बुधवार, 27 मई 2015

मम्मा की डायरी- कुछ पन्ने यूं हीं

17 मई की संध्या। इंडिया हैबिटेट सेंटर का केसोरिना हॉल। जब हम पहुंचे तो हॉल में गिनती के लोग। देखते ही देखते हॉल में बच्चों की शैतानियां शुरू हो गईं। मम्मियों की आंखें लाल होने लगीं और इस सबके बीच सज गया मंच- मम्मा की डायरी पर बातों के लिए। नताशा ने संचालन का जिम्मा उठाया और लेखिका अनु सिंह चौधरी ने बातों की भूमिका बांधी। एक सवाल के साथ- मैं मां न होती तो न जाने क्या होती?
औपचारिक शुरुआत दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुछ स्टुडेंट्स की बनाई फिल्म- आओगी ना मां - से हुई। संवाद के तौर तरीके चिट्ठी पत्री से बदल कर ईमेल तक पहुंचे। इस दौरान बेटी रिद्धिमा की शैतानी बढ़ी, सामने बैठे शख़्स ने नाराज़गी जाहिर की, अर्चना राजहंस ने रिद्धि को बातों में फंसाया और हम कार्यक्रम में मशगूल होने की कोशिश करते रहे।
नताशा ने पब्लिक प्लेटफॉर्म पर पर्सनल राइटिंग के चलन का जिक्र किया, उसके तमाम ख़तरों के साथ। इस सवाल के साथ कि कहीं ऐसे लेखन के जरिए माता-पिता के साथ डिसकनेक्ट को 'हील' करने की कोशिश तो नहीं। पत्रकार मंजीत ठाकुर ने मां की 'कड़ियल' छवि की अंतर्कथा शेयर की। विनीता ने अपनी मां और उनकी सास के रिश्तों से सबक लेते हुए अपनी बेटी के लिए एक प्रण का किस्सा साझा किया। उन्होंने कहा कि बेटी पर कभी हाथ न उठाने का संकल्प तो ले लिया लेकिन इसके लिए उन्हें कई बार बड़ी कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा।

वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने इस चुटकी के साथ बात शुरू की कि पत्रकारों को अब पढ़ने-लिखने की फुरसत कहां? उन्होंने कहा- मां एकतरफा प्रेम करती है। यही एकतरफा प्रेम तमाम रिश्तों के सुधरने, बनने की नींव होता है। इंद्र कुमार गुजराल से बातचीत का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ बातचीत में भी ऐसे एकतरफा प्रेम की अहमियत है। उन्होंने मां को मेडिटेशन गुरु बताया, जिनका मंत्र था- जाहे विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए।
मनीषा पांडेय ने स्त्री के जन्म देने की प्राकृतिक ताकत पर स्त्री के अधिकार की वकालत के साथ अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि महिलाओं को मां होने के लिए शादी करने की शर्त से निजात मिलनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने एक कविता भी सुनाई, जिसके जरिए अजन्मे बच्चों की मां की टीस हॉल में पसर गयी। तूलिका ने अपने पुराने दिनों की वो यादें साझा की, जो उनके लड़की होने से जुड़ीं थीं- कैसे दिल्ली आने के लिए सैकड़ों सवालों के जवाब देने पड़े, कैसे भाई न होने की वजह से रिश्ता ठुकरा दिया गया... आदि-आदि।
नीलम ने कहा कि वो अनु की किताब पढ़ने के बाद एक दिन तक 'साइलेंट मोड' में चली गईं थीं। फिल्म देखने पर 'गिल्ट' का एहसास 'मम्मा की डायरी' पढ़ते हुए ताजा हो गया। प्रियंका अपनी मां के साथ कार्यक्रम में पहुंचीं थीं। उन्होंने किताब की आख़िरी लाइनों का ज़िक्र किया- जो है बस यही पल है... ज़िंदगी डूबते-डूबते बच जाती है... बच्चों की वजह से...
रमा ने अपनी 'नालायकी' के इजहार के साथ बात शुरू की। बच्चों और पति की मौजूदगी में उन सारी बातों का जिक्र किया जो वो बकायदा नोट बना कर ले आईं थीं। उन्होंने कहा कि शादी से पहले आप चाह कर भी बच्चे नहीं ले सकतीं और शादी के बाद आप चाह कर भी बच्चे न लेने का फ़ैसला नहीं कर सकतीं। गृहस्थी में बच्चा प्रेम को अपडेट कर देता है। पति संजय की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि पहले बच्चे को तीन-तीन घंटों तक गोद में खिलाने वाले पिता भी दूसरे बच्चे के वक़्त थोड़े बदल से जाते हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों की ज़िम्मेदारी को लेकर पलायनवादी रवैया पुरुष या स्त्री किसी का नहीं होना चाहिए।
नताशा ने इस टिप्पणी के साथ चर्चा को आगे बढ़ाया कि 'नाइस-नाइस' खेलने का वक़्त नहीं है। प्रीति ने कहा कि सत्तर के दशक के बच्चों के लिए मां त्याग की मूर्ति हुआ करती थी, वो दीवार जैसी फ़िल्मों का दौर था, जहां सारे ऐशो-आराम एक तरफ और मां दूसरी तरफ। उन्होंने कहा कि जब पहली बार उन्होंने स्लीवलेस महिलाओं को सुट्टा मारते देखा तो हिंदी फिल्मों की 'वैम्प' का ख़याल ही ज़ेहन में आया। 4 साल की शादी के बाद तमाम तानों के दबाव में बच्चा लिया, लेकिन सच कहूं तो मैंने 'मदरहुड' इंज्वॉय नहीं किया। एलएसआर की मनोविज्ञान की स्टुडेंट रहीं प्रीति की स्वीकारोक्ति, कार्यक्रम का चरम ही कहा जाएगा।
अंत में अपनी मर्जी से मां नहीं बनने का विकल्प चुनने वालीं अमृता ने अपनी बातें रखीं। उन्होंने कहा कि इससे उनका मातृत्व कमतर नहीं हो गया। रिश्तेदारों के तमाम बच्चे उनसे वो सब कुछ साझा कर लेते हैं, जो वो शायद अपने मम्मी पापा से भी न करते हों। इक्का -दुक्का कुछ और टिप्पणियां हुईं और कार्यक्रम शोभा की इस गुजारिश के साथ संपन्न हुआ कि हम कुछ और ईमानदार हो जाएं... खुद को बेहतर होने की खिड़की पर खड़ा पाएं।
इस परिचर्चा ने 'मम्मा की डायरी' की खिड़कियां खोलीं... मैं, मेरी पत्नी... उनकी बहन के मन में इस घर में दाखिल होने की तमन्ना जगी। किताब का ऑर्डर किया था, जो ये टिप्पणी लिखते-लिखते दरवाजे से घर में दाखिल हो चुकी है। लेकिन बिना पढ़े भी एक पत्रकार ने (विजय त्रिवेदी के मुताबिक पढ़ने से वास्ता रखना थोड़ा मुश्किल तो है ही ) जो कुछ मन में सहेजा-समेटा वो साझा कर दिया।


पशुपति शर्मा

मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

ये दिल्ली है, ज़रा संभल कर


(आप बीती)


ये आपबीती खास तौर पर उन लोगों के लिए जो दिल्ली और एनसीआर में रहने की वजह से खुद को बिहार की तुलना में खुद ज्यादा महफूज महसूस करते हैं। (बिहार का बाशिंदा होने की वजह से तुलना का क्षेत्र बिहार चुना गया है। ) 14 अप्रैल को मेरे दो भाई (चंदन और विवेक) कुछ काम के सिलसिले में मंगोलपुरी के लिए निकले। उन्होंने बाइक से जाने का प्रस्ताव रखा तो मैंने उसे खारिज कर दिया। मेट्रो से वो पीरागढ़ी पहुंचे और फिर वहां से  पैदल मंगोलपुरी की तरफ बढ़े।

उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि मेट्रो के आसपास मंडराने वाले मोबाइल लुटेरों के एक गिरोह की निगाह उन पर पड़ चुकी है। वो मंगोलपुरी जाने के लिए फ्लाईओवर पर पैदल ही बढ़ रहे थे, तभी पीछे से एक लड़का आया। धक्का मारा और लड़ाई शुरू कर दी। विवेक के साथ हो रहे इस बर्ताव पर चंदन ने टोका तो वो लड़का पीछे हट गया। उसे डर लगा पता नहीं कितने लोग साथ हैं। जब उसे पूरी तरह इस बात की तसल्ली हो गई कि ये दो ही हैं। उसका एक और साथी वहां आ गया। अब धक्का-मुक्की और बदसलूकी का दूसरा दौर शुरू हुआ। दोनों बदमाशों ने दिन दहाड़े शाम के 4 बजे बिहार के पूर्णिया जिले से आए इन दोनों भाईयों से सैमसंग का एक मोबाइल छीना और चंपत हो गए। आगे चलकर शायद उनका कोई साथी आया और बाइक से वो आंखों से ओझल हो गए। आपकी जानकारी भर के लिए दोनों भाइयों को ज्यादा सदमा इसलिए लगा कि मोबाइल की कीमत तकरीबन 27 हज़ार रुपये थी।

मुझे ऑफिस में इस बात की सूचना मिली तो मैं कुछ देर के लिए स्तब्ध रह गया। फिर न्यूज नेशन के क्राइम रिपोर्टर रुमान उल्लाह खान से बात की। आगे की औपचारिकताएं रुमान के निर्देश पर पूरी की गईं। उनके कहे मुताबिक मंगोलपुरी थाने में एफआईआर दर्ज कर ली गई है और तफ़्तीश के लिए श्रीमान सुभाषजी को आईओ नियुक्त किया गया है।
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घटना एक नज़र में
तारीख- 14 अप्रैल 2015, शाम 4 बजे
FIR NO- 780
थाना- मंगोलपुरी
आईओ- 9871426097, सुभाषजी

घटना- पीरागढ़ी मेट्रो स्टेशन के पास मंगोलपुरी फ्लाईओवर पर मोबाइल लूट।
शिकायतकर्ता- विवेक कुमार
चश्मदीद- चंदन शर्मा

मोबाइल-
सैमसंग N7000 नोट
क़ीमत- 27 हज़ार
IEMI NO-353058056263222
नंबर- 9199518483

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

लाशें


अधजली लाशें
सड़ी लाशें
गली लाशें
लाशें ही लाशें
घाटों पर
न जाने किनकी लाशें
वो
जिन्होंने अपनों को खोया
लेकिन
नहीं जुटा पाए
चिता की लकड़ियां
नहीं जुटा पाए
पंडे की फ़ीस
मां गंगा ने
उन्हें दे दिया आसरा
आंसू की चंद बूंदों के साथ
मां को सौंप आए
अपनों की लाशें
इन लाशों के
ईद-गिर्द भटक रहा था
मोहन का मन
धड़क रहा था
सोनिया का दिल
बेचैन था
गबरू का दिमाग
मोहन, सोनिया, गबरू
न जाने कितने नाम
तैर रहे थे
गंगा की धारा में
लेकिन
इन्हें कोई शिकायत न थी शायद
मोहन, सोनिया, गबरू
जिन्होंने मौत से बदतर
जिंदगी देख रखी थी
उन्हें तो इन ठहरी लहरों में
थोड़ा सुकून ही था
लेकिन
कमजोरों और लाचारों को
कहां नसीब होता है ये सुकून
उनकी सड़ाती गंधाती लाशें भी
एक सवाल की तरह
मंडराने लगती हैं
मुसीबत बन जाती हैं
परेशान हो उठता है
एक घाट
एक शहर
एक सूबा
लाशें मौन
लेकिन
हलचल महसूस होती है
लखनऊ से दिल्ली तलक
लाशों का दर्द
सिमट आता है एक रिपोर्टर के माइक में
जिंदा हो उठती हैं लाशें
समाचार चैनलों की स्क्रीन पर
जो आंसू सूख चुके होते हैं
वो उतर आते हैं
एंकर की आंखों में
चिंता लाशों की
चिंता गांवों की
चिंता घाटों की
चिंता गंगा की
इन चिंताओं का विस्तार
हर पल के साथ होता है
टीवी की दुनिया में
समाचार के जगत में
आप महसूस करना चाहें
तो कर लें
न कर पाएं तो
इनकी बला से
ये तो लाशों को इंसाफ़
दिलाने की लड़ाई है
जिंदा लोगों के इंसाफ़ की लड़ाई
इतनी आसान कहां।
---- पशुपति शर्मा

