हैं- 'जमुना को माणिक चुपचाप देखें और माणिक को जमुना और गाय इन दोनों को'। मध्यवर्ग की इस प्रेम कहानी को पहली दुपहरी में माणिक मुल्ला पाठकों को तपती धरती की तपिश के साथ ही छोड़ देते हैं- "जब मैं जाता तो मुझे लगता कोई कह रहा है माणिक उधर मत जाओ यह बहुत खराब रास्ता है, पर मैं जानता था कि मेरा कुछ बस नहीं है। और धीरे-धीरे मैंने देखा कि न मैं वहां जाये बिना रह सकता था न जमुना आये बिना।" (पृष्ठ संख्या-24)&lt;br /&gt;जमुना के 'नमकीन पुए' कहानी सुनने वालों के लिए हास्य का विषय बहुत देर तक नहीं रह पाते। जब हम इस हकीकत से रूबरू होते हैं कि 90 फीसदी लड़कियां (आज ये आंकड़ा कुछ कम भले ही हो गया हो लेकिन तस्वीर बहुत ज्यादा नहीं बदली है।) जिंदगी के अभाव की वजह से प्रेम से वंचित रह जाती हैं, तो दुख होता है। दूसरों का प्रेम और नाटकीय घटनाएं हमेशा अचरज भरी होती हैं और हास्य पैदा करती हैं। दरअसल प्रेम हमेशा गढ़े हुए मुहावरों की शक्ल में नहीं आता, इसलिए उसमें एक तरह की मूर्खता भी दिखती है और एक तरह का नयापन भी हमेशा बना रहता है।&lt;br /&gt;दूसरी दोपहर, एक अधेड़ किंतु 'पुख्ता' (पानी खाए) मरद के साथ जमुना की शादी और घोड़े की नाल के करिश्मे के नाम रहती है। 'पुत्र' प्राप्ति के लिए जमुना की तपस्या से देवताओं का मन भले न पिघला हो लेकिन रामधन उसका ये 'कष्ट' नहीं देख सका। अब इसे आप प्रेम कहें या कुछ और वो जमुना को तीन दिन तक तांगे में बिठा कर गंगा पार ले गया और जमींदार साहब के यहां 'नौबत' बज उठी। जमींदार साहब की मौत के बाद जमुना ने ' रामधन को एक कोठरी दी और पवित्रता से जीवन व्यतीत करने लगी।' इस कहानी में प्रेम का एक और रूप सामने आया, जहां समाज की 'मर्यादाएं' भी नहीं टूटीं और जमुना की 'गृहस्थी' भी चल पड़ी। "एक ओर नये लोगों का यह रोमानी दृष्टिकोण, यह भावुकता, दूसरी ओर बूढ़ों का यह थोथा आदर्श और झूठी अवैज्ञानिक मर्यादा सिर्फ आधी ईंच बरफ है, जिसने पानी की खूंखार गहराई को छिपा रखा है।" (पृष्ठ संख्या, 35) प्रेम के इस समाजशास्त्रीय 'इफेक्ट' को आप किसी 'वाद' की व्याख्या के जरिए नहीं समझ सकते।&lt;br /&gt;तीसरी दोपहर, माणिक मुल्ला अपनी किस्सागोई में प्रेम के होने की खुशी और न होने की हताशा की कड़ियां जोड़ते चले जाते हैं। माणिक मुल्ला के शब्दों में-"जब मैं प्रेम पर आर्थिक प्रभाव की बात करता हूं तो मेरा मतलब यह रहता है कि वास्तव में आर्थिक ढांचा हमारे मन पर इतना अजब-सा प्रभाव डालता है कि मन की सारी भावनाएं उससे स्वाधीन नहीं हो पातीं और हम जैसे लोग जो न उच्च वर्ग के हैं, न निम्न वर्ग के, उनके यहां रूढ़ियां, परम्पराएं, मर्यादाएं भी ऐसी पुरानी और विषाक्त हैं कि कुल मिलाकर हम सभी पर ऐसा प्रभाव पड़ता है कि हम यंत्र मात्र रह जाते हैं, हमारे अंदर उदार और ऊंचे सपने खत्म हो जाते हैं और एक अजब सी जड़ मूर्च्छना हम पर छा जाती है।" (पृ 38)&lt;br /&gt;एक तरफ महेसर दलाल अपने बेटे तन्ना और जमुना के सच्चे प्रेम को सामाजिक प्रतिष्ठा की भेंट चढ़ा देता है तो दूसरी तरफ वही महेसर दलाल 'बच्चों की फिक्र' में 'बुआ' को घर लाकर बिठा लेता है। विषाक्त परंपराएं ही हैं कि तन्ना 'घरजमाई' बनने को तैयार नहीं होता और महेसर दलाल तन्ना की होने वाली 'सास' के घर रात-रात भर ठहरने का बहाना तलाश लेते हैं। शादी के बाद भी जमुना तन्ना के करीब आना चाहती है लेकिन वो उसे ठुकरा देता है, जबकि महेसर दलाल किसी 'साबुनवाली' पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते हैं। प्रेम और वासना की बारिकियों को धर्मवीर भारती ने बखूबी उपन्यास में उकेरा और मध्यवर्गीय नैतिकता को हर तरफ से कठघरे में खड़ा किया। तमाम नैतिकताओं का बोझ ढोते तन्ना की दोनों टांगे कट जाती हैं, जबकि जमुना रामधन के साथ मस्त है तो महेसर दलाल 'सत्ती' को पाने की जोड़तोड़ में जुटे रहते हैं।&lt;br /&gt;चौथी दोपहर, माणिक मुल्ला और लिली के प्रेम की लफ्फाजी और आदर्शवादी बातें रखी गईं, जो जीवन का यथार्थ या सच नहीं बन पातीं। माणिक मुल्ला लिली को स्वीकार करने का दम नहीं दिखा पाते और लिली भी रो-धोकर अपने विवाह की मजबूरी को स्वीकार कर लेती है। "इस रूमानी प्रेम का महत्व है, पर मुसीबत यह है कि वह कच्चे मन का प्यार होता है। उसमें सपने, इंद्रधनुष और फूल तो काफी मिकदार होते हैं पर वह साहस और परिपक्वता नहीं होती जो इन सपनों और फूलों को स्वस्थ सामाजिक संबंध में बदल सकें।" (पृष्ठ-50) दो टूटे दिल विवाह के बंधन में बंधते हैं- लिली और तन्ना का निकाह इसी विडंबना का हिस्सा है। महानगरों से लेकर कस्बों तक दसवीं और बारहवीं के युवाओं की प्रेम कहानियों के ऐसे 'द एंड' के गवाह हम और आप भी कई बार बन चुके हैं।&lt;br /&gt;पांचवी दोपहर, एक श्रमशीला स्त्री और एक लिजलिजे शख्स की प्रेम कहानी के नाम रहती है। 'पढ़ी लिखी भावुक लिली' और 'अनपढ़ी दमित मनवाली जमुना' के मुकाबले 'स्वाधीन लड़की' का व्यक्तित्व माणिक मुल्ला को अपनी ओर खिंचता है तो लेकिन जब फैसले की घड़ी आती है तो माणिक मुल्ला साहस नही दिखा पाते। बेचारी सत्ती जो अपना सबकुछ माणिक मुल्ला पर न्यौछावर करने को तैयार है, जो माणिक मुल्ला के भरोसे पूरी दुनिया से लड़ने को तैयार है, वही माणिक मुल्ला धोखे से उसे चमन ठाकुर और महेसर दलाल के हाथ सौंप देते हैं। माणिक मुल्ला की सारी कविताई, सारी भावनाएं उस वक्त जवाब दे जाती हैं, जब एक स्त्री अपना सबकुछ दांव पर लगाकर उसकी शरण में चली आती है।&lt;br /&gt;छठी दोपहर, माणिक मुल्ला के अफसोस, उसके पाश्चाताप और उसकी उदासी में गुजरती है। माणिक मुल्ला जैसे 'बौद्धिकों' का कैसा हाल हो जाता है, उसको लेखक ने कुछ यूं बयां किया है- "मुझमें अपने व्यक्तित्व के प्रति एक अनावश्यक मोह, उसकी विकृतियों को भी प्रतिभा का तेज समझने का भ्रम और अपनी असामाजिकता को भी अपनी ईमानदारी समझने का अनावश्यक दम्भ आ गया था।" (पृष्ठ-74) हालांकि सत्ती के जीवित होने की खबर सुनते ही वो 'सामान्य मानव' बन गए। वो तन्ना की नौकरी भी कर लेते हैं और भीख मांगती सत्ती को देख संतोष कर लेते हैं कि वो 'बाल बच्चों सहित प्रसन्न' है।&lt;br /&gt;सातवीं दोपहर, उपन्यासकार 'सूरज का सातवां घोड़ा' के नामकरण के औचित्य को समझाते हुए मध्यवर्ग में व्याप्त हताशा, निराशा के बीच उम्मीद का, सपनों का घोड़ा दौड़ाने की सलाह दे जाते हैं। "वह घोड़ा है भविष्य का घोड़ा, तन्ना, जमुना और सत्ती के नन्हें निष्पाप बच्चों का घोड़ा, जिनकी जिंदगी हमारी जिंदगी से ज्यादा अमन चैन की होगी, ज्यादा पवित्रता की होगी, उसमें ज्यादा प्रकाश और ज्यादा अमृत होगा।" (पृष्ठ-79) लेखने सपने तो बहुत अच्छे बुने लेकिन हकीकत आज भी उतनी ही कड़वी और हताशाजनक है आज भी सत्ती, जमुना और लिली का हश्र पहले सा ही भयावह है, आज भी अनुपमा पाठक अपने ही घर में मार दी जाती है, आज भी घरों की चारदीवारी में पनपता प्रेम अपने अंजाम तक नहीं पहुंच पाता। कभी गले में रस्सी तो कभी पंचायत में सरेआम कत्ल। आपके ईर्द-गिर्द कोई सत्ती, जमुना या लिली दिख जाए तो उसके सपनों के घोड़ों को थोड़ी आजादी देने की कोशिश करो तो जानें।&lt;br /&gt;पशुपति शर्मा&lt;br /&gt;संपर्क-1011, सेक्टर 15, वसुंधरा, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश 201010 (मोबाइल-9868203840)&lt;br /&gt;(नोट- सूरज का सातवां घोड़ा, भारतीय ज्ञानपीठ का 37 वां संस्सकरण के मुताबिक पृष्ठ संख्या दी गई है।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-6194971795029024781?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/6194971795029024781/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=6194971795029024781' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6194971795029024781'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6194971795029024781'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='सूरज का सातवां घोड़ा-प्रेम का सतरंगा एहसास'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-4458566318040139941</id><published>2011-01-17T20:09:00.000-08:00</published><updated>2011-01-17T20:20:14.419-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजकिशोर केसरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रूपम पाठक कांड'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पूर्णिया'/><title type='text'>रूपम पाठक और हमारी उदासीनता का अर्थ</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TTUUjxPrfOI/AAAAAAAAAEI/PQnOTDQV7OA/s1600/Subhashini_Ali1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 147px; height: 216px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TTUUjxPrfOI/AAAAAAAAAEI/PQnOTDQV7OA/s400/Subhashini_Ali1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5563375519433194722" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पिछले हफ्ते अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की अपनी सहयोगियों के साथ मैं पूर्णिया गई हुई थी। वहां हमारी मुलाकात भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी पर हमला करने वाली रूपम पाठक की माताजी और उनके साथ हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोप में बंद पत्रकार नवलेश पाठक की पत्नी रोमा पाठक से हुई। हम रूपम पाठक और नवलेश पाठक से मिलना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने मिलने नहीं दिया। प्रदर्शन का यह नतीजा जरूर हुआ कि नवलेश पाठक के पास उसकी पत्नी गरम कपड़े पहुंचा सकीं। एक हफ्ते से बंद उस पत्रकार को कड़ाके की ठंड में गरम कपड़ों से वंचित रखा गया था। दूसरे दिन रोमा पाठक को एक हफ्ते बाद पहली बार अपने पति से मुलाकात का मौका मिला, लेकिन रूपम पाठक को अपनी मां और वकील से मिलने नहीं दिया गया। हमने मुख्यमंत्री सचिवालय से संपर्क किया और उसके बाद रूपम को अपने वकील से मिलने की अनुमति भी मिल गई। विधायक पर हमले के बाद उसे बहुत बुरी तरह से मारा गया था। एफआईआर के अनुसार, एक हजार लोगों ने उसे मारा, लेकिन उसे किसी प्रकार की चिकित्सा सेवा नहीं दी गई। वह भी ऐसे प्रांत में, जहां कई-कई कत्ल के आरोपी नेताओं का जेल जाने के रास्ते में स्वास्थ्य खराब होता रहा है और उन्हें तुरंत अच्छे अस्पतालों में पहुंचाया जाता रहा है, लेकिन रूपम पाठक की किस्मत में मरहम-पट्टी भी नहीं लिखी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में आम लोगों से मिलने पर लगा कि उनमें एक गहरी निराशा और उदासीनता थी, वे नहीं मानते कि इस मामले में कुछ होगा। निराशा इसलिए कि बड़े लोगों के तमाम पाप बहुत आसानी से माफ हो जाते है। राजनैतिक दलों के नेताओं के पीछे शासन-प्रशासन की पूरी ताकत खड़ी हो जाती है। उनके तमाम अपराधों पर पर्दा डाल दिया जाता है। पकड़े भी जाते हैं तो जल्दी छूट भी जाते हैं। उनके मरने पर भी उनकी ताकत कम नहीं होती और जिनको वह जिन्दा रहकर परेशान करते हैं, उनका उत्पीड़न उनके मरने के बाद भी जारी रहता है। राजनीति, आन्दोलन और न्याय के लिए संघर्ष के प्रति आम लोगों में उदासीनता पैदा करने का बीड़ा तो समस्त पूंजीवादी मीडिया, तमाम बुद्धिजीवियों और इस वैश्वीकरण के दौर में पनप रहे तमाम संगठनों और संस्थाओं ने उठा रखा है। इन दोनों प्रतिक्रियाओं के बीच फंसे लोग यह जान भी नहीं पाते है कि उनकी उदासीनता ही उनकी निराशा का एक बहुत बड़ा कारण है। अगर वह विरोध करना भूल जाएंगे, या अगर उनका विरोध असली दुनिया में नहीं केवल ‘वचरुअल’ दुनिया तक सीमित रह जाएगा। वे इंटरनेट पर, ज्ञापनों पर हस्ताक्षर करके या ट्विटर पर अपने आक्रोश को व्यक्त करके या फेसबुक पर अपनी टिप्पणी करके संतुष्ट हो जाएंगे कि उन्होंने कुछ कर दिया या टीवी चैनल के सवाल के जवाब में ‘हां’ या ‘न’ का एसएमएस करके अगर उन्हें तसल्ली हो जाएगी तो निश्चित ही अन्याय और अपराध का बोलबाला रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग चाहे कितने ही निराश और उदासीन बना दिए गए हों, उन्होंने अपनी संवेदनशीलता नहीं खोई है। जब रूपम पाठक द्वारा विधायक पर किए गए जानलेवा हमले की तस्वीर टीवी के स्क्रीन पर देखने के बाद, हिंसा और कानून को अपने हाथ लेने की प्रक्रिया को बिल्कुल अनुचित मानने वाले लोग भी एक ही सवाल कर रहे थे, आखिर इस सामान्य-सी दिखने वाली, अधेड़ उम्र की औरत ने ऐसा कदम क्यों उठाया? यह जानते हुए कि वह पकड़ी जाएगी, मारी भी जाएगी, बन्द कर दी जाएगी, उसने ऐसा क्यों किया? इन तमाम सवालों ने रूपम पाठक के प्रति न चाहते हुए भी एक हमदर्दी की भावना पैदा कर दी, जिसका अहसास मुङो उस पूरे सफर के दौरान हुआ जो मुङो पूर्णिया तक ले गई। कानपुर स्टेशन पर कोहरे के कहर को बर्दाश्त करने वाले रेल-कर्मियों को जब पता चला कि मैं क्यों और कहां जा रही हूं, तो उन्होंने पूर्णिया जाने वाली ट्रेन की जानकारी बड़ी तत्परता से दी। ट्रेन में मेरा आरक्षण नहीं था, लेकिन मुसाफिरों ने मुङो पहले बैठने और फिर लेटने की जगह दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूर्णिया पहुंचने के बाद पता चला कि मामला तो वाकई में काफी गड़बड़ था। वह पहले ही पूर्णिया के पुलिस अधिकारी को एक पत्र लिखकर इस बात की शिकायत कर चुकी थी कि विधायक और उनके एक सहयोगी द्वारा उसका यौन शोषण किया जा रहा था। तमाम प्रयासों के बावजूद वह कभी उस अधिकारी से मिल नहीं पाई। 28 मई को रूपम की एफआईआर पूर्णिया के एक थाने में दर्ज हुई। उसमें उसने विधायक और उसके सहयोगी के खिलाफ बलात्कार और यौन शोषण करने का आरोप लगाया, जिसने कभी एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की होगी, वही इस तथ्य की अहमियत समझ सकता है। अगर तभी समय रहते कुछ हो जाता, तो शायद यह नौबत ही न आती।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सुभाषिनी सहगल अली, लेखिका एडवा की अध्यक्षा &lt;br /&gt;(दैनिक हिंदुस्तान का संपादकीय पेज, 18 जनवरी 2011)&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-4458566318040139941?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/4458566318040139941/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=4458566318040139941' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4458566318040139941'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4458566318040139941'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2011/01/blog-post_17.html' title='रूपम पाठक और हमारी उदासीनता का अर्थ'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TTUUjxPrfOI/AAAAAAAAAEI/PQnOTDQV7OA/s72-c/Subhashini_Ali1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-6012590677469006647</id><published>2011-01-04T21:13:00.000-08:00</published><updated>2011-01-04T21:26:09.946-08:00</updated><category 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जनप्रतिनिधियों में बहुसंख्यक लोग निश्चय ही भले और जिम्मेदार लोग हैं, लेकिन उनमें अपराधी तत्वों की तादाद भी इतनी बड़ी है कि किसी नेता पर कोई आरोप लगे तो लोग सहज ही विश्वास कर लेते हैं। केसरी की हत्या की आरोपी महिला रूपम पाठक ने केसरी पर यौन दुराचार का आरोप लगाया था और संभवत: हत्या भी उसने समय पर सुनवाई न करने की वजह से करने की ठानी। विधायक के आसपास के लोगों का आचरण भी कानून और न्याय के प्रति उनकी उपेक्षा को ही जाहिर करता है कि उन्होंने उस महिला को इतना पीटा कि वह गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है। समूचा प्रसंग यह बताता है कि जिन लोगों के जिम्मे कानून बनाने और उसके पालन की देखरेख करने की जिम्मेदारी है, उनके आसपास कैसा अराजक और कानून का मखौल उड़ाने वाला माहौल है। यह स्पष्ट शब्दों में कहना चाहिए कि विधायक केसरी की हत्या निहायत गलत कदम है और उस महिला के आरोप अगर सच भी हों तो उसने एक गलत और गैर-कानूनी रास्ता अपनाया, लेकिन हमें इस बात पर भी फिक्रमंद होना चाहिए कि हमारे जनप्रतिनिधियों की छवि इतनी खराब है कि शायद लोग बिना किसी पुख्ता सुबूत के उस महिला के आरोपों को विश्वसनीय मान लें। ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी विधायक पर ऐसे आचरण का आरोप लगा हो। उत्तर प्रदेश में एक बसपा विधायक द्वारा कथित यौन दुराचार को लेकर बवाल मचा हुआ है। मुख्यमंत्री मायावती द्वारा सख्त कार्रवाई करने के बावजूद उत्तर प्रदेश में एकाधिक बार विधायक ऐसे मामलों में फंस चुके हैं, बल्कि लगभग हर राज्य में ऐसे कांडों की गूंज हुई है। यह कहना भी जरूरी है कि हर पार्टी में ऐसे लोग हैं और जबानी जमाखर्च के अलावा किसी पार्टी ने अपने अंदर के अपराधी तत्वों को बाहर निकालने के लिए व्यवस्थित प्रयास किए हों। हर पार्टी को राजनीति में अपराधियों का मसला तभी महत्वपूर्ण दिखाई देता है, जब विरोधी पार्टी के किसी नेता का नाम अपराध में उछलता है। सवाल सिर्फ माननीय जनप्रतिनिधियों के लिप्त होने का नहीं है, सवाल यह है कि अगर जनप्रतिनिधि ऐसे हों तो बाकी समाज में कानून के पालन की हम क्या उम्मीद कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार में राजग ने अभी-अभी ऐतिहासिक जनमत हासिल किया है और इस ऐतिहासिक जनमत के पीछे एक बड़ा कारण कानून के राज की बहाली है। राजग ने बिहार में कुछ समझौते जरूर किए हैं, लेकिन राजनीति में अपराध के वर्चस्व को कम करने की नीतीश कुमार की सरकार ने काफी हद तक सफल कोशिश की है। जरूरी यह है कि जनता का विश्वास इस सरकार और कानून के राज में बना रहे और इसके लिए सरकार को इसकी निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। तय है महिला द्वारा विधायक की हत्या करने के बाद भीड़तंत्र ने उसकी खूब पिटाई की, पर उस समय सुरक्षा गार्ड क्या कर रहे थे। यह सवाल भी है। जरूरी यह है कि राजनैतिक और कानूनी प्रक्रिया में लोगों का विश्वास बना रहे, इसलिए राजनैतिक पार्टियां अपने गिरेबान में जरा झांकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दैनिक हिंदुस्तान का संपादकीय, 5 जनवरी, 2011&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-6012590677469006647?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/6012590677469006647/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=6012590677469006647' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6012590677469006647'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6012590677469006647'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='हत्या से उपजे सवाल'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TSQA4q4pIWI/AAAAAAAAAEA/gS9F1rXcSKM/s72-c/raj%2Bkishore%2Bkesri.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-6536884628199834906</id><published>2010-12-30T20:45:00.000-08:00</published><updated>2010-12-30T20:51:22.879-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दिल्ली'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शहर'/><title type='text'>दिल वालों का शहर बहुत तंगदिल है</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TR1hE9WpRoI/AAAAAAAAADw/TYr6S7AbpjQ/s1600/Traffic-in-delhi-450x339.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 301px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TR1hE9WpRoI/AAAAAAAAADw/TYr6S7AbpjQ/s400/Traffic-in-delhi-450x339.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5556704253061973634" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दिल वालों के शहर में फिर किसी की आत्मा रौंदी गई। फिर किसी की इज्जत से खेला गया। बलात्कारियों ने उसे गिद्ध की तरह नोंचा खसोंटा और सड़क पर फेंक कर चलते बने। वह मणिपुर की रहने वाली है। रोजगार की तलाश में देश की राजधानी आई थी। उसका कसूर शाय़द ये था कि देश की राजधानी में रात के बारह बजे वह दफ्तर से घर लौट रही थी। उसे शायद ये एहसास नहीं था कि दिल्ली में देर रात जब शहर की रफ्तार थम जाती है तो सरेआम इंसान की शक्ल में घूमने वाले भेड़िये, तेज निगाहों से शिकार की तलाश में निकलते हैं। हालाकि यहां दिन-रात, सुबह- दोपहर और शाम सब एक जैसे हैं। कब किसकी आबरू तार-तार हो जाए कहना मुश्किल है। हालत ये है कि फिल्मी अभिनेत्रियां तक कहने को मजबूर हो जाती हैं कि शहर की नजर में ही खोट है। हाल ही में दिल्ली में संपन्न हाफ मैराथन में गुल पनाग के साथ ही दिल्ली के मनचले छेड़खानी कर बैठे। उन्होंने कहा कि भले ही दिल्ली की सड़कें पहले से ज्य़ादा चौड़ी हो गई हों ,भले ही इस शहर की चमक दमक पहले ज्यादा बढ़ गई हो,भले ही यहां विकास के ऊंचे-ऊंचे पुल नजर आने लगे हों लेकिन शहर अब भी उतना ही पिछड़ा और असभ्य है जितना आज से दस साल पहले हुआ करता था।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; आंकड़े गवाह हैं कि दिल्ली में हवस के भूखे किस तरह से लड़कियों और महिलाओं को तार तार करते रहे हैं। साल 2010 के शुरुआती छह महीनों में बलात्कार के 277 मामले सामने आ चुके हैं। पूरे साल का आंकड़ा आना अभी बाकी है। 2009 में बलात्कार के 452 मामले सामने आए थे। 2008 में  466 लड़कियों और महिलाओं की आबरू लूटी गई। 2007 में अस्मत लूटे जाने के 581 मामले सामने आए जबकि 2005 में 600 से ज्य़ादा बलात्कार की घटनाएं हुईं।  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;उत्तर पूर्व से आने वाली लड़कियों के साथ य़े शहर सबसे खराब सलूक करता है। उनकी वेशभूषा देखकर इस शहर का विकृत दिमाग ये सोचता है कि हर लड़की बिस्तर पर जाने के लिए ही  है। उन पर फिकरे-फब्तियां कसना, बसों में उन्हें छेड़ना, राह चलते परेशान करना और मौका मिलने पर उनकी इज्जत पर हमला करना इस शहर का पसंदीदा शगल है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; आम तौर पर ये सोचा जाता है कि मुंबई में बिहारी और उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ नाइंसाफी होती है। उन्हें पीटा जाता है,सताया जाता है और भगाया भी जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि ठाकरे की बददिमाग सेना ऐसी हरकतें करती है लेकिन शहर के आम लोगों का व्यवहार कतई ऐसा नहीं है। दिल्ली में कोई ठाकरे की संगठित सेना नहीं है लेकिन ठाकरे से भी विकृत दिमाग वालों की बड़ी तादाद है। वो राह चलते कभी भी, किसी भी शक्ल में आपके सामने हाजिर होकर आपको हैरान कर सकते हैं। क्या इस शहर में बिहारियों को कम मानसिक हमले झेलने पड़ते हैं।  बिहारी  शब्द यहां अब भी गाली की तरह है और जरा ये भी देखिये कि बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश से आने वाले गरीब मेहनतकश मजदूरों,रिक्शावालों के साथ दिल्ली के लोग कैसे पेश आते हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; लक्ष्मी नगर में हुआ हादसा इस बात की तस्दीक करता है कि दिल्ली सरकार को  बिहारी-बंगाली मजदूरों से कोई लेना देना नहीं है। दो साल पहले तो शीला दीक्षित ने यहां तक कह दिया था कि दिल्ली की समस्या, बिहार और उत्तर प्रदेश से आने वाले लोगों से बढ़ रही है। लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि लक्ष्मी नगर जैसे हादसों की जड़ में कौन है। उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि दिल्ली की सबसे ऊंची और शानदार इमारत, सिविक सेंटर में बैठने वालों का सिविक सेंस इतना खराब क्यों है। लक्ष्मी नगर की भयावह घटना इसलिए संभव हुई कि एमसीडी की रग रग में रिश्वतखोरी समाई हुई है। सत्तर से ज्यादा लोग मारे गए। खानदान के खानदान तबाह हो गए तब भी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित मौका ए वारदात पर चौदह घंटे बाद नमूदार हुईं। मरने वालों को दो-दो लाख का मुआवजा देकर उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों से छुट्टी पा ली। अब वो तमाम दुखियारे एक सामुदायिक भवन में सड़ रहे हैं। उनके सामने जिन्दगी सवाल बन कर खड़ी है। न रोजगार है, न रिश्तेदार हैं। गांव लौटने की कोई वजह नहीं है क्योकि वहां दो जून रोटी नहीं मिल सकती और यहां रहने का कोई बहाना नहीं है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; दिल्ली एक अजीब पुरुषवादी दंभ से भऱा शहर है। इसकी फितरत ही मर्दाना है।  ये बात बात पर उलझना जानता है। सड़कों पर छोटी-छोटी बात पर फसाद करते हुए लोग यहां बड़ी आसानी से दिख जाते  हैं। सड़क पर आपकी गाड़ी या मोटर साइकिल से सामने वाले को जरा सी खरोंच क्या लगी, समझ लीजिए आफकी शामत है। वो बात करने से पहले हाथ चलाते हैं। शिष्टाचार का इस शहर से कोई लेना देना नहीं। मेट्रो में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर पुरुष बड़े चैन से बैठे देखे जा सकते हैं। बसों में कंडक्टरों का गाली गलौच करना आम बात है। लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद ये दिल वालों का शहर है। अगर दिल वालों का शहर ऐसा ही होता है तो फिर दूसरे शहर बेहतर हैं,जहां लोगों का दिल जरा छोटा है लेकिन इंसानियत का आय़तन जरूर बड़ा है।  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;देवांशु कुमार, न्यूज 24 में बतौर एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर कार्यरत। मोबाइल-9818442690&lt;br /&gt; &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-6536884628199834906?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/6536884628199834906/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=6536884628199834906' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6536884628199834906'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6536884628199834906'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/12/blog-post_30.html' title='दिल वालों का शहर बहुत तंगदिल है'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TR1hE9WpRoI/AAAAAAAAADw/TYr6S7AbpjQ/s72-c/Traffic-in-delhi-450x339.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-4107509286502150018</id><published>2010-12-21T21:38:00.001-08:00</published><updated>2010-12-21T21:48:55.343-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सचिन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='असहमति का साहस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्रिकेट'/><title type='text'>देश से बड़े नहीं सचिन तेंदुलकर</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TRGROstRvwI/AAAAAAAAADk/lUuNIoaiYmk/s1600/sachin1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 188px; height: 269px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TRGROstRvwI/AAAAAAAAADk/lUuNIoaiYmk/s400/sachin1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5553379497229795074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दक्षिण अफ्रीका के सेंचुरियन मैदान पर सचिन तेंदुलकर टेस्ट क्रिकेट में शतक की ओर बढ़ रहे थे और टेलिविजन मीडिया का विवेक विहीन उन्माद उफान पर था। चैनल में उत्सव की तैय़ारी शुरू हो गई थी। महान, महानतम, ब्रैडमैन का बाप, क्रिकेट का भगवान न जाने कितने ही जुमले हवा में उछाले जा रहे थे। मूर्तिपूजा में अंधा हो चुका नायकों से रिक्त हमारा समाज सचिन में अपना नायक देख रहा था, पिछले कई सालों से देखता आ रहा है और आने वाली नस्लें भी देखती रहेंगी। लेकिन एक सत्य जो सामने चीख-चीख कर इस उत्सव का मजाक उड़ा रहा था, उसे देखने और अफसोस जताने की चिंता किसी को नहीं थी। