शनिवार, 31 जुलाई 2010

स्नेह का सोता न जाने कहां गुम हो गया....


फ्रेंड, फिलॉसफर, गाइड । दुबे सर को क्या कहें, ये दुविधा मेरी नहीं उनकी है जिन्होंने मेरा तार्रुफ दुबे सर से कराया । आनंदजी (आनंद प्रकाश श्रीवास्तव, मौजूदा एसोसिएट एडिटर, द संडे इंडियन) के साथ ही दुबे सर से पहली मुलाकात हुई और आखिरी भी । आनंद सर सदमे में हैं और अभी इससे उबर नहीं पाए हैं । बुधवार (28 जुलाई 2010) सुबह 6 बजे करीब दुबे सर के नंबर से फोन आया । इतनी सुबह फोन देख जो डर मन में कौंधा अगले पल कुछ लफ्जों ने वही बात दोहरा दी । तुरंत आनंद सर का फोन आया और हम दुबे सर के घर पहुंचे । जो सीढ़ियां चढ़ते हुए हम ऊपर उनके कमरे तक पहुंचते थे, वहां सन्नाटा पसरा था और दुबे सर खामोश थे । वो होते तो न जाने देखते ही कितनी बातें कह जाते । जब भी मिले बड़ी गर्मजोशी से और बड़ी जिंदादिली से । एक रिश्ता स्नेह का था... जो सारे रिश्ते से कहीं बढ़कर था ।
दुबे सर से पहली मुलाकात की पृष्ठभूमि और पूरा प्रकरण भी काफी रोचक है । बात करीब 7 साल पुरानी है । कुछ निजी कारणों से उन्हें उन दिनों बिहारियों से बड़ी चिढ़ हो गई थी । लोकायत में कुछ संपादकीय सहयोगियों की जरूरत थी और मैंने एक झूठ के सहारे उनसे ये नौकरी मांगी । मैंने कहा कि मैं राजस्थान से हूं । हालांकि ये आंशिक रूप से सच था फिर भी झूठ ही था । इसी तरह पुष्यमित्र ने भी खुद को मध्यप्रदेश का बता कर उनकी टीम ज्वाइन की । हालांकि दुबे सर किसी भी शख्स से इतने सारे सवाल करते हैं कि ये झूठ बहुत दिनों तक नहीं चल सका । फिर तो वो जब न तब ठहाके लगाते और हमें ताना मारते- तुम बिहारियों से मैं बचना चाहता था और तुम्हीं लोगों ने मुझे घेर लिया ।
लोकायत की ये नौकरी बहुत दिनों तक नहीं चली । पत्रिका के पहले इश्यू के साथ ही दुबे सर ने पत्रिका को अलविदा कर दिया । इस पत्रिका में काम करने की सबसे बड़ी उपलब्धि दुबे सर से परिचय ही रहा । इसके बाद उनसे निजी मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ और एक अजीब सी आत्मीयता बनती चली गई । दुबे सर के यहां ज्यादातर आनंद सर के साथ ही जाना होता था । दरअसल उनकी बातचीत का दायरा इतना बड़ा होता था कि मुझे हर वक्त डर लगता रहता, पता नहीं कब कौन सा सवाल दाग दें । हालांकि थोड़ी सी झिड़क के साथ ही फिर वो विस्तार से सब कुछ समझा कर ही दम लेते ।
दुबे सर ने काफी स्नेह और प्यार दिया । मेरी नौकरी को लेकर चिंतित रहते और जब नौकरी हो गई तो शादी को लेकर सलाह देने लगे । शादी पक्की हुई और मैंने उन्हें सूचना दी तो कहा मैं जरूर जाऊंगा पूर्णिया । तब मैं और दुबे सर एक साथ ही घर गए थे । तिलक से लेकर रिसेप्शन तक हर फंक्शन में दुबे सर शामिल हुए । डायबिटीज की शिकायत के बावजूद मिठाइयां जमकर खाईं और बारात में ठुमके भी लगाए । घर का हर छोटा- बड़ा दुबे सर का ये जोश और उनका प्यार देख दंग था । मैं मन ही मन गदगद ।
दुबे सर के साथ दूसरी यात्रा महेश्वर की रही । अभी मार्च महीने की ही तो बात है । दुबे सर के सामने मैंने महेश्वर जाने का प्रस्ताव रखा और वो फट से तैयार हो गए । कब और कैसे जाना है फटाफट प्रोग्राम बनाया और चल पड़े। महेश्वर विजिट के दौरान काफी बातें हुईं । मीडियाकर्मियों के हालात और उनके संगठन को लेकर वो काफी फिक्रमंद थे । वहां हर किसी के साथ काफी गर्मजोशी से मिले और कई सारे सवाल भी रखे । मुझसे कहा कि विकास संवाद वालों से बात कर अगली बार एक सत्र अपने मन के मुताबिक रखवाऊंगा और उसका संचालन भी खुद ही करूंगा । सचिन जी के साथ भी काफी बातें की... लेकिन ये अगला साल नहीं आ सका ।
दुबे सर के साथ आखिरी मुलाकात विनायक अस्पताल में हुई । इधर-उधर की बातों के बाद मेरे घर के बारे में पूछने लगे । कहने लगे सर्बानी को बी एड करवा दो । मेरी पत्नी सर्बानी के करियर को लेकर वो शुरू से ही काफी फिक्रमंद रहे । उसने लॉ कर लिया है अब कुछ करवाते क्यों नहीं ? कुछ नहीं तो बी एड करवाओ... नौकरी लगवाओ.. सर्बानी से भी फोन पर ये सब बात दोहराते । वो इस बात के पक्षधर थे कि महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हों और घरेलू हिंसा या दमन का शिकार न हो । गाहे-बगाहे कई उदाहरणों से वो मुझे भी ताकीद करते रहते थे ।
दुबे सर का जाना... स्नेह के एक साये का उठ जाना है... अब वो बस यादों में ही रहेंगे... कभी हम उस कमरे में बैठ कर घंटों गप्प नहीं लड़ा सकेंगे जहां पता नहीं कितनी- कितनी बार हमने अड्डा जमाया... अब दुबे सर के साथ स्लमडाग मिलेनियर भी नहीं देख पाएंगे... अब कभी मन घबराया तो कहां जाएंगे सर... एक घर था अपना वो तो उजड़ गया... पिता तो मीलों दूर हैं.... एक पिता जो थोड़े से फासले पर बैठा था उसने भी अपना हाथ सिर से उठा लिया... हम स्वार्थी हैं सर... इसलिए भी आपको काफी-काफी मिस करेंगे... आपकी तरह निर्लिप्त और निर्मोही नहीं कि पल भर में टाटा-बाय कर चलते बने....

पशुपति शर्मा
मीडियाकर्मी और दुबेजी के स्नेह का चिर आकांक्षी

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

दुबे जी आप सुबह बहुत याद आओगे


मौत हमारे लिए खबर होती है। कई बार तो मौत ही हमारे लिए खबर होती है। दुबे जी के साथ भी यही हुआ। कृष्णन दुबे जी के साथ। दुबे जी अब नहीं रहे। इसके पहले के कुछ दिनों में वे क्या सोच रहे थे? दुनिया को किस ढंग से देख रहे थे? कितने उदास थे और कितने ऊर्जावान, इसकी कोई खबर नहीं है। बीते पांच सालों में उनसे कम ही मुलाकातें हुई, लेकिन वे हर बार ऊर्जा और अपनत्व से भरे हुए मिले। उनका न रहना अपूरणीय क्षति नहीं है, क्योंकि वे महान नहीं थे। इंसान थे। गलतियों से सीखने वाले और हर समय नये नये सपनों में रंग भरने वाले इंसान। वे कहते थे- हर कोई पत्रकार, नेता, डॉक्टर, इंजीनियर होना चाहता है, लेकिन इसके लिए जरूरी शर्त इंसान होना है। यह शर्त दुबे जी पूरी करते थे। वे भरपूर इंसान थे। सुख में हंसने और दुख में रोने वाले इंसान।