रविवार, 4 जनवरी 2015

पीके पर 'पीके' ही कर रहे हैं हंगामा


पिछले कई दिनों से फिल्म पीके को लेकर विवाद चल रहा है। खूब हो हंगामा भी हो रहा है। शायद जो लोग हंगामा कर रहे हैं, उन्हें ये उम्मीद हो कि उन्हें भी बैठे-बिठाए 'पीके' का नाम मिल जाए, क्योंकि होश में तो ऐसी फिल्म पर हंगामा मुमकिन नहीं लगता। हंगामेबाजों को ये भी नसीब नहीं हो पा रहा, इसका उन्हें जरूर अफ़सोस होगा। हां, वो फिल्म की बिन मांगी पब्लिसिटी जरूर कर रहे हैं, जिसके लिए फिल्म की टीम को उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए।
फेस बुक पर कई साथियों ने प्रतिक्रिया दी कि अब पीके की तारीफ और उसकी आलोचना करने पर आपके सांप्रदायिक, गैर-सांप्रदायिक आदि तमगे जुड़ेंगे, फिल्म की कलात्मकता या उसके कला पक्ष की चर्चा कम होगी। ऐसा ही हो रहा है। रॉन्ग नंबर ही ज्यादा डायल हो गए हैं और रॉन्ग नंबर के ठेकेदार ही दबंगई से न्यूज रूम के स्टूडियो तक 'कांय-कांय' कर रहे हैं। खैर पीके पर सियासत करने वालों, हंगामा करने वालों को उन्हें ये फिल्म मुबारक।
पीके की कथावस्तु की बात करें तो इसमें ऐसा कुछ भी नहीं, जो हमारी आम साइकी में न हो। मंदिर से जूते चोरी, भगवान को चढ़ावा, आस्था के बिचौलिये इन सब पर तंज कसा जाता रहा है, नुक्कड़ से लेकर बड़े पर्दे तक। पीके में इसे एक साथ जमा कर सूत्र में पिरोने की कोशिश भर की गई है, जो कई मौकों पर फूहड़ सी बन पड़ी है। हिंदुस्तान एक हिंदू बहुल राष्ट्र है, हिंदू धर्म ने आलोचना का स्पेस दिया है और फिल्म ने उसका बखूबी इस्तेमाल किया है। इस पर हंगामेबाज हिंदुओं का फर्क करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने अपनी हरकतों से इसे शर्म का विषय बना लिया है। फिल्म में इस्लाम, ईसाई और सिखों के कुछ दृश्य मानो इसलिए जोड़ दिए गए हैं, ताकि एक संतुलन दिखे। जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। एक वक्त में एक तबके पर भी तंज कसते तो कोई ऐतराज न था।
निर्देशक या कथाकार ने दूसरे ग्रह के प्राणी को इस संदेश को देने के लिए क्यों चुना, ये भी समझ से परे है। एक बड़े कान और दूसरे हाथ पकड़कर मन पढ़ने की शक्ति के अलावा पीके में ऐसी कोई खूबी नहीं थी, जिससे दूसरे ग्रह के प्राणी को बुलाने की जरूरत आन पड़ी हो। फिल्म कई तरह के सरलीकरण का शिकार हो गई है। बोली के लिहाज से 'लालू स्टाइल' या 'बिहारी स्टाइल' का चुनाव कर निर्देशक ने बतौर अभिनेता आमिर खान की चुनौती कम ही कर दी। इसके अलावा जब हाथ पकड़ कर ही बोली सीखनी थी तो कुछ और बोलियां भी केरेक्टर पर आजमाई जा सकती थीं। क्षेपक के तौर पर सेक्स को भी हास्य का विषय बनाया गया है। हिलने वाली कार या कंडोम वाले दृश्यों का इस्तेमाल भी एक दूसरे तरह का सरलीकरण है, जिसके विकल्प निर्देशक को तलाशने चाहिए थे। लॉकेट का गायब होना और फिर चोर के पकड़े जाने पर वापसी के दौरान बम विस्फोट जैसे दृश्य अति नाटकीय हैं।
अभिनय के लिहाज से आमिर खान अपनी पुरानी फिल्मों से एक कदम आगे बढ़ते नज़र नहीं आते। अनुष्का शर्मा जरूर अपनी भूमिका में असर पैदा कर पाईं हैं। बतौर रिपोर्टर, एंकर उन्होंने अपने किरदार को जी लिया है। नृत्य की बात करें तो पीके और संजय दत्त दोनों के स्टेप्स अच्छे लगते हैं। फिल्म टुकड़ों-टुकड़ों में निराश करती हुई टुकड़ों-टुकड़ों में ही अपना स्पेस तलाशती है ।
पशुपति शर्मा

शनिवार, 18 अक्टूबर 2014

ये दाढ़ी कुछ तो कहती है


तीन दिन से तबीयत खराब है, सो दफ्तर जाना हो नहीं पाया। इन तीन दिनों में बहुत पुराने साथियों ने हौले-हौले से अपनी जगह हासिल कर ली। पत्नी को उनसे चिढ़ है और मुझे लगाव। पत्नी को चिढ़ इसलिए कि वो मेरी पर्सनालिटी को बिगाड़ देते हैं, और मुझे प्यार इसलिए कि वो लंबे वक्त तक मेरे व्यक्तित्वका हिस्सा रहे हैं। बात चेहरे पर उग आए उन काले-सफेद बालों के जो एक खिचड़ी से हो गए हैं, ठीक वैसे ही जैसे मन।

हाथ दाढ़ियों पर जाते हैं तो बड़ा सुकून महसूस होता है। इन दाढ़ियों के साथ काफी लंबी यादें जुड़ी हैं। पहली बार जब स्कूल के दिनों में गालों पर इक्का दुक्का बाल उगे तो कैसा महसूस हुआ, ठीक से याद नहीं। हां, जब गाल पर घने और काले बालों ने ठीक-ठाक बसेरा बना लिया तो अच्छा लगने लगा। मां ने कभी मना नहीं किया। पिता, जो बाकियों को बढ़ी दाढ़ी के लिए डांटते-फटकारते रहे थे, उन्होंने कभी-कभार ही चेहरे की रंगत सुधार लेने की नसीहत दी। कुल मुलाकर इन दाढ़ियों पर वैसी आफत नहीं टूटी कि उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए।

फिर भोपाल पहुंचे। इक्का-दुक्का मौकों को छोड़ दें तो दाढ़ी बदस्तूर गालों पर कायम रही। ये जो कल से कुछ लिखने को जी मचल रहा है, वो कुछ उन्हीं यादों के सहारे भी तो है। इन दाढ़ियों के साथ कई नाटकों की प्रस्तुतियांकीं। दस्तक के हम उम्र साथियों के बीच शायद दाढ़ियों ने समय से पहले मुझे थोड़ा बुजुर्गबना डाला था। बड़ी सी दाढ़ियां तब तक कई बार घुंघराली शक्ल ले लेती। तब चश्मे का फ्रेमभी गोल और बड़ा गोल था। हड्डियों पर मांस को बसेरा बनाने का वक्त मिलता नहीं था। पहली नज़र में बीमार समझ लिए जाने की गुंजाइश रहती थी लेकिन मन था कि कुलांचे मारता रहता। परवाह कहां थी, न मुझे, न दाढ़ियों को।

दिल्ली आए, अखबार के दिनों तक फिर भी दाढ़ी को कभी कभार मौका मिल जाया करता था, अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का लेकिन चैनलों की नौकरी ने उसे ये मौके देने भी बंद कर दिए। हां, आप वाकई बीमार पड़ जाएं, हिम्मत न हो तो दो चार दिनों के लिए दाढ़ी से याराना गांठ सकते हैं। कुछ घंटों में इन काले-उजरे बालों की विदाई हो जाएगी, लेकिन अभी तो यही मुझे अरसे बाद कुछ बतियाने का मौका दे रहे हैं।
खुद में खोए, खुद को ढूंढते दाढ़ीदार पशुपति का गुनाह माफ हो तो कुछ तस्वीरें बीच-बीच में चस्पां हैं, ख़ास आपके लिए।
-पशुपति 

सोमवार, 18 अगस्त 2014

'मोनालिसा की आंखों' के नाम एक दोपहर


नूतन डिमरी गैरोला के फेसबुक वॉल से साभार

सईद भाई का बुलावा। कवि गोष्ठी में जाऊँ या न जाऊँ, इसको लेकर असमंजस। गर्दन में दर्द की वजह से पत्नी की ना और सुभाषजी को दे दिया गया वचन। इस ‘हाँ और ना के द्वंद्व के बीच ही सुभाषजी का फोन आया और मैं पतलून और शर्ट डालकर निकल पड़ा। सुभाषजी की 'चौपहिया सेवा' ने ‘ना’ को ‘हाँ’ में तब्दील करने में बड़ी भूमिका निभाई। हम तीन बजते-बजते कवयित्री मीता पन्त के आवास आरके पुरम, सेक्टर 10 निवेदिता कुंज के जी-32 में दाखिल हो गए। वहाँ सुमन केशरी मैम थीं और साथ में पुरुषोत्तम अग्रवाल सर। कमरे में कई और भी लोग थे, लेकिन अग्रवाल सर की मौजूदगी एक सुखद आश्चर्य की तरह थी।

बहरहाल, सवा 3 बजते-बजते कार्यक्रम की शुरुआत हुई। परिचय का औपचारिक सत्र। सीमांत सोहल से आनंद कुमार शुक्ल तक सभी का सईद भाई ने अपने अंदाज में परिचय दिया, परिचय कराया। जहाँ मौका मिला, वहाँ चुहलबाजी से भी परहेज नहीं किया। ये बेतकल्लुफी ही इस तरह की अनौपचारिक गोष्ठियों को कुछ और यादगार बना जाती हैं।

काव्य गोष्ठी की शुरुआत पंखुरी सिन्हा की कविताओं से हुई। एक यायावर की झलक समेटे कुछ कविताएँ। आवाज़ की समस्या के बीच ही वो आगंतुक, अकेली औरत, तानाशाह जैसी कुछ कविताओं का पाठ कर गईं। इसके बाद जेएनयू के शोधार्थी बृजेश कुमार ने मैं एक गांव हूं, दूध और सीट कविताएं सुनाईं। उत्तराखंड से आईं डॉक्टर नूतन डिमरी गैरोला ने भिक्षुणी, प्रत्यंचा और माँ के जरिए अपने अनुभव साझा किए। भारत भूषण अग्रवाल सम्मान से सम्मानित कुमार अनुपम बरसाती में जागरण, जल, काला पानी और अशीर्षक जैसी कविताओं के जरिए श्रोताओं को किसी और ही धरातल पर लेकर चले गए। रमा भारती की कविताओं ने चिनाब और चिनार की खूबसूरत लहरों का एहसास कराया। कर्मनाशा नदी के ईर्द-गिर्द रहने वाले 'राजेश खन्ना' सिद्धेश्वर सिंह ने 'कटी पतंग' के साथ काव्य गोष्ठी को नई 'उड़ान' दी। लकड़ बाज़ार, निर्मल वर्मा के शीर्षकों को कविताओं में इस खूबसूरती से पिरोया कि मन ठहर सा गया और पंखुरी सिन्हा के हस्तक्षेप पर उनका एक मीठा सा जवाब- 'हम सभी अपने-अपने वक्त के राजेश खन्ना हैं’ हमेशा याद रहेगा। अरुण देव ने  'घड़ी के हाथ पर समय का भार' जैसी सुंदर कविता के साथ मन की कई 'खिड़कियां' खोल दीं। उनकी आवाज़ की कशिश कविता को कुछ और मानीखेज बना रही थी।

और अंत में सुमन केशरी। थोड़ा सा 'सईद' बनने की ललक के साथ कविताओं का पाठ शुरू किया। रावण, कबीर-अबीर, तथागत, लोहे के पुतले, बहाने से जीवन जीती है औरत, तमगे, मोनालिसा और ऐसी ही कई कविताएँ। कभी मिथकीय आवरण लिए तो कभी आज का जीवन समेटे- स्त्री मन को छूती हुई, पुरुष मन को झकझोरती हुई छोटे से कमरे में इस वक्त तक कविता रेगिस्तान की रेत पर अपना 'घरौंदा' बना चुकी थीं, जिसमें हम सभी 'टीस भरा सुकून' महसूस कर रहे थे।

ये बिलकुल सही वक़्त था जब सईद भाई ने काव्य गोष्ठी को थोड़ा सा विराम दे दिया। मीता पंत ने तब तक समोसे, बिस्किट, नमकीन की मेज़ सजा डाली थी। समय ऐसा था कि हम ज्यादा इंतज़ार न कर सके और टूट ही पड़े। कुछ साथियों ने चाय की चुस्कियां ली। पुरुषोत्तम अग्रवाल सर ने सईद जी को चाय में देरी पर आंदोलन की धमकी तक दे डाली। इन सबके बीच जेएनयू के कुछ पुराने साथियों से गुफ्तगू।

अब वक्त था सुमन केशरी के काव्य संग्रह 'मोनालिसा की आंखें' पर परिचर्चा का। सुमन केशरी की काव्य यात्रा पर एक नज़र डालने की औपचारिक जिम्मेदारी अरुण देव ने निभाई। अरुण देव के मुताबिक सुमन केशरी की कविताएं विचार के रेडिमेड कपड़े नहीं पहनती। केशरी जी कविता की यात्रा पर हैं, किसी मंजिल पर नहीं पहुंची, ये उनके रचना संसार का एक सुखद पहलू है। अरुण देव जी ने शमशेर बहादुर सिंह के एक लेख का जिक्र किया, और उस लेख में वर्णित कसौटियों पर सुमन केशरी के काव्य संसार को कसना शुरू किया। आधुनिक विकास के अध्येता, देश विदेश के साहित्य से परिचय और हिंदी ऊर्दू की परंपरा का ज्ञान के निकष पर एक महान कवयित्री के संकेतों का जिक्र किया। उन्होंने सुमन केशरी की यात्रा को ज्ञानात्मक संवेदना से संवेदनात्मक ज्ञान की ओर मुखर बताया। उनकी नज़र में सुमन केशरी सचेत स्त्री की दृष्टि से मिथकों को देखती हैं। आलोचनात्मक दृष्टि से मिथकों का सृजनात्मक पाठ तैयार करती हैं। यह सचेत स्त्री सिमोन द बोउवार से प्रभावित नहीं है बल्कि मीरा और महादेवी से अपनी संवेदना ग्रहण करती है।
नूतन डिमरी गैरोला के फेसबुक वॉल से जहां मैं वाया मुकेश जी के पहुंचा।