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वो सत्य दक्षिण अफ्रीका की जमीन पर भारतीय  टीम की शर्मनाक हार के रूप में पहले भी कई मर्तबा प्रकट हो चुका है। इस बार भी सामने था लेकिन सचिन रमेश तेंदुलकर के पचासवें शतक की प्रतीक्षा में अधीर लोग भला हार की ओर क्यों ध्यान देते। वैसे भी जब क्रिकेट और फिल्मों के नायक देश से बड़े हो जाएं तो राष्ट्र के अपमान और सम्मान का प्रश्न अपनी प्रासंगिकता खो देता है। यहां ऐसा ही हो रहा है। सचिन तेंदुलकर ने शतक जमाया। तालियों के शोर में सब डूब गए और दूसरी ओर से भारतीय टीम पर छाया हार का संकट धोनी के आउट होने के साथ ही गहराता  चला गया।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;टीवी चैनल्स के तमाम तय कार्यक्रम रद्द हो चुके थे। हर चैनल पर बस सचिन थे। कहीं भगवान बनकर तो कहीं महानायक , कही महासेंचुरियन बनकर तो कहीं पचास मार खां।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;एक टीवी चैनल ने तो हद ही कर दी। वैसे वो चैनल स्वनामधन्य है। वहां बड़े महान अंग्रेजीदां पत्रकार हैं। वैचारिक तौर पर वामपंथी, सत्य़ दिखाने वाले। वहां एक वरिष्ठ समाचार वाचक सचिन का गुणगान करने में लगे थे। तेंदुलकर के प्रशस्ति गान में डूबी उनकी वाणी दर्प से चूर थी। ऐसा आभास हो रहा था कि महाशक्ति बनने से बस फर्लांग भर की दूरी पर खड़ा है भारत। तभी टीवी स्कीन पर अचानक एक संदेश चस्पा हो गया। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt; जिस पर लिखा था---&lt;br /&gt;जेनरेशंस टू कम विल स्कार्स बिलीव दैट सच ए मैन एज़ दिस एवर इन फ्लेश एन्ड ब्लड वॉक्ड अपोन दिस अर्थ..&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अलबर्ट आइन्सटीन&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; ये संदेश बिना किसी प्रस्तावना के टीवी स्क्रीन पर आया और कुछ देर रुक कर विलुप्त हो गया।  बताने की जरूरत नहीं है कि ये बातें आइन्सटीन ने महात्मा गांधी के बारे में कही थीं। लेकिन भावुक पत्रकार ने सोचा होगा कि गांधी तो बीते जमाने के हो गए अब इस दौर में तो सचिन ही इस श्रद्धाभाव के हकदार हैं। आने वाली पीढ़ियां वाकई य़े सोचकर हैरान होंगी कि हाड़ मांस का बना कोई ऐसा इंसान कभी इस धऱती पर मौजूद था। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अब जरा सोचिए कि नायक की परिभाषा और पहचान कैसे बदल गई। गांधी और तेंदुलकर एक ही तराजू पर तौले जा रहे हैं। भ्रष्टाचारियों के आतंक से त्रस्त भारत अब कभी सचिन रमेश तेंदुलकर में अपना नायक देखता है, तो कभी अमिताभ, शाहरुख और आमिर खान में। कभी अंबानी, कभी अजीम प्रेमजी भी नायक बन जाते हैं ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; इस पूरे टेस्ट मैच में भारत की शर्मनाक हार कभी मुद्दा नहीं रही। मुद्दा ये रहा कि सचिन निजी कीर्तिमान को और कितनी ऊंचाई पर ले जा सकते हैं। वैसे उनके कीर्तिमान जब देश के काम ही न आ सकें तो व्यर्थ हैं ।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; ऐसे पहली बार नहीं हुआ है। कई मर्तबा सचिन को शतक बनाते हुए देखने के लिए विकल हमारी ये पीढ़ी देश की विजय या पराजय का प्रश्न भूल जाती है। इसके लिए बहुत हद तक मीडिया जिम्मेदार है। मीडिया ने उन्हें भगवान का दर्ज दे दिया है और क्रिकेट परोसने वाले चैनल उनके कीर्तिमानों से सम्मोहित हो चुके हैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt; खेल के नाम पर उन्हें सिर्फ क्रिकेट दिखता है और क्रिकेट के नाम पर सिर्फ सचिन। अगर कीर्तिमानों की ही बात है तो इसी टेस्ट के दौरान राहुल द्रविड़ 12000 रन का आंकड़ा छूने वाले  दुनिया के तीसरे बल्लेबाज बन गए लेकिन उन्हें कौन पूछता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;ये अंधभक्ति अब कुंठित सोच में तब्दील होती जा रही है। सचिन रमेश तेंदुलकर की महानता से भला कौन इन्कार करता है लेकिन वो देश से बड़े नहीं है। उनकी उपस्थिति इस देश से है। पहले देश है फिर सचिन तेंदुलकर हैं। अगर देश शर्मनाक हार के कगार पर है तो सचिन की व्यक्तिगत उपलब्धियां खुशी का मौका नहीं हैं। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;देवांशु कुमार, एसोसिएट एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर, न्यूज 24, 9818442690&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-4107509286502150018?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/4107509286502150018/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=4107509286502150018' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4107509286502150018'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4107509286502150018'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/12/blog-post_21.html' title='देश से बड़े नहीं सचिन तेंदुलकर'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TRGROstRvwI/AAAAAAAAADk/lUuNIoaiYmk/s72-c/sachin1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-4833894236621291547</id><published>2010-12-20T21:49:00.000-08:00</published><updated>2010-12-20T21:54:08.877-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सम्मान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विनय स्मृति'/><title type='text'>पहला विनय स्मृति सम्मान शफी आलम को</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TRBA3YJXgdI/AAAAAAAAADc/kMOO17uEJD0/s1600/MD._SHAFI_ALAM.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 278px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TRBA3YJXgdI/AAAAAAAAADc/kMOO17uEJD0/s400/MD._SHAFI_ALAM.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5553009660666544594" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कौमी तंजीम के युवा पत्रकार शफी आलम को पहला विनय स्मृति सम्मान प्रदान किया गया है। 19 दिसंबर को पूर्णिया के मिनिस्ट्रियल क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्हें ये सम्मान प्रदान किया गया। युवा पत्रकार शफी आलम को ये सम्मान पूर्णिया के बुजुर्गों की संस्था बुजुर्ग समाज की ओर से दिया गया है। बुजुर्ग समाज ने शफी आलम को संभावनाओं से भरा पत्रकार करार देते हुए उन्हें विनय स्मृति सम्मान से नवाजा।&lt;br /&gt;शफी आलम फिलवक्त कौमी तंजीम के पूर्णिया के ब्यूरो चीफ हैं। पिछले 8-9 सालों से उन्होंने कौमी तंजीम के लिए संजीदा रिपोर्टिंग की है और सामाजिक बदलाव की सरोकारी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। शफी आलम ने इस सम्मान के मिलने पर खुशी जाहिर की। उनके मुताबिक स्थानीय पत्रकारों के लिए एक पेशे के तौर पर पत्रकारिता करना काफी चुनौती भरा है। इसमें करियर नहीं है लेकिन हां कुछ अच्छा करने का सुकून है और वही सबसे बड़ी ताकत है। शफी ने हाल के दिनों में पत्रकारिता में आई गिरावट को लेकर चिंता भी जाहिर की। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर काम करना होगा और राजनीतिक-प्रशासनिक प्रलोभनों से बचना होगा।&lt;br /&gt;हिंदुस्तान के युवा पत्रकार विनय तरूण का इसी साल 21 जून को एक हादसे में आकस्मिक निधन हो गया था। पूर्णिया के रहने वाले विनय तरूण की याद में उनके मित्रों ने अगस्त महीने में एक कार्यक्रम रखा था। इसी कार्यक्रम में बुजुर्ग समाज के अध्यक्ष भोला नाथ आलोक ने विनय स्मृति सम्मान का एलान किया था। बुजुर्ग समाज ने पूर्णिया के साहित्यकारों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की मौजूदगी में शफी आलम को सम्मानित किया और इस परंपरा को आगे भी जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-4833894236621291547?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/4833894236621291547/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=4833894236621291547' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4833894236621291547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4833894236621291547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='पहला विनय स्मृति सम्मान शफी आलम को'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TRBA3YJXgdI/AAAAAAAAADc/kMOO17uEJD0/s72-c/MD._SHAFI_ALAM.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-8124327859778184013</id><published>2010-11-13T22:43:00.000-08:00</published><updated>2010-11-13T22:46:40.218-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>शून्य</title><content type='html'>शून्य तो शून्य है&lt;br /&gt;शून्य का क्या है,&lt;br /&gt;कितना बड़ा कि इतने से इतने बड़े का क्या है ? &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;शून्य की शून्यता में इन दिनों&lt;br /&gt;इस तरह समाया हुआ हूँ कि&lt;br /&gt;रात और दिन के बीच कुछ नजर नहीं आता है&lt;br /&gt;सिवाय शून्य के.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;शून्य बाहर है कि भीतर का है या मध्य में है&lt;br /&gt;शून्य शून्य भर है कि उसके भीतर समाये गए हैं&lt;br /&gt;अनगिनत शून्य&lt;br /&gt;और उनकी शून्यताएँ&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;क्या शून्य अकेला ही बढा रहा है शून्यता को या&lt;br /&gt;उसके भीतर के अनगिनत शून्य मिलकर एक कर दे रहे है&lt;br /&gt;धरती और नक्षत्र को.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;समुद्री किनारों से इन दिनों&lt;br /&gt;जब मेरे यादों के पहाड़ बदलते जा रहे हैं शून्य में&lt;br /&gt;तब शून्य अपनी शून्यता में&lt;br /&gt;भर रहा है मुझे भी और हर रहा है&lt;br /&gt;मेरे सारे आकार-प्रकार, रंगों और रूपों को. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिरीष खरे, क्राई, मुंबई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-8124327859778184013?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/8124327859778184013/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=8124327859778184013' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8124327859778184013'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8124327859778184013'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='शून्य'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-5209649939889100597</id><published>2010-10-02T08:13:00.000-07:00</published><updated>2010-10-02T08:19:15.794-07:00</updated><title type='text'>निफ्ट से गांधी जयंती पर गुजारिश</title><content type='html'>महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को देश के प्रतिष्ठित संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी के ग्रीन पार्क, दिल्ली स्थित परिसर के बाहर समाज के अलग- अलग तबकों से आए बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, छात्रों और आम लोगों ने एक मीटिंग रखी। इस मीटिंग में साल 2010 में निफ्ट में एडमिशन प्रक्रिया के दौरान आरक्षित सीटों को लेकर चर्चा हुई।&lt;br /&gt;बैठक में बताया गया कि एक आरटीआई के जरिए ये पता चला है कि संस्थान में ओबीसी कोटे की सात, एससी व एसटी कोटे की एक-एक सीटें खाली हैं। इन सीटों को क्यों नहीं भरा गया इसको लेकर निफ्ट का जवाब संतोषजनक नहीं रहा है।&lt;br /&gt;अलग-अलग अखबारों और वेबसाइट में छपी खबरों में निफ्ट की ओर से ये तर्क दिया गया कि&lt;br /&gt;1. &lt;strong&gt;निफ्ट का तर्क&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;संस्थान सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार आरक्षण प्रक्रिया का पूरी तरह पालन कर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सवाल-&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;क. क्या सर्वोच्च न्यायालय ने ये निर्देश दिया है कि मेरिट लिस्ट के छात्रों को सीटें ऑफर न की जाएं?&lt;br /&gt;ख. क्या सर्वोच्च न्यायालय ने ये कहा है कि पहली लिस्ट में सीटें न भरें तो ओबीसी,एससी और एसटी कोटे के तहत सीटें खाली छोड़ दी जाएं।&lt;br /&gt;2.&lt;strong&gt; निफ्ट का तर्क &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हम दिल्ली विश्वविद्यालय या अन्य संस्थानों की तरह सीटों को भरने के लिए दूसरी या तीसरी वेटिंग लिस्ट जारी नहीं कर सकते।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सवाल- &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;क. संस्थान ने क्या अलग-अलग कोर्सेस के लिए अलग नियमावली बना रखी है? अगर बीएफटेक और मास्टर्स कोर्स के लिए दूसरी लिस्ट जारी हो सकती है तो फिर बी. डिजाइन में क्यों नहीं?&lt;br /&gt;ख. अगर दूसरी लिस्ट जारी नहीं करनी तो मेरिट लिस्ट जारी करने का क्या फायदा है? क्यों बार-बार अभिभावकों को ये दिलासा दिया गया कि बाकी बची सीटों के लिेए दूसरी लिस्ट आएगी?&lt;br /&gt;3. &lt;strong&gt;निफ्ट का तर्क &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हम गुणवत्ता से समझौता नहीं कर सकते।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सवाल &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;क. क्या निफ्ट अपने द्वारा तैयार मेरिट सूची को अपनी गुणवत्ता के अनुकूल नहीं मानता?&lt;br /&gt;ख. क्या ओबीसी कोटे के तहत 530 रैंक के छात्र और 531 रैंक के छात्र में गुणवत्ता का इतना फासला था कि उससे संस्थान का स्तर गिर जाता?&lt;br /&gt;4.&lt;strong&gt; निफ्ट का तर्क &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दूसरी लिस्ट जारी करने के लिए वक्त कम था?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सवाल- &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;क. बी.डिजाइन ओबीसी कोटे की काउंसलिंग 18 जून 2010 को खत्म हुई, पढाई 28 जुलाई 2010 को शुरू हुई, क्या वाकई 40 दिनों में मेरिट लिस्ट के बाकी छात्रों से संपर्क कर पाना नामुमकिन था?&lt;br /&gt;ख. अगर दूसरी लिस्ट नहीं निकाली जानी थी तो एडमिशन सेल ने अभिभावकों को क्यों कहा कि इंतजार कीजिए नेट पर दूसरी लिस्ट जारी होगी?&lt;br /&gt;5. &lt;strong&gt;एडमिशन से जुड़ा तथ्य- &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बी. डिजाइन के लिए ओबीसी श्रेणी में काउंसलिंग के लिए 530 छात्रों को बुलाया गया। यह संख्या कुल सीटों (356) की तुलना में महज 54 फीसदी ज्यादा छात्र है, जबकि सामान्य कोटे में 85 फीसदी ज्यादा, एससी कोटे में 108 फीसदी ज्यादा और एसटी श्रेणी में 83 फीसदी ज्यादा छात्र काउंसलिंग के लिए बुलाए गए।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;निफ्ट का तर्क &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पिछले रिकार्डो को देखते हुए एक अनुमान के आधार पर संस्थान काउंसलिंग के लिए बुलाए जाने वाले छात्रों की संख्या तय करती है।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सवाल- &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अगर काउंसलिंग में ओबीसी कोटे के तहत कम छात्रों को बुलाए जाने का मकसद उन्हें अनावश्यक परेशानी से बचाना था तो फिर सीटें खाली रहने पर उन्हें ये सीटें ऑफर क्यों नहीं की गईं?&lt;br /&gt;अफसोस कि बात है कि ज्यादातर मामलों में निफ्ट के तर्क संतोषजनक नहीं हैं और इस मामले में स्थिति स्पष्ट करने में निफ्ट के अधिकारियों की कोई दिलचस्पी नहीं है। हम अधोहस्ताक्षरी निफ्ट में आरक्षण कोटे के साथ मनमानी और खिलवाड़ की तीखी निंदा करते हैं।&lt;br /&gt;हमारी विनम्र मांग यह है कि&lt;br /&gt;1. निफ्ट लिखित रूप में हमारे सभी उपरोक्त सवालों का जवाब मुहैया कराए और अब इस मामले और ज्यादा देरी न की जाए।&lt;br /&gt;2. संस्थान आरक्षित कोटे की बाकी बची 9 सीटों के लिए दूसरी लिस्ट जारी करे और छात्रों को फौरन दाखिला दे।&lt;br /&gt;3. संस्थान ओबीसी, एससी और एसटी कोटे के साथ खिलवाड़ की निष्पक्ष जांच करे।&lt;br /&gt;4. आरक्षण कोटे के साथ इस मनमाने रवैये के लिए दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करे।&lt;br /&gt;5. अगर संस्थान में वाकई कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है तो इस पूरी प्रक्रिया और जांच से निकले निष्कर्षों को सार्वजनिक करे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-5209649939889100597?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/5209649939889100597/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=5209649939889100597' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5209649939889100597'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5209649939889100597'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='निफ्ट से गांधी जयंती पर गुजारिश'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-7252637884182343008</id><published>2010-09-19T03:43:00.000-07:00</published><updated>2010-09-19T03:45:39.107-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निफ्ट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एडमिशन धांधली'/><title type='text'>निफ्ट में आरक्षित कोटे की सीटें खालीं क्यों ?</title><content type='html'>नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ फैशन टेक्नॉलॉजी में आरक्षित कोटे की सीटें खाली हैं लेकिन छात्रों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा। साल 2010 के बी डिजाइन कोर्स में दाखिले की प्रक्रिया को लेकर दायर एक आरटीआई में इस बात का खुलासा हुआ है। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक ओबीसी (नॉन क्रीमी लेयर) कोटे की 7 सीटें खाली हैं, जबकि एससी और एसटी कोटे की एक-एक सीट खाली पड़ी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निफ्ट के निदेशक आरएम सिंह के मुताबिक ओबीसी कोटे के तहत 2010 में 356 छात्रों को दाखिला दिया जाना था लेकिन महज 349 छात्रों को ही दाखिला दिया गया। ओबीसी कोटे के तहत काउंसलिंग में कुल 530 छात्रों को बुलाया गया था और 18 जून 2010 को 523 रैंक के छात्र को आखिरी दाखिला दिया गया। निफ्ट की ओर से जारी रैंक लिस्ट में बाकी बचे छात्र कॉल का इंतजार करते रहे लेकिन संस्थान की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। यहां तक कि कई अभिभावकों ने फैक्स के जरिए भी ये सूचना दी कि वो एडमिशन लेना चाहते हैं लेकिन संस्थान उन्हें टालता रहा। आरटीआई के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में निफ्ट ने चुप्पी लगा ली कि आखिर ये फैसला कब लिया गया कि वेटलिस्टेड छात्रों को काउंसलिंग के लिए नहीं बुलाया जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाम न छापने की शर्त पर एक पीड़ित अभिभावक ने आरोप लगाया कि ओबीसी कोटे के साथ हो रहे इस खिलवाड़ की भूमिका उसी वक्त तैयार हो चुकी थी जब काउंसलिंग के लिए पहली लिस्ट जारी की गई। बी डिजाइन के लिए ओबीसी कैटगरी में काउंसलिंग के लिए 530 छात्रों को बुलाया गया। ये कुल सीटों (345) की तुलना में महज 54 फीसदी ज्यादा छात्र थे, जबकि सामान्य कोटे में 85 फीसदी ज्यादा, एससी कोटे में 108 फीसदी ज्यादा और एसटी कैटगरी  में 83 फीसदी ज्यादा छात्र काउंसलिंग के लिए बुलाए गए। अलग-अलग कैटगरी में काउंसलिंग के लिए बुलाए गए छात्रों के इस अंतर पर जब एडमिशन सेल (दिल्ली) में पूछताछ की गई तो बताया गया कि अगर सीटें बची रह जाएंगी तो काउंसलिंग के लिए दूसरी लिस्ट निकाली जाएगी, लेकिन ये दूसरी लिस्ट अभी तक नहीं आई।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;आपको बता दें कि बी डिजाइन के लिए ओबीसी की काउंसलिंग 18 जून को समाप्त हो गई थी और यहां पढ़ाई 28 जुलाई से शुरू हुई। करीब 40 दिनों के इस अंतराल में निफ्ट ओबीसी की 7 सीटों को भरने की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका। निफ्ट में बी एफटेक और मास्टर्स कोर्स के लिए काउंसलिंग की दूसरी लिस्ट जारी की गई लेकिन ओबीसी कैटगरी में दूसरी लिस्ट जारी करने में टालमटोल भरा रवैया बदस्तूर जारी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पशुपति शर्मा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-7252637884182343008?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/7252637884182343008/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=7252637884182343008' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/7252637884182343008'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/7252637884182343008'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='निफ्ट में आरक्षित कोटे की सीटें खालीं क्यों ?'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-3064753374171245421</id><published>2010-08-30T18:33:00.000-07:00</published><updated>2010-08-30T18:55:09.176-07:00</updated><title type='text'>शर्म है कि आती नहीं...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxg2g6SJ1I/AAAAAAAAADU/zR-dn-qHHzE/s1600/DSCN9903.JPG"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; DISPLAY: block; HEIGHT: 300px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5511386533658240850" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxg2g6SJ1I/AAAAAAAAADU/zR-dn-qHHzE/s400/DSCN9903.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;ट्रक-टैम्पो भिड़े... (तीन कॉलम, पेज-3), युवा कांग्रेस का चक्का जाम (फोटो सहित 2 कॉलम, पेज नंबर-3), इसी हेडिंग के साथ एक और खबर (3 कॉलम, 5 नंबर पेज), जागरुकता से जनसंख्या पर नियंत्रण संभव (फोटो सहित 2 कॉलम, पेज-4), बाबा स्वामी रामदेव के कार्यक्रम को ले बैठक (2 कॉलम), किसानों को दी खाद व कीटनाशक की जानकारी (फोटो सहित 2 कॉलम)... 29 अगस्त 2010 को भागलपुर से प्रकाशित हिंदुस्तान के पूर्णिया संस्करण में ऐसी ही कई खबरें थीं लेकिन वो खबर नहीं थी जिसे देखने के लिेए हममें से कई साथियों ने अखबार खरीदा और उसके पन्ने पलटते रहे। पूर्णिया में दिवंगत पत्रकार विनय तरूण को श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम हुआ लेकिन कई पत्रकारों को वहां झांकने तक की फुर्सत नहीं मिली। अफसोस कि दैनिक जागरण समेत दूसरे स्थानीय अखबारों से भी ये खबर नदारद रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाकी की बात छोड़ भी दें लेकिन हिंदुस्तान की इस हरकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हिंदुस्तान के उप स्थानीय संपादक और साथी इसे कोई अपराध न माने लेकिन एक अपराध हो चुका है, भले ही किसी संविधान में उसकी कोई धारा दर्ज नहीं। पत्रकारों की बात छोड़ भी दें लेकिन एक आम पाठक को भी उस वक्त जरूर कोफ्त होगी जब यह पता चलेगा कि वो दिवंगत पत्रकार कोई और नहीं बल्कि दैनिक हिंदुस्तान, भागलपुर में काम करने वाला एक संपादकीय साथी था। उसकी मौत संस्थान की नौकरी छो़ड़ देने या अखबार से हर तरह का नाता तोड़ देने के बाद नहीं हुई थी... वो ऑफिस पहुंचने की आपाधापी में ही 22 जून 2010 को एक ट्रेन हादसे में मारा गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अफसोस हिंदुस्तान के संपादक विनोद बंधु समेत उनके साथ काम करने वाले तमाम साथियों ने इस युवा पत्रकार को महज दो महीने में ही बिलकुल पराया कर दिया, इतना पराया कि उनके लिए श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए दो पल भी न मिले। संपादक महोदय की व्यस्तता का आलम ये रहा कि उन्होंने तमाम स्रोतों से इस कार्यक्रम के आयोजन की सूचना मिलने के बावजूद किसी नुमाइंदे को भेजना जरूरी नहीं समझा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;28 अगस्त 2010 को पूर्णिया के बीबीएम हाईस्कूल में 100 से ज्यादा लोगों का जमावड़ा लगा। दिल्ली, पटना, रांची, जमशेदपुर, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, सहरषा, सुपौल और फारबिसगंज समेत कई जगहों से पत्रकार साथी विनय तरूण को याद करने पहुंचे। कोई 1300 किलोमीटर की यात्रा कर यहां पहुंचा तो किसी ने 300 किलोमीटर का सफर तय किया... कोई मोटरसाइकिल पर हिचकोले खाते 100-125 किलोमीटर चलकर एक सीधे-सादे सच्चे पत्रकार को श्रद्धांजलि देने पहुंचा लेकिन पता नहीं ऐसी क्या बात थी कि हिंदुस्तान के साथी एक से डेढ़ किलोमीटर का फासला भी तय नहीं कर पाए। विनय की याद में आंसू बहते रहे लेकिन इन पत्रकारों ने कलेजा कुछ ऐसा सख्त कर लिया कि ऑफिस में चुनावी जमा खर्च का हिसाब किताब होता रहा। सबसे ज्यादा दुखद बात तो ये है कि ये सब हिंदुस्तान के भागलपुर संस्करण के उप-स्थानीय संपादक विनोद बंधु की मौजूदगी में हुआ। जी हां जिस वक्त पूर्णिया के वयोवृद्ध साहित्यकार भोलानाथ आलोक, पूर्णिया आकाशवाणी के पूर्व केंद्र निदेशक विजयनंदन प्रसाद समेत तमाम पत्रकार, बुद्धिजीवी और घर परिवार के लोग एक कमरे में युवा पत्रकार विनय तरुण की मौत का मातम मना रहे थे, उसी वक्त अपने मातहत विनय तरूण की मौत का गम भुला चुके संपादक विनोद बंधु पूर्णिया में ही मीटिंग कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपादक महोदय की संवेदनशीलता का आलम ये रहा कि सुबह 11 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक चलने वाले श्रद्धांजलि समारोह के तीन सत्रों में से किसी एक सत्र के लिए भी वो दो पल का वक्त नहीं निकाल पाए। जितनी देर कार्यक्रम चला, शायद उतनी देर मीटिंग भी चलती रही। अन्यथा यकीन नहीं होता कि कोई अपने साथी को इस तरह भी भुला सकता है। यकीन नहीं होता कि एक संपादक इतना कठोर हृदय भी हो सकता है। यकीन नहीं होता कि दुनिया का दर्द अखबारों के पन्ने पर उकेरने वाली बिरादरी अपने घर के अंदर बह रहे आंसुओं की धारा से इस कदर आंख मूंद सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ तो बात है कि विनय की स्मृति के कार्यक्रम से संपादक महोदय ने तौबा कर ली। क्या विनोद बंधु इस बात का जवाब दे पाएंगे कि आखिर ऐसा कौन सा डर था कि वो कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। भगवान के लिए ये मत कहें कि हमारी हिम्मत नहीं हुई... आपकी हिम्मत तो काबिले तारीफ है कि आपने 28 अगस्त को पहले पूर्णिया के कार्यक्रम में शिरकत न करने की असमर्थता जाहिर की और उसी दिन आप पूर्णिया में एक मीटिंग करने चले आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपादकों का एक दौर वो भी था, जब साथी पत्रकार उनसे प्रेरणा लेते थे। जब हर मुश्किल घड़ी में पत्रकारों को ये लगता था कि संपादक महोदय का हाथ उनके सिर पर है। पता नहीं इस दौर में अपने इस आचरण के जरिए विनोद बंधु कौन सी मिसाल कायम करना चाहते हैं। संपादक महोदय आपने अनजाने में नहीं बल्कि जानबूझकर पत्रकारिता की उस धारा को अपमानित किया है, जो सच्चाई, सादगी और ईमानदारी के साथ अब भी बह रही है। ये धारा इतनी पतली भी नहीं हुई कि वो आपको नजर न आए, लेकिन अगर आपने आंखों पर अपनी ठसक, अपनी कामयाबी (झूठी या सच्ची?) का काला चश्मा पहन रखा है तो फिर हम क्या कहें और किससे कहें? सच तो यही है कि ऐसी असंवेदनशीलता देख हमें तो शर्म आती है... आपकी आप जानें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;चंद्रकिशोर जायसवाल&lt;br /&gt;साहित्यकार&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-3064753374171245421?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/3064753374171245421/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=3064753374171245421' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/3064753374171245421'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/3064753374171245421'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/08/blog-post_30.html' title='शर्म है कि आती नहीं...'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxg2g6SJ1I/AAAAAAAAADU/zR-dn-qHHzE/s72-c/DSCN9903.