पहली मुलाकात रांची में हुई थी। 'पब्लिक एजेंडा' मैगजीन के प्रकाशन से पूर्व संभावनाओं और योजनाओं को जमीनी स्तर पर टटोलने के लिए वे हैन्सन जी के साथ पहुंचे थे। महाराजा होटल में। पशुपति जी ने फोन पर बताया था कि उनसे मिल लेना। शाम को फोन किया तो बोले कि झारखंड के विभिन्न इलाकों में घूमने और अखबारी साथियों से मिलने का प्रोग्राम है। साथ चलने का प्रस्ताव रखा तो मना नहीं कर सका और दूसरे दिन सुबह सबेरे उनसे मिलने पहुंचा। मेरी सेहत पर नर्म टिप्पणी करते हुए नाश्ता मंगवाया और चल दिये। 8 बजे हम डाल्टेनगंज यानी मेदिनीनगर के लिए निकले। गर्मी खासी थी सो एसी चल रहा था। रातू रोड पार करते करते उन्होंने कार की खिड़की खोल ली। ताजी हवा के लिए। सिगरेट भी सुलगा चुके थे।

76 वर्षीय दुबे जी किस्सों के साथ ताजा राजनीतिक घटनाओं का मार्क्सवादी विश्लेषण करते जाते थे। उनकी जानकारी और अध्ययन प्रवृत्ति के बारे में सुन रखा था लेकिन वे सुने से कहीं ज्यादा पढ़ाकू थे। हर विषय पर स्पष्ट राय और उत्साहित करने वाली जानकारी उनके पास थी। मेरे लिए यह मजेदार सफर होने वाला था। उन्होंने रोडमैप तैयार कर रखा था। किस शहर में किससे मिलना है, क्या बात करनी है? कौन सी इन्फारमेशन निकालनी है? कहां कितना रुकना है और अगले शहर तक पहुंचने के लिए कम से कम कितने बजे निकलना है, से लेकर कहां नाश्ता और कहां खाना-खाना है, तक को वे मोटे तौर पर निर्धारित कर चुके थे।

डाल्टेनगंज, गढ़वा, गुमला, राउरकेला, सिमडेगा के हालात पर चर्चा होती रही। कई खबरों के बारे में और रांची के अखबारों के बारे में भी। प्रभात खबर में छपने वाली छोटी-छोटी खबरों के बारे में उनकी मायनीखेज टिप्पणी आज भी नहीं भूलती कि-''अखबार को रोजनामचा होने से बचना चाहिए। कौन सी खबर पढ़ानी है इसकी समझ संपादकीय साथियों को जरूर होनी चाहिए। पेज पर ज्यादा खबरें देना संपादकीय अयोग्यता ही है।"

हम शाम तक लातेहार और डॉल्टेनगंज का काम निपटा कर गढ़वा पहुंच चुके थे। इस बीच मांडर, चान्हो, कुडू, मनिका में भी रुके। सिगरेट और राजनीतिक बातचीत चलती रही। अखबारी दुनिया पर टिप्पणी के साथ वनस्पितियों के बारे में भी दुबे जी बताते जा रहे थे। हैन्सन शाम की 'व्यवस्था' के लिए परेशान थे। गढ़वा के राज होटल में रुके थे हम। मच्छरों ने सारी रात परेशान किया और सुबह-सुबह बिना चाय पिये ही हम सरगुजा की ओर चले। रंका पहुंचकर चाय नाश्ता किया और आगे बढ़े। रामानुजगंज से छत्तीसगढ़ शुरू हो जाता है। हम रामानुजगंज से तकरीबन 10-15 किलोमीटर आगे तक निकल गये थे। यहां एक गांव था, नाम याद नहीं आ रहा। वहां जाम लगा था सो लौट लिये।

दुबे जी की इच्छा थी कि रुककर इंतजार करते हैं जाम खुलने का। पता चला जाम ग्रामीणों ने लगाया है। कोई ट्रक किसी पशु को टक्कर मारकर चला गया था, जिसके विरोध में जाम लगा था। धूप बढ़ती जा रही थी और जाम खुलने के आसार नहीं थे। सो लौट लिये। गढ़वा की ओर। रास्ते में तय हुआ कि नेतरहाट चलते हैं। गढ़वा के पहले ही कोलिबिरा जाने वाली रोड पर मुड़ गये और तकरीबन पांच बजे शाम को हम नेतरहाट की पहाड़ी पर थे। झारखंड की खूबसूरती का एक शानदार नमूना। यहां के प्रभात होटल में रुके। शाम आठ बजे तक पहाड़ी से दूर तक फैले खेत और पहाड़ों को ताकते हुए हमने कई सिगरेटें सुलगाई और बातचीत का सिलसिला लगातार चलता रहा।

नक्सलवाद पर हैन्सन और दुबे जी के बीच थ्योरिटीकल बातचीत होती रही। बीच-बीच में मैंने स्थानीय हकीकतों को जस्टीफाई किया तो दुबे जी तकरीबन भड़क गये। वे मानने को तैयार नहीं थे कि नक्सल पॉलिटिक्स में आपराधिक तत्व हो सकते हैं। उन्हें गुरिल्ला वॉरफेयर के चेक्स एंड कंट्रोल पर पूरा भरोसा था। दरहकीकत वे अपनी खीज मिटा रहे थे। चांदनी रात में शराबनोशी के साथ उन्होंने सीपीआई और सीपीएम की पॉलिटिक्स को जमकर लताड़ा। हिंदुस्तान में रेवोल्यूशनरी पॉलिटिक्स की कमी और टैक्टिस पॉलिटिक्स की हालिया खामियों पर बोलते रहे।

10 बजते बजते वे तकरीबन एकालाप की स्थिति में थे। यह गुस्सा था जो निकल रहा था। वे करीब 12 बजे सोये। सुबह-सबेरे वे जागे और हैन्सन व मुझे जगाया। घूमने निकले और स्थानीय लोगों से बातचीत की शुरुआत की। दोपहर के खाने से पहले तक यह सिलसिला चलता रहा। आदिवासियों के बीच हनुमान की मूर्तियों को लेकर दुबे जी खासे आतंकित थे। वे इस रूपांतरण के आर्थिक और राजनीतिक आधार देख रहे थे। चर्च की भूमिका और हिंदू संगठनों के कार्यों से वे साथ-साथ नाराजगी जाहिर कर चुके थे।

इसी दिन शाम में हम गुमला पहुंच चुके थे। बीच में छऊ नाच की एक मंडली से यादगार भेंट, सिमडेगा में जनी शिकार पर निकली महिलाओं के फोटो और खेतों में घूमने की रंगतों के बीच देर रात को हम राऊरकेला में थे। यहां की झारखंडी पॉपुलेशन, सर्कुलेशन और खबरों के रिवाज को परखते - परखते रात के तीन बज गये थे। हम सो गये। दूसरे दिन ताजा दम हो तकरीबन दस बजे फिर निकले इस बार बिरमित्रपुर होते हुए हमें कोलिबिरा पहुंचना था। रास्ते में ग्रामीणों से बातचीत और मुकेश के गानों पर भी बातचीत होती रही। ओपी नैयर की धुनों के दीवाने दुबे जी भारतीय संगीत के अच्छे श्रोताओं में से एक थे। वे गीतों को गुनगुनाते हुए लय और ताल का पूरा ख्याल रखते थे। अपनी उम्र को छकाते हुए वे जबरदस्त स्टेमिना के साथ गाते थे।

उनकी स्टेमिना का दूसरा नमूना पूर्णिया में मिला। पशुपति जी की शादी में। बारात पूर्णिया से रायगंज, पश्चिम बंगाल जानी थी। हम कुछ दोस्त एक गाडी में बैठ गये। दुबे जी को छोड़ दिया तो बीच में जब नाश्ते के लिए रुके तो वे हमारे साथ हो लिये। जब मैंने कहा कि दुबे जी आपको बुजुर्गों के साथ रहा चाहिए। तो बोले- वहां खतरा ज्यादा है। मैंने कहा कि- लौंडों की सोहबत में ढेले की सनसनाहट भी सुननी पड़ती है। तो मुस्कुराते हुए बोले- ढेले हमने भी फेंके हैं और यकीन मानो तुम लोगों से ज्यादा सनसनाहट पैदा की है।