इस आलेख के बाद विमर्श सवाल जवाब की तरफ बढ़ा। पंखुरी सिन्हा ने केशरी के कर्ण और दिनकर के कर्ण का अंतर पूछा तो वहीं पुरुषोत्तम अग्रवाल ने ऐसे सवालों के उत्तर खुद पाठकों को तलाश करने की नसीहत दे डाली। सिद्धेश्वर सिंह ने कवि को प्रेस कॉन्फ्रेंस की तरह सवाल जवाब के दौर में फंसाने पर चुटकी ली। वहीं नूतन जी ने 'मोनालिसा की आंखें' शीर्षक पर एक मार्मिक सा सवाल पूछ डाला। सुमन केशरी सृजन प्रक्रिया के 'एकांत' में पहुँच गईं। बेहद निजी क्षण। दफ्तर में तमाम लोगों के बीच अधिकारी की डाँट। आंखों में अटके आँसू। और उस दौरान एक कविता का सृजन। मोनालिसा की ये डबडबाई आंखें ही कवयित्री से संवाद करती हैं, बतियाती हैं, अपना दर्द साझा करती हैं। यही वजह है कि जिस मोनालिसा की मुस्कान पर नज़रें टिकती हैं, उस मोनालिसा की आंखों से गुजरती हुई सुमन केशरी एक काव्य यात्रा पर निकल पड़ती हैं।

- पशुपति शर्मा

गुरुवार, 26 जून 2014

मीडिया की निष्पक्षता के अपने-अपने मायने


(विनय स्मृति व्याख्यानमाला-5)


नई दिल्ली के दीन दयाल उपाध्याय मार्ग स्थित जवाहरलाल नेहरू नेशनल यूथ सेंटर पर 22 जून 2014 की दोपहर एक-एक कर पत्रकार साथियों का जुटान शुरू हो गया। विनय तरुण की स्मृति में ये पांचवां आयोजन था। पांच साल पहले विनय के असामयिक निधन से जो साथी सदमे में थे, वो अब विनय की यादों के बहाने साल में एक बार जमा होकर अपना मन टटोलते हैं, कि सादगी और सच्चाई कितनी बाकी है, उस पौधे में थोड़ा पानी डाल लेते हैं। प्रगतिशील मीडियाकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों के संगठन दस्तक की ओर से आयोजित कार्यक्रम के पहले सत्र में साथियों ने  अनौपचारिक तौर पर कुछ बातें शेयर की।

4 बजते-बजते चाय का स्टॉल लग गया, दूसरे सत्र के वक्ताओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया और कार्यक्रम अपने औपचारिक चरण की तरफ बढ़ चला। वक्ताओं में सबसे पहले आनंद प्रधान सभागृह में दाखिल हुए। फिर अध्यक्ष महोदय डॉक्टर पुरुषोत्तम अग्रवाल। मंच संचालक पुष्पेंद्र पाल सिंह पहले से मौजूद थे ही, आयोजक आश्वस्त हो गये। चाय की चुस्कियों के बीच मीडिया से जुड़े साथी कुछ निजी और कुछ वैचारिक द्वंद्व शेयर करते रहे। इस बीच सीढ़ियां चढ़ते वयोवृद्ध वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय भी हॉल में दाखिल हुए। लिफ्ट पहली मंजिल पर अटकी तो यूथ सेंटर के कर्मचारियों ने फिर इसकी सुध नहीं ली। दो वक्ता, सतीश के सिंह और भाषा सिंह आने शेष थे लेकिन अध्यक्ष महोदय ने नियत समय पर कार्यक्रम शुरू कर देने का इशारा कर दिया।

साढ़े चार बजते ही दस्तक परिवार की साथी और आयोजन के संयोजक की भूमिका संभाल रहीं शेफाली चतुर्वेदी ने विनय तरुण की यादें शेयर की, अतिथियों का स्वागत किया और मंच माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक पुष्पेंद्र पाल सिंह के हवाले कर दिया। मीडिया चुनाव और निष्पक्षता पर औपचारिक परिचर्चा शुरू हो गई। मंच संचालन और आधार वक्तव्य की दोहरी जिम्मेदारी को सहजता से स्वीकार करते हुए पुष्पेंद्र पाल सिंह ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि निष्पक्षता के शाब्दिक अर्थ पर जाएं तो ये पूर्वाग्रह से ग्रस्त हुए बिना, किसी के प्रभाव के दबाव में आए बिना और तटस्थता के साथ अपनी बात रखना है। उन्होंने कहा कि आर्थिक और राजनीतिक दबावों के बीच इस निष्पक्षता को बनाए रखना एक चुनौती है। 2014 के चुनावों के दौरान एक बड़े मीडिया हाउस के मार्केटिंग टीम को जारी सर्कुलर के जरिए उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाई। मीडिया हाउस ने अपनी मार्केटिंग टीम और संपादकीय टीम को ये निर्देश दिया कि हर चुनाव क्षेत्र के हर उम्मीदवार में चुनाव के आखिरी दौर तक जीत की उम्मीद कायम रखनी है ताकि विज्ञापन का सिलसिला अंतिम घड़ी तक जारी रहे। जाहिर है इसका पालन किया गया और खबरों के प्रस्तुतिकरण में सभी उम्मीदवारों को लगभग बराबर का स्पेस देकर चुनावी फाइट में अपने फायदे के लिए बनाए रखने का तिकड़म चलता रहा।


पहले वक्ता के तौर पर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के व्याख्याता आनंद प्रधान ने विनय तरुण की स्मृति को प्रणाम करते हुए अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा, हिन्दी पत्रकारिता का चरित्र विनय तरुण जैसे एक्टीविस्ट पत्रकार ही बनाते हैं। सामाजिक सक्रियता और पत्रकारिता का तालमेल बना रहना एक सुखद विषय है। मैं निष्पक्षता की यांत्रिक अवधारणा के विरुद्ध हूं। प्रोफेशनलिज्म के नाम पर निष्पक्षता थोपी जा रही है। कोई भी पत्रकार निष्पक्ष नहीं हो सकता, हां रिपोर्टिंग का तौर तरीका जरूर ऑब्जेक्टिव होना चाहिए।

आनंद प्रधान ने परिचर्चा के दौरान 'मीडियाटाइज्ड पॉलिटिक्स' के जुमले के जरिए अपनी बात आगे बढ़ाई। पॉलिटिकल पार्टी और आम लोगों के बीच मीडिया अब मध्यस्थ की भूमिका में आ चुका है। मीडिया इन दोनों के रिश्तों को तय करने में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। टेलीविजन पर दिखने वाले नेता, बिना जनाधार के ही रातों रात राष्ट्रीय नेता बन जा रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने चुनावों के दौरान इवेंट कवरेज पर भी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि मीडिया एटेंशन हासिल करने के लिए पार्टियां अब इवेंट क्रिएट करने के फॉर्मूले पर काम कर रही हैं। नेताओं के लुक से लेकर कैमरा एंगल तक सियासी पार्टियों के वॉर रूम में बैठे एक्सपर्ट तय कर रहे हैं। उत्पादित मुद्दों पर प्राइम टाइम चैनलों में बहस हो रही है।

आउटलुक की सहायक संपादक भाषा सिंह ने कहा कि पत्रकार में निष्पक्षता नहीं होनी चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी ये पता लगाना है कि मौजूदा चुनावों में पत्रकारों और मीडिया घरानों की पक्षधरता कहां रही। मीडिया कॉरपोरेट पूंजी का जरिया बन चुका है और उनके हितों का असर चुनावी कवरेज पर पड़ना लाजिमी है। चुनाव परिणाम के आने के साथ ही मीडिया हाउसेस की शेयर होल्डिंग बदलती है, खरीद फरोख़्त शुरू हो जाती है। नई सरकार के दागी मंत्रियों पर खामोशी, फेसबुक कमेंट पर गिरफ़्तारियों पर बेशर्म सी चुप्पी ये एक अनकहे नेक्सस का ही नतीजा माना जा सकता है। थ्रेट टू इकॉनॉमिक सेक्युरिटी, नेशनल इंटरेस्ट जैसे नए जुमले उछालकर नई सरकार विरोध के स्वर दबाने का एक टूल बना रही है, जिस पर सवाल न उठना एक खतरनाक संकेत है।

लाइव इंडिया के ग्रुप एडिटर इन चीफ़ सतीश के सिंह ने खुद पर तंज के साथ माहौल को थोड़ा हलका किया। उन्होंने कहा कि गंभीर मुद्दे पर छिछले माध्यम के प्रतिनिधि के तौर पर बात शुरू कर रहा हूं। उन्होंने पक्षधरता में स्वच्छता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पत्रकार में स्वच्छ निष्पक्षता होनी चाहिए। आनंद प्रधान ने चुनावी कवरेज के जरिए बाय-पोलर पॉलिटिक्स का माहौल बनाने के लिए मीडिया की भूमिका पर जो सवाल उठाये थे, सतीश के सिंह ने उस चर्चा को आगे बढ़ाया। सतीश के सिंह ने कहा कि मीडिया की भूमिका है लेकिन वो सीमित है। अगर ऐसा न होता तो बायपोलर पॉलिटिक्स का तथाकथित मुहावरा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और ओडिशा में बेअसर न हो जाता। इसी सिलसिले में उन्होंने दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सफलता का भी जिक्र किया। सतीश के सिंह ने कहा कि जिस मीडिया पर मोदी का जरूरत से ज्यादा कवरेज करने का आरोप लग रहा है, उसी मीडिया ने 'महंगे दिन आ गए' की रिपोर्टिंग के जरिए मोदी सरकार पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। सतीश के सिंह ने सभाकक्ष में मौजूद युवा साथियों से एक पीआईएल के जरिए चुनावी खर्चों पर श्वेत पत्र की मांग करने का सुझाव भी दिया।

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने विनय तरुण की स्मृति को प्रणाम किया। इसके बाद उन्होंने ओशो से किए गए एक सवाल को सामने रखा- सत्य क्या है? इस पर ओशो का जवाब था-'सत्य बताया नहीं जा सकता, उसके रास्ते बताए जा सकते हैं, उसे अनुभव किया जा सकता है।' रामबहादुर राय ने इस जवाब को मौजूदा विषय से जोड़ा- करीब-करीब यही स्थिति निष्पक्षता के साथ भी है। रामबहादुर राय के मुताबिक पत्रकार का काम किसी का झंडा ढोना नहीं है। पत्रकार के लिए पत्रकार होना जरूरी है जबकि मालिक का लक्ष्य उसे एक 'मीडिया' भर बनाने का होता है।

पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के एक धड़े द्वारा मोदी की जीत को नकारने पर रामबहादुर राय ने सवाल उठाए। उन्होंने इस तरह के विश्लेषण पर तिरछी निगाहें डालीं कि 2014 के चुनाव में 69 फ़ीसदी लोगों ने मोदी को रिजेक्ट किया। उन्होंने मोदी की जीत को कॉरपोरेट हाउसेस की जीत बताने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ये अनकहा नियम है कि कॉरपोरेट घराने सत्तारुढ़ दल को ज्यादा पैसा देते हैं और विपक्ष  को कम। रामबहादुर राय ने चुनावों में किए गए खर्च की हेराफेरी पर भी चिंता जाहिर की। उन्होंने इस लिहाज से केजरीवाल को भी ईमानदार मानने से इंकार कर दिया। रामबहादुर राय के मुताबिक बनारस में केजरीवाल ने अपने चुनावी खर्चे का सही-सही ब्यौरा आयोग को नहीं दिया।

डॉक्टर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने 50 मिनट की क्लास की अपनी आदत और टेलीविजन के 20 सेकंड में बात रखने के विरोधाभासी चरित्र पर चुटकी के साथ माइक संभाला। उन्होंने मीडिया पर बात करने का हक सिर्फ मीडियाकर्मियों को देने से इंकार कर दिया, क्योंकि इसकी जद में हर व्यक्ति आता है, शहर से गांव तक हर किसी के जीवन को मीडिया प्रभावित करता है। मीडिया की निष्पक्षता को असंभव मानने से इंकार करते हुए उन्होंने राजेंद्र माथुर का जिक्र किया, जिन्होंने वीपी समर्थक होने के बावजूद उनके ख़िलाफ़ लिखे जाने वाले तमाम लेखों को अखबार में जगह दी। न्यूज और व्यूज में फर्क करने की जरूरत को पुरुषोत्तम अग्रवाल ने रेखांकित तो किया लेकिन इस सीमा के साथ कि टेलीविजन में ये इतनी आसानी से मुमकिन नहीं। उन्होंने कहा कि एक वो दौर था जब सेठ- 'अखबार अखबार की तरह चलेगा, और कारोबार कारोबार की तरह' की सोच रखते थे, लेकिन अब अखबार को कारोबार की तरह चलाने का चलन आ गया है। पुरुषोत्तम अग्रवाल के मुताबिक टेलीविजन की थोथी पकड़ ने लोगों के जीवन में गहरी समस्या पैदा की है। चैनल ने लोगों से उनका एकांत छीन लिया है।

परिचर्चा के बीच में कुछ सवालों का दौर भी चला। कुंदन शशिराज ने एक निजी चैनल की एंकर तनु शर्मा की खुदकुशी की कोशिश और उस पर मीडिया हाउसेस में पसरे सन्नाटे का सवाल भी छेड़ा। सतीश के सिंह ने इस पर मीडिया की सीमाओं का जिक्र किया तो वहीं आनंद प्रधान ने कहा- कुछ सवालों में उनके जवाब भी निहित होते हैं। एबीपी के संदीप ने भी हस्तक्षेप किया।

कुछ और साथी सवालों की बारी का इंतज़ार करते रहे और समय की सीमा को देखते हुए धन्यवाद ज्ञापन के लिए अनुराग द्वारी ने माइक थाम लिया। विनय की यादें, गीत के दो बोल, फिर एक और चाय का बुलावा।

पशुपति शर्मा
8826972867


सोमवार, 30 सितंबर 2013

शिरीष खरे की पुस्तक 'तहकीकात' का विमोचन

इंदौर. युवा पत्रकार और मध्य प्रदेश में तहलका के वरिष्ठ संवाददाता शिरीष खरे की खोजी पत्रकारिता पर आधारित पहली पुस्तक ‘तहकीकात’ का विमोचन किया गया. इस दौरान देश के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई, दूरदर्शन के महाप्रबंधक त्रिपुरारी शरण, जाने-माने न्यूज एंकर आशुतोष, एक्सचेंज फॉर मीडिया के संपादक अनुराग बत्रा, सकाल (मराठी) के सलाहकार संपादक विजय नायक, नई दुनिया के समूह संपादक श्रवण गर्ग, अजय उपाध्याय, सुरेश बाफना और सीमा मुस्तफा जैसी हस्तियां मौजूद थीं. ‘तहकीकात’ पुस्तक में मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई बड़े घोटालों के खुलासों से जुड़ी बातों पर प्रकाश डाला गया है. यह पुस्तक युवा पत्रकार की उन विशेष रिपोर्टों पर आधारित हैं जो उन्होंने बीते दो सालों के दौरान इन राज्यों में पत्रकारिता करते हुए तैयार की हैं. इसमें खास तौर से इन राज्यों के राजनीतिक मूल्यों में आई गिरावट को समझने की कोशिश की गई है और उन्हें संदर्भों सहित रखा गया है.