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-5959390597141485829</id><published>2010-08-07T00:46:00.000-07:00</published><updated>2010-08-07T00:54:57.651-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='निफ्ट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अफसरशाही'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धांधली'/><title type='text'>निफ्ट का है अंदाज-ए-एडमिशन कुछ और...</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;ओबीसी कोटे की सीटें खालीं, एडमिशन क्लोज &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ फैशन टेक्नॉलॉजी , नाम बड़ा और दर्शन छोटे । सरकारी पैसों से चलने वाले इस संस्थान में एडमिशन प्रक्रिया को देख कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ । आम सरकारी संस्थानों की तरह ही यहां भी अफसरशाही और लालफीताशाही का बोल-बाला है । यहां हम ओबीसी कोटे के तहत एडमिशन को लेकर चल रही अफरा-तफरी का जिक्र करेंगे, लेकिन उससे इस संस्थान की कार्यशैली की आपको कुछ झलक जरूर मिल जाएगी । आपको बता दें कि ओबीसी कोटे की सीटें खाली होने के बावजूद प्रवेश बंद करने की बात कही जा रही है । ये बात कोई निचले लेवल का अधिकारी नहीं बल्कि निफ्ट के डायरेक्टर धनजंय कुमार (एफ एंड ए) कर रहे हैं । वो खुले आम ये कह रहे हैं कि सीटें खाली हों तो भी एडमिशन देना या न देना हमारी मर्जी पर निर्भर करता है । आप इस बारे में कोई सवाल करें तो निफ्ट में कोई आपको तर्कों के साथ जवाब देने को तैयार नहीं ।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ओबीसी कोटे में हो रहे इस खिलवाड़ की भूमिका उसी वक्त तैयार हो चुकी थी जब काउंसलिंग के लिए पहली लिस्ट जारी की गई । बी डिजाइन के लिए ओबीसी कैटगरी में काउंसलिंग के लिए 530 छात्रों को बुलाया गया । ये कुल सीटों (345) की तुलना में महज 54 फीसदी ज्यादा छात्र थे, जबकि सामान्य कोटे में 85 फीसदी ज्यादा, एससी कोटे में 108 फीसदी ज्यादा और एसटी कैटगरी में 83 फीसदी ज्यादा छात्र काउंसलिंग के लिए बुलाए गए । अलग-अलग कैटगरी में काउंसलिंग के लिए बुलाए गए छात्रों के इस मनमाने समीकरण पर जब एडमिशन सेल (दिल्ली) में पूछताछ की गई तो बताया गया कि अगर सीटें बची रह जाएंगी तो काउंसलिंग के लिए दूसरी लिस्ट निकाली जाएगी ।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;आपको बता दें कि बी डिजाइन के लिए ओबीसी की काउंसलिंग 18 जून को समाप्त हो गई लेकिन अभी तक दूसरी लिस्ट नहीं आई है । निफ्ट में बी एफटेक और मास्टर्स कोर्स के लिए काउंसलिंग की दूसरी लिस्ट जारी की गई लेकिन ओबीसी कैटगरी में दूसरी लिस्ट जारी करने की फुरसत संस्थान को नहीं मिल पा रही । इस बारे में बार-बार संपर्क करने वाले अभिभावकों को बस तारीख पर तारीख दी जाती रही लेकिन नेट पर दूसरी काउंसलिंग लिस्ट का दीदार नहीं हो पाया । जिन अभिभावकों ने फोन पर ज्यादा एतराज जताया उन्हें परेशान करने के लिए दिल्ली बुला लिया गया और यहां ये सूचना दे दी गई कि अब दूसरी लिस्ट नहीं जारी की जाएगी । ऐसा लगता है संस्थान ने वेटलिस्टेड छात्रों से संपर्क साधने का कोई गुपचुप तरीका ढूंढ निकाला है, जिसके बारे में आम अभिभावकों को जानने को कोई हक नहीं है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तथ्य ये भी है कि ओबीसी कैटगरी के लिए खाली सीटों के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में एडमिशन सेल ने 24 जून को ये बताया कि अलग-अलग सेंटरों में 6 सीटें खाली हैं, जिनके लिए वेटलिस्ट जारी की जाएगी । खाली सीटों का ये आंकड़ा 26 जुलाई तक आते-आते महज 4 रह गया, इस पर डायरेक्टर और निप्ट के मुख्य अपील अधिकारी धनंजय कुमार का ये दावा कि जो भी होगा नियमों के मुताबिक होगा, संदेह के दायरे में आ जाता है । निफ्ट के एडमिशन सेल में कार्यरत श्रीमती सुनीता के मुताबिक 26 जुलाई को दो सीटें कांगड़ा सेंटर में और दो सीटें शिलांग में खाली थीं, लेकिन इन सीटों पर एडमिशन कब दिया जाएगा इस पर निफ्ट ने चुप्पी साध रखी है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ऐसा ही कुछ संदेह पटना सेंटर की डोमिसाइल सीटों को लेकर भी है । 15 जुलाई को एडमिशन सेल ने फोन पर जानकारी दी कि सीटें खाली हैं और बिहार के लोगों को प्रवेश दिया जा सकता है लेकिन 26 जुलाई आते-आते ये बयान बदल गया । पटना की डोमिसाइल सीटें कब भरी गईं और किसको एडमिशन दे दिया गया ये पहेली आप बूझ सकें तो बूझें ।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;निफ्ट अधिकारियों के बार-बार बयान बदलने से कई सवाल उठते हैं-&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;1. जब दूसरे कोर्सेस के लिए वेटलिस्टेड काउंसलिंग लिस्ट महज 10 दिनों में आ सकती है तो बी. डिजाइन में ऐसी क्या खास बात है कि करीब 40 दिनों बाद भी इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया जा सका ?&lt;br /&gt;2। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;ओबीसी कैटगरी की खाली 6 सीटें 4 में कैसे बदल गईं । 2 छात्रों को किस बिना पर एडमिशन दिया गया । आखिर क्या वजह है कि निफ्ट की वेबसाइट पर कोई सूचना दिए बिना ही एडमिशन देने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है?&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;3। &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;एडमिशन की इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जा रही है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;4। 28 &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;जुलाई से निफ्ट सेंटर पर क्लासेस शुरू हो चुकी हैं, ऐसे में आखिर कब तक छात्रों को निफ्ट अधिकारियों की चिट्ठी का इंतजार करना होगा? &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff00;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;सवाल कई हैं लेकिन निफ्ट अधिकारी इसका जवाब देने को तैयार नहीं । संस्थान जनता के पैसे से भले ही चलता हो लेकिन यहां सब कुछ अफसरशाही अंदाज में होता है । अगर कभी आप एडमिशन को लेकर किसी परेशानी में पड़ जाएं तो भूले से भी इन अफसरों से सवाल पूछने की गुस्ताखी मत कर बैठिएगा- वरना घूमते रह जाएंगे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पशुपति शर्मा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-5959390597141485829?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/5959390597141485829/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=5959390597141485829' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5959390597141485829'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5959390597141485829'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='निफ्ट का है अंदाज-ए-एडमिशन कुछ और...'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-5405321215454796846</id><published>2010-07-31T22:20:00.000-07:00</published><updated>2010-07-31T22:36:49.572-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दुबे सर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्मृति'/><title type='text'>चंद पल में दिल जीतने वाला जादूगर कहां गया?</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUHy3D_TFI/AAAAAAAAACg/vt1GUYhVebQ/s1600/dubey+sir+1.png"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; DISPLAY: block; HEIGHT: 221px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5500311090258463826" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUHy3D_TFI/AAAAAAAAACg/vt1GUYhVebQ/s400/dubey+sir+1.png" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दुबेजी के जाने का समाचार सबके लिए तो धक्का है लेकिन मेरे लिए बड़ा धक्का है.. जिंदगी में कुछ लोग ऐसे होते है जो कुछ ही पल साथ रहते है लेकिन दिल में जिंदगीभर के लिए साथ हो जाते है.. दुबेजी ऐसे ही लोगो में से थे.. मेरी और उनकी मुलाकात व साथ 2 दिनों का है लेकिन सम्बन्ध ऐसे बन गए कि जैसे सालो से हों..&lt;br /&gt;महेश्वर में आयोजित प्रोग्राम के लिए जब मै इंदौर से निकलने वाला था राकेशभाई का कॉल आया कि दिल्ली से कुछ साथी आ रहे है आप उनके साथ आ जाना.. उनमे एक दुबेजी काफी सीनियर है.. मैंने तुरंत प्रतिप्रश्न किया कि कहा फंसवा रहे हो मुझे उनके साथ.. उनका जवाब था काफी अच्छे है वो.. आप एडजस्ट हो जाओगे.. मै आपको उनका और उन्हें आपका नम्बर दे रहा हूँ.. थोड़ी देर बाद ही पशुपति भाई और दुबेजी से मोबाइल पर चर्चा हुई..&lt;br /&gt;रेलवे स्टेशन पर जैसे ही पहली बार हमारी मुलाकात हुयी वैसे ही लगा कि पशुपति भाई और दुबेजी से पट जायेगी..&lt;br /&gt;उसके बाद मुलाक़ात का दौर शुरू हुआ..कहा हो.. क्या करते हो.. जैसे प्रश्नों से लेकर मानसिकता तक के प्रश्न दुबेजी ने अपने अंदाज़ में दागे और उत्तर जाने.. मै भी उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक था.. और जाना भी.. ख़ास बात यह बताना चाहता हूँ कि न केवल उत्तर बल्कि उन प्रश्नों के उत्तर जानने के बाद उन्होंने सही गलत को सही तरह से समझाया भी..&lt;br /&gt;मेरे साथ-साथ इंदौर के बारे में भी वह जानना चाहते थे और पहले से जितना जानते थे.. उसको क्रास चेक भी करते जा रहे थे.. बहुत सी चीजों में उनको मैंने अपडेट किया तो बहुत बातो में उन्होंने भी मुझे अपडेट किया.. 110 किलोमीटर के रास्ते में उनसे स्नेह का नया रिश्ता बना.. महेश्वर पहुँचने के बाद जब गाँवों में जाने के लिए अलग-अलग ग्रुप बनाये गए तो मै और दुबेजी दोनों एक ही ग्रुप चाहते थे.. लेकिन पहले से निश्चित ग्रुप के कारण एक साथ नहीं हो पाए.. तो उन्होंने और मैंने दोनों ने राकेशभाई से एक ही ग्रुप में रखने का आग्रह किया.. जो अस्वीकार हो गया.. महेश्वर डेम और उसके बाद रात को लौटने के बाद तक उन्हें और मुझे इस बात का अफ़सोस रहा..&lt;br /&gt;खैर रात को गाँव से मै पहले आ गया था और फिर होटल भी चला गया.. मै रूम में अकेला था और दुबेजी या पशुपतिजी का साथ चाहता था.. पशुपतिजी अपने दोस्तों के साथ गेस्ट हाउस में ही रुक गए थे... दुबेजी से बात नहीं हो पायी.. रात को १२.३० बजे मेरे रूम का दरवाजा किसी ने खटखटाया.. मैंने उन्हें कह दिया यहाँ पर तो कोई और भी है.. वो आ रहे है.. तब तक दुबेजी के आने की सूचना नहीं थी और ना बात हुयी थी... लेकिन थोड़ी देर बाद फिर से किसी ने आवाज़ लगायी.. दरवाजा खोला तो दुबेजी थे.. मै और वो दोनों प्रसन्न थे कि एक साथ रहेंगे.. उन्होंने अपने लिए जगह रोकने के लिए मुझे काफी दुआएं भी दी..&lt;br /&gt;रात में देर तक उनसे कई मुद्दों पर चर्चा हुयी.. Discovery से लेकर धर्म-परिवार तक पर उनके विचार लोगो से अलग थे और ख़ास बात उनका ज्ञान और अपनी बात पर सही व सटीक विश्लेषण के साथ के दमदार उदाहरण... मुझे उन्होंने काफी प्रेरित किया... बार बार कहा कि यंग journalist के साथ ही यंग लेकिन सुलझी हुयी अनुभवी सोच भी है तुममे.. सुबह नाश्ते के समय एक महाशय से उनकी मुग़ल इतिहास पर काफी लम्बी बहस भी हुई.. और उन्हें मानना पड़ा कि दुबेजी के तर्क सही है.. मुझे भी उन्होंने कई बार इस बहस में शामिल किया..&lt;br /&gt;महेश्वर से अचानक आ जाने के बाद उनसे मुलाकात नहीं हो पायी.. हां आते समय जरुर उनसे मुलाक़ात करना नहीं भूला था.. इसके बाद एक दिन दिल्ली से उनका फ़ोन आया.. करीब 30 मिनट तक बात हुई.. काफी बातें समझाईं और टिप्स भी दिए.. वो कुछ लेख भी मुझे प्रिंट के लिए भेजने वाले थे.. ख़ास बात यह रही कि उन्होंने मेरी न्यूज़ नेट पर देखी और उस बारे में भी वो मुझे दाद देने में नहीं चुके.. एक बार और उनसे बात हुई.. और अब उनके जाने का समाचार सुना..&lt;br /&gt;दुबेजी जैसे इंसान से जो सिखने को मिला वो हमेशा प्रेरणा देता रहेगा.. मेरी दिल से श्रद्धांजलि और नमन..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रफ़ी मोहम्मद शेख&lt;br /&gt;दैनिक भास्कर इंदौर&lt;br /&gt;098263-87809&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-5405321215454796846?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/5405321215454796846/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=5405321215454796846' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5405321215454796846'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5405321215454796846'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/07/blog-post_2376.html' title='चंद पल में दिल जीतने वाला जादूगर कहां गया?'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUHy3D_TFI/AAAAAAAAACg/vt1GUYhVebQ/s72-c/dubey+sir+1.png' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-8612566566791953512</id><published>2010-07-31T22:16:00.000-07:00</published><updated>2010-07-31T22:19:51.173-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दुबे सर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्मृति'/><title type='text'>विचार नहीं प्लानिंग और एक्शन चाहते थे दुबे सर</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUD5rV2TyI/AAAAAAAAACQ/gG9ijladxWc/s1600/dubey_ji.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUD5rV2TyI/AAAAAAAAACQ/gG9ijladxWc/s320/dubey_ji.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5500306809324719906" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;नोएडा में एक मकान का बेसमेंट. किसी इंटरनेट कैफे की तरह सजाए गये आठ-दस क्यूबिकल और उन्हीं क्यूबिकलों के एक मेज जिस पर कम्प्यूटर नहीं था, उसी पर बैठते थे कृष्णन दुबे. यह 2003 की बात है जब रविवार के मिजाज की एक पत्रिका निकालने की कवायद उस कमरे में चल रही थी और अपने मित्र पशुपति के जरिये मुझे उस टीम में शामिल होने का मौका मिला था. वहीं कृष्णन दुबे जी से मुझे परिचित होने का सौभाग्य मिला था. फिर कई मुलाकातें हुईं, लोकायत के दौरान, उसके बाद, पशुपति की शादी में. मगर उन्हें जानने समझने का मौका मिला उनसे आखिरी मुलाकात के दौरान महेश्वर में यमुना के किनारे.&lt;br /&gt;विकास संवाद नामक संस्था मीडिया के मानक और लोग पर सेमिनार करवा रही थी. दुबे सर भी संयोग से पहुंचे थे. हमारे मित्र राकेश मालवीय ने परंपरा का निर्वाह करते हुए आधार वक्तव्य पेश किया और उस वक्तव्य में उन्होंने विस्तार से प्रकाश डाला कि मीडिया के मानकों में किस तरह ह्रास आ रहा है. दुबे सर मंच पर बैठे थे, उन्होंने राकेश के वक्तव्य के खत्म होने का इंतजार तक नहीं किया और मंच संचालक से माइक मांग कर बोल पड़े, "सवाल यह नहीं है कि किस तरह मीडिया के मानकों में गिरावट आई है, इस पर बात कर समय बर्बाद करने से बेहतर है कि हम यह बात करें कि हमें करना क्या है. क्योंकि यहां बैठे लोगों में से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे इस गिरावट को लेकर कोई शुबहा होगा, इसलिए इस गिरावट पर चर्चा करने से बेहतर है गिरने से बचाने के उपाय ढूंढे और काम शुरू करें."&lt;br /&gt;उसी वक्त उन्होंने यह भी कह डाला कि हम ये-ये कर सकते हैं. उन्होंने दो उपाय बताये &lt;br /&gt;1. सबसे जरूरी है पत्रकारों का एकजुट होना और यूनियन बनाना. इसके बगैर मीडिया कभी भी कारपोरेट के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाएगा और कारपोरेट घराने हमारा शोषण करते रहेंगे. &lt;br /&gt;2. वैकल्पिक मीडिया को मजबूत करना. पश्चिमी देशों में छोटे-छोटे साइट्स और कम्युनिटी रेडियोज का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है और आने वाले दिनों में मीडिया जगत में यही रूल करेंगे. &lt;br /&gt;उस पूरे सेमिनार में उन्हें जब-जब मौका मिला, उन्होंने यही बातें उठाईं और जाते वक्त आयोजकों से कह गये कि एक मैगजीन की प्लानिंग करो एक लाख रुपया मैं दूंगा. &lt;br /&gt;आज के जमाने में ऊंची बातें और आदर्शों की दुहाई देकर दुनिया को बदलने की योजना बच्चा-बच्चा जान गया है और हम सब समझते हैं कि इस तरीके से हमारा नाम तो चमक सकता है मगर हमारा उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है. मगर उस 79 साल के युवा ने अपनी बातें जिस इमानदारी से रखीं उसे भूल पाना नामुमकिन है. वह अनुभव मेरे लिये एक बड़ी सीख है अगर मैं इसे अपना सका तो मेरा जीवन भी थोड़ा सुगंधित हो सकता है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुष्यमित्र&lt;br /&gt;प्रभात खबर डॉट कॉम के संपादकीय विभाग में कार्यरत&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-8612566566791953512?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/8612566566791953512/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=8612566566791953512' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8612566566791953512'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8612566566791953512'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/07/blog-post_5736.html' title='विचार नहीं प्लानिंग और एक्शन चाहते थे दुबे सर'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUD5rV2TyI/AAAAAAAAACQ/gG9ijladxWc/s72-c/dubey_ji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-7176037312712377634</id><published>2010-07-31T22:06:00.000-07:00</published><updated>2010-07-31T22:10:23.167-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दुबे सर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्मृति'/><title type='text'>स्नेह का सोता न जाने कहां गुम हो गया....</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUBsfG0UxI/AAAAAAAAAB4/HvPiro_T4o8/s1600/Image0347.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; FLOAT: right; HEIGHT: 240px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5500304383678894866" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUBsfG0UxI/AAAAAAAAAB4/HvPiro_T4o8/s320/Image0347.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;फ्रेंड, फिलॉसफर, गाइड । दुबे सर को क्या कहें, ये दुविधा मेरी नहीं उनकी है जिन्होंने मेरा तार्रुफ दुबे सर से कराया । आनंदजी (आनंद प्रकाश श्रीवास्तव, मौजूदा एसोसिएट एडिटर, द संडे इंडियन) के साथ ही दुबे सर से पहली मुलाकात हुई और आखिरी भी । आनंद सर सदमे में हैं और अभी इससे उबर नहीं पाए हैं । बुधवार (28 जुलाई 2010) सुबह 6 बजे करीब दुबे सर के नंबर से फोन आया । इतनी सुबह फोन देख जो डर मन में कौंधा अगले पल कुछ लफ्जों ने वही बात दोहरा दी । तुरंत आनंद सर का फोन आया और हम दुबे सर के घर पहुंचे । जो सीढ़ियां चढ़ते हुए हम ऊपर उनके कमरे तक पहुंचते थे, वहां सन्नाटा पसरा था और दुबे सर खामोश थे । वो होते तो न जाने देखते ही कितनी बातें कह जाते । जब भी मिले बड़ी गर्मजोशी से और बड़ी जिंदादिली से । एक रिश्ता स्नेह का था... जो सारे रिश्ते से कहीं बढ़कर था ।&lt;br /&gt;दुबे सर से पहली मुलाकात की पृष्ठभूमि और पूरा प्रकरण भी काफी रोचक है । बात करीब 7 साल पुरानी है । कुछ निजी कारणों से उन्हें उन दिनों बिहारियों से बड़ी चिढ़ हो गई थी । लोकायत में कुछ संपादकीय सहयोगियों की जरूरत थी और मैंने एक झूठ के सहारे उनसे ये नौकरी मांगी । मैंने कहा कि मैं राजस्थान से हूं । हालांकि ये आंशिक रूप से सच था फिर भी झूठ ही था । इसी तरह पुष्यमित्र ने भी खुद को मध्यप्रदेश का बता कर उनकी टीम ज्वाइन की । हालांकि दुबे सर किसी भी शख्स से इतने सारे सवाल करते हैं कि ये झूठ बहुत दिनों तक नहीं चल सका । फिर तो वो जब न तब ठहाके लगाते और हमें ताना मारते- तुम बिहारियों से मैं बचना चाहता था और तुम्हीं लोगों ने मुझे घेर लिया ।&lt;br /&gt;लोकायत की ये नौकरी बहुत दिनों तक नहीं चली । पत्रिका के पहले इश्यू के साथ ही दुबे सर ने पत्रिका को अलविदा कर दिया । इस पत्रिका में काम करने की सबसे बड़ी उपलब्धि दुबे सर से परिचय ही रहा । इसके बाद उनसे निजी मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ और एक अजीब सी आत्मीयता बनती चली गई । दुबे सर के यहां ज्यादातर आनंद सर के साथ ही जाना होता था । दरअसल उनकी बातचीत का दायरा इतना बड़ा होता था कि मुझे हर वक्त डर लगता रहता, पता नहीं कब कौन सा सवाल दाग दें । हालांकि थोड़ी सी झिड़क के साथ ही फिर वो विस्तार से सब कुछ समझा कर ही दम लेते ।&lt;br /&gt;दुबे सर ने काफी स्नेह और प्यार दिया । मेरी नौकरी को लेकर चिंतित रहते और जब नौकरी हो गई तो शादी को लेकर सलाह देने लगे । शादी पक्की हुई और मैंने उन्हें सूचना दी तो कहा मैं जरूर जाऊंगा पूर्णिया । तब मैं और दुबे सर एक साथ ही घर गए थे । तिलक से लेकर रिसेप्शन तक हर फंक्शन में दुबे सर शामिल हुए । डायबिटीज की शिकायत के बावजूद मिठाइयां जमकर खाईं और बारात में ठुमके भी लगाए । घर का हर छोटा- बड़ा दुबे सर का ये जोश और उनका प्यार देख दंग था । मैं मन ही मन गदगद ।&lt;br /&gt;दुबे सर के साथ दूसरी यात्रा महेश्वर की रही । अभी मार्च महीने की ही तो बात है । दुबे सर के सामने मैंने महेश्वर जाने का प्रस्ताव रखा और वो फट से तैयार हो गए । कब और कैसे जाना है फटाफट प्रोग्राम बनाया और चल पड़े। महेश्वर विजिट के दौरान काफी बातें हुईं । मीडियाकर्मियों के हालात और उनके संगठन को लेकर वो काफी फिक्रमंद थे । वहां हर किसी के साथ काफी गर्मजोशी से मिले और कई सारे सवाल भी रखे । मुझसे कहा कि विकास संवाद वालों से बात कर अगली बार एक सत्र अपने मन के मुताबिक रखवाऊंगा और उसका संचालन भी खुद ही करूंगा । सचिन जी के साथ भी काफी बातें की... लेकिन ये अगला साल नहीं आ सका ।&lt;br /&gt;दुबे सर के साथ आखिरी मुलाकात विनायक अस्पताल में हुई । इधर-उधर की बातों के बाद मेरे घर के बारे में पूछने लगे । कहने लगे सर्बानी को बी एड करवा दो । मेरी पत्नी सर्बानी के करियर को लेकर वो शुरू से ही काफी फिक्रमंद रहे । उसने लॉ कर लिया है अब कुछ करवाते क्यों नहीं ? कुछ नहीं तो बी एड करवाओ... नौकरी लगवाओ.. सर्बानी से भी फोन पर ये सब बात दोहराते । वो इस बात के पक्षधर थे कि महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हों और घरेलू हिंसा या दमन का शिकार न हो । गाहे-बगाहे कई उदाहरणों से वो मुझे भी ताकीद करते रहते थे ।&lt;br /&gt;दुबे सर का जाना... स्नेह के एक साये का उठ जाना है... अब वो बस यादों में ही रहेंगे... कभी हम उस कमरे में बैठ कर घंटों गप्प नहीं लड़ा सकेंगे जहां पता नहीं कितनी- कितनी बार हमने अड्डा जमाया... अब दुबे सर के साथ स्लमडाग मिलेनियर भी नहीं देख पाएंगे... अब कभी मन घबराया तो कहां जाएंगे सर... एक घर था अपना वो तो उजड़ गया... पिता तो मीलों दूर हैं.... एक पिता जो थोड़े से फासले पर बैठा था उसने भी अपना हाथ सिर से उठा लिया... हम स्वार्थी हैं सर... इसलिए भी आपको काफी-काफी मिस करेंगे... आपकी तरह निर्लिप्त और निर्मोही नहीं कि पल भर में टाटा-बाय कर चलते बने....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पशुपति शर्मा&lt;br /&gt;मीडियाकर्मी और दुबेजी के स्नेह का चिर आकांक्षी&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-7176037312712377634?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/7176037312712377634/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=7176037312712377634' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/7176037312712377634'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/7176037312712377634'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/07/blog-post_31.html' title='स्नेह का सोता न जाने कहां गुम हो गया....'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUBsfG0UxI/AAAAAAAAAB4/HvPiro_T4o8/s72-c/Image0347.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-1681443204852322492</id><published>2010-07-30T22:50:00.000-07:00</published><updated>2010-07-31T22:15:28.174-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दुबे सर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्मृति'/><title type='text'>दुबे जी आप सुबह बहुत याद आओगे</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUC0dL0yNI/AAAAAAAAACI/-jEF6XlCA3k/s1600/Krishnan_Dubey.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 198px; FLOAT: left; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5500305620113606866" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUC0dL0yNI/AAAAAAAAACI/-jEF6XlCA3k/s320/Krishnan_Dubey.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मौत हमारे लिए खबर होती है। कई बार तो मौत ही हमारे लिए खबर होती है। दुबे जी के साथ भी यही हुआ। कृष्णन दुबे जी के साथ। दुबे जी अब नहीं रहे। इसके पहले के कुछ दिनों में वे क्या सोच रहे थे? दुनिया को किस ढंग से देख रहे थे? कितने उदास थे और कितने ऊर्जावान, इसकी कोई खबर नहीं है। बीते पांच सालों में उनसे कम ही मुलाकातें हुई, लेकिन वे हर बार ऊर्जा और अपनत्व से भरे हुए मिले। उनका न रहना अपूरणीय क्षति नहीं है, क्योंकि वे महान नहीं थे। इंसान थे। गलतियों से सीखने वाले और हर समय नये नये सपनों में रंग भरने वाले इंसान। वे कहते थे- हर कोई पत्रकार, नेता, डॉक्टर, इंजीनियर होना चाहता है, लेकिन इसके लिए जरूरी शर्त इंसान होना है। यह शर्त दुबे जी पूरी करते थे। वे भरपूर इंसान थे। सुख में हंसने और दुख में रोने वाले इंसान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहली मुलाकात रांची में हुई थी। 'पब्लिक एजेंडा' मैगजीन के प्रकाशन से पूर्व संभावनाओं और योजनाओं को जमीनी स्तर पर टटोलने के लिए वे हैन्सन जी के साथ पहुंचे थे। महाराजा होटल में। पशुपति जी ने फोन पर बताया था कि उनसे मिल लेना। शाम को फोन किया तो बोले कि झारखंड के विभिन्न इलाकों में घूमने और अखबारी साथियों से मिलने का प्रोग्राम है। साथ चलने का प्रस्ताव रखा तो मना नहीं कर सका और दूसरे दिन सुबह सबेरे उनसे मिलने पहुंचा। मेरी सेहत पर नर्म टिप्पणी करते हुए नाश्ता मंगवाया और चल दिये। 