पूरे कार्यक्रम के दौरान वे उत्साह से भरपूर रहे। शादी के बाद जब हम कुछ मित्र भागलपुर गये तो वे पूर्णिया में ही रुक गये। दूसरे दिन मैं लौटा तो उपाध्याय जी और वे भिडे हुए थे। उपाध्यायजी खांटी संघी और दुबे जी क्लासिकल मार्क्सवादी। दोनों ने एक साथ पूरा दिन कैसे गुजारा होगा यह मैं अनुमान लगा सकता था, लेकिन साथ मुझे दिल्ली तक की यात्रा करनी थी। यह सोचकर मैं सिहर गया। पूरी यात्रा के दौरान दुबे जी चालू रहे। संघी सोच के तर्कों को उदाहरणों और यकीनी जनवाद से रौंदते हुए वे थोड़े पजेसिव भी लगे , लेकिन उनका मार्क्सवाद में विश्वास ताकत देता था।

बाद में छुटपुट मुलाकातें उनके घर और पूसा रोड स्थित पब्लिक एजेंडा के ऑफिस में होती रही। खाने और पीने के शौकीन दुबे जी के साथ पब्लिक एजेंडा ऑफिस में हुई मुलाकात मेरे लिए अपनी सबसे अच्छी दोपहरों में से एक रही है। अब अंधेरी कोठरी का वह रोशनदान बंद हो चुका है, लेकिन जो रोशनी उन्होंने फैलायी वह यकीनन भरोसा देते है, उजाले का। इस रात में जब हर तरफ रोशनी की दरकार शिद्दत से महसूस की जा रही है, दुबे जी याद आते हैं। उन्हे यकीन था कि सुबह होगी। वे सुबह का इंतजार कर रहे थे। रोशनी को बचाने की जुगत भी कर रहे थे। अफसोस वे सुबह के पहले ही चले गये, इस काली रात में। सुबह जब रोशनी होगी, तब आप बहुत याद आओगे दुबे जी।

सचिन श्रीवास्तव
गाजियाबाद से प्रकाशित 'एक कदम आगे' के संपादकीय साथी और दुबेजी के युवा मित्रों में एक।

दुबेजी, हम करेंगे आपके सपने पूरे


दुबे जी ने कहा था आप लोग शुरू करो,दिल्ली से हर संभव मदद दिलाने का मैं वायदा करता हूं। अफसोस उनके सपनों को हम छोटी-मोटी कोशिशों से साकार कर पाते इससे पहले ही वह चले गए। उम्र के इस मुकाम पर पहुंचकर भी उनके अंदर के जज्बात,हौसले, उर्जा, उनके सपनों, स्नेह और सम्मान को समझा जा सकता था।

आज सुबह सचिन भाई (नई इबारतें वाले)की पोस्ट से जब यह सूचना मिली तो पूरा दफ्तर सन्न था। हम सभी के लिए यह एक गहरा आघात था। केवल एक व्यक्ति के रूप में ही नहीं, मीडिया के बदलते परिवेश में वह उन चंद लोगों में थे जो अब भी अखबारनवीसों की ताकत के एकजुट होने की बात कहते थे, मीडिया में बदलाव की बात करते थे, मानकों की बात करते थे। महेश्वर में मीडिया सम्मेलन के बाद दुबे जी हमारे लिए एक प्रेरणा पुरूष बन गए थे।

दुबेजी से कोई बहुत पुराना नाता नहीं थी। इसी साल जब विकास संवाद के सालाना सम्मेलन के लिए लोगों से बातचीत हो रही थी तो पशुपति भाई ने दुबेजी के बारे में बताया था। भाई प्रशांत दुबे ने उनसे बात की तो पहला फोन ही लगभग पौन घंटे की अवधि का रहा होगा। इसी से उनकी जिज्ञासा को समझा जा सकता है।

पशुपति भाई के साथ जब दुबे जी 14-15 घंटे का लंबा सफर तय करके महेश्वर पहुंचे थे। उनको देखा तो एकबारगी सोच में पड़ गया कि आखिर कौन सी उर्जा है इस व्यक्ति के अंदर जो इस अवस्था में इतने कष्ट सहने के बाद एक सम्मेलन में शरीक होने चला आया है।

इस बार सम्मेलन में हमने नर्मदा घाटी के पांच गांवों में चलने की यात्रा करने की योजना तैयार की थी। बातचीत के बाद तय किया गया था कि पहले ही दिन गांवों में जाया जाए, वहां लोगों से बात करें। घाटी के लोगों ने हमसे पहले ही वायदा ले लिया था कि मेहमानों को हम ही भोजन कराएंगे। पांच समूह निकले थे। तीन जीप से और दो बस से। मैं जिस जीप में था उसकी अगली सीट पर दुबेजी विराजमान थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यकर्ता रामकुंवर भी साथ थीं। बीच की सीट पर राकेश दीवान, रितुजी, रानूजी, सीमाजी बैठे थे। पीछे शेख भाई, आसिफ भाई, आशीष अंशु भाई और मैं ठुसे हुए थे। खास बात यह थी कि हमारा गांव मरदाना सबसे दूर था और रास्ता बेहद खराब। लगभग तीन घंटे की थका देने वाली यात्रा के बाद हम गांव में पहुंचे थे। लगभग आठ बजे हमने एक घर में चाय पी। उनसे सामान्य बातचीत होती रही। यह घर बेहद जुदा अंदाज में बना हुआ था। दुबे जी घर की उसारी में पड़े झूले पर बैठे। चाय पी। इसके बाद हमें नर्मदा किनारे एक मंदिर में जाना थां। अंधेरे के कारण इस घाट के सौंदर्य को तो हम नहीं देख सके, लेकिन दाल-बाटी और चावल खाना बहुत राहत भरा था। मंदिर से लौटते-लौटते नौ बज गए थे। इस बीच पूरे गांव में खबर हो गई थी और लोग बातचीत के लिए जमा थे। कोई घरों की टिपटियों पर, कोई फट्टों पर और कोई अपने जूतों और चप्पलों को ही नीचे दबाकर बैठा था।

गांव वाले पूरे तथ्यों और आंकड़ो के साथ अपनी-अपनी बातें कह रहे थे। इतनी कहानियां, इतनी बातें थी कि पूरी रात भी बैठक चल सकती थी। मुझे बीच में आना पड़ा और मैंने निवेदन किया कि दुबेजी सहित सभी लोग काफी दूर-दूर से आए हैं, थके हुए हैं और अभी लंबा सफर तय करके वापस महेश्वर भी जाना है। आखिरी वक्ता के रूप में दुबेजी ही सामने आए थे। वह अभिभूत थे। इस पूरी लड़ाई को और लड़ने वालों को उन्होंने प्रणाम किया था। उन्होंने आशा भी जताई थी कि एक न एक दिन यह लड़ाई जरूर बेहतर परिणाम की तरफ जाएगी। उन्होंने कहा था आज मुझे लग रहा है कि हम दिल्ली में बैठकर कुछ भी नहीं कर रहे, असली लड़ाई जो है वह आप लोग ही लड़ रहे हैं।

पूरे रास्ते भर आते-जाते उन्होंने बातचीत में एक सूत्रधार की भूमिका अदा की। नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ राकेश भैया का एक लंबा रिश्ता रहा है। उनके पास आंदोलन की कहानियों का विशाल भंडार है। राकेश भैया की जान-पहचान और दोस्ती का दायरा भी बहुत बड़ा है, लेकिन दुबेजी से उनकी भी यह पहली मुलाकात थी। बात जब इधर-उधर के चुटकुलों से आंदोलन की कहानियों पर आई तो राकेश भैया एक के बाद एक सुनाते चले गए। कहानियों में हुंकारा भरने वालों में भी दुबे जी सबसे आगे थे। इतनी लंबी यात्रा के बाद उनका शरीर भले ही थक-थक जा रहा हो, लेकिन वह नहीं थके थे। महेष्वर से 12 किमी दूर एक जगह हमने गाड़ी रोककर चाय पी। महेश्वर पहुंचे तो हमारे अलावा बाकी के सभी लोग कहीं पहले पहुंच गए थे। कई बिस्तरों में जा पहुंचे थे। अजीत सर, अखलाक भाई, पुष्यमित्र ने बाहर मंडली जमा रखी थी।