गौरतलब है कि मीडिया के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी यह सभी हस्तियां  इंदौर के होटल फॉरच्यून लेंड मार्क में इंदौर प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित ‘पत्रकारिता की नई चुनौतियां’ में शामिल हुई थीं. इस दौरान उन्होंने खास तौर से युवा पत्रकारों के सामने आ रही चुनौतियों को लेकर अपने अनुभव और विचारों को भी लोगों के साथ साझा किया.

पुस्तक के बारे में :
'तहकीकात' यह पुस्तक मुखौटों के पीछे का ऐसा सच है जिसमें रिपोर्ट दर रिपोर्ट कई बड़े घोटालों का खुलासा हुआ है. साथ ही भ्रष्ट व्यवस्था के ऊंचे सोपान पर बैठे व्यक्तियों के दोहरे चरित्र की पड़ताल भी की गई है. यह पुस्तक मुख्यतः उन विशेष रिपोर्टों पर आधारित है जो लेखक ने बीते दो सालों में मध्य प्रदेश और राजस्थान रहते हुए लिखी थीं. अपने समय की तस्वीरें बताती हैं कि देश के विकसित होते इन राज्यों में आर्थिक घटनाक्रम किस तेजी से बदल रहा है. इसकी वजह से खास तौर पर राजनीतिक मूल्यों में किस हद तक गिरावट आई है. रिपोर्टिंग के पीछे मकसद था कि ऐसी स्थितियों की प्रक्रियाओं को जाना जाए और उन्हें संदर्भ के रुप में रखा जाए. दूसरे शब्दों में यह अपने समय का लघु दस्तावेज है. एक युवा पत्रकार के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है कि पत्रकारिता के पहले ही दौर में उसने जो लिखा उसकी गूंज सियासी गलियारों से लेकर सदन तक हुई. इस मामले में मध्य प्रदेश के साथ ही राजस्थान के उन संस्कारों का धन्यवाद जहां असली शक्ल दिखाने के बावजूद आईना तोड़ने का चलन अभी पनपा नहीं है. उम्मीद है कि यह प्रयास अपने समय के मुद्दों को संदर्भ और विश्लेषण के साथ समझने में मदद करेगा.

लेखक के बारे में :
जनपक्षीय पत्रकारिता में बीते बारह सालों से सक्रिय. इस दौरान दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के गांवों को देखा-समझा. गरीबी, समाज के उत्पीडि़त वर्ग पर होने वाले अत्याचारों और सत्ता के ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की अराजकता की वजह से आम आदमी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को पत्रकारिता का विषय बनाया. 2002 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विष्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त की. प्रतिष्ठित लाडली मीडिया पुरस्कार और सेंट्रल स्टडी ऑफ डवल्पमेंट सोसाइटी, नई दिल्ली द्वारा मीडिया फेलोशिप सम्मान.
(मेल से प्राप्त... इसे विज्ञप्ति की श्रेणी में रखा जा सकता है।)

बुधवार, 10 जुलाई 2013

केसला के वो दो दिन

सुखतवा, केसला के जंगलों को रात के अंधेरे में चीरती हुई हमारी गाड़ी रात करीब डेढ से दो बजे के बीच प्रदान के कैंपस में पहुंची। पेट में चूहे दौड़ रहे थे और उनींदी सी रोली शिवहरे पुरानी चिरपरिचित गर्मजोशी से सभी साथियों का स्वागत कर रहीं थीं। बावजूद इसके इतनी रात गए ये बेतकल्लुफी कौन करता... कौन ये कहता कि हमें भूख भी लग रही है, सो हम सभी अपने-अपने कमरों में जा विराजे। कुछ देर बाद अखलाक ने मेरा दरवाजा खटखटाया, वो बिस्किट का एक डिब्बा कहीं से जुगाड़ लाया था। तब तक मैं भी अपने बैग से बिस्किट के एक आध-पैकेट ढूंढ चुका था। खैर, दो चार बिस्किट चबाए, पानी गटका और सो गए।
 


सुबह नींद खुली तो... सतपुड़ा के जंगलों का पिछले साल सा एहसास। आंखें रूम के कमरों से ही वो पंडाल भी ढूंढने लगीं जो पचमढ़ी में तना था। नास्ता हुआ और कुछ देर बाद हम उस हॉल में जा पहुंचे, जहां सातवां विकास संवाद शुरू हो चुका था। साथियों के परिचय का सिलसिला जारी था। सत्र की औपचारिक शुरुआत के साथ ही संचालक चिन्मय मिश्र ने वो बात कह डाली, जो मन में उमड़-घुमड़ रही थी- पचमढ़ी का एक्सटेंशन है केसला। सच, वही सतपुड़ा की पहाड़ियां और वैसे ही सघन सत्र। बंदरों की धींगामुश्ती इस बार के सत्रों में व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पाई क्योंकि पंडाल का विस्तार प्रदान के पक्के सभागृह में तब्दील था।

सुनील भाई ने 'संघर्षों के राष्ट्रीय संदर्भ' से अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि निराशाजनक संकेतों के साथ ही आशाजनक संकेत भी मिल रहे हैं। विकास के मौजूदा ढांचे और उसके गुणगान पर उन्होंने सवाल उठाए। विकास की बलि चढ़ने वाले लोग कोई और हैं और उनका फायदा गिनाने वाले कोई और। मीडिया के चरित्र की विडंबना को उन्होंने रेखांकित किया। नक्सली आंदोलन में जब बड़ी हिंसात्मक घटना होती है तो पूरा मीडिया उस पर टूट पड़ता है लेकिन अहिंसक तरीके से चलने वाले आंदोलन और अनशन के कवरेज की मीडिया को फुर्सत नहीं होती। 'शक्तिमान' परियोजना के उद्धाटन की मिसाल पेश करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान मुकेश खन्ना की मौजूदगी का 'स्टार कवरेज' हुआ लेकिन परियोजना का विरोध कर रहे लोगों, उनके धरने और उनकी गिरफ्तारी के लिए एक दो लाइन लिखना भी पत्रकारों ने मुनासिब नहीं समझा। मंच से उन्होंने अन्ना और उनके साथियों के लिए एक सवाल भी उछाल दिया- भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन को व्यापक कवरेज मिली लेकिन आंदोलनकारियों ने इसके बाद भ्रष्टाचार की जड़ें कहां हैं, इस पर कोई सेमिनार क्यों नहीं करवाया?

'संवैधानिक तंत्र का बदलता चेहरा' विषय पर परिचर्चा की शुरुआत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति वी के कुठियालाजी की 'सुख की अनुभूति' के साथ हुई। कुठियालाजी ने अपने व्याख्यान को इतने आयाम और इतना विस्तार दे दिया कि उनकी 'सुख की अनुभूति' में श्रोता अपने लिए 'सुख' तलाशते रह गए। स्वतंत्रता प्राप्ति का नशा ख़त्म होने के बाद के लोगों के इस जमावड़े के सामने उन्होंने मछलियों को डूबने से बचाने के बंदर के प्रयास की मिसाल रखी। वैज्ञानिक विकास, हरित क्रांति, न्यूक्लियर विकास से लेकर क्रायोजेनिक ईंजन तक कई मोर्चों पर मिली विजय को उन्होंने बड़ी उपलब्धि बताया। मनुष्य के नवजात शिशु को उन्होंने सबसे ज्यादा हेल्पलेस प्राणी करार दिया और इस सिलसिले में संवाद की महती भूमिका को रेखांकित किया।

संचालक चिन्मय मिश्र ने रवीन्द्र नाथ टैगोर की एक कविता से कुठियालाजी के भाषण का समअप किया, लेकिन इस दौरान माइक ने व्यवधान पैदा कर दिया। तभी भीड़ से एक जुमला उछला- 'ये वर्तमान मीडिया की कविता है।' हल्की-फुल्की टिप्पणियों के इस मिजाज को अगले वक्ता अनिल बैरवाल ने अपने अंदाज में 'मैनटेन' किये रखा। हॉल में बैठे एक साथी की टी शर्ट पर लिखी चंद लाइनों पर उनकी नज़रें जा टिकीं- 'लव इज़ लाइक चाइनीज़ मोबाइल, नो गारंटी।' इसे उन्होंने विस्तार दे दिया- 'पॉलिटिक्स इज़ लाइक चाइनीज़ मोबाइल, नो गारंटी।' हालांकि उनका अपना ऑब्जर्बेशन कुछ ऐसा है कि आज़ादी के पहले प्यार और पॉलीटिक्स दोनों ही चाइनीज़ मोबाइल की तरह नहीं थे।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच, जैसे मिनी मूवमेंट चला रहे अनिल बैरवाल ने बातों ही बातों में मौजूदा राजनीतिक तंत्र और राजनेताओं की कुंठाओं और विंडबनाओं को भी बेपर्दा करना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि कैसे संसद में एक दूसरे के ख़िलाफ़ हो-हंगामा मचाने वाले राजनीतिक दल, तब एक सुर में बातें करने लगते हैं, जब उनकी जवाबदेही तय करने का सवाल सामने आता है। 1991 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने एक पीआईएल दायर कर चुनावी मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने की मांग उठाई थी। साल 2002 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मांग को जायज ठहराया। सारे राजनीतिक दल इस मुद्दे पर एक हो गए और हाईकोर्ट के फ़ैसले को बेअसर करने के लिए एक अध्यादेश लेकर आए। राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार इस पर हस्ताक्षर नहीं किया, तो कैबिनेट ने दोबारा इसे उनके पास भेजा। हालांकि सरकारी ये कोशिशें सुप्रीम कोर्ट में जाकर बेकार साबित हुईं। राजनेताओं को जवाबदेह बनाना इस वक़्त की सबसे बड़ी चुनौती है।

अनिल बैरवाल ने सवाल उठाया कि राजनीतिक दल इस बात के लिए राजी क्यों नहीं होते कि उन्हें आरटीआई के दायरे में लाया जाए? राजनीतिक दल ये बताने को तैयार क्यों नहीं होते कि उनके पास पैसा कहां से आ रहा है? राजनीतिक दल ये क्यों नहीं बताते कि सरकार से उन्हें कितना पैसा या सुविधाएं मिल रही हैं? सुप्रीम कोर्ट जब आरटीआई के दायरे में आ सकता है तो फिर राजनीतिक पार्टियां इसके लिए क्यों हामी नहीं भरतीं? इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जब सज़ायाफ़्ता चुनाव नहीं लड़ सकते तो फिर सज़ा के एलान के बाद विधायकों सांसदों को हटाए जाने की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं?

भोजन के पूर्व सत्र के आख़िरी वक्ता के तौर पर दैनिक हिंदुस्तान के पूर्व संपादक अरविंद मोहन ने मंच संभाला। संवैधानिक तंत्र के बदलते चेहरे पर बेहद अहम टिप्पणी के साथ उन्होंने अपनी बात शुरू की- अब कानून अपराधियों के साथ कॉरपोरेट हाउस और उनके दलाल बना रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की मजबूती को देश की जनता में स्थापित करने के लिए टी एन शेषन की तारीफ की तो वहीं सीएजी रिपोर्ट के जरिए एक के बाद एक प्राकृतिक संसाधनों की सार्वजनिक लूट को जगजाहिर करने के लिए विनोद राय के काम की सराहना की। हालांकि इस सिलसिले में मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर चुटकी भी ली- 'वो तो प्लानिंग कमीशन में बेरोजगारी के दिन काट रहे हैं वरना देश के वित्त मंत्री होते'।

अरविंदजी ने कहा कि जेनुइन डेमोक्रेसी की लड़ाई अभी बाकी है लेकिन अन्ना के आंदोलन से ये भरोसा भी पैदा होता है कि कोई भी पीढ़ी ख़ामोश नहीं रहती, वो हस्तक्षेप जरूर करती है। डेमोक्रेसी की परिभाषा को उन्होंने दो स्तरों पर समझाया- एक तो सांस्थानिक डेमोक्रेसी और दूसरी- दिल की डेमोक्रेसी। जब तक हम दिल से लोकतंत्र को स्वीकार नहीं करते, अपने व्यवहार में उसे नहीं लाते, सांस्थानिक लोकतंत्र मजबूत होता नहीं दिखेगा।

भोजन उपरांत का सत्र- 'बाबा बागदेव' के पाठ के साथ हुआ। पचमढ़ी में भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'सतपुड़ा के घने जंगल' का जो वाचन प्रशांत ने किया था, यहां उसे कश्मीर उप्पल ने अपनी ही कविता के जरिए विस्तार दिया।

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कभी किसी ने

बाघ नहीं कहा उन्हें

न ही कहा शेर

बाबा के बारे में

बोलते लोगों की आंखें

चमकने लगतीं

सांस भर आती

....