8 बजे हम डाल्टेनगंज यानी मेदिनीनगर के लिए निकले। गर्मी खासी थी सो एसी चल रहा था। रातू रोड पार करते करते उन्होंने कार की खिड़की खोल ली। ताजी हवा के लिए। सिगरेट भी सुलगा चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;76 वर्षीय दुबे जी किस्सों के साथ ताजा राजनीतिक घटनाओं का मार्क्सवादी विश्लेषण करते जाते थे। उनकी जानकारी और अध्ययन प्रवृत्ति के बारे में सुन रखा था लेकिन वे सुने से कहीं ज्यादा पढ़ाकू थे। हर विषय पर स्पष्ट राय और उत्साहित करने वाली जानकारी उनके पास थी। मेरे लिए यह मजेदार सफर होने वाला था। उन्होंने रोडमैप तैयार कर रखा था। किस शहर में किससे मिलना है, क्या बात करनी है? कौन सी इन्फारमेशन निकालनी है? कहां कितना रुकना है और अगले शहर तक पहुंचने के लिए कम से कम कितने बजे निकलना है, से लेकर कहां नाश्ता और कहां खाना-खाना है, तक को वे मोटे तौर पर निर्धारित कर चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डाल्टेनगंज, गढ़वा, गुमला, राउरकेला, सिमडेगा के हालात पर चर्चा होती रही। कई खबरों के बारे में और रांची के अखबारों के बारे में भी। प्रभात खबर में छपने वाली छोटी-छोटी खबरों के बारे में उनकी मायनीखेज टिप्पणी आज भी नहीं भूलती कि-''अखबार को रोजनामचा होने से बचना चाहिए। कौन सी खबर पढ़ानी है इसकी समझ संपादकीय साथियों को जरूर होनी चाहिए। पेज पर ज्यादा खबरें देना संपादकीय अयोग्यता ही है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम शाम तक लातेहार और डॉल्टेनगंज का काम निपटा कर गढ़वा पहुंच चुके थे। इस बीच मांडर, चान्हो, कुडू, मनिका में भी रुके। सिगरेट और राजनीतिक बातचीत चलती रही। अखबारी दुनिया पर टिप्पणी के साथ वनस्पितियों के बारे में भी दुबे जी बताते जा रहे थे। हैन्सन शाम की 'व्यवस्था' के लिए परेशान थे। गढ़वा के राज होटल में रुके थे हम। मच्छरों ने सारी रात परेशान किया और सुबह-सुबह बिना चाय पिये ही हम सरगुजा की ओर चले। रंका पहुंचकर चाय नाश्ता किया और आगे बढ़े। रामानुजगंज से छत्तीसगढ़ शुरू हो जाता है। हम रामानुजगंज से तकरीबन 10-15 किलोमीटर आगे तक निकल गये थे। यहां एक गांव था, नाम याद नहीं आ रहा। वहां जाम लगा था सो लौट लिये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुबे जी की इच्छा थी कि रुककर इंतजार करते हैं जाम खुलने का। पता चला जाम ग्रामीणों ने लगाया है। कोई ट्रक किसी पशु को टक्कर मारकर चला गया था, जिसके विरोध में जाम लगा था। धूप बढ़ती जा रही थी और जाम खुलने के आसार नहीं थे। सो लौट लिये। गढ़वा की ओर। रास्ते में तय हुआ कि नेतरहाट चलते हैं। गढ़वा के पहले ही कोलिबिरा जाने वाली रोड पर मुड़ गये और तकरीबन पांच बजे शाम को हम नेतरहाट की पहाड़ी पर थे। झारखंड की खूबसूरती का एक शानदार नमूना। यहां के प्रभात होटल में रुके। शाम आठ बजे तक पहाड़ी से दूर तक फैले खेत और पहाड़ों को ताकते हुए हमने कई सिगरेटें सुलगाई और बातचीत का सिलसिला लगातार चलता रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नक्सलवाद पर हैन्सन और दुबे जी के बीच थ्योरिटीकल बातचीत होती रही। बीच-बीच में मैंने स्थानीय हकीकतों को जस्टीफाई किया तो दुबे जी तकरीबन भड़क गये। वे मानने को तैयार नहीं थे कि नक्सल पॉलिटिक्स में आपराधिक तत्व हो सकते हैं। उन्हें गुरिल्ला वॉरफेयर के चेक्स एंड कंट्रोल पर पूरा भरोसा था। दरहकीकत वे अपनी खीज मिटा रहे थे। चांदनी रात में शराबनोशी के साथ उन्होंने सीपीआई और सीपीएम की पॉलिटिक्स को जमकर लताड़ा। हिंदुस्तान में रेवोल्यूशनरी पॉलिटिक्स की कमी और टैक्टिस पॉलिटिक्स की हालिया खामियों पर बोलते रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10 बजते बजते वे तकरीबन एकालाप की स्थिति में थे। यह गुस्सा था जो निकल रहा था। वे करीब 12 बजे सोये। सुबह-सबेरे वे जागे और हैन्सन व मुझे जगाया। घूमने निकले और स्थानीय लोगों से बातचीत की शुरुआत की। दोपहर के खाने से पहले तक यह सिलसिला चलता रहा। आदिवासियों के बीच हनुमान की मूर्तियों को लेकर दुबे जी खासे आतंकित थे। वे इस रूपांतरण के आर्थिक और राजनीतिक आधार देख रहे थे। चर्च की भूमिका और हिंदू संगठनों के कार्यों से वे साथ-साथ नाराजगी जाहिर कर चुके थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी दिन शाम में हम गुमला पहुंच चुके थे। बीच में छऊ नाच की एक मंडली से यादगार भेंट, सिमडेगा में जनी शिकार पर निकली महिलाओं के फोटो और खेतों में घूमने की रंगतों के बीच देर रात को हम राऊरकेला में थे। यहां की झारखंडी पॉपुलेशन, सर्कुलेशन और खबरों के रिवाज को परखते - परखते रात के तीन बज गये थे। हम सो गये। दूसरे दिन ताजा दम हो तकरीबन दस बजे फिर निकले इस बार बिरमित्रपुर होते हुए हमें कोलिबिरा पहुंचना था। रास्ते में ग्रामीणों से बातचीत और मुकेश के गानों पर भी बातचीत होती रही। ओपी नैयर की धुनों के दीवाने दुबे जी भारतीय संगीत के अच्छे श्रोताओं में से एक थे। वे गीतों को गुनगुनाते हुए लय और ताल का पूरा ख्याल रखते थे। अपनी उम्र को छकाते हुए वे जबरदस्त स्टेमिना के साथ गाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी स्टेमिना का दूसरा नमूना पूर्णिया में मिला। पशुपति जी की शादी में। बारात पूर्णिया से रायगंज, पश्चिम बंगाल जानी थी। हम कुछ दोस्त एक गाडी में बैठ गये। दुबे जी को छोड़ दिया तो बीच में जब नाश्ते के लिए रुके तो वे हमारे साथ हो लिये। जब मैंने कहा कि दुबे जी आपको बुजुर्गों के साथ रहा चाहिए। तो बोले- वहां खतरा ज्यादा है। मैंने कहा कि- लौंडों की सोहबत में ढेले की सनसनाहट भी सुननी पड़ती है। तो मुस्कुराते हुए बोले- ढेले हमने भी फेंके हैं और यकीन मानो तुम लोगों से ज्यादा सनसनाहट पैदा की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे कार्यक्रम के दौरान वे उत्साह से भरपूर रहे। शादी के बाद जब हम कुछ मित्र भागलपुर गये तो वे पूर्णिया में ही रुक गये। दूसरे दिन मैं लौटा तो उपाध्याय जी और वे भिडे हुए थे। उपाध्यायजी खांटी संघी और दुबे जी क्लासिकल मार्क्सवादी। दोनों ने एक साथ पूरा दिन कैसे गुजारा होगा यह मैं अनुमान लगा सकता था, लेकिन साथ मुझे दिल्ली तक की यात्रा करनी थी। यह सोचकर मैं सिहर गया। पूरी यात्रा के दौरान दुबे जी चालू रहे। संघी सोच के तर्कों को उदाहरणों और यकीनी जनवाद से रौंदते हुए वे थोड़े पजेसिव भी लगे , लेकिन उनका मार्क्सवाद में विश्वास ताकत देता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में छुटपुट मुलाकातें उनके घर और पूसा रोड स्थित पब्लिक एजेंडा के ऑफिस में होती रही। खाने और पीने के शौकीन दुबे जी के साथ पब्लिक एजेंडा ऑफिस में हुई मुलाकात मेरे लिए अपनी सबसे अच्छी दोपहरों में से एक रही है। अब अंधेरी कोठरी का वह रोशनदान बंद हो चुका है, लेकिन जो रोशनी उन्होंने फैलायी वह यकीनन भरोसा देते है, उजाले का। इस रात में जब हर तरफ रोशनी की दरकार शिद्दत से महसूस की जा रही है, दुबे जी याद आते हैं। उन्हे यकीन था कि सुबह होगी। वे सुबह का इंतजार कर रहे थे। रोशनी को बचाने की जुगत भी कर रहे थे। अफसोस वे सुबह के पहले ही चले गये, इस काली रात में। सुबह जब रोशनी होगी, तब आप बहुत याद आओगे दुबे जी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सचिन श्रीवास्तव&lt;br /&gt;गाजियाबाद से प्रकाशित 'एक कदम आगे' के संपादकीय साथी और दुबेजी के युवा मित्रों में एक।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-1681443204852322492?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/1681443204852322492/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=1681443204852322492' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1681443204852322492'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1681443204852322492'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/07/blog-post_30.html' title='दुबे जी आप सुबह बहुत याद आओगे'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUC0dL0yNI/AAAAAAAAACI/-jEF6XlCA3k/s72-c/Krishnan_Dubey.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-3017325612133540619</id><published>2010-07-30T11:24:00.000-07:00</published><updated>2010-07-31T22:13:34.757-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दुबे सर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्मृति'/><title type='text'>दुबेजी, हम करेंगे आपके सपने पूरे</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUCaPv3yiI/AAAAAAAAACA/8iLTt_WNdus/s1600/dubey_ji.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; FLOAT: right; HEIGHT: 240px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5500305169830103586" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUCaPv3yiI/AAAAAAAAACA/8iLTt_WNdus/s320/dubey_ji.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दुबे जी ने कहा था आप लोग शुरू करो,दिल्ली से हर संभव मदद दिलाने का मैं वायदा करता हूं। अफसोस उनके सपनों को हम छोटी-मोटी कोशिशों से साकार कर पाते इससे पहले ही वह चले गए। उम्र के इस मुकाम पर पहुंचकर भी उनके अंदर के जज्बात,हौसले, उर्जा, उनके सपनों, स्नेह और सम्मान को समझा जा सकता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह सचिन भाई (नई इबारतें वाले)की पोस्ट से जब यह सूचना मिली तो पूरा दफ्तर सन्न था। हम सभी के लिए यह एक गहरा आघात था। केवल एक व्यक्ति के रूप में ही नहीं, मीडिया के बदलते परिवेश में वह उन चंद लोगों में थे जो अब भी अखबारनवीसों की ताकत के एकजुट होने की बात कहते थे, मीडिया में बदलाव की बात करते थे, मानकों की बात करते थे। महेश्वर में मीडिया सम्मेलन के बाद दुबे जी हमारे लिए एक प्रेरणा पुरूष बन गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुबेजी से कोई बहुत पुराना नाता नहीं थी। इसी साल जब विकास संवाद के सालाना सम्मेलन के लिए लोगों से बातचीत हो रही थी तो पशुपति भाई ने दुबेजी के बारे में बताया था। भाई प्रशांत दुबे ने उनसे बात की तो पहला फोन ही लगभग पौन घंटे की अवधि का रहा होगा। इसी से उनकी जिज्ञासा को समझा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पशुपति भाई के साथ जब दुबे जी 14-15 घंटे का लंबा सफर तय करके महेश्वर पहुंचे थे। उनको देखा तो एकबारगी सोच में पड़ गया कि आखिर कौन सी उर्जा है इस व्यक्ति के अंदर जो इस अवस्था में इतने कष्ट सहने के बाद एक सम्मेलन में शरीक होने चला आया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार सम्मेलन में हमने नर्मदा घाटी के पांच गांवों में चलने की यात्रा करने की योजना तैयार की थी। बातचीत के बाद तय किया गया था कि पहले ही दिन गांवों में जाया जाए, वहां लोगों से बात करें। घाटी के लोगों ने हमसे पहले ही वायदा ले लिया था कि मेहमानों को हम ही भोजन कराएंगे। पांच समूह निकले थे। तीन जीप से और दो बस से। मैं जिस जीप में था उसकी अगली सीट पर दुबेजी विराजमान थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यकर्ता रामकुंवर भी साथ थीं। बीच की सीट पर राकेश दीवान, रितुजी, रानूजी, सीमाजी बैठे थे। पीछे शेख भाई, आसिफ भाई, आशीष अंशु भाई और मैं ठुसे हुए थे। खास बात यह थी कि हमारा गांव मरदाना सबसे दूर था और रास्ता बेहद खराब। लगभग तीन घंटे की थका देने वाली यात्रा के बाद हम गांव में पहुंचे थे। लगभग आठ बजे हमने एक घर में चाय पी। उनसे सामान्य बातचीत होती रही। यह घर बेहद जुदा अंदाज में बना हुआ था। दुबे जी घर की उसारी में पड़े झूले पर बैठे। चाय पी। इसके बाद हमें नर्मदा किनारे एक मंदिर में जाना थां। अंधेरे के कारण इस घाट के सौंदर्य को तो हम नहीं देख सके, लेकिन दाल-बाटी और चावल खाना बहुत राहत भरा था। मंदिर से लौटते-लौटते नौ बज गए थे। इस बीच पूरे गांव में खबर हो गई थी और लोग बातचीत के लिए जमा थे। कोई घरों की टिपटियों पर, कोई फट्टों पर और कोई अपने जूतों और चप्पलों को ही नीचे दबाकर बैठा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांव वाले पूरे तथ्यों और आंकड़ो के साथ अपनी-अपनी बातें कह रहे थे। इतनी कहानियां, इतनी बातें थी कि पूरी रात भी बैठक चल सकती थी। मुझे बीच में आना पड़ा और मैंने निवेदन किया कि दुबेजी सहित सभी लोग काफी दूर-दूर से आए हैं, थके हुए हैं और अभी लंबा सफर तय करके वापस महेश्वर भी जाना है। आखिरी वक्ता के रूप में दुबेजी ही सामने आए थे। वह अभिभूत थे। इस पूरी लड़ाई को और लड़ने वालों को उन्होंने प्रणाम किया था। उन्होंने आशा भी जताई थी कि एक न एक दिन यह लड़ाई जरूर बेहतर परिणाम की तरफ जाएगी। उन्होंने कहा था आज मुझे लग रहा है कि हम दिल्ली में बैठकर कुछ भी नहीं कर रहे, असली लड़ाई जो है वह आप लोग ही लड़ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे रास्ते भर आते-जाते उन्होंने बातचीत में एक सूत्रधार की भूमिका अदा की। नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ राकेश भैया का एक लंबा रिश्ता रहा है। उनके पास आंदोलन की कहानियों का विशाल भंडार है। राकेश भैया की जान-पहचान और दोस्ती का दायरा भी बहुत बड़ा है, लेकिन दुबेजी से उनकी भी यह पहली मुलाकात थी। बात जब इधर-उधर के चुटकुलों से आंदोलन की कहानियों पर आई तो राकेश भैया एक के बाद एक सुनाते चले गए। कहानियों में हुंकारा भरने वालों में भी दुबे जी सबसे आगे थे। इतनी लंबी यात्रा के बाद उनका शरीर भले ही थक-थक जा रहा हो, लेकिन वह नहीं थके थे। महेष्वर से 12 किमी दूर एक जगह हमने गाड़ी रोककर चाय पी। महेश्वर पहुंचे तो हमारे अलावा बाकी के सभी लोग कहीं पहले पहुंच गए थे। कई बिस्तरों में जा पहुंचे थे। अजीत सर, अखलाक भाई, पुष्यमित्र ने बाहर मंडली जमा रखी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन आधार वक्तव्य के बाद कृष्णन दुबेजी ने भी अपनी बात रखी थी। उन्होंने कहा था कि सभी को मालूम है कि समस्या क्या है, हमें उसके हल की तरफ बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा था कि मौजूदा दौर में ट्रेड यूनियन या तो खत्म हो गए हैं या निष्क्रिय हैं। सबसे पहले जरूरत इस बात की है कि जगह-जगह ट्रेड यूनियन का गठन किया जाए ताकि पत्रकार तो कम से कम अपने पर हो रहे अन्याय का विरोध कर सके। दूसरे उपाय के तौर पर उन्होंने वैकल्पिक मीडिया के बढ़ावे की बात कही थी। इसके लिए एक लाख रूपए की मदद दिल्ली स्तर पर करने की बात भी की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पूरे सम्मेलन में वह सबकी बातों को ध्यान से सुनते रहे। कभी हॉल में बैठकर, थक जाते तो बाहर कुर्सी लगाकर बैठ जाते।&lt;br /&gt;सम्मेलन से लौटकर दुबे जी ने सम्मेलन की थीम मीडिया के मानक और समाज पर हमें एक लंबा आलेख भेजा था। लगभग आठ पेज के इस आलेख में उनकी सोच,सपने और नजरिया साफ झलकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुबे जी का चले जाना एक खालीपन के आ जाने जैसा है। अलग-अलग लोगों के साथ उनके कितने-कितने अनुभव थे। दुबे जी आप याद आते रहेंगे। आपकी बातें हम सभी के लिए हमेशा प्रेरणा रहेंगी। दुबे जी को विकास संवाद परिवार की भावभीनी श्रद्धांजलि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-राकेश मालवीय, विकास संवाद, भोपाल&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-3017325612133540619?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/3017325612133540619/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=3017325612133540619' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/3017325612133540619'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/3017325612133540619'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='दुबेजी, हम करेंगे आपके सपने पूरे'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TFUCaPv3yiI/AAAAAAAAACA/8iLTt_WNdus/s72-c/dubey_ji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-4600397394354778730</id><published>2010-06-28T19:24:00.000-07:00</published><updated>2010-06-28T19:41:13.595-07:00</updated><title type='text'>कमाठीपुरा की गलियों से</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TCldMkOOnFI/AAAAAAAAABo/2fl-gkPXPzg/s1600/kamathipura.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 216px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TCldMkOOnFI/AAAAAAAAABo/2fl-gkPXPzg/s320/kamathipura.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5488020091390827602" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;शिरीष खरे, मुंबई से &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह शहर के उठने का वक़्त है. बोरीबली से मुंबई सेंट्रल आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक़्त, हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक़्त है. मुंबई सेंट्रल से यात्रियों को अपने में समाए बेस्ट यानी ‘बॉम्बे एलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट’ की लालधारी बसों ने भी चौतरफ़ा दौड़ना शुरू कर दिया है. मुझे भी यहाँ से पैदल अब 15-20 मिनट ही चलना है, सिटी सेंटर से होते हुए सीधे कमाठीपुरा की गलियों की तरफ़.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अटपटे-से एहसासों से जुड़े कुछ सवाल लिए हुए बढ़ रहा हूँ. क्या आप जानते हैं कि रेडलाईट की यह गलियाँ सारी रात जागी हैं और ग्राहकों के इंतजार में अभी भी सोई नहीं हैं ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ की गलियों ने यहाँ को बनते हुए देखा है. अंग्रेजों ने अपने सैनिकों के लिए यहाँ कभी ‘कम्फर्ट जोन’ बनवाया था और विदेशों से बड़ी तादाद में यौनकर्मियों को बुलवाया था. 1928 में यौनकर्मियों को लाइसेंस जारी किए थे. मगर 1950 में सरकार ने यौन व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया था. इसके बावज़ूद यह इलाक़ा आज भारतीय यौनकर्मियों का बहुत बड़ा घर कहलाता है. यहाँ 200 से ज्य़ादा पिंज़रानुमा कोठरियों में 5000 से भी ज्यादा यौनकर्मियों का रहवास है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आंध्रप्रदेश के कमाठी मजदूरों के नाम पर यह इलाक़ा कमाठीपुरा कहलाता है. एक ज़माने में गुजरात के वाघरी लोगों की भी यहाँ खासी तादाद थी. मगर अब तो बँगाल, नेपाल, कर्नाटक, तमिलनाडू, उड़ीसा, असम से आए लोग भी ख़ूब मिल जाया करते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमाठीपुरा का यह पूरा इलाक़ा मौटे तौर से 16 गलियों में बटा है, 9 गलियों में सेक्स का कारोबार चलता है, ब़ाकी 5 गलियां रेसीडेंटल और बिज़नेस के लिए हैं. यह गलियाँ आगे जाकर नार्थबुक गार्डन, बैलेसिस रोड़, फाकलेंड रोड़ से जुड़कर अपनी पहचान ख़ोने लगती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, यहाँ की गलियों में भारी भीड़ के बीच से पैदल चलते हुए आदमी कुछ ज्य़ादा ही ठहर रहे हैं, वह चलते-चलते टकरा भी जाते हैं. हो सकता है कि मेरी तरह आपका दिल भी यहाँ धकधक की आवाज़ पर काबू पाने के चक्कर में बैठता जाए, और ज़ुबान अपनेआप सिलती जाए, दर्ज़नो आँखें उम्मीद लिए आपके ऊपर भी अटक जाएं, और मेरी तरह आपका बदन भी पीला पड़ता जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;कतरा-कतरा ज़िंदगी&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसम तो ख़ुशनुमा है, मगर ख़ुली नालियों से आने वाली बदबू चारों ओर फैली रहती है. एक गली से दूसरी और तीसरी से चौथी में मुड़ता हूँ, मगर पूरा इलाक़ा इतना तंग और फ़ैला हुआ है कि दो-चार बार घूमने के बाद भी यह शायद ही समझ में आए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्हीं गलियों में यौनकर्मियों की अनगिनत और अंतहीन कहानियाँ हैं. यहाँ से यौनव्यापार मौटे तौर पर चार तरीकों से चलते हुए देख रहा हूँ- एक तो अपने को सीधे बेचने वाली औरतों से, दूसरा पिंज़रानुमा कोठरियों की मालकिनों यानी घरवालियों से, तीसरा पिंज़रानुमा कोठरियों में कैद लड़कियों से और चौथा दारू के अड्डों से.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक भरा पूरा बाज़ार है- नीचे दुकानें और ऊपर औरतें खड़ी हैं. शहर की ब़ाकी लड़कियां जब प्यार का खु़शनुमा एहसास लिए सोती-जागती हैं, यहाँ की लडकियाँ अपने को किसी के साथ भी किराए पर खुल्ला छोड़ देती हैं. शहर की ब़ाकी औरतों के लिए सुबह, शाम, रात होने के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं, मगर यहाँ की औरतों के लिए सुबह, शाम, रात का एक ही अर्थ है- ग्राहकों को पकड़ना और उनसे पैसा कमाना. यह अपने ऊपर बेहिस़ाब पाऊडर, लिपिस्टिक, काजल, पर्स, सेंडल, जूड़े, सस्ती जेव्लरी क्या-क्या नहीं लादे हैं. इनके जींस, टीशर्ट, फ़िराक, सलवार-शूट, ब्लाउस, स्कर्ट, साड़ी में हर आकार और प्रकार के कट लगे हुए हैं. ऐसे में एक ग्राहक का काम यहाँ से वह माल छांटना है, जिसे तोड़मरोड़ कर अपने को हल्का कर सके, और कुछ और रातों तक आराम से सो तो सके.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप यहाँ से देखिए- यह औरतें रंग-ढ़ंग और चाल-ढ़ाल से अपने ग्राहक को किस तरह से पहचान लेती है. दूसरी तरफ, आपको यहाँ आने वालों से भी यह पता लग सकता हैं कि यहाँ कौन-सी गलियाँ कितनी सही हैं, और क्यों हैं, उनमें कौन सी ज़मात वालों का असर ज्य़ादा है, उनका हिसाब-किताब क्या है, उनका धंधापानी कैसा है, कभी-कभार क्या-क्या लफड़ा हो सकता है, और उनसे कैसे-कैसे निपटा जा सकता है, वगैरह-वगैरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप यहाँ से देखिए- एक जगह पर खड़ी होने के बावजूद यह पिंज़रानुमा कोठरी की दुनिया लोकल ट्रेन जैसी नहीं दिखती है, जो कुछ यात्रियों को उतारती है, और नए यात्रियों को चढ़ाकर एक मशीन सी चलती रहती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां भाई सुनिए... एकदम नया आया है.. गलत नहीं ले जाऊंगा चलिए... नेपाली, बंगाली, साऊथ इंडियन सब हैं... पहले देख लीजिए... 12 से 16 का है... गोरा है देखने में क्या जाता है... इधर तो धंधा चलता है... उधर भी सस्ता ही है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिंज़रानुमा कोठरी के सामने खड़े हुए नहीं कि एक-एक करके बहुत सारे दलाल आपको घेरने लगते हैं. यहाँ तक कि फ़ोन नम्बर वाली पर्चियां भी देने लगते हैं. इनसे बगैर उलझे आगे बढ़ना ठीक है. वैसे इनकी भी अपनी कहानियाँ हैं. मगर अभी आगे बढ़ना ठीक है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खै़र पिंज़रानुमा कोठरी के भीतर जैसे ही जाएंगे, वैसे ही आप दूसरी दुनिया में घुस जाएंगे. यहाँ लकड़ी की सीढ़ियों से लगे कुछ कोने, कोनों से दरवाजे, दरवाजों से ताबूतनुमा कमरे और कमरों के अंधियारे से बहुत सारी औरतें दिखाई देती हैं. यहाँ तक़रीबन 25 से 30 औरतों के साथ उनकी एक घरवाली भी दिखेगी. यहाँ औरतों की तादाद और उनकी उम्र से किसी घरवाली की सत्ता और उसकी संपत्ति का पता चलता है. यहाँ तक़रीबन आधी तो 22 साल से ज्य़ादा की नहीं हैं. यहाँ का बड़ा सीधा हिसाब है- 12 से 22 साल तक को ऊँचे दामों पर बेचो, और 30 से 35 साल के बाद घरवाली बन जाओ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मेरी तरह आपको भी यहाँ किसी से सीधे-सीधे यह पूछना मुश्किल हो सकता है कि- "आप यहाँ तक कैसे पहुंचीं"... "वो कौन था जिसने आपसे पहली बार कहा कि पैसे कमाने का यह भी एक तरीका हो सकता है", इसलिए मेरी तरह आप भी यहाँ पहुँचकर हो सकता है कि- ‘आपका नाम...’ ‘आप कैसे हो’ से आगे न बढ़ पाएं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर दिन के उजाले में एक इज्ज़तदार कहलवाने वाला आदमी जहाँ आने से कतराता है, वहाँ से मुझे लगता है कि सुबह से शाम तक का वक़्त ज़रूर बिताया जाए. यहाँ की कुछ सच्चाईयों से दो-चार हो जाया जाए और कोई नैतिक बहस छेड़े बगैर अपना ताज़ातरीन तजुर्बा बांट लिया जाए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बड़ी बहन, छोटी बहन और... &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘याद आ रही है, तेरी याद आ रही है...’- ‘‘सुबह-सुबह पता नहीं क्यों आ रही है’’ कहते हुए जूही ने रेडियो बंद कर दिया है. आज के दिन पता नहीं कितनों दिनों के बाद वह पूरी नींद सो जाना चाहती है. दिन को जागना उसे कभी भी अच्छा नहीं लगा है. मगर उससे तो हरदम चुस्त रहने की उम्मीद की जाती है. इस उम्मीद के बगैर भी दुनिया चल सकेगी- वह सोच भी नहीं सकती है. शहर के बहुत से ठिकाने बदलने के बाद ही तो वह यहाँ तक आई है, और अब यही की होकर रह गई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ उम्र के पच्चीसवें साल में भी उसने अपने सीधेपन को संभाले रखा है. उसकी सुने तो उसमें अब पहले जैसी बात नहीं है. बचपना तो बहुत पहले ही ख़त्म हो चुका था, जवानी भी ख़त्म होने ही वाली है. असल में जूही की बड़ी बहन चंपा की शादी होने वाली है, इसलिए वह यहाँ हैं. इससे पहले चंपा भी यहाँ बैठ चुकी है. जुही कहती है कि उसके घर में अब कोई फूल (छोटी बहन) नहीं बचा है, इसलिए उसकी शादी के लिए यहाँ कौन बैठने वाली है, पता नहीं है. मगर ऐसा उसने मज़ाक में कहा है या वाकई संज़ीदगी से, यह भी तो पता नहीं चलता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी उसके हिस्से में दिन और रात का अंतर नहीं बचा है. मौसम के मिजाज़, छुट्टी वाले दिनों या चौपाटी जाने जैसे ख़्यालों से भी जूही का कोई लेना-देना नहीं है. ग्राहक कितना सही है-यह भी उसे नहीं जानना है. शहर के नक़्शे की बजाय उसकी दुनिया के तार तो घनी बस्ती से भी सघन उस नेटवर्क से जुड़े हुए हैं जिसमें हजार रूपए का ग्राहक ढ़ूढ़ लेना सबसे बड़ी बात मान ली जाती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;मां की तलाश में गोमती&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इधर से सबसे आख़िरी के कमरे तक अगर नज़र पहुँचे तो कोई भी यह पूछ सकता है कि उधर रौशनी क्यों नहीं है- यह बात गोमती से अच्छा भला कौन जान सकता है, जिसे 8 साल की उम्र में यहां कैद किया गया था. दरअसल, नेपाल के काठमांडू की गोमती की मम्मी बचपन में मर चुकी थी. इसलिए वह अक्सर स्कूल के बाहर ही बैठी रहती थी. इतनी नाज़ुक उम्र में उसे क्या पता था कि स्कूल या मेले की ऐसी अकेली और गुमसुम बच्चियों पर दलालों की नज़र रहती है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दलाल भी गोमती को कई दिनों से बतियाता और उसे बहलाता-फुसलाता था. उसने यह भी कहा था कि वह उसकी मम्मी को भी जानता है, और अगर वह किसी को कुछ न बताए तो एक दिन मिला भी सकता है. मगर एक दिन उसने गोमती को खाने में ऐसा कुछ दिया कि वह नेपाल से मुंबई तक होश में नहीं आई. यहाँ उसे घरवाली के हाथों बेच दिया गया. घरवाली ने उसे बहुत प्यार-दुलार दिया. उसने कहा मम्मी तुझे मेरे लिए ही तो छोड़ गई है, एक दिन आएगी. मगर गोमती की मम्मी है कि आज तक नहीं आई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोमती बता रही है कि ऐसी लड़कियों को सालों तक कैद करके रखा जाता है. फिर कुछ सालों बाद उसकी बोली लगायी जाती है. अगर लड़की न माने तो उसे कई दिनों तक भूखा और नंगा रखा जाता है, मारा, पीटा और तड़पाया जाता है. मगर जैसे ही लड़की एक बार तैयार हो जाती है तो उसे हाथों हाथ लिया जाता है. जब तक वह कुछ जानती-समझती नहीं है, तब तक तो उससे होने वाली कमाई केवल घरवाली के हाथों में जाती है, मगर जैसे-जैसे लड़की सियानी होती है तो वह खाने, कपड़े, लत्ते के अलावा ग्राहक के पैसे से भी अपना हिस्सा मांगने लगती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर एक बाज़ार में नई और आर्कषक चीज़ों की माँग हमेशा बनी रहती है. सेक्स का बाज़ार भी इसी सिद्धांत पर चलता है, यहाँ भी तो ज्य़ादातर ग्राहकों को कमसिन देह ही चाहिए. इसलिए यहाँ बच्चियों के देह व्यापार में हमेशा तेजी बनी रहती है. मगर बच्चियां भी कोई दिमागी तैयारी के साथ तो देह व्यापार में उतरती नहीं हैं, जो पहले से ही उन्हें सेक्स से जुड़ी जानकारियों का ज्ञान हो. इसलिए उनमें सेक्स से जुड़ी गंभीर बीमारियों की आशंकाए बढ़ जाती हैं. लिहाजा, न जाने कितनी गोमतियां एड्स नामक हालात की गिरफ़्त में आ जाती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बची रहना बिटिया&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वैसे दुर्गा जैसी कई औरतें अपनी बच्चियों को ऐसे धंधे से दूर ही रखना चाहती हैं. इसके लिए वह यहाँ से दूर भिमंडी या मीरा रोड़ जैसी जगहों में रहती हैं. दुर्गा बता रही है कि बहुत कम माँएं अपनी बच्चियों को पढ़ा पा रही हैं. एक तो उनकी आधी से ज्यादा कमाई घरवाली, दलाल, डॉक्टर और साहूकार खा जाते हैं. दूसरा यह भी कि जैसे ही वह 30 की होती हैं, तो अक्सर कई तरह की बीमारियों से घिर जाती हैं, उनके सिर पर जब तक बहुत सारा क़र्ज़ भी चढ़ चुका होता है, और जब तक उनकी बच्चियां भी 12-13 साल की हो जाती हैं, जो कभी अपनी माँओं की बीमारियों, तो कभी उनके कर्जों को उतारने के लिए उन्हीं के नक़्शे-कदमों पर चल रही होती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे बच्चियां जो देखती हैं, वही करती हैं. वह बचपन से मां के जैसा मेक़अप और व्यवहार देख-देखकर उनसे काफ़ी कुछ सीखा करती हैं. इस तरह उनमें आने वाली आदतें ताज़िंदगी आसानी से नहीं जाती हैं. दूसरी तरफ, कुछ बच्चियों को अपनी माँओं का ग्राहकों के साथ जाना अच्छा नहीं लगता है. कई तो पढ़ने में भी तेज होती हैं, मगर उन्हें सही रास्ता कोई नहीं बताता है, और अगर बताए भी तो घर से उतना सहयोग भी नहीं मिलता है. अक्सर घरवाली और दलाल भी उनसे उल्टी-सीधी बातें करके हतोत्साहित किया करते हैं. इसके अलावा, माँओं के ग्राहक भी उनका यौन-शोषण करना चाहते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी बच्चियों को बचाने के लिए कुछ माँएं उन्हें अपने रिश्तेदारों के पास भेज देती हैं. कुछ माँएं 14-15 साल की उम्र में शादियाँ करा देती हैं. जबकि कुछ माँएं एनजीओ के पुनर्वास केन्द्रों में भेज देती हैं. मगर अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों तक भेजने वाली माँओं को यह डर भी रहता है कि अगर उनकी बच्ची सब जानने-समझने के बाद उनके पास नहीं आयी तो ? इसलिए यह माँएं बीच-बीच में अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों से बुलाती रहती हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;पुनर्वास के बजाय फिर धंधे में &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई पुनर्वास केन्द्रों की एक दिक्कत यह भी है कि उनमें केवल 7 से 12 साल तक के बच्चों को ही रखा जाता है. जया नाम की लड़की जैसे ही 13 की हुई, वैसे ही एक एनजीओ ने उसे यह कहकर अपने पुनर्वास केन्द्र से निकाल दिया कि तुम्हारी उम्र की लड़कियों को रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. जया को उस समय पुनर्वास केन्द्र की सबसे ज्यादा ज़रुरत थी, क्योंकि उसकी मां का अपना कोई घर नहीं था और न ही वह उसे कहीं भेज सकती थी. इसलिए जया अपनी माँ के साथ रहने लगी और धीरे-धीरे उसी के धंधे में हाथ बटाने लगी. आज जया को एनजीओ वालों से नफ़रत हैं, वह एनजीओ के बारे में कहती है- "उनका काम तो सब ओर अपना काम दिखाना भर है, कोण्डम या गोली-दवाई देने के अलावा उनका कोई काम नहीं हैं."