दूसरे दिन आधार वक्तव्य के बाद कृष्णन दुबेजी ने भी अपनी बात रखी थी। उन्होंने कहा था कि सभी को मालूम है कि समस्या क्या है, हमें उसके हल की तरफ बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा था कि मौजूदा दौर में ट्रेड यूनियन या तो खत्म हो गए हैं या निष्क्रिय हैं। सबसे पहले जरूरत इस बात की है कि जगह-जगह ट्रेड यूनियन का गठन किया जाए ताकि पत्रकार तो कम से कम अपने पर हो रहे अन्याय का विरोध कर सके। दूसरे उपाय के तौर पर उन्होंने वैकल्पिक मीडिया के बढ़ावे की बात कही थी। इसके लिए एक लाख रूपए की मदद दिल्ली स्तर पर करने की बात भी की थी।

पूरे सम्मेलन में वह सबकी बातों को ध्यान से सुनते रहे। कभी हॉल में बैठकर, थक जाते तो बाहर कुर्सी लगाकर बैठ जाते।
सम्मेलन से लौटकर दुबे जी ने सम्मेलन की थीम मीडिया के मानक और समाज पर हमें एक लंबा आलेख भेजा था। लगभग आठ पेज के इस आलेख में उनकी सोच,सपने और नजरिया साफ झलकता है।

दुबे जी का चले जाना एक खालीपन के आ जाने जैसा है। अलग-अलग लोगों के साथ उनके कितने-कितने अनुभव थे। दुबे जी आप याद आते रहेंगे। आपकी बातें हम सभी के लिए हमेशा प्रेरणा रहेंगी। दुबे जी को विकास संवाद परिवार की भावभीनी श्रद्धांजलि।

-राकेश मालवीय, विकास संवाद, भोपाल

सोमवार, 28 जून 2010

कमाठीपुरा की गलियों से


शिरीष खरे, मुंबई से

यह शहर के उठने का वक़्त है. बोरीबली से मुंबई सेंट्रल आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक़्त, हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक़्त है. मुंबई सेंट्रल से यात्रियों को अपने में समाए बेस्ट यानी ‘बॉम्बे एलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट’ की लालधारी बसों ने भी चौतरफ़ा दौड़ना शुरू कर दिया है. मुझे भी यहाँ से पैदल अब 15-20 मिनट ही चलना है, सिटी सेंटर से होते हुए सीधे कमाठीपुरा की गलियों की तरफ़.

अटपटे-से एहसासों से जुड़े कुछ सवाल लिए हुए बढ़ रहा हूँ. क्या आप जानते हैं कि रेडलाईट की यह गलियाँ सारी रात जागी हैं और ग्राहकों के इंतजार में अभी भी सोई नहीं हैं ?

यहाँ की गलियों ने यहाँ को बनते हुए देखा है. अंग्रेजों ने अपने सैनिकों के लिए यहाँ कभी ‘कम्फर्ट जोन’ बनवाया था और विदेशों से बड़ी तादाद में यौनकर्मियों को बुलवाया था. 1928 में यौनकर्मियों को लाइसेंस जारी किए थे. मगर 1950 में सरकार ने यौन व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया था. इसके बावज़ूद यह इलाक़ा आज भारतीय यौनकर्मियों का बहुत बड़ा घर कहलाता है. यहाँ 200 से ज्य़ादा पिंज़रानुमा कोठरियों में 5000 से भी ज्यादा यौनकर्मियों का रहवास है.

आंध्रप्रदेश के कमाठी मजदूरों के नाम पर यह इलाक़ा कमाठीपुरा कहलाता है. एक ज़माने में गुजरात के वाघरी लोगों की भी यहाँ खासी तादाद थी. मगर अब तो बँगाल, नेपाल, कर्नाटक, तमिलनाडू, उड़ीसा, असम से आए लोग भी ख़ूब मिल जाया करते हैं.

कमाठीपुरा का यह पूरा इलाक़ा मौटे तौर से 16 गलियों में बटा है, 9 गलियों में सेक्स का कारोबार चलता है, ब़ाकी 5 गलियां रेसीडेंटल और बिज़नेस के लिए हैं. यह गलियाँ आगे जाकर नार्थबुक गार्डन, बैलेसिस रोड़, फाकलेंड रोड़ से जुड़कर अपनी पहचान ख़ोने लगती हैं.

बहरहाल, यहाँ की गलियों में भारी भीड़ के बीच से पैदल चलते हुए आदमी कुछ ज्य़ादा ही ठहर रहे हैं, वह चलते-चलते टकरा भी जाते हैं. हो सकता है कि मेरी तरह आपका दिल भी यहाँ धकधक की आवाज़ पर काबू पाने के चक्कर में बैठता जाए, और ज़ुबान अपनेआप सिलती जाए, दर्ज़नो आँखें उम्मीद लिए आपके ऊपर भी अटक जाएं, और मेरी तरह आपका बदन भी पीला पड़ता जाए.

कतरा-कतरा ज़िंदगी

मौसम तो ख़ुशनुमा है, मगर ख़ुली नालियों से आने वाली बदबू चारों ओर फैली रहती है. एक गली से दूसरी और तीसरी से चौथी में मुड़ता हूँ, मगर पूरा इलाक़ा इतना तंग और फ़ैला हुआ है कि दो-चार बार घूमने के बाद भी यह शायद ही समझ में आए.

इन्हीं गलियों में यौनकर्मियों की अनगिनत और अंतहीन कहानियाँ हैं. यहाँ से यौनव्यापार मौटे तौर पर चार तरीकों से चलते हुए देख रहा हूँ- एक तो अपने को सीधे बेचने वाली औरतों से, दूसरा पिंज़रानुमा कोठरियों की मालकिनों यानी घरवालियों से, तीसरा पिंज़रानुमा कोठरियों में कैद लड़कियों से और चौथा दारू के अड्डों से.

यह एक भरा पूरा बाज़ार है- नीचे दुकानें और ऊपर औरतें खड़ी हैं. शहर की ब़ाकी लड़कियां जब प्यार का खु़शनुमा एहसास लिए सोती-जागती हैं, यहाँ की लडकियाँ अपने को किसी के साथ भी किराए पर खुल्ला छोड़ देती हैं. शहर की ब़ाकी औरतों के लिए सुबह, शाम, रात होने के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं, मगर यहाँ की औरतों के लिए सुबह, शाम, रात का एक ही अर्थ है- ग्राहकों को पकड़ना और उनसे पैसा कमाना. यह अपने ऊपर बेहिस़ाब पाऊडर, लिपिस्टिक, काजल, पर्स, सेंडल, जूड़े, सस्ती जेव्लरी क्या-क्या नहीं लादे हैं. इनके जींस, टीशर्ट, फ़िराक, सलवार-शूट, ब्लाउस, स्कर्ट, साड़ी में हर आकार और प्रकार के कट लगे हुए हैं. ऐसे में एक ग्राहक का काम यहाँ से वह माल छांटना है, जिसे तोड़मरोड़ कर अपने को हल्का कर सके, और कुछ और रातों तक आराम से सो तो सके.

आप यहाँ से देखिए- यह औरतें रंग-ढ़ंग और चाल-ढ़ाल से अपने ग्राहक को किस तरह से पहचान लेती है. दूसरी तरफ, आपको यहाँ आने वालों से भी यह पता लग सकता हैं कि यहाँ कौन-सी गलियाँ कितनी सही हैं, और क्यों हैं, उनमें कौन सी ज़मात वालों का असर ज्य़ादा है, उनका हिसाब-किताब क्या है, उनका धंधापानी कैसा है, कभी-कभार क्या-क्या लफड़ा हो सकता है, और उनसे कैसे-कैसे निपटा जा सकता है, वगैरह-वगैरह.

आप यहाँ से देखिए- एक जगह पर खड़ी होने के बावजूद यह पिंज़रानुमा कोठरी की दुनिया लोकल ट्रेन जैसी नहीं दिखती है, जो कुछ यात्रियों को उतारती है, और नए यात्रियों को चढ़ाकर एक मशीन सी चलती रहती है.

हां भाई सुनिए... एकदम नया आया है.. गलत नहीं ले जाऊंगा चलिए... नेपाली, बंगाली, साऊथ इंडियन सब हैं... पहले देख लीजिए... 12 से 16 का है... गोरा है देखने में क्या जाता है... इधर तो धंधा चलता है... उधर भी सस्ता ही है...