बाबा मायाराम ने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों और उनकी नियति पर संक्षेप में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ये अजीब विडंबना है कि मानव एक तरफ मंगल पर जीवन तलाश रहा है और दूसरी तरफ पृथ्वी पर जीवन के ख़ात्मे में सहभागी बना बैठा है। टाइगर रिजर्व में वन विभाग के अधिकारियों की एक अजीबोगरीब दलील का जिक्र किया- मछली से बाघ चमकता है इसलिए मछली पालन का काम इस इलाके से ख़त्म कर दिया जाए। विस्थापन के नाम पर आदिवासियों के साथ हो रही लूट-खसोट को उन्होंने बेहद दुखद घटना बताया।

इसके बाद फागराम ने आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि लकड़ी-गट्ठे के झूठे केस में पुलिस ने उन्हें जेल भेजा और सताया। ग्रामीण शिक्षा के बारे में बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि 150 बच्चों पर एक गुरूजी। ऐसे में गुरूजी की हालत बेहद दयनीय हो जाती है- इते देखईं कि उते देखईं। अब ऐसे में मास्टरसाहब क्या तो 'मास्टरप्लान' समझेंगे और समझाएंगे। बिना लड़े इस देश में कुछ नहीं मिलता, राह-ए-संघर्ष चुननी ही पड़ेगी।

चाय के उपरांत, दिन के तीसरे सत्र में 'मौजूदा दलीय लोकतंत्र-कितना संवैधानिक' विषय पर 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के संपादक अरुण त्रिपाठी ने अपनी बातें रखीं। उन्होंने 1975 और उसके बाद 1992 को भारतीय लोकतंत्र के लिहाज़ से दो ख़तरनाक 'काल' बताया। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को परिवारवाद, पक्षपात, तानाशाही का गढ़ बताया तो वहीं क्षेत्रीय दलों के उभार का भी जिक्र किया। इस बात पर अफसोस भी जाहिर किया कि उत्तरप्रदेश जैसे सूबे की दो बड़ी पार्टियां चाहें सवारी हाथी या साईकिल की कर रही हों, परसुराम जयंती मनाने में दोनों ही दलों के कार्यकर्ताओं का उत्साह एक सा है।

बातचीत के क्रम में अरुण त्रिपाठी ने बीडी शर्मा का एक कथन उद्धृत किया- संविधान ने लोगों को आज़ादी दी, आदिवासियों को गुलामी। इसके साथ ही इस बात पर चिंता भी जाहिर की कि देश की सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका ऐसी भी लंबित है, जिसमें संविधान से 'समाजवाद' शब्द को हटाने की गुहार लगाई गई है। त्रिपाठीजी ने कहा कि अब लोकतंत्र में भागीदारी के लिए भी बड़ी पूंजी चाहिए। दिनोंदिन पूंजी का बोलबाला बढ़ा है और बौद्धिक लोगों की उपेक्षा हर मोर्चे और हर पार्टी में नजर आने लगी है। सबसे बड़ी विडंबना तो ये है कि देश का नेता भी विदेश में तय होने लगा है।

इस सत्र में हस्तक्षेप के तौर पर एशियन ह्यूमन राइट्स के सदस्य समर अनार्य ने अन्ना के आंदोलन को मौजूदा दौर का सबसे गैर-लोकतांत्रिक आंदोलन बताया। सत्र की अध्यक्षता कर रहे अखलाक अहमद ने कहा कि विदेशी शक्तियों का दखल केंद्र सरकार ही नहीं राज्य सरकारों का मुखिया तय करने में भी बढ़ रहा है, जो चिंता का विषय है। पहले दिन का आखिरी और खुला सत्र कश्मीर उप्पल, रजनी बख्शी, सुनील, सचिन जैन और राकेश दीवान की टिप्पणियों के साथ समाप्त हुआ।

दूसरे दिन के पहले सत्र की शुरुआत गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अनुपम मिश्र के प्रजेंटेशन से हुई। पानी और उनके संरक्षण के कई उदाहरण चित्रों के जरिए सामने आए और उनके साथ अनुपमजी की लाइव कमेंट्री चलती रही। पानी के संरक्षण को जितने सुंदर चित्रों में सहेजा गया था, उतनी ही कोमल वाणी में उसका महात्म्य बखाना जा रहा था। हॉल में बैठे लोग मंत्रमुग्ध से कभी सेलुलाइड के चित्रों को और कभी अनुपम मिश्र को निहार रहे थे। पानी के इसी जनतांत्रिक संरक्षण के जरिए उन्होंने 'समाज के लोकतंत्र और संवैधानिक लोकतंत्र' के फर्क को बड़ी सरलता और सहजता से मन में उतार दिया।

इस सत्र में कश्मीर उप्पल ने नागार्जुन, श्रीकृष्ण कुमार और सच्चिदाननंद सिन्हा के कुछ पत्रों का वाचन किया। ये वो पत्र थे, जिनसे पत्रकारिता के क्षरण का इतिहास झांक रहा था। पशुपति शर्मा ने बतौर हस्तक्षेप एक पत्रकार के स्टाइलशीटिया बन जाने पर अफसोस जताया। अख़बारों के संपादकों से जैसा तादात्म्य आम लोगों का था, ठीक वैसा ही चैनलों के संपादकों के साथ क्यों नहीं?, ये सवाल भी उठाया।

इस सत्र के खत्म होते-होते हॉल में वो शख्स दाखिल हो गया, जो पत्रकारिता जगत में एक आदर्श नायक की तरह स्थापित है। 70 के दशक के अमिताभ (गरीब, मजलूम और किसानों के हक की लड़ाई का प्रतीक नायक) सरीखा कद हासिल कर चुके पी साईंनाथ मंच पर आसीन थे। 'कॉरपोरेट हस्तक्षेप और मीडिया' पर अपनी बात इस मुनादी के साथ शुरू की कि असहमति का कोई भी सुर, कोई भी सवाल बीच व्याख्यान में मुमकिन है। पी साईंनाथ ने कहा कि विकास संवाद की परिचर्चा के इन तीन दिनों में देश में समानांतर रूप से जो कुछ घटित हो रहा है, वो काफी चिंतनीय है। इन तीन दिनों में देश के 147 किसान आत्महत्या कर चुके होंगे, इन तीन दिनों में 3000 बच्चे कुपोषण और उसकी वजह से होने वाली बीमारियों से दम तोड़ चुके होंगे।


मीडिया को उन्होंने राजनीतिक रूप से स्वतंत्र लेकिन मुनाफे का गुलाम बताया। शारदा चिटफंड से लेकर एनडीटीवी प्रॉफिट से पत्रकारों की छंटनी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की नौकरी की किसी को चिंता नहीं है बल्कि इस पूरे गोरखधंधे में मीडिया हाउसेस कॉरपोरेट घरानों की मनमर्जी और इशारे के तहत काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने मीडिया मॉनोपॉली को कॉरपोरेट मोनोपॉली का एक हिस्सा बताया।

पी साईंनाथ ने कहा कि अब मीडिया हाउसेस रिपोर्टिंग पर खर्च कम करते जा रहे हैं। यही वजह है कि चैनलों पर टॉक शो की बाढ़ आ गई है क्योंकि इसमें खर्च कम है। इसी तरह संपादकों की जगह सीईओ, मैनेजिंग एडिटर, एक्जक्यूटिव एडिटर जैसे पदों के गठन को भी उन्होंने पत्रकारिता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। मीडिया हाउसेस और कॉरपोरेट हाउसेस के बीच होने वाली 'प्राइवेट ट्रीटी' को भी उन्होंने पत्रकारिता की आजादी में बाधक बताया। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे मीडिया घरानों के हित बाजार के हित के साथ जुड़ते जाएंगे, एक तरह का खतरनाक नेक्सस खबरों को दबाने, छिपाने और उन्हें विकृत करने में सक्रिय होता जाएगा।

पी साईंनाथ ने कहा कि हाल के दिनों में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कोई बड़ी ख़बर ब्रेक की हो, इसके उदाहरण बेहद कम मिलते हैं। मीडिया के पतन के साथ पत्रकार 'कॉमेडियन रिलीफ' देने का काम करते नजर आते हैं। ऐसे में पत्रकारों को गुरिल्ला जर्नलिज्म की आदत डाल लेनी चाहिए। संस्थानों में रहते हुए वो कैसे समाज और आम आदमी की बात सामने रख पाते हैं, ये उनकी निजी काबिलियत का विषय है।

इसके साथ ही उन्होंने पेड न्यूज को लेकर भी अपनी राय रखी। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इलेक्शन के दौरान पेड न्यूज की पकड़ आसान हो जाती है लेकिन बहुत बड़ा हिस्सा नॉन इलेक्शन पेड न्यूज का भी है। उन्होंने पत्रकारिता जगत में आने वाले युवाओं से वैकल्पिक मीडिया को अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि एक पत्रकार को एक से ज्यादा हुनर का मास्टर होना चाहिए ताकि वो अलग-अलग माध्यमों से अपनी बात कह सके। उन्होंने अपनी ओर से किए जा रहे आर्काइव प्रोग्राम की एक झलक भी दिखाई। पी साईंनाथ ने उन लोगों के दिमाग के तारों को झंकृत कर दिया जो न्यूज रूम के शोर में भी सोने की आदत पाले बैठे हैं।

विकास संवाद में इसके बाद के सत्रों में भी कुछ बातें हुईं लेकिन पी साईंनाथ ने मीडिया के इतने आयाम खोल दिए कि दिमाग में लंबे समय तक वो उमड़ते घुमड़ते रहेंगे।

केसला से वापसी में एक अलग तरह की भूख का एहसास तीव्रतर हो गया। 'भूख' उदर से कुछ ऊपर शिफ्ट हो चुकी थी। विकास संवाद की सार्थकता बस इतनी है कि वो इस भूख को जगा तो सकता है मिटा नहीं सकता। भूखे पेट भजन भले न हो भूखे मन में नए गीत गूंजते हैं... शायद हममें से कोई साथी कभी ऐसा ही कोई नया गीत गुनगुनाएं तो इस आयोजन की सार्थकता और ज्यादा बढ़ जाएगी।

पशुपति शर्मा

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

भोपाल में बिखरी 'मोहनिया' की यादें

 

नम आंखें और उन आंखों से ढलकतीं विनय की यादें। भोपाल के गांधी भवन के मोहनिया बाल गृह में सुबह एक-एक कर साथियों का आना शुरू हो गया। विनय की याद में आयोजित कार्यक्रम को लेकर बने पोस्टर और बैनर मंच पर एक-एक कर टांके गए। इसी दौरान दो टेबल पलट कर उस पर एक-एक चादर डाली गई। अखलाक ने जो दो पोस्टरनुमा तस्वीरें मुजफ्फरपुर से बनवाकर लाईं थीं, उसे दो कोने पर जैसे ही लगाया गया, वो मंच तैयार हो गया... जहां विनय की यादें एक-एक कर बिखरने लगीं।

पहला अनौपचारिक सत्र-विनय स्मरण का रहा। राजू नीरा ने चंद लफ़्जों में विनय को याद किया और जैसे ही पुष्पांजलि के लिए साथियों को न्यौता दिया गया, कई आंखें डबडबा गईं। राजू नीरा ने इस अनौपचारिक सत्र की शुरुआत इस प्रस्ताव के साथ की कि विनय की याद के इस सिलसिले को अब किस दायरे में आगे बढ़ाया जाए। माखनलाल तक ही इसे सीमित रखा जाए या इसमें बाहर के लोगों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इसी सिलसिले में राजू ने माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के एक और सीनियर साथी वेदव्रत गिरि के असामयिक निधन पर शोक जाहिर किया। राजू ने जरूरतमंद और संकटग्रस्त साथियों के लिए एक को-ऑपरेटिव जैसी व्यवस्था विकसित करने की बात भी कही।

मुजफ्फरपुर दैनिक जागरण से जुड़े अखलाक अहमद ने कार्यक्रम में स्थानीय साथियों की कम भागीदारी पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि पिछले चार साल से चल रहे इस कार्यक्रम को जारी रखा जाना चाहिए और एक नेशनल नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। विनय के बहाने अलग-अलग विषयों पर पुस्तिका प्रकाशन पर भी उन्होंने जोर दिया।

बीबीसी से जुड़ीं शेफाली चतुर्वेदी ने लगे हाथ अगला आयोजन दिल्ली में करने का प्रस्ताव रखा, जिस पर करतल ध्वनि से सभी ने हामी भर दी। एक्शन एड के साथ काम कर रहे उमेश चतुर्वेदी ने भी दिल्ली में कार्यक्रम की जिम्मेदारी लेने की तत्परता दिखाई और कार्यक्रम स्थल के तौर पर गांधी शांति प्रतिष्ठान का नाम सुझाया। मुजफ्फरपुर से आए साथी अमरेन्द्र तिवारी ने आयोजन का समय एक दिन से बढ़ाकर दो दिन करने की इच्छा जाहिर की। इसके साथ ही उन्होंने बीच-बीच में वर्कशॉप किए जाने की जरूरत भी रेखांकित की।

एनडीटीवी, मुंबई में कार्यरत साथी अनुराग द्वारी के चंद बोलों ने विचार में डूबते-उतराते लोगों को फिर भावुक कर दिया। अनुराग ने ये जब ये सवाल किया कि फूलों से भी इतनी तकलीफ़ हो सकती है... तो इसका जवाब आंखें दे रहीं थीं। भोपाल के साथी अरुण सूर्यवंशी ने पिछली बार के कार्यक्रम में न शामिल हो पाने का अफसोस जाहिर किया और कहा कि 'टू बी कनेक्टेड' की स्थिति बनी रहनी चाहिए।