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यौनकर्मी बनने की बहुत सारी कहानियाँ पारिवारिक हिंसा-दुत्कार, अपराध, बलात्कार और ख़रीद-फ़रोख्त से भी जुड़ी हैं. मगर बाज़ार की फ़ितरत के हिसाब से यहाँ भी शोषण के लिए ज्य़ादातर उन लड़कियों को चुन लिया जाता है, जो पिछड़े और गरीब तबक़े से आती हैं. उनकी मज़बूरियों के ख़िलाफ उनके सारे सपने बहुत सस्ते और थोक में जो ख़रीद लिए जाते हैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में यौनव्यापार को रोकने के लिए ‘भारतीय दण्ड विधान, 1860’ से लेकर ‘वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक, 1956’ बनाये गए हैं. इनदिनों कानून में बदलाव की चर्चाएं भी ज़ोरों पर चल रही हैं. मगर इस स्थिति की जड़ें तो बेकारी और पलायन से जुड़ी हुई हैं. इन उलझनों के आपसी जुड़ाव को अनदेखा किया जा रहा है. असलियत यह है कि यहाँ की औरतें घर पर बहुत सारा पैसा भेजने की बजाय दो टाइम की रोटी के लिए जूझ रही हैं. इसलिए नीतियों में इनके जीवन-स्तर को उठाने की बजाय इन्हें जीने के मौके देने वाले नियमों की बात हो तो बात बने भी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमाठीपुरा की गलियों से गुज़रते हुए आप कुछ और पिंज़रानुमा कोठरियों में भी घुस सकते हैं, कुछ और चरित्रों से भी बतिया सकते हैं. यहाँ के इन भागों को उनकी संपूर्णता में भी देख सकते हैं. दृश्यों को केवल दृश्य भर न मानकर, उनका विश्लेषण भी कर सकते हैं. बहुत सारे बिन्दुओं के मेलजोल से, एक कहानी को उपन्यास में भी बदल सकते हैं. मगर मेरे भीतर से कागज के फ़ूल, पाक़ीजा, उमराव ज़ान जैसी ओल्ड और गोल्ड फ़िल्मों की हिरोइनें हवा हो चुकी हैं... मेरे सामने केवल मंटो की काली सलवारें लटकी हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-4600397394354778730?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/4600397394354778730/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=4600397394354778730' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4600397394354778730'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4600397394354778730'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/06/blog-post_28.html' title='कमाठीपुरा की गलियों से'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TCldMkOOnFI/AAAAAAAAABo/2fl-gkPXPzg/s72-c/kamathipura.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-8881176726525395667</id><published>2010-06-22T22:24:00.000-07:00</published><updated>2010-06-22T23:10:28.754-07:00</updated><title type='text'>ये ट्रेन मिस कर दो विनय!</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TCGlOp8quRI/AAAAAAAAABg/yPdrRBb4AM4/s1600/vinay4allin.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 239px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TCGlOp8quRI/AAAAAAAAABg/yPdrRBb4AM4/s320/vinay4allin.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5485847492311038226" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(माखनलाल चतुर्वेदी का पूर्व छात्र, दस्तक का साथी, हिंदुस्तान भागलपुर का पत्रकार और सबसे बढ़कर सबका प्यारा विनय चला गया, हमेशा-हमेशा के लिए)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंगलवार की रात 9 बजे फास्ट ट्रैक का बुलेटिन चल रहा था। मैं पीसीआर में बुलेटिन करवा रहा था इसी दौरान प्रवीण का फोन आया, मैंने काट दिया। दूसरी बार, तीसरी बार घंटी बजी लेकिन मैंने फोन काट दिया। फिर मनोज भाई का फोन आया, वो फोन भी मैं नहीं उठा सका। बुलेटिन खत्म हुआ तो संतोष का फोन आया कि विनय नहीं रहा, विनय हम सभी को छोड़ कर चला गया। विनय तु्म्हारी मौत की खबर भी इस न्यूज बुलेटिन ने मुझ तक पहुंचाने में आधे घंटे की देर कर दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह पता चला कि तुम भी ऑफिस पहुंचने की आपाधापी में ही ....। पुष्य ने बताया कि ऑफिस में देर हो रही थी और शायद तुम्हारी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। पटना से तुम भागलपुर के लिए चले थे लेकिन नाथनगर में पता नहीं तुमने चलती ट्रेन से उतरने की कोशिश की या फिर कुछ और.... लेकिन तुम ऑफिस नहीं पहुंच पाए। अब कभी नहीं पहुंच पाओगे। ऑफिस से लौटते हुए जो बात मुझे बहुत ज्यादा कचोट रही थी कि मैं फोन क्यों नहीं उठाया वो अब कुछ और ज्यादा तकलीफ दे रही है। पता नहीं किस हालात और किन दबावों में हम काम करते हैं कि .... खैर! ये वक्त इस बात का नहीं लेकिन पुष्य समेत अपने तमाम साथियों के जेहन में न जाने ऐसे ही कई सवाल उठ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेट्रो से घर पहुंचने तक कई मित्रों के फोन आए- किसी के पास कहने को कुछ नहीं था। सब एक दूसरे से एक-दो लाइनों में बात करते और फिर शब्द गुम हो जाते। अखिलेश्वर का मेरठ से फोन आया-भैया विनय नहीं.... उसके बाद न वो कुछ बोल सका और न मैं। इसी तरह ब्रजेन्द्र, उमेश ... सभी इस खबर के बाद अजीब सी मनस्थिति में थे.... शिरीष से बात की और ये सूचना दी तो वो भी सन्न रह गया। विनय अब तुम से तो कोई सवाल नहीं कर सकता लेकिन एक दूसरे से ताकत बटोरने की कोशिश कर रहे हैं... विनय ऐसी भी क्या जल्दी थी... एक दिन ऑफिस छूट ही जाता तो क्या होता... लेकिन हादसों के बारे में क्या कहा जा सकता है... तुमने भी तो शायद ये नहीं सोचा था कि चलती ट्रेन के पहिए तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा चेहरा रात से बार-बार मेरे सामने घूम रहा है... सीधा, सपाट और बिलकुल बेबाक विनय और उसकी उतनी ही प्यारी मुस्कुराहट अब कभी देखने को नहीं मिलेगी... वो विनय जो चंद मुलाकातों में ही बिलकुल अपना सा हो गया था वो पता नही कहां गुम हो गया... बंदर मस्त कलंदर का गोडसे उड़न छू हो गया... विनय वो तुम ही तो थे जो बैक स्टेज पर हंसते मुस्कुराते और मंच पर जाते ही गोडसे के चरित्र में ढ़ल जाते थे... तुम्हीं ने राजकमल नायक के साथ एक अलग ही परसाई की कहानी के कैरेक्टर में कमाल की जान डाल दी थी... आज बेजान पड़े हो... बिना किसी रिहर्सल के जिंदगी के नाटक का पटाक्षेप कर दिया...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई सारी बातें ध्यान में आ रही हैं... बिलकुल बेतरतीब... तुम्हारा भोपाल का कमरा, जहां तुमने मुझे खिचड़ी का न्योता दिया। हबीबगंज स्टेशन पर ट्रेन सीटी बजा रही थी लेकिन तुम्हारे कुकर की सीटी नहीं बज रही थी। बिना खिचड़ी खाए जाना मुमकिन नहीं था... जब तक हम स्टेशन की ओर बढ़ते तब तक ट्रेन जा चुकी थी... तुमने बड़े प्यार से कह दिया- ठीक है एक दिन और रूक जाइए... मेरा मन भी नहीं था कि आप जाएं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी ही चंद मुलाकातें बार-बार जेहन में कौंध रही है... तुम्हारी प्रवीण के साथ नोक-झोंक, भागलपुर स्टेशन पर पुष्य के साथ खबरों को लेकर खींचतान... भागलपुर का वो कमरा जो तुमने तीसरी या चौथी मंजिल पर ले रखा था... जिसका पूरा व्याकरण तुमने अपने मुताबिक गढ़ रखा था... विनय तुम सबसे जुदा थे... सबसे अलग.... तुम्हारा स्नेह, तुम्हारा प्यार.... तुम्हारी बहस और तुम्हारे सवाल सब तुम्हारे साथ ही गायब हो रहे हैं... कैसे कहूं- हो सके तो लौट आओ मेरे भाई... तुम्हारे हाथ की खिचड़ी खाने का फिर से मन हो रहा है... क्या तुम मौत की ट्रेन मेरे लिए मिस नहीं कर सकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पशुपति शर्मा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-8881176726525395667?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/8881176726525395667/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=8881176726525395667' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8881176726525395667'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8881176726525395667'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='ये ट्रेन मिस कर दो विनय!'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/TCGlOp8quRI/AAAAAAAAABg/yPdrRBb4AM4/s72-c/vinay4allin.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-3010806594046751090</id><published>2010-05-15T08:25:00.000-07:00</published><updated>2010-05-15T08:31:38.541-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माओवाद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बहस'/><title type='text'>बहस निकली है तो दूर तलक जाएगी...</title><content type='html'>दफ्तर से लौटते हुए शाम को थका मांदा मैं दिल्ली के यमुना बैंक स्टेशन पर बैठा तहलका पत्रिका के पन्ने पलट रहा था। मैं सीढियों पर बैठा शोमा चौधरी का एक लेख पढ़ रहा था, जिसमें नक्सलवाद से लड़ने की सरकार की नीति पर तर्क-वितर्क थे। मुझे इस बात का इल्म ही नहीं रहा कि कोई मेरे पीठ पीछे खड़ा है। 2-3 मिनट बाद एक वर्दीधारी अफसर ने टोका-क्या कुछ गंभीर पढ़ रहे हो? मुझे इस सवाल की कतई उम्मीद नहीं थी। पुलिस अफसर ने अपना सवाल दोहराया। इन दो पलों में मेरे जेहन में कई सारी चीजें घूम गईं। नक्सलवाद को लेकर मचे हो-हंगामे से लेकर सरकार की धमकी भरी चेतावनी, सब कुछ। मुझ कुछ समझ नहीं आया कि मैं उसे क्या जवाब दूं। मैंने पत्रिका उस अफसर के हाथ में सौंप दी। उसने पत्रिका को उलट-पुलट कर देखा और अजीब सी निगाहों से मुझे देखता हुआ सीढियों से उतर गया। गलियारे में मौजूद गार्ड को उसने कुछ कहा। अगले दिन मैं फिर सीढ़ियों पर बैठने लगा तो गार्ड ने मना कर दिया। पता नहीं ये नक्सलवाद पर लेख पढ़ने का असर था या फिर सुरक्षा चौकसी, लेकिन मुझे तपती गर्मी में लू के थपेड़े सहने सीढ़ियां छोड़ प्लेटफार्म पर आना पड़ा। ये तो बस बानगी भर है, अभी सरकार के उस एलान पर पूरी तरह अमल शुरू नहीं हुआ जिसमें नक्सलवाद का समर्थन या उसके समर्थक होने की बू मात्र से आप गुनहगार बन जाएंगे, पता नहीं उस दिन पुलिसवाले क्या करेंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर! ये भी बड़ी अजीब बात है न, जिस देश में अपराधों पर लगाम लगा पाने में पुलिस नाकाम रही है, उस देश में अब उसे विचारों की निगरानी की भी जिम्मेदारी देने पर विचार चल रहा है। उस देश में जहां कत्ल की वारदात के बाद पुलिस सालों में कातिल का पता नहीं ढूंढ पाती, उस देश में विचार से होने वाले खून-खराबे को रोकने की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपी जा रही है। आज जब मैं ये लेख लिख रहा हूं, आरुषि के कत्ल को दो साल बीत गए हैं- न तो यूपी पुलिस और न ही देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी अभी तक कातिल का सुराग ढूंढ पाई है। आरुषि तो महज एक मामला है, ऐसे न जाने कितने मामले हैं जहां लोग इंसाफ के इंतजार में हैं। शायद, सरकार में बैठे साहबों को इस बात का इल्म भी न हो कि देश में महज एक-आध फीसदी लोग ही इंसाफ की लड़ाई लड़ने में यकीन रखते हैं। देश के इस छोटे से हिस्से को भी इंसाफ मुहैया करा पाने में सरकार और ये मशीनरी पूरी तरह नाकाम रही है। एक बहुत बड़ा हिस्सा तो इंसाफ की प्रक्रिया और उसमें आने वाली परेशानियों के बारे में सोच कर ही तौबा कर लेता है। ऐसे में नक्सलवाद समर्थकों की गिरफ्तारी को लेकर किए नए एलान के जरिए चिदंबरम साहब ने देश की अदालतों और थानों का बोझ कई गुना बढ़ाने का ही फैसला किया है। बल्कि इसके जरिए लोगों के शोषण और उनके दमन का एक नया हथियार पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को सौंपा है। अब तो गिरफ्तार शख्स के पास हथियार या असलाह बारूद दिखाने की जरूरत भी नहीं होगी, ये कह देना भर ही काफी होगा कि ये नक्सलवाद समर्थक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सके तो सरकारी मशीनरियों में बैठे चंद इमानदार लोग मुझे माफ करें, लेकिन सच यही है कि नक्सलवाद समर्थक शब्द की रेंज इतनी बड़ी है कि किसी को भी इसमें घसीटा जा सकता है। देश भर में चलने वाले जन आंदोलनों में से किसी पर भी नक्सल समर्थक या नक्सलियों से प्रभावित होने का लेबल बड़ी आसानी से चस्पा किया जा सकता है। हर उस शख्स पर जो नक्सलियों की ओर से उठाए जा रहे मुद्दों की बात करे, उन्हें देश के दुश्मनों की श्रेणी में डाला जा सकता है। हर वो शख्स जो किसानों की जमीन पर जबरन कब्जा किए जाने का विरोध करे, किसानों और गरीबों के हितों की लड़ाई लड़े, उसे नक्सलियों के खाते में डाला जा सकता है। ये फेहरिश्त कितनी लंबी हो सकती है शायद इसका गुमान भी गृहमंत्री को नहीं है। एक बार इस फेहरिश्त में किसी का नाम शुमार हो जाए तो फिर पुलिस के दमन चक्र से बचने का कोई उपाय नहीं। क्योंकि विचार तो ऐसे हैं कि कभी मरते नहीं खत्म नहीं होते। एक बार आप इस जुर्म में सजा काट कर आएं तो देश में नक्सलियों की किसी बड़ी घटना के साथ ही थाने में हाजिर होकर खुद ही गिरफ्तारी दे दें, वरना आपका एनकाउंटर हो सकता है। आतंकवाद निरोधक कानून पोटा के दुरुपयोग के बाद सरकार को इसे वापस लेना पड़ा था, ऐसे में नक्सल समर्थकों की गिरफ्तारी की चेतावनी देने से पहले सरकार को इसके नतीजों पर भी सोचना चाहिए था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नक्सलवाद से लड़ाई के मसले पर चिदंबरम साहब के रवैये और बयान में आए उतार-चढ़ाव का भी अपना ही ग्राफ है। करीब दो महीने पहले चिदंबरम नक्सलियों से बातचीत की पेशकश कर रहे थे। दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ कैंप पर हमला होते ही चिदंबरम त्यौरियां चढ़ा कर ये बयान देने लगे कि नक्सलियों के खिलाफ हवाई हमले की नीति पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है। इसके कुछ दिनों बाद चिदंबरम जेएनयू जैसे संस्थान में आम सभा करने पहुंचे तो उन्हें तीखा विरोध झेलना पड़ा। जेएनयू के वामपंथी संगठनों ने सभा स्थल के बाहर चिदंबरम और केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। इस विरोध के बाद ही शायद ये खबर आई कि अब नक्सल समर्थकों की भी खैर नहीं। चिदंबरम साहब को लोकतंत्र में विरोध और प्रतिरोध के ये सुर बेहद नागवार गुजरे और ये एलान हो गया कि नक्सल समर्थक जेल की हवा खाने को तैयार रहें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेएनयू की इस घटना को चंद दिन गुजरे ही थे कि चिदंबरम ने ये बयान दे दिया कि माओवाद से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है जनता का भरोसा जीतना। कंफेडरनेश ऑफ इंडियन फेडरेशन के एक कार्यक्रम में चिदंबरम ने कहा-"साल 2004-09 के बीच देश ने 8.5 फीसदी की दर से विकास किया लेकिन पिछड़े राज्यों में प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। सरकार और औद्योगिक घरानों को लोगों का भरोसा जीतने के उपाय ढूंढने होंगे।" गनीमत है कि चिदंबरम को ये एहसास हो रहा है कि बिना लोगों का विश्वास हासिल किए नक्सलवाद जैसी समस्या से नहीं निपटा जा सकता। नक्सलवाद से निपटने के लिए 'गोली' से ज्यादा जरूरत 'भरोसा' जीतने की है। चिदंबरम साहब आप जो सोच रहे हैं उसे कर दिखाइए, जंग में आपकी जीत निश्चित होगी। दो पल ठहरकर सोच लीजिए, ये रास्ता जरा लंबा है-इसमें धीरज भी चाहिए और ज्यादा आत्मबल भी। वरना गोली चलाना तो बहुत आसान है- जवानों को आदेश दिया और मरने-मारने के लिए जंग-ए-मैदान में उतार दिया। गोली की लड़ाई जवानों को लड़नी है लेकिन भरोसे की लड़ाई सरकार और सियासी पार्टियों को लड़नी है। क्या वाकई आपमें वो हिम्मत और हौसला बाकी है? क्या वाकई सरकार एक तानाशाही कानून की बजाय लोकतांत्रिक तरीके से ये लड़ाई लड़ने का माद्दा रखती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिदंबरमजी आपकी नीयत को लेकर सवाल उठाने का मेरा इरादा कतई नहीं है। हो सकता है आप देश में अमनबहाली का सपना देख रहे हों पर साथ ही साथ आप ये भी तय कर लीजिए कि ये अमनबहाली कैसे और किन शर्तों पर? क्या लोकतंत्र का दम घोट कर आप नक्सलवाद की लड़ाई लड़ेंगे? क्या आप लोगों को डरा-धमका कर उनकी जुबान बंद करना चाहते हैं या फिर एक बहस के जरिए देश में आम राय बनाना चाहते हैं? सीआईआई के एक कार्यक्रम में आपने खुद कहा है कि माओवाद के मुद्दे पर दो तरह की राय है। एक धड़ा ये मानता है कि मौजूदा सरकार बुरी है और दूसरा धड़ा सरकार के साथ खड़ा है। मतभेद हो सकते हैं, लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है। विचारों की इस भिन्नता को ये कहकर खत्म मत कीजिए कि चुप रहो वरना सलाखों के पीछे डाल दिए जाओगे। जिस देश में हर मुजरिम को बचाव के लिए एक वकील मुहैया कराने की व्यवस्था है, वहां किसी मुद्दे या शख्स के पक्ष-विपक्ष में बहस पर रोक मत लगाइए। देश की आजाद आबोहवा और लोकतांत्रिक परंपराओं का गला मत घोटिए, बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश बने रहने दीजिए, देश आपको दुआएं देगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पशुपति शर्मा&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-3010806594046751090?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/3010806594046751090/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=3010806594046751090' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/3010806594046751090'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/3010806594046751090'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/05/blog-post_15.html' title='बहस निकली है तो दूर तलक जाएगी...'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-1040278112626498431</id><published>2010-04-03T21:45:00.000-07:00</published><updated>2010-04-03T21:47:28.607-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खबर पर नजर'/><title type='text'>टोपी उतारो फिर लड़ो इंसाफ की जंग</title><content type='html'>“आदमी को तोड़ती नहीं है&lt;br /&gt;लोकतांत्रिक पद्धतियां&lt;br /&gt;केवल पेट के बल उसे झुका लेती हैं&lt;br /&gt;धीरे धीरे अपाहिज&lt;br /&gt;धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए” (राजकमल चौधरी)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह हिंदुस्तान (2 अप्रैल, 2010, दिल्ली संस्करण, रिपोर्टर सत्यप्रकाश) की एंकर खबर देखी तो बरबस राजकमल चौधरी की ये पंक्तियां दिमाग में कौंधने लगी। लोकतांत्रिक पद्धतियों के पेट के बल झुका लेने के हुनर की एक और मिसाल मेरे सामने थी। ये मिसाल पेश की लोकतंत्र के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मंदिर ने। देश के सर्वोच्च न्यायालय के कारिंदों ने एक लॉ इंटर्न को टोपी लगाकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने से रोक दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी पढा था कि अंग्रेजों के जमाने में कई क्लब के आगे लिखा होता था कि यहां हिंदुस्तानियों और कुत्तों का प्रवेश वर्जित है। ये एक तरह की शासकीय ठसक थी, सामंती नजरिया था और दूसरों को उसकी औकात में रखने की पद्धति थी। देश की आजादी के बाद ये पद्धति बदलनी चाहिए थी, ये नजरिया बदलना चाहिए था लेकिन अफसोस ऐसा हो न सका। आज सुप्रीम कोर्ट के अंदर कानून के एक छात्र को टोपी उतारने के लिए मजबूर किया जाता है तो कई सवाल जेहन में कौंधते है। ये और मसला है कि इन सवालों के बाद सर्वोच्च अदालत के कारिंदों की बजाय आप कठघरे में खड़े कर दिए जाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई कर रहा मंसूर अहमद इन दिनों अजीब से हालात में फंस गया है। मंसूर 10 मार्च से सुप्रीम कोर्ट में इंटर्नशीप कर रहा है। वो यहां इंसाफ की लड़ाई के तौर-तरीके सीखने आया है लेकिन उसके पहले कोर्ट के आला अधिकारी उसे इंसाफ का शिष्टाचार सिखा रहे हैं। वो उसे ये पाठ पढ़ा रहे हैं कि वकीलों को कोर्ट में टोपी लगाने का हक है लेकिन एक इंटर्न को नहीं। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार की नसीहत भी लाजवाब है-“ बेटे तुम यहां ट्रेनिंग के लिए आए हो। तुम अपना मन उसी में लगाओ। टोपी नहीं लगाओगे तो क्या होगा? ” मी लार्ड माफ करें, पेट के बल झुकने में थोड़ा वक्त तो लगता है। लॉ के नए रंगरूट ने आरटीआई दायर कर टोपी की लड़ाई आगे बढ़ाई लेकिन महानिबंधक एम पी भद्रन ने जवाब भेजा- “यह कोर्ट के शिष्टाचार का मामला है।”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है कश्मीर के बड़गाम जिले के निवासी मंसूर अहमद की भावनाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट में कोई जगह नहीं है। पता नहीं उसकी टोपी में ऐसी क्या बात है कि सुप्रीम कोर्ट के गुंबद को वो रास नहीं आ रही। मंसूर को टोपी लगाने का हक मिलेगा, फिलहाल इसकी गुंजाइश कम है। हां मंसूर के साथ सर्वोच्च न्यायालय में इंटर्नशीप कर रहे उसके 82 साथियों को पहला सबक जरूर मिल गया। इंसाफ की लड़ाई लड़ो मगर टोपी उतारकर, कमर झुकाकर।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-1040278112626498431?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/1040278112626498431/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=1040278112626498431' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1040278112626498431'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1040278112626498431'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='टोपी उतारो फिर लड़ो इंसाफ की जंग'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-2485808179610043351</id><published>2010-03-27T19:09:00.000-07:00</published><updated>2010-03-27T21:50:00.489-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रतिरोध की संस्कृति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नर्मदा बचाओ आंदोलन'/><title type='text'>कैसे बांधोगे नर्मदा की प्रतिरोध-धारा</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/S67fIKLftTI/AAAAAAAAABI/5EE1FLt_qqs/s1600/Image0350.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5453541530056766770" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/S67fIKLftTI/AAAAAAAAABI/5EE1FLt_qqs/s320/Image0350.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;पिछले दिनों विकास संवाद के एक कार्यक्रम में महेश्वर जाने का मौका मिला। इस कार्यक्रम में काफी तादाद में मीडियाकर्मी जमा हुए। यूं तो बहस का एजेंडा- मीडिया के मानक और लोग- था, लेकिन चूंकि ये इलाका नर्मदा पर बन रहे बांध की वजह से नर्मदा बचाओ आंदोलन की कर्मभूमि है, सो फिजा में डूब से प्रभावित लोगों का सवाल भी घुला रहा। खुद आयोजकों ने भी कार्यक्रम कुछ इस तरह से ऱखा कि मीडियाकर्मी नर्मदा पर बन रहे बांध और उससे प्रभावित लोगों की हकीकत से दो-चार हुए और उन्हें ये मुद्दा उद्वेलित कर गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;12 मार्च 2010 को 5 टोलियों में बंटे लोग महेश्वर डैम और डूब प्रभावित गांवों की ओर निकले। नर्मदा बचाओ आंदोलन से महेश्वर डैम के निर्माण से जुड़े लोग किस कदर दहशत में है, इसकी पहली झलक हमें निर्माण स्थल पर पहुंचते ही मिली। एक दस्ता तो किसी तरह गेट के अंदर दाखिल होने में कामयाब हो गया, लेकिन बाकी लोगों को गेट पर ही रोक दिया गया। एस कुमार्स कंपनी के प्रशासनिक अधिकारियों और गार्ड्स ने हमारे तमाम अनुरोध को दरकिनार कर अंदर दाखिल होने से साफ-साफ मना कर दिया। उनका सीधा तर्क था कि आप मीडियाकर्मी हैं तो क्या फिलहाल नर्मदा बचाओ आंदोलन के लोगों के साथ हैं, इसलिए अंदर जाने नहीं दिया जाएगा। उस समय तो सभी साथियों को बुरा लगा, लेकिन मुझे नर्मदा बचाओ आंदोलन की शक्ति की पहली झलक मिल गई थी। एक अहिंसक आंदोलन से ये खौफ साफ दर्शा गया कि एस कुमार्स कंपनी के लोगों का भरोसा कितना डिगा हुआ है और एनबीए के लोगों की पकड़ इलाके में कितनी मजबूत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महेश्वर डैम से हम सभी बैरंग लौटे और हमारी टोली पथराना गांव पहुंची। रास्ते में एक साथी ने नाराजगी में ये कहा कि डैम को बम लगाकर उड़ा देना चाहिए, एस कुमार्स के लोगों को मार-पीटकर बराबर कर देना चाहिए था, वगैरह-वगैरह। वो बिलकुल भन्नाया हुआ था, लेकिन बावजूद इसके मुझे उसकी ये राय नागवार गुजरी। ये चंद पलों का उफान क्या सालों से चले आ रहे किसी आंदोलन का विकल्प हो सकता है? खैर, गांव पहुंचे तो गांव के एक सज्जन ने कहा-“ अच्छा हुआ- आप लोगों ने झगड़ा नहीं किया, वरना आंदोलन का नाम खराब होता। ” मेरे लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यशैली को लेकर खुश होने का ये दूसरा मौका था। ये बात उस गांव का एक शख्स बोल रहा था जो 13 सालों से अपने वजूद की, अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है। वो किसी उतावलेपन में नहीं है, वो अपने हक की लड़ाई को आड़ेचंद पलों में समेटना नहीं चाहता बल्कि उसकी लड़ने की ताकत अदम्य है, असीम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, रात का खाना हमने जिस घर में खाया, वहां बुजुर्गों से बात हुई। घर के युवाओं, माताओं-बहनों के बीच हमने करीब आधे घंटे से ज्यादा वक्त गुजारा। गांव उजड़ने की चिंता तो थी लेकिन उनके अंदर मुझे हताशा का वो भाव नहीं दिखा, जो मेरे अंदर इस गांव के डूबने की फिक्र से ही घर करने लगा था। इन लोगों ने बताया कि कैसे आधे घंटे की नोटिस पर पूरा गांव जमा हो जाता है। कैसे संघर्ष के लिए गांव-गांव फौरन खबर भेजी जाती है। कैसे मिल-जुलकर वो अपनी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं। घर के मुखिया ने बताया कि इस आंदोलन के दौरान वो कई बार जेल भी जा चुके हैं, लेकिन कभी भी वो प्रशासन के आगे गिरगिराकर या पैसे जमाकर अपनी जमानत नहीं करवाते, खुद ही जब जेल अधिकारियों या प्रशासन का जी भर जाता है उन्हें आजाद कर दिया जाता है। गांधी के सत्याग्रह की तरह अपनी बात पर डटे रहने का ये साहस नर्मदा बचाओ आंदोलन की एक और उपलब्धि नहीं तो क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौपाल पर जब बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो गांव के लोगों ने आंदोलन से जुड़े तथ्यों को इतनी संजीदगी से रखा कि पत्रकारों की बोलती बंद हो गई। हर सवाल का मुकम्मल जवाब। गांव की गलियों से लेकर संसद के गलियारे तक नर्मदा बचाओ आंदोलन को लेकर क्या चल रहा है, इसकी पूरी डिटेल गांववालों के पास मौजूद थी। हाल में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के दफ्तर से जारी चिट्ठी तक का हवाला इस चर्चा में दिया गया। गांववालों ने बताया कि ग्राम सभा ने पुनर्वास परियोजना में अनियमितता को लेकर प्रस्ताव पारित किया है और उसे सभी अधिकारियों और मंत्रियों तक पहुंचाया गया है। ये और बात है कि गांधी के नाम पर सत्ता सुख भोगने वाली पार्टी को ग्राम स्वराज का ये हस्तक्षेप रास नहीं आ रहा, लेकिन गांववालों को इसकी ताकत से रूबरू कराने वाले एनबीए को साधुवाद देने से आप खुद को कैसे रोक सकते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूचना का अधिकार से लेकर ग्राम स्वराज तक हर मोर्चे पर एनबीए ने गांववालों को सशक्त किया और उनको आगे लाकर अपनी लड़ाई की कमान उनके हाथों में सौंपी है, इसका एहसास मुझे पहली बार पथराना के दौरे के बाद ही हुआ। बावजूद इसके कई सवाल मेरे और साथियों के मन में घुमड़ते रहे। 