पिंज़रानुमा कोठरी के सामने खड़े हुए नहीं कि एक-एक करके बहुत सारे दलाल आपको घेरने लगते हैं. यहाँ तक कि फ़ोन नम्बर वाली पर्चियां भी देने लगते हैं. इनसे बगैर उलझे आगे बढ़ना ठीक है. वैसे इनकी भी अपनी कहानियाँ हैं. मगर अभी आगे बढ़ना ठीक है.

खै़र पिंज़रानुमा कोठरी के भीतर जैसे ही जाएंगे, वैसे ही आप दूसरी दुनिया में घुस जाएंगे. यहाँ लकड़ी की सीढ़ियों से लगे कुछ कोने, कोनों से दरवाजे, दरवाजों से ताबूतनुमा कमरे और कमरों के अंधियारे से बहुत सारी औरतें दिखाई देती हैं. यहाँ तक़रीबन 25 से 30 औरतों के साथ उनकी एक घरवाली भी दिखेगी. यहाँ औरतों की तादाद और उनकी उम्र से किसी घरवाली की सत्ता और उसकी संपत्ति का पता चलता है. यहाँ तक़रीबन आधी तो 22 साल से ज्य़ादा की नहीं हैं. यहाँ का बड़ा सीधा हिसाब है- 12 से 22 साल तक को ऊँचे दामों पर बेचो, और 30 से 35 साल के बाद घरवाली बन जाओ।

अब मेरी तरह आपको भी यहाँ किसी से सीधे-सीधे यह पूछना मुश्किल हो सकता है कि- "आप यहाँ तक कैसे पहुंचीं"... "वो कौन था जिसने आपसे पहली बार कहा कि पैसे कमाने का यह भी एक तरीका हो सकता है", इसलिए मेरी तरह आप भी यहाँ पहुँचकर हो सकता है कि- ‘आपका नाम...’ ‘आप कैसे हो’ से आगे न बढ़ पाएं.

मगर दिन के उजाले में एक इज्ज़तदार कहलवाने वाला आदमी जहाँ आने से कतराता है, वहाँ से मुझे लगता है कि सुबह से शाम तक का वक़्त ज़रूर बिताया जाए. यहाँ की कुछ सच्चाईयों से दो-चार हो जाया जाए और कोई नैतिक बहस छेड़े बगैर अपना ताज़ातरीन तजुर्बा बांट लिया जाए.

बड़ी बहन, छोटी बहन और...

‘याद आ रही है, तेरी याद आ रही है...’- ‘‘सुबह-सुबह पता नहीं क्यों आ रही है’’ कहते हुए जूही ने रेडियो बंद कर दिया है. आज के दिन पता नहीं कितनों दिनों के बाद वह पूरी नींद सो जाना चाहती है. दिन को जागना उसे कभी भी अच्छा नहीं लगा है. मगर उससे तो हरदम चुस्त रहने की उम्मीद की जाती है. इस उम्मीद के बगैर भी दुनिया चल सकेगी- वह सोच भी नहीं सकती है. शहर के बहुत से ठिकाने बदलने के बाद ही तो वह यहाँ तक आई है, और अब यही की होकर रह गई है.

यहाँ उम्र के पच्चीसवें साल में भी उसने अपने सीधेपन को संभाले रखा है. उसकी सुने तो उसमें अब पहले जैसी बात नहीं है. बचपना तो बहुत पहले ही ख़त्म हो चुका था, जवानी भी ख़त्म होने ही वाली है. असल में जूही की बड़ी बहन चंपा की शादी होने वाली है, इसलिए वह यहाँ हैं. इससे पहले चंपा भी यहाँ बैठ चुकी है. जुही कहती है कि उसके घर में अब कोई फूल (छोटी बहन) नहीं बचा है, इसलिए उसकी शादी के लिए यहाँ कौन बैठने वाली है, पता नहीं है. मगर ऐसा उसने मज़ाक में कहा है या वाकई संज़ीदगी से, यह भी तो पता नहीं चलता है.

वैसे भी उसके हिस्से में दिन और रात का अंतर नहीं बचा है. मौसम के मिजाज़, छुट्टी वाले दिनों या चौपाटी जाने जैसे ख़्यालों से भी जूही का कोई लेना-देना नहीं है. ग्राहक कितना सही है-यह भी उसे नहीं जानना है. शहर के नक़्शे की बजाय उसकी दुनिया के तार तो घनी बस्ती से भी सघन उस नेटवर्क से जुड़े हुए हैं जिसमें हजार रूपए का ग्राहक ढ़ूढ़ लेना सबसे बड़ी बात मान ली जाती है.

मां की तलाश में गोमती

इधर से सबसे आख़िरी के कमरे तक अगर नज़र पहुँचे तो कोई भी यह पूछ सकता है कि उधर रौशनी क्यों नहीं है- यह बात गोमती से अच्छा भला कौन जान सकता है, जिसे 8 साल की उम्र में यहां कैद किया गया था. दरअसल, नेपाल के काठमांडू की गोमती की मम्मी बचपन में मर चुकी थी. इसलिए वह अक्सर स्कूल के बाहर ही बैठी रहती थी. इतनी नाज़ुक उम्र में उसे क्या पता था कि स्कूल या मेले की ऐसी अकेली और गुमसुम बच्चियों पर दलालों की नज़र रहती है.

एक दलाल भी गोमती को कई दिनों से बतियाता और उसे बहलाता-फुसलाता था. उसने यह भी कहा था कि वह उसकी मम्मी को भी जानता है, और अगर वह किसी को कुछ न बताए तो एक दिन मिला भी सकता है. मगर एक दिन उसने गोमती को खाने में ऐसा कुछ दिया कि वह नेपाल से मुंबई तक होश में नहीं आई. यहाँ उसे घरवाली के हाथों बेच दिया गया. घरवाली ने उसे बहुत प्यार-दुलार दिया. उसने कहा मम्मी तुझे मेरे लिए ही तो छोड़ गई है, एक दिन आएगी. मगर गोमती की मम्मी है कि आज तक नहीं आई है.

गोमती बता रही है कि ऐसी लड़कियों को सालों तक कैद करके रखा जाता है. फिर कुछ सालों बाद उसकी बोली लगायी जाती है. अगर लड़की न माने तो उसे कई दिनों तक भूखा और नंगा रखा जाता है, मारा, पीटा और तड़पाया जाता है. मगर जैसे ही लड़की एक बार तैयार हो जाती है तो उसे हाथों हाथ लिया जाता है. जब तक वह कुछ जानती-समझती नहीं है, तब तक तो उससे होने वाली कमाई केवल घरवाली के हाथों में जाती है, मगर जैसे-जैसे लड़की सियानी होती है तो वह खाने, कपड़े, लत्ते के अलावा ग्राहक के पैसे से भी अपना हिस्सा मांगने लगती हैं।

हर एक बाज़ार में नई और आर्कषक चीज़ों की माँग हमेशा बनी रहती है. सेक्स का बाज़ार भी इसी सिद्धांत पर चलता है, यहाँ भी तो ज्य़ादातर ग्राहकों को कमसिन देह ही चाहिए. इसलिए यहाँ बच्चियों के देह व्यापार में हमेशा तेजी बनी रहती है. मगर बच्चियां भी कोई दिमागी तैयारी के साथ तो देह व्यापार में उतरती नहीं हैं, जो पहले से ही उन्हें सेक्स से जुड़ी जानकारियों का ज्ञान हो. इसलिए उनमें सेक्स से जुड़ी गंभीर बीमारियों की आशंकाए बढ़ जाती हैं. लिहाजा, न जाने कितनी गोमतियां एड्स नामक हालात की गिरफ़्त में आ जाती हैं.

बची रहना बिटिया

वैसे दुर्गा जैसी कई औरतें अपनी बच्चियों को ऐसे धंधे से दूर ही रखना चाहती हैं. इसके लिए वह यहाँ से दूर भिमंडी या मीरा रोड़ जैसी जगहों में रहती हैं. दुर्गा बता रही है कि बहुत कम माँएं अपनी बच्चियों को पढ़ा पा रही हैं. एक तो उनकी आधी से ज्यादा कमाई घरवाली, दलाल, डॉक्टर और साहूकार खा जाते हैं. दूसरा यह भी कि जैसे ही वह 30 की होती हैं, तो अक्सर कई तरह की बीमारियों से घिर जाती हैं, उनके सिर पर जब तक बहुत सारा क़र्ज़ भी चढ़ चुका होता है, और जब तक उनकी बच्चियां भी 12-13 साल की हो जाती हैं, जो कभी अपनी माँओं की बीमारियों, तो कभी उनके कर्जों को उतारने के लिए उन्हीं के नक़्शे-कदमों पर चल रही होती हैं.