नई दुनिया, इंदौर में कार्यरत सचिन श्रीवास्तव ने विनय के नाम पर किसी फोरम के गठन को लेकर आपत्तियां जाहिर कीं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति आधारित संस्थाएं कब तक और कितनी दूर तक चल पातीं हैं, इसका इतिहास अच्छा नहीं रहा है। वहीं दैनिक जागरण, भोपाल के खेल प्रभारी शशि शेखर ने इन सबसे से परे विनय के सरल-सहज स्वभाव को जिंदा रखने को ही आयोजन की सार्थकता बताया। सहारा न्यूज चैनल के एंकर संदीप ने फेसबुक पर एक पेज बनाकर साथियों को जोड़े रखने की बात कही और उन्होंने ये जिम्मा खुद अपने कंधों पर ले लिया। पशुपति शर्मा ने विनय के नाम पर हो रहे आयोजनों को मौजूदा स्वरूप में ही जारी रखने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव जैसी व्यवस्थाएं कई बार काम आगे बढ़ाने की बजाय अड़चनें पैदा करने लगती हैं। दस्तक के रोल मॉडल की तरह की विनय स्मरण कार्यक्रम भी यूं ही जारी रखा जाए तो बेहतर होगा।

बिहार में प्रभात खबर के साथ लंबे वक्त से काम रहे अखिलेश्वर पांडेय ने एक ईमानदार आदमी की सतत मौजूदगी को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज भी प्रभात खबर के साथ विनय को याद कर भावुक हो उठते हैं। उससे काम में जुटे रहने और जिम्मेदारियां ओढ़ लेने की प्रेरणा लेते हैं।

न्यू सोशलिस्ट इनीशिएटिव, दिल्ली के साथी सुभाष गाताडे ने विनय की याद में इस तरह के कार्यक्रम को एक जरूरी पहल बताया। इसके साथ ही औपचारिक संगठन से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि विनय के लेखों के संकलन के बारे में गंभीरता से सोचा जाना चाहिए।

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग के प्रोफेसर पुष्पेंद्र पाल सिंह ने एक रोचक प्रसंग से अपनी बात शुरू की। विनय के निधन के बाद दोस्तों ने जिस शिद्दत से उसे याद किया, उसने कई लोगों को प्रभावित किया। उन्होंने बताया कि कैसे अभिलाष खांडेलकर ने उनसे फोन कर पूछा कि आखिर ये विनय कौन है, क्या बात थी इस युवा पत्रकार में कि उसे साथी इतने भावुक होकर याद कर रहे हैं। पुष्पेंद्र पाल सिंह ने कहा कि इस आयोजन की सबसे बड़ी बात ये है कि ये ईमानदारी, अच्छाई और सादगी में लोगों के विश्वास को पुख्ता करता है। ये आस्था बलवती होती है कि समाज में अच्छे लोग हैं तो उनका सम्मान भी है। पहला सत्र साथियों को आगे बढ़ते रहने के पीपी सिंह के इसी संदेश के साथ संपन्न हो गया।

दूसरा सत्र, करीब ढ़ाई बजे... ये फैसले का वक्त है, आ कदम मिला के बोल के साथ शुरू हुआ। मुजफ्फरपुर के सांस्कृतिक संगठन गांव ज्वार के साथी सुनील और अखलाक ने ये गीत गया। इसके बाद शेफाली चतुर्वेदी ने सचिन श्रीवास्तव की कविता 'अफसोस विनय अफसोस' का वाचन किया। पशुपति शर्मा ने आरंभिक उद्बोधन में मोहनिया बाल गृह में अपने मोहनिया को याद करने की बात कही। विनय तरुण का स्वभाव ही ऐसा है कि वो कभी मोहनिया बन कर सामने आ जाता है तो कभी आनंद के राजेश खन्ना की तरह लोगों को हंसता-हंसाता आंखों के सामने तैरने लगता है। विनय की याद में ये कार्यक्रम उसकी सादगी, उसकी सहजता, उसकी ईमानदारी, उसकी दृढ़ता का उत्सव है।

अब बारी सुभाष गाताडे की थी, जिन्हें अस्मिताओं का संघर्ष और पत्रकारिता पर अपनी बात रखनी थी। गाताडे ने विनय की याद में आयोजित इस व्याख्यान पर साथियों को साधुवाद दिया। उन्होंने कहा- ये बड़ी बात है कि साथियों ने विनय के न होने के गम को सयापे में नहीं बदला बल्कि संकल्पशक्ति में तब्दील किया है। ऐसे दौर में जब पत्रकारिता कमीशनखोरी में तब्दील हो गई हो, अपनी भूमिका तलाशने की ऐसी कोशिशें काफी ताकत देने वाली है।

उन्होंने कहा कि अस्मिताओं के संघर्ष का सवाल आज ज्यादा मौजूं है। 80-90 के दशक में दलित और स्त्री अस्मिता का उभार हुआ। हिंदी पट्टी के सबसे बड़े सूबे में मायावती अस्मिताओं के इस संघर्ष के बाद सत्ता पर काबिज हुईं। 90 के दशक में हिंदू अस्मिता का उभार हुआ। और अब आज के दौर में जब हम गुजरात दंगे बनाम विकास की बहस में उलझे हैं, अस्मिताओं से जुड़े ऐसे कई सवाल बार-बार सिर उठाते हैं।

पत्रकारिता के ढांचे का जिक्र करते हुए सुभाष गाताडे ने कहा कि यहां अभी भी पुरुष वर्चस्व कायम है। पत्रकारिता संस्थानों में तमाम अस्मिताओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। इस सिलसिले में उन्होंने 2006 में हुए एक सर्वे का जिक्र किया। 35 चैनलों के 300 सीनियर मीडियाकर्मियों का विश्लेषण प्रतिनिधित्व के लिहाज से बेहद गैर-लोकतांत्रिक नज़र आया। 71 फीसदी पदों पर हिन्दू उच्च जाति का कब्जा था।

हस्तक्षेप के तौर पर देविन्दर कौर उप्पल ने भी कमज़ोर और सशक्त की लड़ाई में हमेशा कमज़ोर के साथ खड़े रहने की प्रतिबद्धता पर जोर दिया। बिहार से आए पत्रकार साथी श्याम लाल ने नक्सली लिंक के शक में प्रताड़ित किए जाने की 'व्यथाकथा' शेयर की।

अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया ने मीडिया घरानों की मोनोपॉली ख़त्म करने को एक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर की कि पत्रकारों को सबसे कम फ्रीडम न्यूज़ रूम में हासिल होती है। पत्रकार संगठनों के अभाव में हक की लड़ाई जारी रखना भले ही मुश्किल हो गया हो लेकिन हरदेनियाजी ने हर पत्रकार को वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को समझने और उसे पढ़ने की नसीहत दी। कई मायने में निजी पूंजी से बेहतर सरकारी पूंजी है। उन्होंने स्मरण से किसी पुराने उद्धरण का जिक्र किया कि यदि पत्रकार अपने आर्थिक हालात को लेकर चिंतित रहने लगे तो फिर देश का भविष्य अंधकारमय होना तय है।

अहा जिंदगी के संपादक आलोक श्रीवास्तव की व्यवस्तताओं की वजह से व्याख्यान का एक और सत्र तो मुमकिन नहीं हो पाया लेकिन पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक शाम कविताओं के नाम रही। आलोक श्रीवास्तव, कुमार अंबुज और रवींद्र स्वप्निल प्रजापति ने अपनी कुछ चुनींदा कविताओं का पाठ किया। इसके साथ ही राजू नीरा, सचिन श्रीवास्तव ने कविताएं पढ़ीं और नदीम खान ने कुछ शेर गुनगुनाए।

शाम ढ़लते-ढ़लते विनय की याद में गुजरे एक दिन पर भी धुंधलका छाने लगा... साथी अपने घर को लौट चले।

रविवार, 3 मार्च 2013

माफ कर देना माई!


हरे रामा, हरे कृष्णा, कृष्णा-कृष्णा हरे-हरे। वृंदावन के उस आश्रम के बाहर हमारे कदम पड़े तो ये बोल कानों में गूंजने लगे। अंदर गए तो सफेद कपड़ों में लिपटीं महिलाओं का झुंड। कुछ घेरा बनाकर भजन गा रहीं थीं, झूम रहीं थीं और कुछ इस घेरे से बाहर गुमसुम बैठीं थीं। दूर कोने में कुछ वृद्ध महिलाएं फूलों की माला गूंथ रहीं थीं। कुछ के हाथों में धागा था और वो न जाने उनमें कौन से मोती पिरो रहीं थीं, अपने गम के या कान्हा के नाम के। इन सबके बीच एक वृद्ध भी झूम रहा था, लाल बंडी और सफेद सा कुर्ता पहने। बाद में पता चला वो विंदेश्वरी पाठक थे। विंदेश्वरी पाठक जिन्हें, सुप्रीम कोर्ट की दखलअंदाजी के बाद वृंदावन में अपने आखिरी दिन गुजारने पहुंचीं विधवाओं की देखरेख का जिम्मा सौंपा गया है।

कुछ देर तक तो कदम ऐसे ठिठके कि दिमाग सुन्न सा हो गया। भजन के बोलों से परे कब विधवाओं को देख-देख उनके गम की दुनिया दिमाग में कौंधने लगीं, पता ही नहीं चला। आंखें डबडबाने को थीं, कि चेतन मन जाग उठा। दुख कैसे कभी-कभी उत्सव का मौका भी दे जाते हैं, वो पल मेरे सामने थे। सुलभ इंटरनेशनल ने 24 फरवरी 2013 को ये छोटा सा कार्यक्रम इन विधवाओं की जिंदगी में खुशी के थोड़े से पल तलाशने के लिए रखा था। विंदेश्वरी पाठक ने पहले हिंदी में कहा- ''रात बीत गई और अब एक नई सुबह होने को है।'' एक बांग्लाभाषी ने इसे बांग्ला में अनुवाद कर दिया। वो इस लिहाज से भी जरूरी था कि वृंदावन में आने वाली विधवाओं में कइयों की दुख की बोली-बाणी अभी भी बंगला ही है। पाठक जी ने कहा - "जो बीत गया उसे सपने की तरह भूल जाओ, अब नया जीवन शुरू होगा।" उनकी इस घोषणा के साथ जुड़ी थी, दो हजार रुपये की वो सहयोग राशि, जो हर माह विधवाओं को दी जाएगी। एक हजार की अनुग्रह राशि अचानक दो हजार कर दी गई थी। इस छोटी सी शर्त के साथ कि अब पांच-पांच रुपये के लिए भजन गायन करने ये विधवाएं कहीं नहीं जाएंगी।

इसके बाद सिलाई मशीनें बांटी गईं। मैं दूर खड़ा देख रहा था। वो महिलाएं जो अब तक झुंड बनाकर नाच-गा रहीं थीं, इस बार भी अगली कतार में वो हीं थीं। इक्का दुक्का विधवाओं ने बीच से हाथ उठाया। उन्हें भी आगे वाली कतार में बुला लिया गया, एक मशीन उनके सामने भी रख दी गई। हॉल के आखिरी कोने में अब भी कोई हलचल नहीं थी। इसके बाद कैंची आई, कुछ  रंगीन धागे भी बांटे गए। घोषणाएं होती रहीं। सुलभ इंटरनेशनल की तरफ से सिलाई सिखाने के लिए एक टीचर। इसके अलावा दो तीन शिक्षिकाओं का परिचय भी हुआ जो इन विधवाओं को हिंदी, बांग्ला और अंग्रेजी भी सिखाएंगी। राधा, सुनंदा और नयन, इन तीनों पर ये जिम्मेदारी डाली गई। इसी बीच ये भी बताया गया कि विधवा जिन्हें यहां माई कहते हैं, के लिए टीवी भी लगाई जा रही है, ताकि वो कुछ देर स्क्रीन के सामने भी बिता सकें।

इसी दौरान एक पत्रकार साथी ने आवाज लगाई- ''चलिए जरा इनके रहने का ठौर-ठिकाना भी देख आएं।'' अंदर गया। नए-नए से पर्दे टंगे थे, जिनकी चिन्दियां उधेड़ी जाएं तो न जाने माई के कितने फटे पुराने दिन इनमें सिमटे हों। अंदर एक हॉल। वहां हॉस्टल की तरह एक के बाद एक खाट। उस पर बिछा बिस्तर। खाट के नीचे बर्तन-बासन। थोड़ा और जरूरी सामान। सब करीने से सजा हुआ। हो सकता है, आज आए मेहमानों की वजह से भी माई ने अपना बिखरा सामान ही नहीं दुख भी सहेज कर बिस्तरे के नीचे डाल दिया हो।

यहीं थोड़ी हिम्मत कर दो माइयों से छोटी सी बात हुई। एक ने कहा- "शाहजहानपुर, यूपी से आई हूं। घर कोई खुशी से तो छोड़ता नहीं। बेटा-बेटी का अपना खर्च ही पूरा नहीं होता तो मेरा पेट कहां से भरते। दो-चार महीने पर घर से कोई आ जाता है, मुलाकात हो जाती है। बस और क्या?" दूसरी माई ने बताया- "मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल से आई हूं। 32-33 साल से वृंदावन की गलियां ही ठिकाना रही हैं।" अंदाजा लगाया, इस माई की उम्र 60-65 के बीच रही होगी। आधी जिंदगी कान्हा की नगरी में बीती है। बच्चे जो छोटे थे, बड़े हो गए लेकिन वो दुनिया इनके लिए तब भी बेगानी थी और आज भी बेगानी ही है।

बाहर निकला तो बोर्ड पर नजर पड़ी। मीरा सहभागिनी महिला आश्रम सदन। कहते हैं मीरा ने आखिरी दिन कान्हा के भजन गाते यहीं वृंदावन में गुजारे थे। विधवा आश्रमों में माई और मीरा को लेकर कई तरह की धारणाएं भी हैं। बोर्ड के ठीक नीचे डॉक्टर साहब की कुर्सी टेबल। माई का बीपी चेक हो रहा था। डॉक्टर साहब बड़े प्यार से बातें कर दवाईयां दे रहे थे। अच्छा लग रहा था, कम से कम इनका इतना केयर तो हो रहा है।

भूख लगने लगी थी। इस कार्यक्रम के लिए खास तौर पर दिल्ली से आए कई पत्रकार साथियों ने भोजन की इच्छा जाहिर की तो आयोजकों ने बाहर बुलाया। हम चल दिए। होटल बसेरा में खाने का इंतजाम था। पनीर की सब्जी, दाल फ्राई, और भी दो तीन तरह की सब्जियां, रोटी, मिस्सी रोटी, नान, पुलाव। मीठे में गुलाब जामुन और आईस्क्रीम भी। निवाला गटकते हुए सोच रहा था, आज माई ने क्या खाया होगा? क्या एक दिन माई के साथ एक थाली हमारी नहीं लग सकती थी? जिनके साथ कुछ पल गुजारने आए थे, उनके साथ एक वक्त का खाना क्यों नहीं?