13 मार्च को मेधा पाटकर जब हम सभी से रूबरू हुईं तो सवालों की बौछार लग गई- नर्मदा बचाओ आंदोलन कोई परिणाम देने में कामयाब क्यों नहीं हुआ? क्या नर्मदा बचाओ आंदोलन को एस कुमार जैसी कंपनियों से पैसा मिलता है, ताकि प्रोजेक्ट डिले हो और उनकी कमाई का जरिया बना रहे। आदि-आदि। इन सभी सवालों का मेधाजी ने बिना किसी झिझक के जवाब दिया। पता नहीं मेरे साथी उन जवाबों से संतुष्ट हैं या नहीं, पर मुझे नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं और उसकी कार्यशैली ने काफी प्रभावित किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आप इस बात से असहमत हो सकते हैं कि एनबीए ने गांववालों की लड़ाई लड़ने का ठेका नहीं लिया बल्कि हर गांव वाले को एक योद्धा की तरह अपनी लड़ाई लड़ने का हुनर सिखाया? क्या ये कोई उपलब्धि नहीं कि अपने हक की लड़ाई लड़ने वाले ये गांववासी आज किसी भी अधिकारी, राजनेता या मंत्री से आंख से आंख मिलाकर बात करने का साहस रखते हैं, इनका नैतिक बल उन पर भारी पड़ता है? क्या इस बात को नजरअंदाज किया जा सकता है कि नर्मदा के लोग अपने हक के लिए हर कुर्बानी को तैयार हैं? क्या ये हम सभी को शक्ति नहीं देता कि नर्मदा तट के जीवट लोगों में सालों की लड़ाई के बाद भी सालों लंबी लड़ाई का माद्दा अब भी बाकी है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथियों ने नर्मदा के तट पर केवल प्रतिरोध खड़ा नहीं किया बल्कि प्रतिरोध की एक संस्कृति पैदा की है, जिसे नर्मदा पर बनने वाला कोई बांध नहीं बांध पाएगा, वो हर बांध के बावजूद अपनी गति से बहती रहेगी- हर सुबह, हर शाम। इस अनवरत धारा को शत शत सलाम।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-2485808179610043351?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/2485808179610043351/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=2485808179610043351' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/2485808179610043351'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/2485808179610043351'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/03/blog-post_27.html' title='कैसे बांधोगे नर्मदा की प्रतिरोध-धारा'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/S67fIKLftTI/AAAAAAAAABI/5EE1FLt_qqs/s72-c/Image0350.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-7247264200678878719</id><published>2010-03-22T22:21:00.000-07:00</published><updated>2010-03-22T22:25:53.444-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><title type='text'>मीडिया के मानक और लोग</title><content type='html'>आम तौर पर यह कह दिया जाता है कि मीडिया के अब कोई मानक नहीं बचे तो इन पर बहस की गुंजाइश ही कहां बचती है। कुछ हद तक ये बात सही है, लेकिन क्या इसके उलट ऐसा नहीं लगता कि अब मानकों पर और ज्यादा गंभीरता से सोचने और विचारने की जरूरत आन पड़ी है। आप और हम सबसे ज्यादा मीडिया के बदलते मानकों से ही प्रभावित हो रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया के सैद्धांतिक मानकों और व्यावहारिक मानकों में काफी अंतर आ गया है। व्यावहारिक मानकों के कर्ता-धर्ता कामयाबी के शिखर पर खड़े हो जनता का मुंह चिढ़ा रहे हैं तो सैद्धांतिक मानकों के पक्षधर पाताल की खाइयों में खड़े जनता के हितों की दुहाई दे रहे हैं। इन दोनों के बीच अटका है 'लोग'। लोग, जो हर मानक के प्रयोग का आधार है। लोग, जो मानकों के नतीजों को प्रभावित करता है। लोग, जो चैनलों की टीआरपी तय करता है। लोग, जो अखबारों की प्रसार संख्या घटाने-बढ़ाने की शक्ति रखता है, लेकिन  अफसोस उस लोग की भूमिका मीडिया के मानक तय करते वक्त कम से कमतर होती जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, बात मीडिया की मानकों की करें तो सबसे बड़ा बदलाव तो ये है कि मानक-लोग, लोकहित से शिफ्ट कर गए हैं, अब बाजार और उपभोक्ता नए मानक बन गए हैं। नई परिभाषा-जो बाजार को भाए वही खबर है। जो मुनाफा दे, वही खबर है। जो विज्ञापनदाताओं के हितों का पोषण करे, वही खबर है। ऐसे में खबरों के मानक तय करने की शक्ति संपादकों के हाथ से फिसलकर मार्केटिंग डिवीजन के हाथ में जा रही है तो कैसा अचरज?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब बात एक दो उदाहरणों से की जाए तो शायद परिदृश्य और स्पष्ट हो। विकास संवाद के मीडिया सम्मेलन के लिए इंदौर आ रहा था कि रास्ते में नई दुनिया का अखबार खरीदा। 12 मार्च 2010 की नई दुनिया की लीड खबर- अखबारों में छपने से कुछ नहीं होता। मध्यप्रदेश के आदिम जाति व अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री विजय शाह से जुड़ी खबर लीड बनी थी। मुद्दा बस इतना था कि मलगांव मेले में बेले डांस को लेकर मीडिया ने उन पर चौतरफा हमला किया तो वो भी मीडिया की औकात बनाने पर उतारू हो गये। मीडिया और मंत्रीजी की टशन में लीड खबर बन गई। यहां मानक न तो लोग था, न लोक हित। यहां दो सत्ता प्रतिष्ठानों के ईगो की लड़ाई थी। मीडिया की सत्ता को मंत्री ने चुनौती दी तो लीड खबर बन गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी क्रम में एक खबर मुझे पिछले दिनों बिहार के सीवान जिले (जीरादेई) के विधायक के ठुमके वाली ध्यान में आ रही है। इसे चैनल वालों ने बार-बार दिखाया। बार बालाओं के साथ ठुमके लगाते विधायक श्याम बहादुर सिंह के विजुअल में बड़ा दम था, बिकाउ था सो खूब चला। अगले दिन विधायक जी ने माफी मांगी- फिर वही डांस के विजुअल चले। तीसरे दिन श्याम बहादुर सिंह ने कहा- नाच कर मैंने कोई गलती नहीं की, मैं फिर ठुमके लगाऊंगा। खबर तीसरी बार भी चली- क्योंकि खबर से ज्यादा दम और रस बार बालाओं के ठुमकों में था। मीडिया में ऐसे में कई बार विधायक या मंत्रीजी के हाथ का एक खिलौना बस नजर आता है। वो जब चाहें खबर चलवा लें। आप ऊपर के दो उदाहरणों में खुद ही तय करें कि खबर के मानक क्या हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तमिलनाडु पत्रकार यूनियन ने पेड न्यूज को लेकर एक सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण के मुताबिक लोकसभा चुनावों के दौरान तमिलनाडु के अखबारों ने पेड न्यूज के नाम पर 350 करोड़ रुपयों का वारा-न्यारा किया। लोक सभा चुनावों में राजनेताओं और राजनीतिक दलों से मार्केटिंड डिवीजन ने डील की और खबरें धड़ल्ले से छपती रहीं। कभी-कभी तो एक ही संस्करण में एक ही क्षेत्र के दो प्रतिद्वंद्वियों को एक साथ कागज में जिता दिया गया। लोगों और लोक हित के लिहाज से उम्मीदवारों का विश्लेषण नहीं हुआ, पैसों के लिहाज से हार-जीत तय हो गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार्च महीने (2010) में कुछ संगठनों ने प्रेस क्लब में एक प्रेस वार्ता रखी। इस प्रेस वार्ता में जस्टिस राजेंद्र सच्चर, अरुंधति राय समेत कई लोगों ने अपनी बात रखी। अरुंधति राय ने इस बात पर हैरानी जाहिर की कि मीडिया नक्सलवाद के मामले में सरकारी वर्जन को ही अंतिम मानकर खबरों का प्रसारण कर रहा है। इतना ही नहीं, दूर-दराज के इलाकों के उन सभी जन संगठनों को नक्सलवादियों की कतार में खड़ा कर दिया गया है जो जनता के हितों की बात करते हैं। जहां मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए वहां वो अगर सरकार के हाथ की कठपुतली बन जाए तो फिर कहना ही क्या?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में मानकों का सवाल बार-बार उठता है और जरूरी भी है, लेकिन सवाल है कि क्या इन मानकों को कोई मानेगा? जिन लोगों ने मीडिया के मानकों को दफन कर दिया है क्या वो फिर से मानकों की रूह को कब्र से बाहर आने देंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पशुपति शर्मा&lt;br /&gt;मीडियाकर्मी&lt;br /&gt;9868203840&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-7247264200678878719?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/7247264200678878719/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=7247264200678878719' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/7247264200678878719'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/7247264200678878719'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='मीडिया के मानक और लोग'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-5295320338964049498</id><published>2010-02-25T21:19:00.000-08:00</published><updated>2010-02-25T21:24:47.783-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>बेटी, औरत और दादी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;१) बेटी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कोई पैमाना नहीं है&lt;br /&gt;जो बेटे के मुकाबले&lt;br /&gt;घटा बड़ा कर&lt;br /&gt;नापी जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; २)&lt;em&gt; &lt;/em&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;औरत&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कोई मर्द की नाक नहीं है&lt;br /&gt;जो इज्जत के हिसाब से&lt;br /&gt;जोड़ काट कर&lt;br /&gt;रखी जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३) &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;दादी&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कोई फ्रेम में लगी फोटो नहीं है&lt;br /&gt;जिसे दीवार पर सजाओ&lt;br /&gt;फिर अपनी सहूलियत से&lt;br /&gt;चाहो तो देखो या न देखो।&lt;br /&gt; शिरीष खरे&lt;br /&gt;Shirish KhareC/0- Child Rights and You189/A, Anand EstateSane Guruji Marg(Near Chinchpokli Station)Mumbai-400011&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-5295320338964049498?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/5295320338964049498/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=5295320338964049498' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5295320338964049498'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5295320338964049498'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='बेटी, औरत और दादी'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-4237822014710506597</id><published>2009-12-26T07:27:00.000-08:00</published><updated>2009-12-26T07:36:01.432-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>एक जवाब के लिए</title><content type='html'>वह वहीं थी&lt;br /&gt;पर किसी की नजर उस पर नहीं थी।&lt;br /&gt;कई सारी परछाइयों के बीचोंबीच&lt;br /&gt;एक परछाई सी थी वह।&lt;br /&gt;यह बहुत पहले की बात है&lt;br /&gt;इतनी कि तब दिन की रौशनी नहीं थी।&lt;br /&gt;इतनी कि तब किसी रंग के लिबास में&lt;br /&gt;लिपटी नहीं थी वह।&lt;br /&gt;एक रोज़ सूरज को तो निकलना ही था&lt;br /&gt;उसके निकलते ही पहाड़ों से जा टकराई  और&lt;br /&gt;दुनिया के पहले चित्र सी बन गई वह।&lt;br /&gt;उसका शरीर कुदरत का हिस्सा था&lt;br /&gt;जो कई सारे रिक्त स्थानों से भरा था&lt;br /&gt;फिर पता नहीं किसने हांड मांस से भर दिया उसको&lt;br /&gt;उसकी आँखों को किसने आकार दे दिया।&lt;br /&gt;किसने होठ खीच दिए।&lt;br /&gt;किसने गोल माथे को देखकर बिंदी चिपका दी।&lt;br /&gt;फिर माला, सिन्दूर और देखते ही देखते&lt;br /&gt;जिसको जो लगा वो वो&lt;br /&gt;उसके अंगों पर चिपकाता गया।&lt;br /&gt;इन सबके बीच&lt;br /&gt;क्या कोई ऐसा भी था जिसने उसकी आँखों में&lt;br /&gt;उसकी ख़ुशी, उसके सपने, उसकी ख्वाहिश देखी थी ?&lt;br /&gt;जिसने उससे कहा हो कि&lt;br /&gt;अगर यह चीजें तुम्हे भारी लगती हो तो&lt;br /&gt;उतार  क्यों नहीं फेंकती&lt;br /&gt;उड़ क्यों नहीं जाना चाहती&lt;br /&gt;जहां चाहे इस जहान में....&lt;br /&gt;तब से अब से&lt;br /&gt;या कब कब से&lt;br /&gt;कितनी कितनी औरतें&lt;br /&gt;सिर्फ इतना भर सुनने के लिए खड़ी रही हैं ?&lt;br /&gt;- शिरीष खरे&lt;br /&gt;Shirish KhareC/0- Child Rights and You189/A, Anand EstateSane Guruji Marg(Near Chinchpokli Station)Mumbai-400011&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-4237822014710506597?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/4237822014710506597/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=4237822014710506597' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4237822014710506597'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4237822014710506597'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='एक जवाब के लिए'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-4717045887908080715</id><published>2009-11-27T05:42:00.000-08:00</published><updated>2009-11-27T05:46:00.483-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='असहमति का साहस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्रिकेट'/><title type='text'>     गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं</title><content type='html'>नायकों का हमेशा सम्मान होता है और देश के आत्माभिमान के लिए यह जरूरी भी है। लेकिन जब नायक आलोचना से परे हो जाते हैं या यूं कहा जाए कि आलोचना से परे कर दिये जाते हैं, तब उनकी अभ्यर्थना होने लगती है। वे नायक से महानायक और महानायक से अवतार हो जाते हैं। जैसे ही कोई नायक अवतार का दर्जा पाता है । देश अंधभक्ति में डूब जाता है। उसकी शख्सियत का कमजोर पहलू भी वंदना और अभिनंदन के शोर में अनसुना रह जाता है। वह महानतम हो जाता है, जैसा कि अभी सचिन तेंदुलकर के साथ हो रहा है। वे अब हमारे लिए महानतम हैं। हमारे देश ने उन्हें क्रिकेट का भगवान बना दिया है। उनकी छोटी सी आलोचना से हम तिलमिला जाते हैं।  पिछले बीस वर्षों से वे क्रिकेट खेल रहे हैं। फिलहाल जिस मुकाम पर खड़े हैं वहां से उनके लिए हर रोज एक नयी मंजिल का रास्ता खुलता हैं। उनके बनाए रनों से कीर्तिमानों का एक शिखऱ सा खड़ा होता जा रहा है। लेकिन  य़ह जरूरी नहीं कि जिसने कीर्तिमानों का पहाड़ खड़ा किया, वही महानतम है। उन्हें महानतम कहने से पहले क्रिकेट के इतिहास की सूक्ष्म पड़ताल जरूरी है। मौजूदा समय के शोर में दब चुके इतिहास के महानायकों से सचिन की भिड़ंत करानी होगी।  तेंदुलकर को डब्ल्यूजी ग्रेस, सर डॉन ब्रैडमेन, सर गारफील्ड सोबर्स, एवॉटन वीक्स, वॉरेल, वॉलकॉट, वॉली हैमंड,ग्रीम पोलक, सर लेन हटन, सुनील गावस्कर, विवियन रिचर्ड्स और ब्रायन लारा के बरक्स देखना होगा। इस कड़ी में कई और नाम जोड़े जा सकते हैं। लेकिन ऐसा करना जरूरी नहीं है। तेंदुलकर उस दौर में क्रिकेट खेलने आए जब सुनील गावस्कर एक बेजोड़ करियर को अलविदा कह चुके थे। 1989 में पाकिस्तान के दौरे से उनके अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत हुई । शुरुआत धमाकेदार थी। सोलह वर्ष की उम्र में एक सुनहरे भविष्य की चमक साफ नजर आ रही थीं। सचिन बढ़ते चले गए। इंग्लैंड में टेस्ट क्रिकेट का पहला शतक लगाया।  फिर शतकों का सिलसिला सा चल पड़ा जो अब तक जारी है और जब वे विदा होंगे तो शायद रनों की अभेद्य दीवार खड़ी होगी। लेकिन बल्लेबाज सिर्फ इसलिए महानतम नहीं होता कि उसने अपने जीवन में सबसे ज्यादा शतक लगाए या सबसे ज्यादा रन बनाए।  सर डॉन ब्रैडमेन इसके अपवाद हैं। उनका बल्ला तो शायद मैदान पर गेंदबाजों को रौंदने के लिए ही बना था। बावन टेस्ट मैचों में उन्होंने जिस रफ्तार से और जिस अंदाज से रन बनाए वो इतिहास है। बल्लेबाजी के हर पैमाने को वे तोड़ते चले गए और  नये पैमाने बनाते गए। सबसे बड़ी बात यह कि उनसे जब भी टीम ने उम्मीद की, वे उस उम्मीद से कहीं ज्यादा देकर गए। वे आज भी क्रिकेट की दुनिया के अपराजेय़ योद्धा हैं । सचिन ने भी अपनी जिन्दगी में बड़ी पारियां खेलीं हैं। अब तक तैतालीस शतक लगा चुके हैं लेकिन कोई तिहरा शतक नहीं लगाया है। उनका सर्वश्रेष्ठ दो सौ अड़तालीस बाग्लांदेश के खिलाफ है और फिर दो सौ बयालीस ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ। उन्होंने  इतने लंबे करियर में सिर्फ चार डबल सेंचुरी लगाई है।  सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सचिन किसी भी एक श्रृखंला में दो से ज्यादा शतक नहीं लगा सके और पांच सौ रनों का आंकड़ा तक नहीं छू सके। (यह बात हैरान करती हैं)।  जब भी महान बल्लेबाजों की बात छिड़ती है तो ऐसे बल्लेबाजों की लंबी चौड़ी सूची तैयार हो जाती हैं जिन्होंने अपने बल्ले की धमक से कई श्रृंखलाओं में सामने खड़ी टीम पर राज किया है । ब्रैडमेन के अलावा सोबर्स,ग्रीम पोलक, लेन हटन, रिचर्ड्स,गावस्कर लारा, कई नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपनी बेहतरीन पारियों से सामने वाली टीम को पानी पिलाया है। और पूरी श्रृंखला में रनों का दरिया बहा दिया है।  1976 में विवियन रिचर्ड्स ने इंग्लैंड के खिलाफ चार मैचों में एक सौ अठारह के औसत से आठ सौ उनत्तीस रन बनाए। जिसमें तीन शतक शामिल हैं। उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर दो सौ इक्य़ानवे था। वेस्टइंडीज के ही थ्री ड्बल्यूज के नाम से मशहूर बल्लेबाज़ों में से एक वॉलकॉट ने 1954-55 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पांच मैचों में आठ सौ सत्ताइस रन बनाए,जिसमें पांच शतक भी शामिल थे । सोबर्स और लारा तो इस मामले में शहंशाह हैं। सोबर्स ने एक श्रृंखंला  में एक बार आठ सौ से ज्यादा, दो बार सात सौ से ज्यादा, दो बार छह सौ से ज्यादा और दो बार-पांच सौ से ज्यादा रन बनाए हैं। जबकि लारा ने 1994-95 में इंग्लैंड के खिलाफ पांच मैचों की श्रृंखला में सात सौ अट्ठानवे रन बनाए जिसमें उनकी तीन सौ पचहत्तर रनों की महान पारी भी शामिल थी। कुला मिलाकर लारा ने एक श्रृंखला में दो बार सात सौ रनों का आंकड़ा पार किया है। दो बार सात सौ के करीब पहुंचे हैं और तीन बार पाच सौ रनों को पार किया है।  इस मामले में गावस्कर सचिन से मीलों आगे हैं । गावस्कर दो बार सात सौ का आंकड़ा और कई बार एक ही सीरीज में पांच सौ से छह सौ रनों के पार जा चुके हैं । जबकि द्रविड़ दो बार छह सौ का आंकड़ा पार कर चुके हैं। जबकि सचिन का किसी एक श्रृंखला में अब तक का सर्वाधिक स्कोर चार सौ तिरानवे है। 2007-08 में आस्ट्रेलिया में उन्होंने दो शतकों के साथ ये रन बनाए थे। ऐसे भारतीय बल्लेबाजों की सूची भी बड़ी है जिन्होने अपने बल्ले के जोर से किसी खास श्रृंखला पर अपना झंडा लहराया है।  ये तर्क भी जायज है कि सिर्फ एक सीरीज में रनों का अंबार लगा देना महानता का पैमाना नहीं है। लेकिन हर महान बल्लेबाज ने ऐसा किया है तो फिर पैमाना बनता है। दिलचस्प है कि सचिन अपने करियर में ऐसा कोई कारनामा करने से चूक गए हैं।  सचिन को मास्टर ब्लास्टर का तमगा तो हासिल है लेकिन जरा सच पर गौर फऱमाइंये। टेस्ट क्रिकेट में एक दिन में सबसे बड़ा स्कोर करने वाले सौ खिलाड़िय़ों की सूची से सचिन गायब हैं।  डॉन ब्रैडमैन ने एक ही दिन में तिहरा शतक लगा दिया था। इस सूची में ब्रैडमेन, लारा, रिचर्ड्स, वॉली हैमंड, सोबर्स जैसों की पारियां भरी पड़ी हैं। वीरेन्द्र सहवाग भी यहां अपनी जगह बना चुके हैं। हैरानी की बात ये है कि भारतीय बल्लेबाजों की सूची भी उन्हें जगह नहीं देती। एक दिन में सर्वाधिक रन की छह पारियों में चार वीरू के नाम हैं, एक द्रविड़ के नाम और एक पारी किसी और बल्ले से निकली है। वनडे का भी कुछ यही हाल है। सबसे तेज शतक लगाने वाले बल्लेबाजों में सचिन छब्बीसवें पायदान पर हैं। फिर सचिन मास्टर ब्लास्टर कैसे हुए? ये आकंड़े साबित करते हैं कि टेस्ट क्रिकेट में भले ही सचिन ने खूब शतक लगाए लेकिन गेंदबाज़ों पर वैसा दबदबा कभी कायम नहीं कर सके जैसा ऊपरोक्त बल्लेबाज़ों ने किया है। साथ ही महानता के हगामे में कुछ ऐसी बातें उनके खाते में जुड़ गई हैं जिन पर उनका हक नहीं है।  सचिन ने क्रिकेट के दोनों ही फॉरेमैट में रनों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। लेकिन उनके जीवन में ऐसे बेशुमार मौके आए जब वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। जब भी देश ने सचिन में एक उत्तरदायी बल्लेबाज की छवि देखनी चाही, वे धड़ाम से गिरे । और भारत के करोड़ों क्रिकेट दीवानों के चेहरे पर नाकामी का तमाचा पड़ा। सचिन ने कई मौकों पर देश को जीत का रास्ता दिखाया या इज्जत बचाई लेकिन इतने लंबे करियर में ऐसे मौके बहुत कम आए। वे रन बनाते गए। टीम को सम्मानजनक स्कोर तक भी ले गए। ऐसा कभी कभार ही हुआ, जब उन्होंने अपने बूते मैदान पर उतरकर फतह दिलाई। शारजाह की दो पारियां और बीस साल के के सफऱ  में उनकी गिनी चुनी पारिय़ां अपवाद हैं।   जब माइक आर्थर्टन ने हाल में ये कहा कि सचिन को महानतम कहना ठीक नहीं तो तमाम न्यूज चैनल बौखला गए। उन्होंने इतिहास के कुछ पन्नों को पलट कर सचिन की क्षमता का आकलन किया था और ये पूछा था कि जब बॉडीलाइन सीरीज हुई या जब लोग बिना हेलमेट के बल्लेबाजी करते थे, तब सचिन होते तो उनका प्रदर्शन कैसा होता। वैसे इस तर्क में कोई दम नहीं है कि ऐसा होता तो क्या होता। लेकिन यह सवाल दिलचस्प जरूर है । जब हम उन्हें महानतम कहते हैं तो इतिहास में हमें झांकना होगा। क्रिकेट के मुश्किल दौर के ताप में सचिन को जलना होगा। एक ऐसी अग्निपरीक्षा के सवालों से जूझना होगा जिनका सामना उन्होंने किया ही नहीं।   जब आर्थर्टन ऐसा कह रहे हैं तो इस सच से पर्दा उठाना भी जरूरी है कि सचिन ने अपने जीवन में क्रिकेट के महानतम गेंदबाज़ों को नहीं खेला। यहां तेज गेंदबाजों का जिक्र हो रहा है। शेन वार्न उसके अपवाद हैं। सचिन का उदय हुआ तो वेस्ट इंडीज के खौफनाक गेदबाजों का करियर अस्त हो चुका था। होल्डिंग, क्राफ्ट, गार्नर, एंडी रॉबर्ट्स और मार्शल का उन्होंने अपने जीवन में कभी सामना नहीं किया। वसीम अकरम और वकार को उनके उफान पर नहीं झेला क्योंकि 1989 की श्रृंखला के बाद 1999 तक भारत-पाक के बीच कोई टेस्ट सीरीज नहीं खेली गई। इसके बावजूद टेस्ट क्रिकेट में पाकिस्तान के खिलाफ उनका औसत महज पैंतीस का है।ऑस्ट्रेलिया के डेनिस लिली, ज्यॉफ थॉमसन की छाय़ा भी उनके बल्ले पर नहीं पड़ी।   रिचर्ड हेडली, बॉथम, इमरान को उनके ढलान पर खेला। हालांकि उन्होंने डोनाल्ड, मैक्ग्रा ब्रेट ली और शोएब अख्तर को झेला लेकिन गिनी चुनी पारियों को छोड़कर कभी उन पर दबदबा कायम नहीं कर सके । (जिस तरह से गावस्कर ने वेस्टइंडीज के महानतम गेंदबाजों पर किया था)। सबसे बड़ी बात यह कि इनमें से मैक्ग्रा और शायद ली को छोड़कर शोएब और डोनाल्ड उस कोटि के गेंदबाज हैं ही नहीं जिसका जिक्र ऊपर किया गया है।  आर्थर्टन का तर्क भी कुछ इसी लाइन पर था।  यह कोई साजिश नहीं कि विस्डन ने लंबे समय तक इतिहास की सौ महानतम पारियों में सचिन की किसी टेस्ट पारी को शुमार नहीं किया था। जबकि इस लिस्ट में ब्रैडमेन, सोबर्स, वॉली हैमंड, सर लेन हटन गावस्कर, लारा, रिचर्ड्स समेत तमाम लोगों की कई पारियां शामिल हैं। अगर ये पक्षपात या ज्यादती थी तब भी इतने लंबे करियर में उनकी पांच पारियां तो ऐसी होनी ही चाहिये थी जिनकी चमक के आगे विस्डन की सूची बनाने वालों की आखें चुंधिया जातीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सचिन ने टेस्ट क्रिकेट में बेशुमार रन बनाए। पर मैदान पर विपक्ष को उस तरह से ध्वस्त नहीं कर सके, जिस तरह से ब्रैडमेन,सोबर्स, लारा, वॉली हैमंड, जैसे बल्लेबाजों ने कई मर्तबा किया। उन्होंने अपने जीवन में ऐसी गिनी चुनी टेस्ट पारियां खेली हैं जिसमें शुरू से आखिर तक उनके बल्ले ने आग उगली। उन्होंने आक्रामक शॉट्स भी खेले तो बहुत संभल कर। उन्होंने हमेशा अपनी पारी को सलीके से गढ़ने की कोशिश की।  उन पारियों में झंझा का वेग नहीं था और शायद झरने का प्रवाह भी नहीं। टेस्ट की कई पारिय़ों में उन्होंने आक्रामक होने की कोशिश की तो उन्हें पवेलियन लौटना पड़ा।   रनों के अंबार के साथ उनके क्रिकेट करियर का एक पक्ष इतना चमकीला है कि दूसरे महान बल्लेबाज़ों की आभा फीकी पड़ने का भ्रम होने लगा है। बेशक वे रनों और शतकों के शिखर पर हैं। उनकी बल्लेबाजी में निरंतरता भी है लेकिन एक बहुत बड़ा खालीपन हैं जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। सचिन रिकॉर्ड की सबसे ऊंची चोटी पर जरूर खड़े हैं, सबसे दुर्गम चोटी पर कतई नहीं।   यहां उनकी प्रतिभा पर शक नहीं किया जा रहा। इतने महान करियर को गढ़ने वाला बल्लेबाज जाहिर तौर पर असाधारण होगा लेकिन उन्हें महानतम कहना जरा जल्दबाजी है । य़ह उन बल्लेबाज़ों के साथ ज्यादती भी है जिन्होंने कभी अपने बल्ले से क्रिकेट के मैदान पर राज किया है। हम सचिन की मुक्त कंठ से तारीफ करें लेकिन उन्हें भगवान न बनाएं तो बेहतर क्योंकि क्योकि क्रिकेट के इस तथाकथित भगवान की वंदना अब कर्कश शोर में तब्दील हो गई हैं। &lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;देवांशु कुमार झा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;फोन-9818442690 &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;प्रोड्यूर-न्यूज 24       &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-4717045887908080715?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/4717045887908080715/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=4717045887908080715' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4717045887908080715'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4717045887908080715'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/11/blog-post_27.html' title='     गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-1546750603832828922</id><published>2009-11-22T10:25:00.000-08:00</published><updated>2009-11-22T10:29:13.878-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><title type='text'>मिल गया शंभुजी का मोबाइल</title><content type='html'>आप लोगों को एक अच्छी खबर। पुलिस पर मीडिया के दबाव का असर हुआ। शंभुजी का मोबाइल मिल गया है। पुलिसवालों ने उस शख्स का पता भी लगा लिया है, जिसने शंभुजी के साथ लूटपाट की। अब कोर्ट से कानूनी कार्रवाई के बाद शंभुजी अपना मोबाइल वापस ले सकते हैं। आपको याद ही होगा कि न्यूज २४ के प्रोड्यूसर शंभुजी के साथ हाल ही में कुछ गुंडों ने कैब में लूटपाट की थी। बहरहाल, गनीमत है कि पुलिस ने उन बदमाशों को ढूंढ निकाला।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-1546750603832828922?