वैसे बच्चियां जो देखती हैं, वही करती हैं. वह बचपन से मां के जैसा मेक़अप और व्यवहार देख-देखकर उनसे काफ़ी कुछ सीखा करती हैं. इस तरह उनमें आने वाली आदतें ताज़िंदगी आसानी से नहीं जाती हैं. दूसरी तरफ, कुछ बच्चियों को अपनी माँओं का ग्राहकों के साथ जाना अच्छा नहीं लगता है. कई तो पढ़ने में भी तेज होती हैं, मगर उन्हें सही रास्ता कोई नहीं बताता है, और अगर बताए भी तो घर से उतना सहयोग भी नहीं मिलता है. अक्सर घरवाली और दलाल भी उनसे उल्टी-सीधी बातें करके हतोत्साहित किया करते हैं. इसके अलावा, माँओं के ग्राहक भी उनका यौन-शोषण करना चाहते हैं.

अपनी बच्चियों को बचाने के लिए कुछ माँएं उन्हें अपने रिश्तेदारों के पास भेज देती हैं. कुछ माँएं 14-15 साल की उम्र में शादियाँ करा देती हैं. जबकि कुछ माँएं एनजीओ के पुनर्वास केन्द्रों में भेज देती हैं. मगर अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों तक भेजने वाली माँओं को यह डर भी रहता है कि अगर उनकी बच्ची सब जानने-समझने के बाद उनके पास नहीं आयी तो ? इसलिए यह माँएं बीच-बीच में अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों से बुलाती रहती हैं.

पुनर्वास के बजाय फिर धंधे में

कई पुनर्वास केन्द्रों की एक दिक्कत यह भी है कि उनमें केवल 7 से 12 साल तक के बच्चों को ही रखा जाता है. जया नाम की लड़की जैसे ही 13 की हुई, वैसे ही एक एनजीओ ने उसे यह कहकर अपने पुनर्वास केन्द्र से निकाल दिया कि तुम्हारी उम्र की लड़कियों को रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. जया को उस समय पुनर्वास केन्द्र की सबसे ज्यादा ज़रुरत थी, क्योंकि उसकी मां का अपना कोई घर नहीं था और न ही वह उसे कहीं भेज सकती थी. इसलिए जया अपनी माँ के साथ रहने लगी और धीरे-धीरे उसी के धंधे में हाथ बटाने लगी. आज जया को एनजीओ वालों से नफ़रत हैं, वह एनजीओ के बारे में कहती है- "उनका काम तो सब ओर अपना काम दिखाना भर है, कोण्डम या गोली-दवाई देने के अलावा उनका कोई काम नहीं हैं."

यौनकर्मी बनने की बहुत सारी कहानियाँ पारिवारिक हिंसा-दुत्कार, अपराध, बलात्कार और ख़रीद-फ़रोख्त से भी जुड़ी हैं. मगर बाज़ार की फ़ितरत के हिसाब से यहाँ भी शोषण के लिए ज्य़ादातर उन लड़कियों को चुन लिया जाता है, जो पिछड़े और गरीब तबक़े से आती हैं. उनकी मज़बूरियों के ख़िलाफ उनके सारे सपने बहुत सस्ते और थोक में जो ख़रीद लिए जाते हैं.

भारत में यौनव्यापार को रोकने के लिए ‘भारतीय दण्ड विधान, 1860’ से लेकर ‘वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक, 1956’ बनाये गए हैं. इनदिनों कानून में बदलाव की चर्चाएं भी ज़ोरों पर चल रही हैं. मगर इस स्थिति की जड़ें तो बेकारी और पलायन से जुड़ी हुई हैं. इन उलझनों के आपसी जुड़ाव को अनदेखा किया जा रहा है. असलियत यह है कि यहाँ की औरतें घर पर बहुत सारा पैसा भेजने की बजाय दो टाइम की रोटी के लिए जूझ रही हैं. इसलिए नीतियों में इनके जीवन-स्तर को उठाने की बजाय इन्हें जीने के मौके देने वाले नियमों की बात हो तो बात बने भी.

कमाठीपुरा की गलियों से गुज़रते हुए आप कुछ और पिंज़रानुमा कोठरियों में भी घुस सकते हैं, कुछ और चरित्रों से भी बतिया सकते हैं. यहाँ के इन भागों को उनकी संपूर्णता में भी देख सकते हैं. दृश्यों को केवल दृश्य भर न मानकर, उनका विश्लेषण भी कर सकते हैं. बहुत सारे बिन्दुओं के मेलजोल से, एक कहानी को उपन्यास में भी बदल सकते हैं. मगर मेरे भीतर से कागज के फ़ूल, पाक़ीजा, उमराव ज़ान जैसी ओल्ड और गोल्ड फ़िल्मों की हिरोइनें हवा हो चुकी हैं... मेरे सामने केवल मंटो की काली सलवारें लटकी हैं.

मंगलवार, 22 जून 2010

ये ट्रेन मिस कर दो विनय!



(माखनलाल चतुर्वेदी का पूर्व छात्र, दस्तक का साथी, हिंदुस्तान भागलपुर का पत्रकार और सबसे बढ़कर सबका प्यारा विनय चला गया, हमेशा-हमेशा के लिए)


मंगलवार की रात 9 बजे फास्ट ट्रैक का बुलेटिन चल रहा था। मैं पीसीआर में बुलेटिन करवा रहा था इसी दौरान प्रवीण का फोन आया, मैंने काट दिया। दूसरी बार, तीसरी बार घंटी बजी लेकिन मैंने फोन काट दिया। फिर मनोज भाई का फोन आया, वो फोन भी मैं नहीं उठा सका। बुलेटिन खत्म हुआ तो संतोष का फोन आया कि विनय नहीं रहा, विनय हम सभी को छोड़ कर चला गया। विनय तु्म्हारी मौत की खबर भी इस न्यूज बुलेटिन ने मुझ तक पहुंचाने में आधे घंटे की देर कर दी।

सुबह पता चला कि तुम भी ऑफिस पहुंचने की आपाधापी में ही ....। पुष्य ने बताया कि ऑफिस में देर हो रही थी और शायद तुम्हारी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। पटना से तुम भागलपुर के लिए चले थे लेकिन नाथनगर में पता नहीं तुमने चलती ट्रेन से उतरने की कोशिश की या फिर कुछ और.... लेकिन तुम ऑफिस नहीं पहुंच पाए। अब कभी नहीं पहुंच पाओगे। ऑफिस से लौटते हुए जो बात मुझे बहुत ज्यादा कचोट रही थी कि मैं फोन क्यों नहीं उठाया वो अब कुछ और ज्यादा तकलीफ दे रही है। पता नहीं किस हालात और किन दबावों में हम काम करते हैं कि .... खैर! ये वक्त इस बात का नहीं लेकिन पुष्य समेत अपने तमाम साथियों के जेहन में न जाने ऐसे ही कई सवाल उठ रहे हैं।

मेट्रो से घर पहुंचने तक कई मित्रों के फोन आए- किसी के पास कहने को कुछ नहीं था। सब एक दूसरे से एक-दो लाइनों में बात करते और फिर शब्द गुम हो जाते। अखिलेश्वर का मेरठ से फोन आया-भैया विनय नहीं.... उसके बाद न वो कुछ बोल सका और न मैं। इसी तरह ब्रजेन्द्र, उमेश ... सभी इस खबर के बाद अजीब सी मनस्थिति में थे.... शिरीष से बात की और ये सूचना दी तो वो भी सन्न रह गया। विनय अब तुम से तो कोई सवाल नहीं कर सकता लेकिन एक दूसरे से ताकत बटोरने की कोशिश कर रहे हैं... विनय ऐसी भी क्या जल्दी थी... एक दिन ऑफिस छूट ही जाता तो क्या होता... लेकिन हादसों के बारे में क्या कहा जा सकता है... तुमने भी तो शायद ये नहीं सोचा था कि चलती ट्रेन के पहिए तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं...