खैर। वृंदावन से लौटते वक्त एक्सप्रेसवे पर गाड़ी फर्राटे भर रही थी। इसके साथ ही माइयों के चेहरे भी बड़ी तेजी से धुंधले होते जा रहे थे। हॉस्टल में बिताए दिनों को याद कर सोच रहा था कि सामूहिकता में दुख खत्म भले न हो, कम जरूर हो जाता है। हां फर्क बस इतना था कि स्कूल डेज में हॉस्टल के ये दिन अपनी नई जिंदगी शुरू करने के लिए बेहद अहम थे, जबकि माइयों का ये हॉस्टल तो जिंदगी के आखिरी दिनों को सुकून से काट लेने भर का जरिया है।

माई... दिल्ली आ गया है... हो सके तो तुम्हारे इस दुख के सभी गुनहगारों को माफ कर देना... मुझे भी।

- पशुपति शर्मा

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

आयरा और कवि का प्रेम-1


(हाल ही में विमल कुमार के नए काव्य संकलन- क्या तुम रोशनी बनकर आओगी आयरा
?- हाथ लगा। महज 24 घंटों में एक-एक कविता पढ़ गया। दूसरी बार पढ़ते हुए बतौर पाठक कुछ बातें मन में उठीं, वो आप सभी के साथ साझा कर रहा हूं। )

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संकलन की पहली कविता 'प्रेम क्या है?', प्रेम की उस व्यापकता का संकेत दे जाती है, जो महज नारी तक सीमित नहीं है। खुद को पहचानने और दूसरे को जानने तक पसरा है ये प्रेम। गलत को गलत और सही को सही मान पाने की सहज ताकत है कवि का प्रेम। 'प्रेम का अभिप्राय' में कवि चांद, फूल और सूरज की दुहाई देता हुआ प्रेम को महज देने का जरिया बना देता है, लेकिन इस आरजू के साथ कि बस कोई इस प्रेम को समझ ले।

अगर तुम न दे सको अपना प्रेम मुझे

तो कोई बात नहीं

पर कम से कम समझना जरूर

मेरा प्रेम कितना सच्चा है

प्रेम को समझना

मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है

प्रेम करने से

प्रेम और उसका अभिप्राय समझाने के बाद कवि ये भी समझा देना चाहते हैं कि 'प्रेम करने से पहले' क्या-क्या देख लेना चाहिेए। घर का नक्शा, चौहद्दी, आंगन, छत, सीढियां और खिड़कियां अगर घर हो तो, वरना ये देखें कि सिर पर कितना आसमान है, कितनी छांव। फिर धीरे से मन में झांक लेने की नसीहत भी - घबराहटें, साहस, दुख, धैर्य, लालच, घृणा, क्रूरता, हिंसा सब कुछ प्रेम से पहले जान लेने की ललक रखता है कवि। काश 'डायरियां पढ़ लेने' भर से ये समझ पाना इतना आसान होता।

प्रेम करने से पहले

हमें एक दूसरे के भीतर,

झांककर देख लेना चाहिए

जैसे हम देखते हैं

झांककर कोई कुआं

'प्रेम से पहले' कविता में कवि प्रेम को 'सृजन' का जरिया बताता हुआ 'क्रोध', 'तोहमत' से बचने की नसीहत भी देता चलता है। लेकिन क्या करे...

पर एक जद्दोजहद भी

चलती रहती है

मनुष्य के भीतर

तर्क और भावना के बीच

किसी की भावना जीत जाती है

तो किसी का तर्क जीत जाता है

और इस तरह हार जाता है मनुष्य

पड़ जाता है किसी के प्रेम में

फिर बुरी तरह

'प्यार में कुछ भी नहीं छिपाना चाहिए'- आसमान का रंग, बारिश, शहर में उल्लसित तरंगें, समुद्र का गर्जन, रात की उदासी- सब कुछ बता देना चाहिए। आसमान की पतंग, तार पर बैठी चिड़िया, आंगन में खिला फूल, पार्क में खिली धूप। ये सारी बातें इतनी सहजता से कवि कहता है कि पाठक के मन को गहरे तक छू जाती हैं। इसके साथ ही प्रेम में आज के सवाल कैसे घुलते हैं, वो भी कवि का अपना अंदाज है।

पर जब आदमी करता है

किसी से सच्चा प्यार

तो आटे दाल और

सब्जियों के दाम भी

चाहता है बताना

किस तरह बढ़ गई है महंगाई

और प्याज के भाव

चढ़ गए आसमान पर

********

बढ़ गया है कितना

किराया

और स्कूल की फीस

********

पर यह भी बताना चाहता है

नौकरी करता किस तरह घुट घुटकर

इन दिनों

और नहीं मिल पा रही है

समय पर तनख्वाह।




(विमल कुमार की प्रेम कविताओं के संकलन पर पाठकीय प्रतिक्रिया की दूसरी किश्त जल्द आपके साथ साझा करूंगा। कवि विमल से आप- 9968400416- पर संपर्क कर सकते हैं।)

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

मैं इस देश को बेचकर चला जाऊंगा

(पैसे पेड़ पर नहीं उगते, इस पारंपरिक ज्ञान को आदरणीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नया अर्थ प्रदान किया है। बाजारवाद के इस दौर में इस अर्थ को कवि विमल कुमार जितना कुछ समझ पाए हैं, उसे इन शब्दों में बयां किया है। एक 'ईमानदार' प्रधानमंत्री की पीड़ा से आप भी गुजरें।-पशुपति)
 
सोने की इस मरी हुई चिड़िया को
बेच कर चला जाऊंगा....
तुम देखते रह जाओ
मैं नदी नाले तालाब
शेरशाह सुरी का ग्रांड ट्रंक रोड
नगर निगम की कार पार्किग
चांदनी चौक के फव्वारे
सब कुछ बेच कर चला जाऊंगा

मैं चला जाऊंगा बेचकर
अपने गांव की जमीन जायदाद खेत खलिहान
दुकानों, यहां तक कि अपने पूर्वजों के निशान
सब कुछ बेच कर चला जाऊंगा एक दिन
तुम देखते रहना बस चुपचाप

 

तंग आ गया हूं
इस देश की बढ़ती गरीबी से
परेशान हो गया हूं
नित्य नये घोटाले से

मेरी नींद जाती रही
जाता रहा मेरा चैन
इसलिए मैंने तय कर लिया है
अपने घर का सारा सामान पैक कर चला जाऊंगा

पर जाने से पहले
इस देश को पूरी तरह बेचकर जाऊंगा
 

मैं ठहरा एक ईमानदार आदमी
नहीं तो बेच देता मैं अब तक कुतुबमीनार
अगर मिल जाता मुझे कोई खरीददार

बेच देता चार‌मीनार
इंडिया गेट, चंडीगढ़ का रॉक गार्डन, मैसूर का पैलेस
आखिर इन चीजों से हमें मिलता ही क्या है
नहीं होता अगर इनसे कोई उत्पादन
नहीं बढ़ता जी.डी.पी.
नहीं घटती मुद्रास्‍फीति
तो बेच ही देना चाहिए
बाबा फरीद और बुल्ले शाह के गीत
बहादुर जफ़र का उजड़ा दयार, टीपू की तलवार
 

मैं धर्मनिरपेक्ष हूं
नहीं तो कब का बेच देता
अमृतसर का स्वर्ण मंदिर
बाबरी मस्‍जिद जो ढहा दी गयी
पुरी या कोर्णाक का मंदिर
सोमनाथ या काशी विश्‍‍वनाथ का मंदिर
लेकिन नहीं बेचा अब तक

पर मैंने सोच लिया है
अगर तुम लोग करोगे मुझे नाहक परेशान
उछालोगे कीचड़ मेरी पगड़ी पर
तो मैं इस देश की आत्मा को ही बेच कर चला जाऊंगा

है इस देश में इतना भ्रष्‍‍‍टाचार
तो मैं क्या करूं
है इस देश में इतना कुपोषण
तो मैं क्या करूं
है इस देश में इतना शोषण
तो मैं क्या करूं

अधिक से अधिक एफ.डी.आई. ही तो ला सकता हूं
बेच सकता हूं भोपाल का बड़ा ताल
नर्मदा नदी पर बांध
पटना का गोलघर
लहेरिया सराय में अशोक की लाट
कन्या कुमारी में विवेकानन्द रॉक
बंकिम की दुर्गेशनन्‍दिनी
टैगोर का डाकघर
वल्लोत्तोल की मूर्ति
बैलूर मठ
दीवाने ग़ालिब

अगर इन चीजों के बेचने से बढ़े विदेशी मुद्रा भंडार
तो हर्ज क्या है
बताओ, इस मुल्क के रोग का मर्ज क्या है

क्या हर्ज है
यक्षिणी की मूर्ति बेचने में
कालिदास को बेचने में
भवभूति के नाटकों को बेचने में
हीर रांझा और सोहनी महिवाल
और देवदास को बेचने में

मैं इस देश को उबारने में लगा हूं
संकट की इस घड़ी में
जब अर्थव्यवस्‍था पिघल रही है
पर तुम समझते ही नहीं
लेकिन तुम फौरन बयां देते हो मेरे खिलाफ

मैं तो इस देश के भले के लिये ही
इस देश को बेच रहा हूं
अपने मौहल्ले में पान की गुमटी
किराना स्टोर को बेच दिया

बेच रहा हूं कोयले की खान
स्टील के प्लांट
कपड़ें की मिल
ताकि तुम्हारे बच्‍चे कुछ लिख पढ़ सकें
ताकि तुम्हारी दवा दारू का हो सके इंतजाम
न करो तुम इस तरह आत्महत्याएं

पर तुम कहते हो कि
मैं नयी ईस्ट इंडिया कम्पनी ला रहा हूं
देश को गुलाम बना रहा हूं
आजादी का ये जज्बा ही है कि मैं बेच रहा हूं

क्योंकि आजादी से हमें नहीं मिली आजादी दरअसल
सचमुच, मैं तुम्हारे तर्क, विरोध, प्रर्दशन
जुलूस धरने और जल सत्याग्रह से अज़िज आ गया हूं
78 साल की उम्र में पेस मेकर लगा कर चला रहा हूं
डायबटिज का मरीज हो गया हूं
चश्मे का नम्बर बढ़ता जा रहा हर साल
घुटने होते जा रहे मेरे खराब

मेरा क्या है
अगर तुम लोग मुझे रहने नहीं दोगे
अपने देश में
तो मैं वहीं चला जाऊंगा
जहां से आया हूं सेवानिवृत होकर
तुम लोग ही भूखे मरोगे
सोच लो
मुझे अपने जाने से ज्यादा चिंता है तुम्हारी
इसलिए
पहले आओ पहले पाओ के आधार पर
मैं पहले आर्यवर्त
फिर भारत को बेचकर चला जाऊंगा
देखता हूं तुम लोग कैसे रहते हो इंडिया में

तुम लोग पड़े रहो इस गटर में जहलत में
जब तक तुम्हारी टूटेगी नींद
जागोगे मेरे खिलाफ
लामबंद होगे
 
मैं इस सोने की मरी हुई चिड़िया को बेचकर चला जाऊंगा

दूर बहुत दूर ......

 
 
विमल कुमार, इनसे आप 9968400416 पर संपर्क कर सकते हैं।
 

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

हमने अपने 'आनंद' को याद किया...