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/1546750603832828922/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=1546750603832828922' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1546750603832828922'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1546750603832828922'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/11/blog-post_22.html' title='मिल गया शंभुजी का मोबाइल'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-5193370333606460883</id><published>2009-11-15T09:27:00.000-08:00</published><updated>2009-11-15T09:37:44.520-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><title type='text'>क्या कोई इस स्टोरी को फॉलो करेगा ?</title><content type='html'>(अपने साथी शंभु झा के साथ कैब में मारपीट हुई, लूट हुई। एक पत्रकार खबर बना और फिर बात आई गई हो गई। आदतन यहां भी कोई फॉलोअप नहीं है और शायद होगा भी नहीं। हर शख्स की तरह शंभु झा भी अकेले ही कभी कभार थाने का चक्कर लगा पाए तो लगाएंगे,  वरना बात गुम हो जाएगी। हो सका या इस पर कोई कार्रवाई हुई तो आपको सूचना दूंगा। लेकिन तब तक देबांशु झा ने जो पैकेज लिखा था,  उसे कुछ कांटछांट के साथ आपके साथ शेयर कर रहा हूं। घटना हम सभी के रिकॉर्ड के लिए भी और उस हकीकत से रूबरू होते रहने के लिए भी, जो मीडिया में रहते हुए हमें कचोटती है, कचोटनी चाहिए।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न्यूज 24 में बतौर प्रोड्यूसर काम करने वाले शंभु झा १२ नवंबर की रात के साढ़े दस बजे डीएनडी फ्लाईवे पर घर जाने के लिए कैब का इतजार कर रहे थे। तभी उनके पास नीले रंग की एक मारुति कार आकर रुकी। शंभु कैब समझ कर उस कार में सवार हो गए। ये शंभु की सबसे बड़ी गलती साबित हुई, क्योंकि उन्हें मालूम नहीं था, जिस कार में वो बैठे हैं, उसकी स्टेयरिंग लुटेरे के हाथों में हैं।&lt;br /&gt;कार में सवार लोग शंभु को जबरन एक्सप्रेस वे की ओर ले गए। कनपटी पर पिस्तौल सटा दी। और चुप रहने को कहा, जब भी शंभु कुछ कहना चाहते, पीछे बैठा शख्स उनके चेहरे पर पिस्तौल की बट से वार करता। गाड़ी में सवार गुंडे शंभु को देर तक घुमाते रहे। गालीगलौज करते रहे, पीटते रहे। उनके पैसे, मोबाइल छीन लिये। अंगूठी उतार ली। और एक्सप्रेस वे की सुनसान सड़क पर चलती गाड़ी से जबरन उतर जाने को कहा।&lt;br /&gt;ये कहानी उस दिन की है, जब मायावती मेट्रो को हरी झंडी दिखाने नोएडा आई थीं। दिन के उजाले में जब मेट्रो के उदघाटन के लिए सूबे की सीएम मायावती यहां आई थी तब पुलिस की चौकसी थी। चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात थी। क्या मजाल कि परिंदा भी पर मार जाए। मायावती के जाते ही पुलिस अपने मांद में घुस गई।   नोएडा शहर एक बार फिर अपनी रफ्तार पर लौट आया। रात के अंधेरा, सर्दी का मौसम और रिमझिम बारिश में भला सड़क पर चलने वालों की सुरक्षा से यूपी पुलिस को क्या लेना देना। नोएडा की कानून व्यवस्था पर गुंडे चढ़ बैठे और एक पत्रकार को लिफ्ट देने के बहाने लूटा, बुरी तरह से मारपीट की। बल्कि न्यूज 24 का ये पत्रकार खुशकिस्मत था कि गुंडों ने  उसकी जान बख्श दी। वर्ना एक्सप्रेस वे  की इस बेवा सड़क पर शंभु के साथ कुछ भी हो सकता था।&lt;br /&gt; हम यूपी पुलिस से पूछना चाहते हैं कि आखिर क्या वजह है  दिल्ली की चौहद्दी पार होते ही कानून व्यवस्था भगवान भरोसे हो जाती है। जिस शहर को यूपी की सीएम सिंगापुर बनाने का ख्वाब देखती है, वहां गुंडे, लुटेरे, बेलगाम क्यों घूमते हैं। इस चमकते शहर की काली हकीकत यही है कि यहां कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। दिन के किसी भी पहर में यहां य़हां कोई लुट सकता है, किसी का कत्ल हो सकता है किसी का अपहरण हो सकता है और आप पुलिस से सिर्फ रिपोर्ट लिखने भर की उम्मीद कर सकते हैं। &lt;br /&gt;(रिपोर्टर-जीतेन्द्र शर्मा, कॉपी- देवांशु झा)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-5193370333606460883?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/5193370333606460883/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=5193370333606460883' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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का शुक्र है , तबादला रद्द हो गया</title><content type='html'>दोस्तों, दीदी जीजाजी बेंगलोर से वापस ट्रेन में बैठ चुके हैं। कोशिशों की कामयाबी की खुशी के साथ। हेड ऑफिस में एक डी जी एम् साहेब ऐसे मिले जिन्होंने इस मामले में आगे बढ़कर दिलचस्पी ली और तबादला रद्द करवा दिया।&lt;br /&gt;चलिए इसी बहाने एक बार फ़िर ये विश्वास पुख्ता हुआ कि सिस्टम में अभी कुछ अच्छे लोग बचे हैं, जो भावनाओं, मुसीबतों को समझते हैं और फैसले लेने का हौसला भी रखते हैं ।&lt;br /&gt;आप सभी का शुक्रिया जिन्होंने इस मुसीबत में सहानुभूति दिखाई और हमारा हौसला बनाये रखा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-3111036757459866922?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/3111036757459866922/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=3111036757459866922' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/3111036757459866922'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/3111036757459866922'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/09/blog-post_23.html' title='खुदा का शुक्र है , तबादला रद्द हो गया'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-1679715411539958527</id><published>2009-09-20T09:54:00.000-07:00</published><updated>2009-09-20T10:19:23.145-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आपबीती'/><title type='text'>ये दुनिया ऐसी क्यूं है ?</title><content type='html'>मैं जिस समय ये टिप्पणी लिख रहा हूं, दीदी और जीजाजी बैंगलुरू की ट्रिप पर हैं बल्कि पटना से बैंगलुरू जाने वाली ट्रेन में हैं। दोनों एक अजीब सी ऊहा-पोह में हैं। पिछले तीन महीनों तक निराशा और हताशा का एक लंबा दौर झेलने के बाद एक उम्मीद के साथ ट्रेन पर सवार हुए हैं कि शायद अब काम हो जाए।&lt;br /&gt;बात दीदी-जीजाजी की है और आप सभी से शेयर कर रहा हूं। वजह ये एक उदाहरण है कि कैसे हिंदुस्तान का सिस्टम काम कर रहा है। कैसे एक सच्चे और ईमानदार आदमी की कहीं कोई सुनने वाला नहीं। बस एक सिस्टम चल रहा है-अफसरों की ठसक के साथ। इस सिस्टम में आप इंसाफ की उम्मीद लगाएं तो सौ में से ९० मर्तबा आपको निराशा हाथ लगे तो कोई अचरज नहीं।&lt;br /&gt;दरअसल अभी पिछले एक साल पहले या उससे भी कुछ पहले जीजा का एक बहुत भारी एक्सिडेंट  हो गया था। तब से उनकी एक टांग में तकलीफ है और वो स्टिक लेकर चलते हैं। कैनरा बैंक में मैनेजर हैं और करीब २५ साल से इस संस्थान की सेवा कर रहे हैं। लेकिन मुश्किल की घड़ी में इस संस्थान ने उनके साथ जो सलूक किया उसे देखकर हैरानी होती है।&lt;br /&gt;मामला उनके ट्रांसफर से जुड़ा है। जीजाजी की ऐसी हालत नहीं या यूं कहूं कि वो इस शारीरिक और मानसिक स्थिति में नहीं कि घर-परिवार से दूर रह सकें लेकिन बैंक के अफसरान अपनी जिद्द पर अड़ें हैं। उनका ट्रांसफर पटना से कोलकाता कर दिया गया है। उन्होंने अपना ट्रांसफर रद्द करवाने के लिए जीतोड़ कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं। यूनियन की तरफ से कोशिश की गई। अफसरों से विनती आरजू की गई लेकिन सब बेकार। आप सोच सकते हैं पिछले तीन महीने में हर दिन हमारे पूरे परिवार ने किस तरह की मनस्थिति में गुजारा है।&lt;br /&gt;मैं एक मीडिया संस्थान में हूं तो जीजा और दीदी को मुझसे भी कुछ उम्मीदें थीं, लेकिन हम तो परकटे परिंदे हैं। खैर इस परिंदे की जितनी उड़ान हो सकती थी, कोशिश की। सीनियर पत्रकारों से बात की लेकिन उन्होंने एक तरह से हाथ खड़ा कर दिया। बहुत सीनियर पत्रकारों तक मैंने दरख्वास्त नहीं लगाई।  कुछ संकोच वश और कुछ नाउम्मीदी में।&lt;br /&gt;खैर इस बीच मेरे एक मित्र जो कांग्रेस की युवा शाखा में  सक्रिय हैं उनसे बात की। एक संपर्क सूत्र मिला। योगेन्द्र पति त्रिपाठी, कैनरा बैंक में निदेशक हैं। पेशे से शिक्षक हैं और बेहद मिलनसार। बात कुछ आगे बढ़ी,  उम्मीदें भी प्रबल हुईं। करीब एक-डेढ महीने तक हमलोग त्रिपाठीजी के संपर्क में रहे और लगातार हमें ये दिलासा मिली कि ट्रांसफर रूक जाएगा।&lt;br /&gt;शरीर से आंशिक रूप से लाचार एक शख्स के साथ हमदर्दी की उम्मीद हमें भी थी और योगेन्द्र पति त्रिपाठी जी को भी। इस बीच यूनियन की ओर से कैनरा बैंक में निदेशक एस के कोहली से भी बात होती रही। सब कुछ पटरी पर आ रहा था । पटना के जीएम ने हेड ऑफिस बैंगलुरू ये आवेदन भी भेजा कि जितेंद्र कुमार शर्मा (कैनरा बैंक की पटना सिटी ब्रांच के मैनेजर, जीजाजी) की जगह किसी और को कोलकाता भेजा जा सकता है। लेकिन जीएम बैंगुलूरु श्रीनाथ जी ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। उनकी नाक ऊंची रहनी चाहिए थी। इंसान की सारी मजबूरी से ज्यादा बड़ी होती है एक अफसर की जिद्द, इसका एहसास ऐसे ही मौकों पर तो एक आम आदमी को होता है। वरना उसे अपने आम आदमी होने का अफसोस ही क्यों कर होता?&lt;br /&gt;अब दीदी जीजी आखिरी उम्मीद में ट्रेन का सफर कर रहे हैं, मुझे उम्मीद कम है लेकिन दुआ यही करता हूं कि दो पल के लिए ही सही श्रीनाथ साहब की इंसानियत जाग जाए, इतने में एक परिवार का सुकून बना रह जाएगा। वरना रोजी-रोटी के लिए सिस्टम का ये सितम भी झेलना ही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-1679715411539958527?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/1679715411539958527/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=1679715411539958527' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1679715411539958527'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1679715411539958527'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='ये दुनिया ऐसी क्यूं है ?'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-7359160688729974332</id><published>2009-07-18T11:33:00.000-07:00</published><updated>2009-07-18T11:46:42.672-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उदय प्रकाश'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माफीनामा'/><title type='text'>हमारे लेखक को माफ कर दो</title><content type='html'>बहुत आसान होता है किसी की गलती पर उसे दम भर कोस लेना। ऐसा करते हुए कई बार 'न्यायकर्ताओं' को उस हद का भी पता नहीं होता, जिसके बाद अपराध की 'सजा' भी अपराध हो जाती है। मुझे अफसोस होता है कि अपने ही साथ के लोगों को महज एक गलती के लिए हम कितना पराया बना देते हैं। उसे इतना ज्यादा प्रताड़ित करना शुरू कर देते हैं कि उसका खुद पर से यकीन ही डगमगाने लगता है।&lt;br /&gt;इंसान की फितरत ही है गलती करना... उसमें न तो कोई उम्र कमाल दिखा सकती है... न कामयाबी की बुलंदियां... न अरजा हुआ अनुभव। सब कुछ होने के बाद भी गलतियां करना भी हमारा एक मौलिक अधिकार ही है। गलतियों का एहसास कराना और बात है और गलतियों को एक मुद्दा बनाकर किसी का हौसला तोड़ना और बात?&lt;br /&gt;उदयप्रकाशजी ने भाई साहब की स्मृति में दिए गए सम्मान को लेने की भूल की। भूल ये कि आपने इसे योगी आदित्यनाथ के हाथों से ले लिया। जाहिर है योगी आदित्यनाथ की शख्सियत को लेकर कुछ लोगों को गंभीर आपत्तियां है और इसे पूरी तरह से खारिज भी नहीं किया जा सकता। लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है कि अगर हम वाकई समाज में कोई बदलाव चाहते हैं उसकी सूरत बदलना चाहते हैं तो इसे बहुत सारे खांचों में बांट कर नहीं देख सकते। हो सकता है उदयजी की सोहबत में आदित्यनाथ जैसे लोगों में भी कुछ बदलाव आ जाए। लेकिन हम तो इसी बात से डरे रहते हैं कि कहीं योगी आदित्यनाथ ही आपको अपने रंग में न रंग ले। बस इसी चक्कर में हमेशा दूर से ही ऐसे लोगों को धिक्कारते रहते हैं। कोई सच्ची कोशिश भी नहीं होती इन लोगों से संवाद की।&lt;br /&gt;उदयजी आपसे मुलाकात के दौरान हुई चर्चा में यही बात उठी थी... बार-बार हम सभी ने जोर दिया था कि जो भी आपको इस समय महसूस हो रहा हो उसे ईमानदारी से लिखें... इसमें कोई रणनीतिक एजेंडे की दरकार नहीं। अच्छा लगा कि आपने भी उसी तरह सच्चे दिल से सच को कबूल किया। माफी मांगी तो जरूर लेकिन उन सारी बातों के जिक्र के साथ जो आपके दिलो-दिमाग में उमड़ घुमड़ रहे थे।&lt;br /&gt;शायद आपकी इस स्वीकारोक्ति के बाद सहृदय आलोचकों और दोस्तों ने राहत की सांस ली होगी। उन्हें ये लगा होगा कि जो साथी सुबह को अपना रास्ता भूल गया था वो शाम को घर लौट आया। और अगर अब भी उन्हें आपके व्यक्तित्व को लेकर शक है, अब भी आप से उनके गिले शिकवे दूर नहीं हों तो फिर क्या किया जा सकता है?&lt;br /&gt;हां, हम सभी को आप जैसे लोगों से कई उम्मीदें होती हैं। क्योंकि जो हम खुद नहीं कर पाते उसका ठेका हम आप जैसे लोगों को दे देते हैं। बड़ा अच्छा लगता है ये कहते हुए देखो वो उदय प्रकाश हैं-एक मिसाल हैं... बड़े लेखक हैं... और जो भी उपमाएं जोड़नी होती है जोड़ देते हैं। मूर्ति पूजा का विरोध भले ही हम सदियों से करते रहे हों लेकिन आज भी मंदिरों की लालसा नहीं मरी... और जब मंदिर बनेंगे तो उसमें विराजने के लिए कोई भगवान तो चाहिए न। तो फिर कोई उदय प्रकाश क्यों नहीं?&lt;br /&gt;वो चाहे न चाहे, उसे लेना ही होगा ये ठेका। उसे धारण करनी ही होगी हमारी दी गई ये जिम्मेदारी। और अगर उसने चू-चपड़ की तो फिर पंचायत बैठेगी... हो जाएगा हुक्का पानी बंद। हमें हर तरकीब आती है... हमने किसी को बुलंदियों पर बैठाया हो तो उसकी कब्र खोदकर दफनाने में भी महारथ हासिल है हमें। आखिर इस तरह का दंभ क्यों? आखिर क्यों हम कभी-कभी पुलिस की भूमिका में आ जाते हैं और पुलिस वालों के तरह ही डंडे की चोट पर अपनी बात मनवाने की जिद्द पर अड़ जाते हैं?&lt;br /&gt;हमारे लेखक ने अपनी गलती मान ली है... उसने मान लिया है कि उससे भूल हुई है। अब इस मुद्दे को यहीं विराम देकर सभी को आगे की सुध लेनी चाहिए। यहां दो कहावतें याद आ रही हैं उनका भी जिक्र कर ही देता हूं-पहली-&lt;br /&gt;काजर की कोठरी में कैसे भी सयानो जाएएक लीक काजल की लागि है पे लागि है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदय प्रकाश के पूरे व्यक्तित्व पर इस प्रकरण पर मचे बवाल से एक धब्बा तो लग ही गया जिसे धुलने में लंबा वक्त लगेगा।लेकिन वहीं दूसरी तरफ रहीम का दोहा खुद ही मन में उदय प्रकाश जी के प्रति एक ऐसा भाव भर देता है कि किसी शिकायत की जगह ही नहीं बचती।&lt;br /&gt;रहिमन जो नर उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।&lt;br /&gt;चंदन विष व्यापत नहीं, लपटत रहत भुजंग।&lt;br /&gt;उदयजी जो बातें मेरे मन में आ रही थी, वो मैंने भी लिख दी हैं। ये मेरा भी अंतिम ड्राफ्ट नहीं है।&lt;br /&gt;चलते-चलते सभी सुधी पाठकों, आलोचकों और लेखकों से मैं उदय प्रकाशजी की तरफ से माफी मांगता हूं... इसलिए भी कि मेरे सामने उन्होंने आप सभी से माफी मांगने की बात कही है... वो खुद ही काफी परेशान हैं... हमें उन्हें इन पलों में और परेशान करने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए। एक लेखक को उसके पथ पर चलने दीजिए... उसकी अपनी गति और अपनी चाल से... वो भटका भी तो बहुत कुछ दे कर ही जाएगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-7359160688729974332?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/7359160688729974332/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=7359160688729974332' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/7359160688729974332'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/7359160688729974332'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='हमारे लेखक को माफ कर दो'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-2375583470994025475</id><published>2009-06-22T08:27:00.000-07:00</published><updated>2009-06-22T08:40:15.172-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>जीवन बहे रे बहे</title><content type='html'>नर्मदा का ताल&lt;br /&gt;लहरों पर संगीत&lt;br /&gt;सागौन में नयी- नई&lt;br /&gt;कोपलों का मौसम&lt;br /&gt;हल्की बूंदा- बांदी से&lt;br /&gt;गीली हुई मिट्टी&lt;br /&gt;सौंधा- सौंधा पहाड़&lt;br /&gt;सूखी - सूखी चिडिया&lt;br /&gt;टिड्डियाँ और&lt;br /&gt;तितलियाँ&lt;br /&gt;पत्ती-पत्ती पर हजारों हजार&lt;br /&gt;खुशियाँ ।&lt;br /&gt;किंतु बिखरा जीवन&lt;br /&gt;दिन , बहुत कम।&lt;br /&gt;इसलिए गाते हैं , नाचते हैं&lt;br /&gt;बूढे आदिवासी लोग और&lt;br /&gt;हिल उठता है पूरा&lt;br /&gt;जंगल।&lt;br /&gt;हर तीज पर&lt;br /&gt;झुंड के झुंड&lt;br /&gt;एका बाँध झूम जाते हैं&lt;br /&gt;पुरखों की आत्मा की शान्ति के वास्ते !&lt;br /&gt;साथ लाते हैं&lt;br /&gt;अपनी-अपनी औलादें&lt;br /&gt;ताकि कल ख़ुद के मरने पर&lt;br /&gt;आत्मा&lt;br /&gt;युवा पीढी के देह दिमाग में&lt;br /&gt;रुके, घुटनों पर&lt;br /&gt;थोड़ा मुडे और&lt;br /&gt;हाथ उठाये&lt;br /&gt;जिन्दा हो जाए&lt;br /&gt;बार - बार , हर साल।&lt;br /&gt;- शिरीष खरे। मुंबई क्राई के साथ जुड़े हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-2375583470994025475?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/2375583470994025475/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=2375583470994025475' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/2375583470994025475'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/2375583470994025475'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/06/blog-post_22.html' title='जीवन बहे रे बहे'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-4287379235266091588</id><published>2009-06-08T07:46:00.000-07:00</published><updated>2009-06-08T08:43:55.234-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्रद्धांजलि'/><title type='text'>हबीब तनवीर, गिर गया परदा</title><content type='html'>हबीब तनवीर नहीं रहे, आज सुबह ये समाचार एक टीवी चैनल के जरिये मिला। थोड़ी देर तक मैं हक्का बक्का रह गया , फ़िर उनसे जुडी कुछ यादें , कुछ तस्वीरें जेहन में घूमती रहीं। &lt;br /&gt;भोपाल में पहली बार हबीब दा का नाटक माटी गाड़ी देखा। मानव संग्रहालय मैं शो था , खुले आकाश के नीचे। उस समय रंगकर्म का शौक उफान पर था। उनके कलाकारों का अंदाज देख हैरान रह गया। पुरे नाटक के दौरान हबीब दा लाईट्स वाले के पास बैठे थे। एक ७५ साल का रंगकर्मी और उसके काम का जूनून मेरे लिए काफी  प्रेरणादायक था।&lt;br /&gt;इसके बाद चरणदास चोर देखा। हबीब दा के सबसे सफल नाटकों में शुमार है चरण दास चोर।  हबीब साहब का जितना नाम सुना था उससे कहीं बढ़कर पाया। लोग भी खूब उमरते उनका नाटक देखने। नाटकों मैं बात ही कुछ ऐसी थी की कभी पुराने नहीं पड़ते। लोक का ऐसा रस घुला था की जित देखो तित नया।&lt;br /&gt;ये यादें साल १९९८-९९ के बीच की हैं। इस दौरान मैं भोपाल मैं माखनलाल विश्वविद्यालय काम छात्र था। हम एक ग्रुप बना कर नाटक कर रहे थे।  शहर में कोई भी एक्टिविटी होती  हम लोग पहुँच जाते। इस दौरान मध्य प्रदेश सरकार ने हबीब साहब के ७५ साल के होने पर एक भव्य आयोजन कराया । ५ दिनों तक भोपाल हबीबमय हो गया। दिन मैं हबीब साहब पर व्याख्यान और रात में नाटक।  व्याख्यान में तो कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन असली जद्दोजहद शुरू होती शाम में । रवींद्र भवन में पाँव रखने की जगह नहीं होती और हमारे पास टिकेट नहीं होते। हमें आख़िर तक इंतज़ार करना पड़ता जब एंट्री ओपन कर दी जाती।  इस समारोह में कुछ और नाटक देखे - गाँव के नाम ससुराल , मोर नाम दामाद।&lt;br /&gt;दस्तक के बैनर से हम लोगों ने नाटक तैयार किया- राम सजीवन की प्रेम कथा। बहुत संकोच के साथ हमने दादा के घर कार्ड भिजवाया। हबीब साहेब उन दिनों भोपाल में नहीं  थे , हमने भी उनके आने की उम्मीद छोड़ दी थी। लेकिन नाटक शुरू होने से पहले विंग्स में हमें खबर मिली की हबीब सर अपने ग्रुप के साथ आ गए हैं. हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।  धड़कन भी बढ़ गयी।  नाटक शुरू हुआ, साउंड की कुछ समस्या थी , आवाज़ दर्शकों तक ठीक से नहीं पहुँच पा रही थी , बावजूद इसके उन्होंने पूरा नाटक देखा। हम लोगों से मिले आशीर्वाद दिया और उसके बाद ही वहां से गए।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;एक नौसिखुए रंगकर्मी  के लिए इस से बढ़कर खुशी की बात और क्या हो सकती थी । खैर , वो दिन गुजर गए लेकिन हबीब साहेब एक अमिट छाप छोड़ गए.  इस समय और भी कई बातें जेहन मैं आ रही हैं, लेकिन वो फिर कभी.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; दिल्ली आने के बाद उनका एक और नाटक देखा -आगरा बाज़ार. एक ऐसा नाटक जिसका एहसास आप शब्दों में बयां नहीं कर सकते. नजीर अकबराबादी की कवि़ताओं में न जाने कितने आयाम जोड़ दिए हबीब जी ने.  नजीर की पंक्तियों से बात ख़त्म करता हूँ -सब ठाठ पड़ा रह जायेगा जब बांध चलेगा बंजारा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-4287379235266091588?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/4287379235266091588/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=4287379235266091588' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4287379235266091588'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/4287379235266091588'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='हबीब तनवीर, गिर गया परदा'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-1786439079127220481</id><published>2009-04-10T16:31:00.000-07:00</published><updated>2009-04-12T14:02:45.015-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='असहमति का साहस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>जरनैल ये तूने क्या किया?</title><content type='html'>जरनैल सिंह&lt;br /&gt;तुम भी अजीब आदमी हो&lt;br /&gt;भरी महफिल में&lt;br /&gt;देश के गृहमंत्री पर जूता चला दिया?&lt;br /&gt;किस युग में जीते हो&lt;br /&gt;जरनैल?&lt;br /&gt;क्या तुम्हें नहीं मालूम&lt;br /&gt;यहां सब कुछ सोच समझ कर&lt;br /&gt;किया जाता है&lt;br /&gt;प्यार ही नहीं, गुस्सा भी&lt;br /&gt;समर्थन ही नहीं, विरोध भी&lt;br /&gt;और तुम हो&lt;br /&gt;कि भावना में बह जाते हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाकई अजीब हो जरनैल&lt;br /&gt;तुम्हें इस बात का भी एहसास नहीं&lt;br /&gt;कि तुम एक पत्रकार हो&lt;br /&gt;पत्रकार जो कहीं नौकरी करता है&lt;br /&gt;पत्रकार जिसकी कुछ मर्यादाएं तय हैं&lt;br /&gt;पत्रकार जो निष्पक्ष कहा जाता है&lt;br /&gt;लेकिन तुम तो&lt;br /&gt;किसी मुद्दे पर भावनात्मक हो जाते हो&lt;br /&gt;उबल पड़ते हो&lt;br /&gt;जूता पहनकर पीसी में चले जाते हो&lt;br /&gt;और गुस्सा आने पर&lt;br /&gt;चला भी देते हो जूता&lt;br /&gt;आखिर कैसे पत्रकार हो तुम?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरनैल सिंह&lt;br /&gt;क्या तुमने अपने मालिक से पूछा था?&lt;br /&gt;क्या तुमने अपने संपादक को बताया था&lt;br /&gt;कि तुम पीसी में चलाने वाले हो जूता?&lt;br /&gt;नहीं न&lt;br /&gt;तो अब उनसे सुनो&lt;br /&gt;पत्रकारिता का पाठ&lt;br /&gt;उनसे सीखो&lt;br /&gt;पत्रकारिता की मर्यादा&lt;br /&gt;उनसे सीखो&lt;br /&gt;कैसे किया जाता है कलम का इस्तेमाल&lt;br /&gt;उनसे सीखो&lt;br /&gt;कैसे जलते मुद्दों पर साधी जाती है गुम्मी&lt;br /&gt;उनसे सीखो&lt;br /&gt;कैसे बरती जाती है खामोशी&lt;br /&gt;और अगर नहीं सीख सकते&lt;br /&gt;तो फिर तैयार हो जाओ&lt;br /&gt;क्योंकि&lt;br /&gt;वो अब बताएंगे&lt;br /&gt;तुम्हें तुम्हारी औकात&lt;br /&gt;वो बताएंगे&lt;br /&gt;एक पत्रकार की हैसियत&lt;br /&gt;गृहमंत्री ने माफ कर दिया तो क्या&lt;br /&gt;वो देंगे तुम्हें&lt;br /&gt;तुम्हारे 'जुल्म' की सजा?&lt;br /&gt;आखिर वो कैसे बनने दे सकते हैं&lt;br /&gt;तुम्हें एक मिसाल&lt;br /&gt;मिसाल&lt;br /&gt;एक गुस्से की&lt;br /&gt;मिसाल&lt;br /&gt;एक बेचारगी की&lt;br /&gt;मिसाल&lt;br /&gt;एक पीड़ित के दर्द की&lt;br /&gt;मिसाल&lt;br /&gt;मुद्दे उठाने की तड़प की&lt;br /&gt;आखिर&lt;br /&gt;उन्हें भी तो साबित करनी है&lt;br /&gt;अपनी वफादारी&lt;br /&gt;उन्हें भी तो बताना है कि&lt;br /&gt;उन्हें फिक्र है पत्रकारिता की&lt;br /&gt;पत्रकारों की&lt;br /&gt;और सबसे ज्यादा इस&lt;br /&gt;बात की फिक्र कि&lt;br /&gt;हिंदुस्तान इराक नहीं&lt;br /&gt;यहां विरोध के दूसरे तरीके&lt;br /&gt;आजमाए जा सकते हैं&lt;br /&gt;लेकिन&lt;br /&gt;यहां नहीं पैदा हो सकता कोई&lt;br /&gt;मुंतजर अल जैदी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बोल रहा हूं न&lt;br /&gt;क्या करूं&lt;br /&gt;जब से तुम्हारे जूते को देखा है&lt;br /&gt;वो काटने को दौड़ रहा है&lt;br /&gt;मुझे गुस्सा आ रहा है कि&lt;br /&gt;मालिकों और संपादकों का पाठ&lt;br /&gt;पढ़ने से पहले&lt;br /&gt;काश ! तुमने पढ़ लिया होता&lt;br /&gt;तुलसी को&lt;br /&gt;काश ! तुमने जान लिया होता कि&lt;br /&gt;समरथ का कोई दोष नहीं होता&lt;br /&gt;या तुमने&lt;br /&gt;धूमिल से लोकतंत्र में जीना ही सीख लिया होता&lt;br /&gt;कमर झुका कर&lt;br /&gt;टूटने से बचा ही लिया होता खुद को...&lt;br /&gt;बहरहाल&lt;br /&gt;अब जब तुमने जूता चला ही दिया&lt;br /&gt;जब तुमने हंगामा खड़ा कर ही दिया&lt;br /&gt;तो बस&lt;br /&gt;पत्रकारों के लिए&lt;br /&gt;इतना और करना&lt;br /&gt;इस जूते पर किसी&lt;br /&gt;ब्रांड की मोहर मत लगने देना&lt;br /&gt;किसी को मत खरीदने देना&lt;br /&gt;अपना गुस्सा&lt;br /&gt;अपनी तड़प&lt;br /&gt;अपनी बेचारगी&lt;br /&gt;अपना हौसला&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;लड़ने की ताकत।&lt;br /&gt;- १० अप्रैल २००९&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-1786439079127220481?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/1786439079127220481/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=1786439079127220481' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1786439079127220481'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/1786439079127220481'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/04/blog-post_10.html' title='जरनैल ये तूने क्या किया?'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-923826591328695475</id><published>2009-04-02T15:09:00.000-07:00</published><updated>2009-04-02T15:41:56.845-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गंदा है पर धंधा है'/><title type='text'>वोदाफोन का लीगल नोटिस</title><content type='html'>वोदाफोन ने मुझे एक लीगल नोटिस भेजा है। ये नोटिस कंपनी के मनमाने बिल का भुगतान न करने की वजह से भेजा गया है। वोदाफोन ने जनवरी और फरवरी में डाउनलोडिंग के नाम पर अनाप-शनाप चार्ज किया है। मेरा एक नंबर ९९९९०३१३८० है जो इन दिनों बंद पड़ा है। गनीमत से नंबर बंद होने की वजह मोबाइल का गुम हो जाना है, वरना बिल और भी लंबा हो सकता था। कंपनी के मनमाने रवैये की वजह से मैंने इसे दोबारा हासिल करने की कोशिश भी नहीं की है।&lt;br /&gt;दरअसल वोदाफोन ने वोदा लाइव के नाम से एक सर्विस दे रखी है। इस पर चार्ज बहुत ही मामूली है १० पैसे प्रति मिनट (कारपोरेट कनेक्शन) । ये सुनने में बहुत अच्छा लगता है लेकिन कंपनी ने कुछ और साइट्स से गुप्त गठबंधन कर रखा है। और वहां आपने क्लिक किया नहीं कि अनाप शनाप चार्ज लगने शुरू हो जाते हैं। ऐसा ही हुआ है मेरे इस नंबर के साथ भी। गाने डाउनलोड करने के नाम पर कंपनी ने ९९ रुपये के हिसाब से चार्ज किया है और उसका तरीका समझ से परे है।