तुम्हारा चेहरा रात से बार-बार मेरे सामने घूम रहा है... सीधा, सपाट और बिलकुल बेबाक विनय और उसकी उतनी ही प्यारी मुस्कुराहट अब कभी देखने को नहीं मिलेगी... वो विनय जो चंद मुलाकातों में ही बिलकुल अपना सा हो गया था वो पता नही कहां गुम हो गया... बंदर मस्त कलंदर का गोडसे उड़न छू हो गया... विनय वो तुम ही तो थे जो बैक स्टेज पर हंसते मुस्कुराते और मंच पर जाते ही गोडसे के चरित्र में ढ़ल जाते थे... तुम्हीं ने राजकमल नायक के साथ एक अलग ही परसाई की कहानी के कैरेक्टर में कमाल की जान डाल दी थी... आज बेजान पड़े हो... बिना किसी रिहर्सल के जिंदगी के नाटक का पटाक्षेप कर दिया...

कई सारी बातें ध्यान में आ रही हैं... बिलकुल बेतरतीब... तुम्हारा भोपाल का कमरा, जहां तुमने मुझे खिचड़ी का न्योता दिया। हबीबगंज स्टेशन पर ट्रेन सीटी बजा रही थी लेकिन तुम्हारे कुकर की सीटी नहीं बज रही थी। बिना खिचड़ी खाए जाना मुमकिन नहीं था... जब तक हम स्टेशन की ओर बढ़ते तब तक ट्रेन जा चुकी थी... तुमने बड़े प्यार से कह दिया- ठीक है एक दिन और रूक जाइए... मेरा मन भी नहीं था कि आप जाएं...

ऐसी ही चंद मुलाकातें बार-बार जेहन में कौंध रही है... तुम्हारी प्रवीण के साथ नोक-झोंक, भागलपुर स्टेशन पर पुष्य के साथ खबरों को लेकर खींचतान... भागलपुर का वो कमरा जो तुमने तीसरी या चौथी मंजिल पर ले रखा था... जिसका पूरा व्याकरण तुमने अपने मुताबिक गढ़ रखा था... विनय तुम सबसे जुदा थे... सबसे अलग.... तुम्हारा स्नेह, तुम्हारा प्यार.... तुम्हारी बहस और तुम्हारे सवाल सब तुम्हारे साथ ही गायब हो रहे हैं... कैसे कहूं- हो सके तो लौट आओ मेरे भाई... तुम्हारे हाथ की खिचड़ी खाने का फिर से मन हो रहा है... क्या तुम मौत की ट्रेन मेरे लिए मिस नहीं कर सकते।

पशुपति शर्मा

शनिवार, 15 मई 2010

बहस निकली है तो दूर तलक जाएगी...

दफ्तर से लौटते हुए शाम को थका मांदा मैं दिल्ली के यमुना बैंक स्टेशन पर बैठा तहलका पत्रिका के पन्ने पलट रहा था। मैं सीढियों पर बैठा शोमा चौधरी का एक लेख पढ़ रहा था, जिसमें नक्सलवाद से लड़ने की सरकार की नीति पर तर्क-वितर्क थे। मुझे इस बात का इल्म ही नहीं रहा कि कोई मेरे पीठ पीछे खड़ा है। 2-3 मिनट बाद एक वर्दीधारी अफसर ने टोका-क्या कुछ गंभीर पढ़ रहे हो? मुझे इस सवाल की कतई उम्मीद नहीं थी। पुलिस अफसर ने अपना सवाल दोहराया। इन दो पलों में मेरे जेहन में कई सारी चीजें घूम गईं। नक्सलवाद को लेकर मचे हो-हंगामे से लेकर सरकार की धमकी भरी चेतावनी, सब कुछ। मुझ कुछ समझ नहीं आया कि मैं उसे क्या जवाब दूं। मैंने पत्रिका उस अफसर के हाथ में सौंप दी। उसने पत्रिका को उलट-पुलट कर देखा और अजीब सी निगाहों से मुझे देखता हुआ सीढियों से उतर गया। गलियारे में मौजूद गार्ड को उसने कुछ कहा। अगले दिन मैं फिर सीढ़ियों पर बैठने लगा तो गार्ड ने मना कर दिया। पता नहीं ये नक्सलवाद पर लेख पढ़ने का असर था या फिर सुरक्षा चौकसी, लेकिन मुझे तपती गर्मी में लू के थपेड़े सहने सीढ़ियां छोड़ प्लेटफार्म पर आना पड़ा। ये तो बस बानगी भर है, अभी सरकार के उस एलान पर पूरी तरह अमल शुरू नहीं हुआ जिसमें नक्सलवाद का समर्थन या उसके समर्थक होने की बू मात्र से आप गुनहगार बन जाएंगे, पता नहीं उस दिन पुलिसवाले क्या करेंगे?

खैर! ये भी बड़ी अजीब बात है न, जिस देश में अपराधों पर लगाम लगा पाने में पुलिस नाकाम रही है, उस देश में अब उसे विचारों की निगरानी की भी जिम्मेदारी देने पर विचार चल रहा है। उस देश में जहां कत्ल की वारदात के बाद पुलिस सालों में कातिल का पता नहीं ढूंढ पाती, उस देश में विचार से होने वाले खून-खराबे को रोकने की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपी जा रही है। आज जब मैं ये लेख लिख रहा हूं, आरुषि के कत्ल को दो साल बीत गए हैं- न तो यूपी पुलिस और न ही देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी अभी तक कातिल का सुराग ढूंढ पाई है। आरुषि तो महज एक मामला है, ऐसे न जाने कितने मामले हैं जहां लोग इंसाफ के इंतजार में हैं। शायद, सरकार में बैठे साहबों को इस बात का इल्म भी न हो कि देश में महज एक-आध फीसदी लोग ही इंसाफ की लड़ाई लड़ने में यकीन रखते हैं। देश के इस छोटे से हिस्से को भी इंसाफ मुहैया करा पाने में सरकार और ये मशीनरी पूरी तरह नाकाम रही है। एक बहुत बड़ा हिस्सा तो इंसाफ की प्रक्रिया और उसमें आने वाली परेशानियों के बारे में सोच कर ही तौबा कर लेता है। ऐसे में नक्सलवाद समर्थकों की गिरफ्तारी को लेकर किए नए एलान के जरिए चिदंबरम साहब ने देश की अदालतों और थानों का बोझ कई गुना बढ़ाने का ही फैसला किया है। बल्कि इसके जरिए लोगों के शोषण और उनके दमन का एक नया हथियार पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को सौंपा है। अब तो गिरफ्तार शख्स के पास हथियार या असलाह बारूद दिखाने की जरूरत भी नहीं होगी, ये कह देना भर ही काफी होगा कि ये नक्सलवाद समर्थक है।

हो सके तो सरकारी मशीनरियों में बैठे चंद इमानदार लोग मुझे माफ करें, लेकिन सच यही है कि नक्सलवाद समर्थक शब्द की रेंज इतनी बड़ी है कि किसी को भी इसमें घसीटा जा सकता है। देश भर में चलने वाले जन आंदोलनों में से किसी पर भी नक्सल समर्थक या नक्सलियों से प्रभावित होने का लेबल बड़ी आसानी से चस्पा किया जा सकता है। हर उस शख्स पर जो नक्सलियों की ओर से उठाए जा रहे मुद्दों की बात करे, उन्हें देश के दुश्मनों की श्रेणी में डाला जा सकता है। हर वो शख्स जो किसानों की जमीन पर जबरन कब्जा किए जाने का विरोध करे, किसानों और गरीबों के हितों की लड़ाई लड़े, उसे नक्सलियों के खाते में डाला जा सकता है। ये फेहरिश्त कितनी लंबी हो सकती है शायद इसका गुमान भी गृहमंत्री को नहीं है। एक बार इस फेहरिश्त में किसी का नाम शुमार हो जाए तो फिर पुलिस के दमन चक्र से बचने का कोई उपाय नहीं। क्योंकि विचार तो ऐसे हैं कि कभी मरते नहीं खत्म नहीं होते। एक बार आप इस जुर्म में सजा काट कर आएं तो देश में नक्सलियों की किसी बड़ी घटना के साथ ही थाने में हाजिर होकर खुद ही गिरफ्तारी दे दें, वरना आपका एनकाउंटर हो सकता है। आतंकवाद निरोधक कानून पोटा के दुरुपयोग के बाद सरकार को इसे वापस लेना पड़ा था, ऐसे में नक्सल समर्थकों की गिरफ्तारी की चेतावनी देने से पहले सरकार को इसके नतीजों पर भी सोचना चाहिए था।