विनय स्मृति आयोजन-3

मुजफ्फरपुर प्रेस क्लब। तारीख 23 जून। समय सुबह के 11 बजे। विनय स्मृति में तीसरा आयोजन। हॉल में गिने-चुने लोग। एक बार तो लगा कि परिचर्चा चाय की चुस्कियों के साथ ही खत्म न हो जाए, लेकिन घड़ी का कांटा 11.30 पर पहुंचते-पहुंचते संशय जाता रहा। हॉल में मुजफ्फरपुर की अलग-अलग बिरादरी के लोग मौजूद थे- साहित्यकार, रंगकर्मी, पत्रकार, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता।

11.45 पर अखलाक ने विनय की यादें ताजा कर दीं, कई छोटी-छोटी बातों का जिक्र होते ही विनय उस हॉल में जिंदा हो उठा और उसकी धड़कनें महसूस होने लगीं। सचिन श्रीवास्तव की कविता जब शेफाली के सुर में घुलकर कानों तक पहुंची तो विनय के न होने का 'अफसोस' और गहरा हो गया।

मीडिया सत्ता और जनअपेक्षाएं पर परिचर्चा की शुरुआत पत्रकार रामप्रकाश झा के विषय प्रवेश के साथ हुई। रामप्रकाश की नजर में मीडिया ने बाजार से समझौता नहीं किया, बल्कि 'संतुलन' बनाया है। मीडिया ने जनता की अपेक्षाओं को निष्कर्ष तक पहुंचाया है।

सामाजिक कार्यकर्ता शाहिद कमाल ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सनसनीखेज खबरों और प्रिंट मीडिया पर छाए पेड न्यूज के संकट के साथ अपनी बात रखी। मीडिया में बड़े घराने और कॉरपोरेट के कब्जे के बीच उन्होंने छोटी-छोटी पहल पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लघु पत्रिकाएं अपने तरीके से छोटा पाठक वर्ग तैयार कर रही हैं और विचार बना रही हैं। ये एक शुभ संकेत है।

साहित्यकार नंद किशोर नंदन ने पत्रकारिता के साथ 'मिशन था' को जोड़े जाने पर आपत्ति जाहिर करते हुए 'मिशन है' पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लुंज-पुंज संसदीय सिस्टम में पत्रकार उम्मीद की किरण जगाते हैं। टूजी घोटाले से लेकर बथानी टोला नरसंहार पर आए फैसले के बाद की घटनाओं का बखान करते हुए नंदनजी ने अपनी बात रखी। उन्होंने मीडिया के सामने एक सवाल रखा कि लोकतंत्र की रट लगाने वाले पत्रकारों को ये भी सोचना चाहिए कि आर्थिक लोकतंत्र के बिना ये कैसे मुमकिन है?

सुरेश प्रसाद गुप्ता ने कहा कि जब सारा सिस्टम फेल हो जाए तब एक पत्रकार काम आ सकता है। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर अफसोस भी जाहिर किया कि मुद्दों को लेकर मीडिया में संवेदनशीलता घटी है। बीटी बैगन के खिलाफ जनयात्रा का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 72 जिलों में उन्हें अच्छा कवरेज मिला, लेकिन दिल्ली पहुंचने पर वहां के अखबारों ने इतनी बड़ी यात्रा को नजरअंदाज कर दिया। जनसत्ता में पूरा पेज कवरेज जरूर दिया लेकिन बाकी अखबारों में सिंगल कॉलम के लायक भी जगह नहीं मिली।

अरविंद जी ने ये सवाल उठाया कि चतुर्दिक गिरावट के दौर में मीडिया तमाम कसौटियों पर खरा उतरे, ये कैसे मुमकिन है। उन्होंने कहा कि आज की तारीख में औद्योगिक घराने सरकार के फैसले को प्रभावित नहीं तय करते हैं, वो भी जनसरोकारों की कीमत पर। इस अंधे युग में मीडिया भी मिशन की जगह कमीशन के जाल में फंसता चला गया है। वहीं डॉक्टर धनाकर ठाकुर ने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि सामाजिक कार्यकर्ताओं का मीडिया अपमान करता है।

पशुपति शर्मा (रिपोर्ट लेखक) ने बाबा भारती और उसके घोड़े की कहानी के जरिए अपनी बात रखी। बाबा भारती को घोड़ा छिन जाने के बाद सबसे ज्यादा चिंता इस बात की थी कि ये बात फैली तो इंसान का इंसान से भरोसा उठ जाएगा। ये संवेदनशीलता खबरों के चयन, संपादन और प्रसारण के दौरान मीडियाकर्मियों के बीच भी होनी चाहिए। उन्होंने निर्मल बाबा से लेकर अन्ना के आंदोलन तक मीडिया कवरेज की प्रवृत्ति को लेकर अपनी बात रखी।

इसके बाद मंच पर राजनीतिक हस्तक्षेप भी हुआ। पूर्व विधायक केदार बाबू तो संक्षेप में अपनी बात रख कर 'गायब' हो गए, लेकिन आरजेडी प्रवक्ता शमी इकबाल ने कई मुद्दों पर तीखे तेवरों के साथ अपनी बात रखी। शमी इकबाल ने कहा कि जो लोग 60 लाख खर्च कर मेयर बनते हैं, वो पहले अपना हिसाब चुकता करते हैं और फिर शहर की सफाई की बात सुनना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा कि अन्ना को कवरेज करने वाला मीडिया ये भूल गया कि 'मैं अन्ना हूं' कह कर रैली निकालने वालों की भीड़ में तमाम वो लोग थे जो अपराध, घोटाले और भ्रष्टाचार में लिप्त रहे हैं। महज ईमानदारी से बात बनने वाली नहीं है, कई ईमानदार हैं लेकिन घोर जातिवादी हैं, कई ईमानदार हैं लेकिन घोर सांप्रदायिक हैं। इसलिए इस वक्त में जो महज आदमी है, उसको दिक्कत है और इस दिक्कत को मीडिया को समझना होगा।

शमी इकबाल ने एक तीन सूत्री फॉर्मूला भी रखा- मिलावट का सामान, सामूहिक बलात्कार और वित्तीय लूट। इन तीनों के खिलाफ अभियान के तौर पर मीडिया कवरेज होना चाहिए। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि मीडिया में काम करने वाले कर्मचारियों के हाथ बंधे हैं क्योंकि आज की तारीख में सारे सौदे मालिकान और सत्ता में बैठे लोगों के बीच सीधे तय हो जाते हैं। वहीं पूर्व प्राचार्य राम इकबाल शर्मा ने किसानों को मिलने वाली सब्सिडी और उसमें चल रही धांधली का सवाल उठाया।

जमशेदपुर, प्रभात खबर के स्थानीय संपादक रंजीत ने मीडिया को एक सर्कस की संज्ञा के साथ अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि इस सर्कस का रिंग मास्टर- संपादक है, जबकि इन दिनों जोकर की भूमिका में पत्रकार हैं, जहां तक पाठक का सवाल है तो वो दर्शक की भूमिका निभाकर ही संतुष्ट बैठा है। मीडिया वाच डॉग की भूमिका छोड़कर फेसिलिटेटर की भूमिका में आ चुका है। अगर मीडिया में वाकई बदलाव लाना है, तो उसे चौक-चौराहे पर खड़ा कीजिए और सवाल दागिए।

रंजीत ने कहा कि अखबारों इन दिनों कई तरह के दबाव के बीच निकल रहे हैं- सत्ता, पूंजी और कॉरपोरेट का दबाव। छोटे अखबारों को जिंदा रखने की ताकत समाज को खुद पैदा करनी होगी। हालांकि उन्होंने इस बात पर संतोष जताया कि सरकार, लोकशाही और ज्यूडिशियरी के मुकाबले मीडिया की आज भी सबसे बड़ी ताकत है कि वो अपनी आलोचना सुनने को हर पल तैयार रहता है।

प्रभात खबर के वरिष्ठ साथी पुष्यमित्र ने रंजीत की बात को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि पाठकों की तरफ से मीडिया का रिजेक्शन होना चाहिए। जिलों में मीडिया वॉच जैसी संस्थाएं होनी चाहिए। एक फीसदी पत्रकार जो बदलना चाहते हैं, उनके लिए ये रिजेक्शन, आलोचना एक आईने का काम करेगी। उनके बाद मंच पर आए तारकेश्वर मिश्रा ने स्थानीय सृजन की बात कही तो शारदानंद झा ने कर्ता भाव और कर्तव्य भाव के सामंजस्य का सुझाव दिया।

पटना आईनेक्स्ट के स्थानीय संपादक चंदन शर्मा ने एक तरफ मीडिया को पूरी तरह गुलाम बताया तो वहीं इस सबके बीच वैकल्पिक रास्तों की तलाश पर जोर भी दिया। उन्होंने फेसबुक, ब्लॉग और इंटरनेट को संचार के नए हथियार बताया। इसके साथ ही संपादक के नाम चिट्ठी के पारंपरिक तरीके को पुनर्जीवित करने की अपील भी की। हिंदुस्तान के प्रभात ने गंदगी, गरीबी और अशिक्षा के खिलाफ मीडिया को कारगर हथियार बताया बशर्ते ईमानदारी से और विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग हो।

एक-एक वक्ता को बड़े ध्यान और धैर्य से सुन रहे सामाजिक कार्यकर्ता अनिल प्रकाश ने अध्यक्षीय वक्तव्य में इस परिचर्चा का सार सामने रखा। उन्होंने कहा कि जो सत्ताधारी मीडिया को कंट्रोल करने की कोशिश करता है, उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं है। अगर आप अपने खिलाफ असंतोष को अभिव्यक्ति के मौके नहीं देंगे तो समाज में एक दिन विस्फोट हो जाएगा, जो सत्ताधारियों के लिए कहीं ज्यादा घातक होगा। इसके साथ ही उन्होंने समाज के बीच काम करने वाले लोगों को ये संदेश भी दिया कि मीडिया के कैमरों के सामने फोटो खिंचाने से नेता या एक्टिविस्ट पैदा नहीं होता।

आयोजन के दूसरे और तीसरे सत्र में अप्पन समाचार की पहल और पुष्यमित्र के उपन्यास की झलक के साथ सभी अपने घर लौटे। हां, इसमें गांव ज्वार के कलाकार ने निर्गुण के सुरों में विनय की यादें घोल दीं। निर्गुण के बोल ट्रेन की धुक-धुक में बार-बार विनय की धक-धक के गुम हो जाने की बेचैनी, उदासी के साथ ही आगे बढ़ने और जीवन के चलते रहने की चेतना को झकझोर गए।
-पशुपति शर्मा

मंगलवार, 29 मई 2012

ये सड़कें कहीं नहीं जाती...


उत्तराखंड के देवप्रयाग में हल्दू और दैडा के जंगलों से गुजरते हुए अचानक पांव ठिठक जाते हैं। अनायास ही जंगल की हरीतिमा खत्म हो जाती है और धूसर, पथरीला पहाड़ नजर आने लगता है। कुछ दूर चलने के साथ ही यह भी ज्ञात हो जाता है कि क्यों जंगल खत्म हो गए। दरअसल यहां सड़क बनाई जा रही है। आश्चर्य इस बात पर नहीं होता कि सड़क बन रही है, लेकिन इस बात पर जरूर होता है कि सड़क बनाने के लिए सम्बद्ध विभाग ने कितनी निर्दयता से पर्वत और जंगल को नष्ट किया है। एक विशाल क्षेत्र से वृक्ष गायब कर दिये गए हैं। सिर्फ ठूंठ, जमीन पर यहां वहां बिखरी शाखें और विनाश के चिन्ह हैं। इस जंगल का एक हिस्सा वन क्षेत्र के नाप में आता है, दूसरा हिस्सा सिविल है। लेकिन जिला प्रशासन ने वन विभाग को बिना किसी सूचना के इस जंगल को पथरीले मैदान में बदल दिया। स्टोन क्रशर, बुल्डोजर और बड़ी बड़ी मशीनों से पहाड़ को रौंद कर समतल कर दिया गया है और विस्फोट कर पूरे इलाके में पत्थर बिखेर दिये गये। ताज्जुब है कि वन संरक्षक को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि वहां स़ड़क बनाई जा रही है। इस लापरवाही और निर्वैयक्तिकता के लिए पहले तो वनविभाग ही दोषी है, दूसरा दोष जिला प्रशासन का है जिन्होंने इतनी बड़ी पहाड़ी पट्टी को वृक्ष से सूना कर दिया लेकिन वन विभाग से इसकी आज्ञा लेने की जरूरत नहीं समझी।

कुछ अरसा पहले तक इन पहाड़ों पर हरे भरे पेड़ थे। अब मरे हुए, निष्प्राण वृक्ष हैं। व्य़ासघाट से डाडा नागराज तक सड़क बनाए जाने के क्रम में विकास का अलकतरा जब गिराया गय़ा तो सुंदर वन उसके ताप में तबाह हो गए। इस इलाके में अब मीलों रोते हुए बंजर पहाड़ हैं जिनके सीने पर चट्टानों का साम्राज्य है। हल्दू और दैडा के जंगली इलाकों को ध्वस्त किये गए पहाड़ के मलबों से पाट दिया गया है। बोल्डरों से कुचले गए हजारों पेड़ या तो नीचे बहने वाली गंगा में समा गए या फिर खड़े खड़े सूख गए। अब सोचिये कि पर्यावरण और गंगा को बचाने का सरकारी शोर कितना सच्चा है। सच तो यही है कि इन दोनों को रौंदे जाने की प्रक्रिय़ा सतत चल रही है।

इस विनाश की जानकारी जब गढ़वाल के वन संरक्षक को दी गई तो उन्होंने सड़क निर्माण कार्य रुकवा दिया। चूंकि इस वन क्षेत्र का एक हिस्सा नाप में और एक हिस्सा सिविल इलाके में आता है इसलिए वन विभाग के अधिकार भी सीमित हैं। अब कार्रवाई करने की बारी जिला प्रशासन की है जिनकी ओर से अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।

जब आप यहां का मंजर देखेंगे तो आपको विश्वास नहीं होगा कि कुछ महीनों पहले तक यह क्षेत्र घने और छायादार पेड़ों से घिरा था, जिनका एक सुंदर छंद था। अब क्या है? सिर्फ चट्टानी चुप्पी और पथरीले पनाहगाह। आखों में बसने वाले वन को बर्बरता से तहस नहस कर दिय़ा गया है। और यह सब एक सड़क बनाने के नाम पर हुआ है ताकि आप इस रास्ते पर चलें, सरकार का कृतज्ञता ज्ञापन करें कि उन्होंने आपके लिए सड़क बनाई, प्रकृति के बीच होने के भ्रम में भी रहें। और इस सत्य से सवर्था अनभिज्ञ रहें कि गंगा के पास से गुजरने वाली इस सड़क ने कितनी बड़ी बलि ली है।

देवांशु झा, महुआ चैनल के प्रोग्रामिंग से जुड़े हैं। आपसे 9818442690 पर संपर्क किया जा सकता है।