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;strong&gt;आखिर कोई कंपनी खुद १० पैसे लेकर किसी को उसी सर्विस पर करीब एक हजार गुना ज्यादा चार्ज करने की सुविधा कैसे दे सकती है?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;इस पर मैंने कंपनी में शिकायत की तो उनका एक तैयार मेल आ गया कि हम इस बारे में कुछ नहीं कर सकते।&lt;br /&gt;वोदाफोन कस्टमर केयर वालों से बात की तो उनका कहना था कि &lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;strong&gt;ये चार्जेज हमारी कंपनी ने नहीं किए हैं ये थर्ड पार्टी पेमेन्ट है।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मैंने वोदाफोन से यही अपील की थी कि&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;strong&gt;१।थर्ड पार्टी का पेमेन्ट मेरी ओर से आपको करने का हक किसने दिया? &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;strong&gt;2।आखिर आज जब क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड से मोबाइल के थ्रू ही कई सारी परचेजिंग हो जाती है तो आपने इस तरह के बिल का भुगतान करने का ठेका क्यों उठा रखा है? &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;strong&gt;3-क्यों नहीं थर्ड पार्टी को खुद ब खुद पेमेन्ट लेने को कहा  जाता है?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#330000;"&gt;लेकिन कंपनी है कि कोई जवाब देने की बजाय चुप्पी साध लेती है। &lt;/span&gt;ये सारा गोरखधंधा महज इसलिए कि उस साइट से कंपनी को अच्छा खासा हिस्सा कमीशन के तौर पर हासिल हो जाता है।&lt;br /&gt;और अब मुझे डराने धमकाने के लिए उन्होंने अपनी लीगल कंपनी से एक नोटिस भेज दिया है। इस नोटिस का जवाब भेजने के लिए मैंने भी एक वकील से बात कर ली है और जल्द ही इसका जवाब दे दिया जाएगा।&lt;br /&gt;बहरहाल, वोदाफोन जैसी कंपनियों के इस धंधे के खिलाफ और क्या किया जा सकता है इस पर आप सभी के सुझाव चाहूंगा। और कंपनियों की इस 'लीगल गुंडागर्दी'  से निपटने के लिए आप सभी का सहयोग भी अपेक्षित है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-923826591328695475?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/923826591328695475/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=923826591328695475' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/923826591328695475'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/923826591328695475'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/04/blog-post_02.html' title='वोदाफोन का लीगल नोटिस'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-8128388352295880001</id><published>2009-04-01T14:43:00.000-07:00</published><updated>2009-04-02T14:41:15.777-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आवाज दो'/><title type='text'>वीओआई- कब मिलेगी दूसरी किश्त</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;वीओआई- वॉइस ऑफ इम्प्लॉई &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वॉइस ऑफ इंडिया चैनल की धांधली बदस्तूर जारी है। कंपनी अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों तक को नहीं बख्श रही है। महीनों सैलरी के लिए इंतजार नहीं करने को तैयार पत्रकारों ने वीओआई को इस्तीफा दिया तो उनके साथ प्रबंधन ने एग्रीमेंट (कोई और विकल्प प्रबंधन ने छोड़ा ही नहीं) का नाटक किया। मेहनताना जो बन रहा था उसके भुगतान के लिए कंपनी ने कर्मचारियों से जबरन मोहलत ले ली और पांच किश्तों में भुगतान का एग्रीमेंट हुआ।&lt;br /&gt;नाराज कर्मचारियों के तेवर देख जैसे-तैसे कंपनी ने फरवरी माह के आखिर में पहली किश्त का भुगतान तो कर दिया लेकिन अब दूसरी किश्त के लिए फिर कर्मचारियों को चक्कर पे चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।&lt;br /&gt;कई दिनों तक वीओआई ऑफिस के चक्कर लगाने के बाद आखिरकार अब कर्मचारी अदालत में जाने पर विचार कर रहे हैं। इस जंग में कई पत्रकार साथी शामिल हैं। कुछ साथी जो अब तक अपने बकाया भुगतान का इंतजार कर रहे हैं वो भी अब अदालत का दरवाजा खटखटाने का इरादा कर चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;आखिर कब तक प्रबंधन का झांसा चलता रहेगा? &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;आखिर कब तक लोग कंपनी की मनमानी झेलते रहेंगे? &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;आखिर कहीं तो होगी सुनवाई? &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;आखिर कभी तो मिलेगा इंसाफ? &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वीओआई प्रबंधन के खिलाफ पत्रकार साथियों की इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाना ही होगा और आप सभी से अपील है कि आवाज से आवाज मिलाएं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-8128388352295880001?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/8128388352295880001/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=8128388352295880001' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8128388352295880001'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8128388352295880001'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='वीओआई- कब मिलेगी दूसरी किश्त'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-5817657237899200441</id><published>2009-03-25T15:51:00.000-07:00</published><updated>2009-03-25T15:59:43.243-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>विस्थापन पर दो कविताएं</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;१-&lt;span style="color:#000099;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ffff00;"&gt;मेलघाट&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000099;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जो तिनका-तिनका जोड़कर&lt;br /&gt;जिंदगी बुनते थे&lt;br /&gt;वो बिखर गए।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;गांव-गांव&lt;br /&gt;टूट-टूटकर&lt;br /&gt;ठांव-ठांव बन गए।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अब उम्मीद से&lt;br /&gt;उसकी उम्र&lt;br /&gt;और छांव-छांव से&lt;br /&gt;पता पूछना&lt;br /&gt;बेकार है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;२&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ffff33;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मुंबई&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;मुंबई का चांद&lt;br /&gt;अकेला होता है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उस रात&lt;br /&gt;बहुत अकेला था चांद&lt;br /&gt;खुले आसमान में&lt;br /&gt;चंद तारों के साथ&lt;br /&gt;अकेला और&lt;br /&gt;देर तक लटका था चांद।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बेकरार चांद&lt;br /&gt;उस रात&lt;br /&gt;सोना नहीं चाहता था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वह जानता था&lt;br /&gt;उसकी एक झपकी से&lt;br /&gt;उजियाला होगा और&lt;br /&gt;शहर के हजारों चांद टूट जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;शहर के हजारों घर रोशनी खो देंगे&lt;br /&gt;वह अपने ठिकानों से लापता होंगे।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;उस रात&lt;br /&gt;चांद&lt;br /&gt;हजारों ख्वाबों को तोड़ने की तैयारियां&lt;br /&gt;देख रहा था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;- ये दोनों कविताएं &lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#33ff33;"&gt;शिरीष खरे&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;की है, जो इन दिनों क्राई, मुंबई के साथ काम कर रहे हैं।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-5817657237899200441?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/5817657237899200441/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=5817657237899200441' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5817657237899200441'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/5817657237899200441'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/03/blog-post_25.html' title='विस्थापन पर दो कविताएं'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-2444012106483981775</id><published>2009-03-23T14:20:00.000-07:00</published><updated>2009-03-25T16:24:11.715-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बैंकिंग'/><title type='text'>मॉडर्न महाजन-3</title><content type='html'>लंबे अरसे बाद इस सीरीज में एक कड़ी और जोड़ रहा हूं। ताजा मामला एचएसबीसी के क्रेडिट कार्ड के साथ जुड़ा है। ये बातें आपसे इसलिए भी शेयर कर लेता हूं ताकि मेरीबीती से आप कुछ सतर्क हो जाएं।&lt;br /&gt;एचएसबीसी कार्ड के साथ मेरा रिश्ता बड़ा अजीबो-गरीब रहा है। मैं क्रेडिट कार्ड के चक्कर में तब नया-नया ही फंस रहा था। शादी तय हो चुकी थी इसलिए हाथ तंग था और पैसों की जरूरत। ऐसे में एचएसबीसी क्रेडिट कार्ड वालों ने फोन किया तो मैं ना नहीं कर सका।&lt;br /&gt;इस कार्ड की शुरुआती लिमिट पचास हजार के करीब थी, जो बैंक वालों ने मुझसे कोई सलाह मशविरा किए बगैर, बड़े ही मनमाने तरीके से घटाकर ११ हजार के आसपास कर दी। मैंने सोचा चलो पिंड छुटा नहीं कुछ हलका तो हुआ ही।&lt;br /&gt;खैर बात आई गई हो गई और फिलहाल इस क्रेडिट कार्ड का लिमिट १५ हजार है, वो भी बैंक ने खुद ही अतिरिक्त कृपा दिखाते हुए एकतरफा फैसला लिया।&lt;br /&gt;एकतरफा फैसला लेने का बैंक का ये सिलसिला यहीं नहीं रुका। हाल ही में मुझे कुछ शॉपिंग करनी थी मैंने ये कार्ड यूज करना चाहा। मैंने करीब ५४०० का पेंमेंट करना चाहा तो बैंक वालों ने डिनाय कर दिया। इसके बाद सेकेंड टाइम में ४३०० का पेमेंट करना चाहा तो पेमेंट हो गया।&lt;br /&gt;इसके बाद मैंने जब भी कार्ड यूज करना चाहा, बैंक वालों ने डिनाय कर दिया। मुझे डिनायल का कोई कारण समझ में नहीं आया। और न ही पेमेंट के लिए मैसेज कर ग्राहक को बार-बार रिमाइंड कराने वाले बैंक अधिकारियों ने ये जरूरी समझा कि मेरे कार्ड पर लगी पाबंदी की सूचना मुझे देते।&lt;br /&gt;बहरहाल सबसे हैरान करने वाला तथ्य तो ये है कि करीब ४०० रुपये के ओवरयूज के लिए बैंक ने ५०० रुपये चार्ज कर दिया।&lt;br /&gt;सवाल ये है कि&lt;br /&gt;१- जब बैंक ने डिनाय ही किया तो मुझे महज ४०० रुपये ज्यादा निकालने की सुविधा ही क्यों दी?&lt;br /&gt;२- दूसरा सवाल ४०० रुपये के ओवरयूज पर ५०० का फाइन कहां तक जायज है?&lt;br /&gt;३- इस तरह के फैसले लेने के बाद बैंक ग्राहक को सूचना भेजने की जहमत क्यों नहीं उठाते?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने जैसे ही क्रेडिट कार्ड का बिल देखा मेरा माथा ठनक गया। मैंने जब फोन कर कस्टमर केयर वालों से अपना गुस्सा जाहिर किया तो उन्होंने एहसान जताते हुए फाइन को कम कर १२५ रुपये कर दिया। मैं जानता था कि ये भी बिलुकल नाजायज है लेकिन क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल की कुछ तो सजा मिलनी ही चाहिए न।&lt;br /&gt;आखिर मॉडर्न महाजन के पैंतरों से आप और हम कैसे वाकिफ होंगे... इसी तरह तो....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-2444012106483981775?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/2444012106483981775/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=2444012106483981775' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/2444012106483981775'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/2444012106483981775'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/03/3.html' title='मॉडर्न महाजन-3'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-6238244580663778410</id><published>2009-03-20T19:15:00.000-07:00</published><updated>2009-03-20T19:19:39.408-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कविता क्यों और कैसे ?</title><content type='html'>&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;वर्ल्ड पोएट्री डे पर याद आई कविता&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सदियों पहले..एक परिंदे की दर्द भऱी आवाज में ढल कर तुम किसी की रूह में उतरीं..एक डाकू..जिसने उस दर्द को महसूस किया और उस दर्द के पेट से तुम पैदा हुई..डाकू महर्षि बन गया और दर्द कविता.. यूं तो अंजान ताकतों की प्रार्थना का रहस्य..भी कविता है लेकिन..वाल्मीकि..ही तुम्हारे पिता थे...और फिर मेघ की भाषा में तुम्हें कालिदास ने बात करने की कला सिखलाई..तुम्हें रंगीनियों से संवारा.. और सीता की तकलीफ भवभूति की कलम से उभरी..तुम्हारी रंगीनियों ने पहली बार करुणा और अंधकार की भाषा भवभूति से सीखी..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम चलती रही..बहती रही..भास, दण्डी..श्रीहर्ष..और न जाने कितनी ही जुबां से संवरती रही.शंकर.. कुमारिल ने तुम्हें दर्शन के जेवर पहनाये..तुम्हारी धारा..उत्तर से दक्षिण की ओर बहने लगी..सुदूर..तमिलनाडु में तुम्हें एक नया कलेवर मिला..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक वक्त ऐसा भी आया जब धारा कुछ रुक सी गई.. लेकिन फिर अमीर खुसरो..की जुबां में तुम ताजा हो उठीं..और राम तुम्हारे हाथों कुछ और संवर से गए.. तुलसी की कलम से.. कूष्ण की शख्सियत को सूर ने तुम्हारे सहारे से एक नई चांदनी से भर दिया..कबीर ने तुम्हें तोड़ना फोड़ना सिखाया..तुम खुद अपनी राह बनाकर चलने की कला उस फकीर से सीख गईं.. नानक की भाषा में तुम कई विरोधों को साथ लेकर चलीं.. और जयदेव..चैतन्य.. कम्ब..पंपा तुम्हें रोशन करते गए..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सदियां बीतीं..भाषा बदलती रहीं.. फारसी में बेदिल की कलम से तुम खिल उठी.. तो मीर के शेर और नज्म तुम्हें खुदा के करीब ले गए.. गालिब की पीड़ा और दर्द में तुम पिघल सी गई....और टैगोर ने तुम्हें झरने का प्रवाह दिया..पश्चिम को पूर्व से मिला दिया..बंकिम ने तुम्हें मुक्ति की चाह दी..और भारती के स्वरों में तुमने विद्रोह करना सीखा....प्रसाद के सहारे तुमने इस संस्कृति की धारा में फिर से डुबकी लगाई... निराला के प्रचंड ओज में तुम्हारे बंधन टूट गए तुम परंपरा और आधुनिकता के बीच भिड़ंत करती रहीं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवनानंद ने तुम्हें नई छवियां दीं..तो मुक्तिबोध ने तुम्हें अंधकार से प्रकाश में जाने की छटपटाहट...नागार्जुन ने तुम्हें भदेस होना सिखलाया और अज्ञेय की भाषा में अभिजात्य हो गईं..&lt;br /&gt;अब तुम्हारे स्वर कुछ बदले हुए हैं.. तुम्हारी शैली भी बदल गई है.. तुम्हारी पहचान मुश्किल है.. तुम कविता हो या कुछ और कहना आसां नहीं.. लेकिन जीवन जब भी गम...खुशी.हार जीत के लम्हों से गुजरता है तुम सांस लेती हो..जब भी बादल गरजते हैं.. झरने बहते हैं.. नदियां उफनती हैं.. चिड़ियां चहचहाती हैं..किसान खेतों में काम करते हैं.. बच्चे जिद करते हैं...मां रोती है..और पिता मुस्कराते हैं तुम मौजूद रहती हो.. और शायद किसी न किसी भाषा, जुबां में इस धरती के जीवित रहने तक तुम भी सांस लेती रहोगी.. क्योंकि जीवन एक कविता ही है...&lt;br /&gt; - देबांशु कुमार (न्यूज २४ में कार्यरत प्रोड्यूसर)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-6238244580663778410?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/6238244580663778410/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=6238244580663778410' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6238244580663778410'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6238244580663778410'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/03/blog-post_20.html' title='कविता क्यों और कैसे ?'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-218979833401407670</id><published>2009-03-18T16:15:00.000-07:00</published><updated>2009-03-18T16:19:46.041-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>उसकी मां</title><content type='html'>दिल्ली की&lt;br /&gt;सर्द रात और&lt;br /&gt;क्नॉट प्लेस पर&lt;br /&gt;रोता बच्चा&lt;br /&gt;भीख मांगता, खेलता&lt;br /&gt;भटक आया इस&lt;br /&gt;फुटपाथ पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डरा, सहमा वह नन्हा&lt;br /&gt;दो खुली आंखों से&lt;br /&gt;खोजता अपनी मां को।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आसमान में तारे और&lt;br /&gt;एक बड़ा सा चांद&lt;br /&gt;उग आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चा टकटकी लगाए&lt;br /&gt;कुछ देर देखता है और&lt;br /&gt;फिर स्ट्रीट लाइट के&lt;br /&gt;नीचे झरे&lt;br /&gt;पत्तों के ढेर इकट्ठा कर&lt;br /&gt;नरम बिस्तर बना&lt;br /&gt;सो जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह तक&lt;br /&gt;हो सकता है&lt;br /&gt;उसे उसकी मां मिल जाए!&lt;br /&gt;- शिरीष खरे (क्राई, मुंबई में कार्यरत)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-218979833401407670?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/218979833401407670/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=218979833401407670' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/218979833401407670'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/218979833401407670'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/03/blog-post_18.html' title='उसकी मां'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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बच्चा।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;नींद में&lt;br /&gt;उसकी मुस्कान&lt;br /&gt;नदी की रेत पर&lt;br /&gt;चांदनी सी फैली है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;धरती पर बैठी&lt;br /&gt;देखती मां&lt;br /&gt;बेतहाशा चूमती है&lt;br /&gt;उसके सारे दुख और&lt;br /&gt;सपने!&lt;br /&gt;- शिरीष खरे ( क्राई में कार्यरत, मुंबई)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-6244563223316105362?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/6244563223316105362/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=6244563223316105362' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6244563223316105362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6244563223316105362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/03/blog-post_16.html' title='गोंडनी मां'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-9016318943013302231</id><published>2009-03-02T14:00:00.001-08:00</published><updated>2009-03-02T14:02:53.848-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>वसंत</title><content type='html'>गांव को जाती हुई पगडंडी पर&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;सर्दी की सुस्त परछाई को&lt;br /&gt;कल शाम घिसटते देखा था मैंने।&lt;br /&gt;पेड़ से लटक रहे थे&lt;br /&gt;आधे हरे, आधे पीले पत्ते उदास।&lt;br /&gt;पेड़ ने ज्यों देखा&lt;br /&gt;अपना पीला बीमार चेहरा,&lt;br /&gt;उद्धत होकर झाड़ दिये सब पत्ते।&lt;br /&gt;पत्ते उड़ते रहे खेत में,&lt;br /&gt;मैदान में कहते रहे अपनी व्यथा।&lt;br /&gt;डालियां कांपती रहीं देर तक,&lt;br /&gt;हिल-हिल कर वसंत को बुलाती रहीं।&lt;br /&gt;-देवांशु कुमार (न्यूज २४ में बतौर प्रोड्यूसर कार्यरत)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-9016318943013302231?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/9016318943013302231/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=9016318943013302231' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/9016318943013302231'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/9016318943013302231'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/03/blog-post_8165.html' title='वसंत'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-6419115790174365489</id><published>2009-03-02T13:55:00.000-08:00</published><updated>2009-03-02T14:00:30.675-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>पिता</title><content type='html'>मैने संस्कृति के जिस बियाबान में तुम्हें छोड़ दिया है,&lt;br /&gt;वहां तुम अपनी जड़ों को तलाशने की बात सोच भी नहीं सकते&lt;br /&gt;इसलिए तुम्हारा स्वर एकालापी हो चला है।&lt;br /&gt;हमारी भाषा में जिसे जड़ता कहते हैं,&lt;br /&gt;वह तुम्हारी पीड़ा की घनीभूत अवस्था है।&lt;br /&gt;मैं क्षितिज के पास गलते सूरज की तरह&lt;br /&gt;तुम्हें हर रोज गलते देखता हूं&lt;br /&gt;तुम्हारी आंखों में उदासी की अबूझ लिपियां&lt;br /&gt;पढ़ने की कोशिश करता हूं,&lt;br /&gt;तुम्हारे स्वरों में अंतर्द्वंद्व की ध्वनियां सुन सकता हूं,&lt;br /&gt;जिसे तुम मुस्कुराहट में कह जाते हो।&lt;br /&gt;-देवांशु कुमार, (न्यूज २४ में बतौर प्रोड्यूसर कार्यरत)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-6419115790174365489?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/6419115790174365489/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=6419115790174365489' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6419115790174365489'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/6419115790174365489'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/03/blog-post_02.html' title='पिता'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-8572927666216156779</id><published>2009-03-02T13:50:00.000-08:00</published><updated>2009-03-02T13:55:34.607-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>पगडंडियां और सड़कें</title><content type='html'>पगडंडियां अब सड़कों में मिल गई हैं।&lt;br /&gt;वे संकीर्ण थीं,&lt;br /&gt;एक बार में किसी एक राहगीर को ही जगह दे पाती थीं&lt;br /&gt;लेकिन कंधे तो टकराते थे, आखें भी मिलती थीं।&lt;br /&gt;सुबह,  दोपहर,  शाम और देर रात तक&lt;br /&gt;आने-जाने का सिलसिला चलता था।&lt;br /&gt;पगडंडियां जो गेंहू और अरहर के खेतों से&lt;br /&gt;लुकाछिपी का खेल खेलती थीं,&lt;br /&gt;रेल की पटरियों को पार कर&lt;br /&gt;दूर तलक बाजार के मुहाने तक जाती थीं,&lt;br /&gt;ज्य़ादा महफूज थीं।&lt;br /&gt;अब सड़कें खा गईं हैं इन्हें,&lt;br /&gt;जो पसर गई हैं खेत के पास-पास&lt;br /&gt;और सीधे-सीधे जुड़ गई हैं बाजार से,&lt;br /&gt;गांव से बाहर जाने का ज़रिया बनकर रह गई हैं।&lt;br /&gt;सड़कों पर अब एकतरफा यातायात&lt;br /&gt;है और गांव में उदासी की एकतानता।&lt;br /&gt;देवांशु कुमार (न्यूज २४ में बतौर प्रोड्यूसर कार्यरत)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3687459469939352706-8572927666216156779?l=khoyachand.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://khoyachand.blogspot.com/feeds/8572927666216156779/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3687459469939352706&amp;postID=8572927666216156779' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8572927666216156779'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3687459469939352706/posts/default/8572927666216156779'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://khoyachand.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='पगडंडियां और सड़कें'/><author><name>पशुपति शर्मा</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11856783167021814006</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_rty4AqLh-_E/THxbrp1nkfI/AAAAAAAAAC0/0xISkpYvK1U/S220/Image0000.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3687459469939352706.post-4989205500062693353</id><published>2009-02-25T13:57:00.000-08:00</published><updated>2009-02-25T14:01:55.925-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='असहमति का साहस'/><title type='text'>हिरन की खाल की खंजड़ी और राम कथा</title><content type='html'>"छापक पेड़ त पतवल गहबर हो। तारि ढाढि़ हरिनिया हरिना बाट जोहत हो। ,यानी पलाश के पेड़ के नीचे हिरनी अपने हिरन की राह देख रही है। हिरन ने अपनी हिरनी से पूछा- क्या तुम्हारा चरहा सूख गया या पानी के बिना तुम्हारा चेहरा मुरझा गया है। हिरनी बोली- न मेरा चरहा सूखा न पानी के बिन मेरा चेहरा मुरझाया। आज राजा जी छट्ठी है वे तुम्हें मार डालेंगे।। कौशल्या रानी मचिया पर बैठी थीं। उनसे हिरनी ने प्रार्थना की. रानी मांस तो रसोई में पक रहा है, हमें खाल दे दो। मैं पेड़ से खाल लटका लूंगी और खाल देख-देखकर मन को समझा लूंगी कि मेरा हिरन अभी जीवित है। रानी बोली-हिरनी तू अपने घर जा। हिरन की खाल से मैं अपने राम के लिए खंजड़ी मढ़वाऊंगी तो मेरे राम उससे खेलेंगे।"&lt;br /&gt;एक मशहूर पत्रकार और बौद्धिक(मुद्राराक्षस) ने इस लोककथा और सौहर के सहारे राम को खंडित करने का प्रयास किया है। विचार के केन्द्र में बीजेपी और राम हैं लेकिन आत्मा लेख की यह है कि राम महल वालों के देवता हैं । यानी बूर्जुआ। उन्हें दलितों, गरीबों से कोई मतलब नहीं था। उन्होंने लिखा है-'काश भारतीय जनता पार्टी या विश्व हिन्दू परिषद के लोग यह समझ पाते कि यह दर्द किसका है और क्यों कर है तो निश्चय़ ही इस देश के करोड़ों लोगों की तकलीफ में वे सीधे हिस्सेदारी करते। वे यह भी समझते कि राम के प्रति पेरियार के क्षोभ की वजह क्या हो सकती है।' बड़ा दिलचस्प विचार है। लेखक के मुताबिक पिछड़ों, जनजातियों और दलितों में राम तुच्छ हैं। अवध क्षेत्र में बच्चे की छट्ठी पर गाए जाने वाले इस सौहर के सहारे उन्होंने राम के पूरे व्यक्तित्व को ही खंडित कर दिया। सबसे पहली बात तो यह कि अवध के किस क्षेत्र में यह सौहर गाया जाता है उसका पता नहीं। लेकिन उन्होंने गजब के आत्मविश्वास के साथ पूरे अवध की महिलाओं के मन की बात जान ली। ये भी समझ गए कि राम सिर्फ उच्च जातियों के देवता है, आदर्श हैं।&lt;br /&gt;चलिए ये मान भी लिया कि सौहर में घोर दुख झलकता है। लेकिन इस सौहर और लोककथा का राम से क्या? उनकी माता ने हिरनी से कहा कि हिरन की खाल से खंजड़ी मढ़वाकर वो राम को देंगी, राम उससे खेलेंगे। चूंकि राम की माता को हिरनी का दर्द नजर नहीं आया इसलिए लेखक के मुताबिक राम भी बेदर्द हो गए। क्या यह बताना भी जरूरी है राम इसलिए राम नहीं थे कि कौशल्या उनकी माता थीं और दशरथ उनके पिता। चारों भाइयों में राम विशिष्ट थे और पूर्ण थे इसलिए वो महामानव हुए। उनकी विमाता कैकयी ने राम के लिए वनवास मांगा तो राम ने क्या किया ये कहने और स्पष्ट करने की जरूरत नहीं है। यह बताने की भी जरूरत नहीं है कि केवट, शबरी और अहिल्या के लिए उन्होंने क्या किया था।राम के मन में पिछड़ों के लिए कोई दर्द नहीं था इसीलिए जब वो केवट से विदाई ले रहे थे तो उन्होंने कहा- तुम मम प्रिय भरत हि सम भ्राता। क्या राम का दोष इसलिए था कि वो र