नक्सलवाद से लड़ाई के मसले पर चिदंबरम साहब के रवैये और बयान में आए उतार-चढ़ाव का भी अपना ही ग्राफ है। करीब दो महीने पहले चिदंबरम नक्सलियों से बातचीत की पेशकश कर रहे थे। दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ कैंप पर हमला होते ही चिदंबरम त्यौरियां चढ़ा कर ये बयान देने लगे कि नक्सलियों के खिलाफ हवाई हमले की नीति पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है। इसके कुछ दिनों बाद चिदंबरम जेएनयू जैसे संस्थान में आम सभा करने पहुंचे तो उन्हें तीखा विरोध झेलना पड़ा। जेएनयू के वामपंथी संगठनों ने सभा स्थल के बाहर चिदंबरम और केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। इस विरोध के बाद ही शायद ये खबर आई कि अब नक्सल समर्थकों की भी खैर नहीं। चिदंबरम साहब को लोकतंत्र में विरोध और प्रतिरोध के ये सुर बेहद नागवार गुजरे और ये एलान हो गया कि नक्सल समर्थक जेल की हवा खाने को तैयार रहें।

जेएनयू की इस घटना को चंद दिन गुजरे ही थे कि चिदंबरम ने ये बयान दे दिया कि माओवाद से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है जनता का भरोसा जीतना। कंफेडरनेश ऑफ इंडियन फेडरेशन के एक कार्यक्रम में चिदंबरम ने कहा-"साल 2004-09 के बीच देश ने 8.5 फीसदी की दर से विकास किया लेकिन पिछड़े राज्यों में प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। सरकार और औद्योगिक घरानों को लोगों का भरोसा जीतने के उपाय ढूंढने होंगे।" गनीमत है कि चिदंबरम को ये एहसास हो रहा है कि बिना लोगों का विश्वास हासिल किए नक्सलवाद जैसी समस्या से नहीं निपटा जा सकता। नक्सलवाद से निपटने के लिए 'गोली' से ज्यादा जरूरत 'भरोसा' जीतने की है। चिदंबरम साहब आप जो सोच रहे हैं उसे कर दिखाइए, जंग में आपकी जीत निश्चित होगी। दो पल ठहरकर सोच लीजिए, ये रास्ता जरा लंबा है-इसमें धीरज भी चाहिए और ज्यादा आत्मबल भी। वरना गोली चलाना तो बहुत आसान है- जवानों को आदेश दिया और मरने-मारने के लिए जंग-ए-मैदान में उतार दिया। गोली की लड़ाई जवानों को लड़नी है लेकिन भरोसे की लड़ाई सरकार और सियासी पार्टियों को लड़नी है। क्या वाकई आपमें वो हिम्मत और हौसला बाकी है? क्या वाकई सरकार एक तानाशाही कानून की बजाय लोकतांत्रिक तरीके से ये लड़ाई लड़ने का माद्दा रखती है?

चिदंबरमजी आपकी नीयत को लेकर सवाल उठाने का मेरा इरादा कतई नहीं है। हो सकता है आप देश में अमनबहाली का सपना देख रहे हों पर साथ ही साथ आप ये भी तय कर लीजिए कि ये अमनबहाली कैसे और किन शर्तों पर? क्या लोकतंत्र का दम घोट कर आप नक्सलवाद की लड़ाई लड़ेंगे? क्या आप लोगों को डरा-धमका कर उनकी जुबान बंद करना चाहते हैं या फिर एक बहस के जरिए देश में आम राय बनाना चाहते हैं? सीआईआई के एक कार्यक्रम में आपने खुद कहा है कि माओवाद के मुद्दे पर दो तरह की राय है। एक धड़ा ये मानता है कि मौजूदा सरकार बुरी है और दूसरा धड़ा सरकार के साथ खड़ा है। मतभेद हो सकते हैं, लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है। विचारों की इस भिन्नता को ये कहकर खत्म मत कीजिए कि चुप रहो वरना सलाखों के पीछे डाल दिए जाओगे। जिस देश में हर मुजरिम को बचाव के लिए एक वकील मुहैया कराने की व्यवस्था है, वहां किसी मुद्दे या शख्स के पक्ष-विपक्ष में बहस पर रोक मत लगाइए। देश की आजाद आबोहवा और लोकतांत्रिक परंपराओं का गला मत घोटिए, बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश बने रहने दीजिए, देश आपको दुआएं देगा।

पशुपति शर्मा

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

टोपी उतारो फिर लड़ो इंसाफ की जंग

“आदमी को तोड़ती नहीं है
लोकतांत्रिक पद्धतियां
केवल पेट के बल उसे झुका लेती हैं
धीरे धीरे अपाहिज
धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए” (राजकमल चौधरी)

आज सुबह हिंदुस्तान (2 अप्रैल, 2010, दिल्ली संस्करण, रिपोर्टर सत्यप्रकाश) की एंकर खबर देखी तो बरबस राजकमल चौधरी की ये पंक्तियां दिमाग में कौंधने लगी। लोकतांत्रिक पद्धतियों के पेट के बल झुका लेने के हुनर की एक और मिसाल मेरे सामने थी। ये मिसाल पेश की लोकतंत्र के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मंदिर ने। देश के सर्वोच्च न्यायालय के कारिंदों ने एक लॉ इंटर्न को टोपी लगाकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने से रोक दिया।

कभी पढा था कि अंग्रेजों के जमाने में कई क्लब के आगे लिखा होता था कि यहां हिंदुस्तानियों और कुत्तों का प्रवेश वर्जित है। ये एक तरह की शासकीय ठसक थी, सामंती नजरिया था और दूसरों को उसकी औकात में रखने की पद्धति थी। देश की आजादी के बाद ये पद्धति बदलनी चाहिए थी, ये नजरिया बदलना चाहिए था लेकिन अफसोस ऐसा हो न सका। आज सुप्रीम कोर्ट के अंदर कानून के एक छात्र को टोपी उतारने के लिए मजबूर किया जाता है तो कई सवाल जेहन में कौंधते है। ये और मसला है कि इन सवालों के बाद सर्वोच्च अदालत के कारिंदों की बजाय आप कठघरे में खड़े कर दिए जाएं।

बहरहाल, अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई कर रहा मंसूर अहमद इन दिनों अजीब से हालात में फंस गया है। मंसूर 10 मार्च से सुप्रीम कोर्ट में इंटर्नशीप कर रहा है। वो यहां इंसाफ की लड़ाई के तौर-तरीके सीखने आया है लेकिन उसके पहले कोर्ट के आला अधिकारी उसे इंसाफ का शिष्टाचार सिखा रहे हैं। वो उसे ये पाठ पढ़ा रहे हैं कि वकीलों को कोर्ट में टोपी लगाने का हक है लेकिन एक इंटर्न को नहीं। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार की नसीहत भी लाजवाब है-“ बेटे तुम यहां ट्रेनिंग के लिए आए हो। तुम अपना मन उसी में लगाओ। टोपी नहीं लगाओगे तो क्या होगा? ” मी लार्ड माफ करें, पेट के बल झुकने में थोड़ा वक्त तो लगता है। लॉ के नए रंगरूट ने आरटीआई दायर कर टोपी की लड़ाई आगे बढ़ाई लेकिन महानिबंधक एम पी भद्रन ने जवाब भेजा- “यह कोर्ट के शिष्टाचार का मामला है।”

जाहिर है कश्मीर के बड़गाम जिले के निवासी मंसूर अहमद की भावनाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट में कोई जगह नहीं है। पता नहीं उसकी टोपी में ऐसी क्या बात है कि सुप्रीम कोर्ट के गुंबद को वो रास नहीं आ रही। मंसूर को टोपी लगाने का हक मिलेगा, फिलहाल इसकी गुंजाइश कम है। हां मंसूर के साथ सर्वोच्च न्यायालय में इंटर्नशीप कर रहे उसके 82 साथियों को पहला सबक जरूर मिल गया। इंसाफ की लड़ाई लड़ो मगर टोपी उतारकर, कमर झुकाकर।