सोमवार, 28 जून 2010

कमाठीपुरा की गलियों से


शिरीष खरे, मुंबई से

यह शहर के उठने का वक़्त है. बोरीबली से मुंबई सेंट्रल आने वाली लोकल के ठहरने के बीच का यह वक़्त, हजारों लोगों के दौड़ने का भी वक़्त है. मुंबई सेंट्रल से यात्रियों को अपने में समाए बेस्ट यानी ‘बॉम्बे एलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट’ की लालधारी बसों ने भी चौतरफ़ा दौड़ना शुरू कर दिया है. मुझे भी यहाँ से पैदल अब 15-20 मिनट ही चलना है, सिटी सेंटर से होते हुए सीधे कमाठीपुरा की गलियों की तरफ़.

अटपटे-से एहसासों से जुड़े कुछ सवाल लिए हुए बढ़ रहा हूँ. क्या आप जानते हैं कि रेडलाईट की यह गलियाँ सारी रात जागी हैं और ग्राहकों के इंतजार में अभी भी सोई नहीं हैं ?

यहाँ की गलियों ने यहाँ को बनते हुए देखा है. अंग्रेजों ने अपने सैनिकों के लिए यहाँ कभी ‘कम्फर्ट जोन’ बनवाया था और विदेशों से बड़ी तादाद में यौनकर्मियों को बुलवाया था. 1928 में यौनकर्मियों को लाइसेंस जारी किए थे. मगर 1950 में सरकार ने यौन व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया था. इसके बावज़ूद यह इलाक़ा आज भारतीय यौनकर्मियों का बहुत बड़ा घर कहलाता है. यहाँ 200 से ज्य़ादा पिंज़रानुमा कोठरियों में 5000 से भी ज्यादा यौनकर्मियों का रहवास है.

आंध्रप्रदेश के कमाठी मजदूरों के नाम पर यह इलाक़ा कमाठीपुरा कहलाता है. एक ज़माने में गुजरात के वाघरी लोगों की भी यहाँ खासी तादाद थी. मगर अब तो बँगाल, नेपाल, कर्नाटक, तमिलनाडू, उड़ीसा, असम से आए लोग भी ख़ूब मिल जाया करते हैं.

कमाठीपुरा का यह पूरा इलाक़ा मौटे तौर से 16 गलियों में बटा है, 9 गलियों में सेक्स का कारोबार चलता है, ब़ाकी 5 गलियां रेसीडेंटल और बिज़नेस के लिए हैं. यह गलियाँ आगे जाकर नार्थबुक गार्डन, बैलेसिस रोड़, फाकलेंड रोड़ से जुड़कर अपनी पहचान ख़ोने लगती हैं.

बहरहाल, यहाँ की गलियों में भारी भीड़ के बीच से पैदल चलते हुए आदमी कुछ ज्य़ादा ही ठहर रहे हैं, वह चलते-चलते टकरा भी जाते हैं. हो सकता है कि मेरी तरह आपका दिल भी यहाँ धकधक की आवाज़ पर काबू पाने के चक्कर में बैठता जाए, और ज़ुबान अपनेआप सिलती जाए, दर्ज़नो आँखें उम्मीद लिए आपके ऊपर भी अटक जाएं, और मेरी तरह आपका बदन भी पीला पड़ता जाए.

कतरा-कतरा ज़िंदगी

मौसम तो ख़ुशनुमा है, मगर ख़ुली नालियों से आने वाली बदबू चारों ओर फैली रहती है. एक गली से दूसरी और तीसरी से चौथी में मुड़ता हूँ, मगर पूरा इलाक़ा इतना तंग और फ़ैला हुआ है कि दो-चार बार घूमने के बाद भी यह शायद ही समझ में आए.

इन्हीं गलियों में यौनकर्मियों की अनगिनत और अंतहीन कहानियाँ हैं. यहाँ से यौनव्यापार मौटे तौर पर चार तरीकों से चलते हुए देख रहा हूँ- एक तो अपने को सीधे बेचने वाली औरतों से, दूसरा पिंज़रानुमा कोठरियों की मालकिनों यानी घरवालियों से, तीसरा पिंज़रानुमा कोठरियों में कैद लड़कियों से और चौथा दारू के अड्डों से.

यह एक भरा पूरा बाज़ार है- नीचे दुकानें और ऊपर औरतें खड़ी हैं. शहर की ब़ाकी लड़कियां जब प्यार का खु़शनुमा एहसास लिए सोती-जागती हैं, यहाँ की लडकियाँ अपने को किसी के साथ भी किराए पर खुल्ला छोड़ देती हैं. शहर की ब़ाकी औरतों के लिए सुबह, शाम, रात होने के अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं, मगर यहाँ की औरतों के लिए सुबह, शाम, रात का एक ही अर्थ है- ग्राहकों को पकड़ना और उनसे पैसा कमाना. यह अपने ऊपर बेहिस़ाब पाऊडर, लिपिस्टिक, काजल, पर्स, सेंडल, जूड़े, सस्ती जेव्लरी क्या-क्या नहीं लादे हैं. इनके जींस, टीशर्ट, फ़िराक, सलवार-शूट, ब्लाउस, स्कर्ट, साड़ी में हर आकार और प्रकार के कट लगे हुए हैं. ऐसे में एक ग्राहक का काम यहाँ से वह माल छांटना है, जिसे तोड़मरोड़ कर अपने को हल्का कर सके, और कुछ और रातों तक आराम से सो तो सके.

आप यहाँ से देखिए- यह औरतें रंग-ढ़ंग और चाल-ढ़ाल से अपने ग्राहक को किस तरह से पहचान लेती है. दूसरी तरफ, आपको यहाँ आने वालों से भी यह पता लग सकता हैं कि यहाँ कौन-सी गलियाँ कितनी सही हैं, और क्यों हैं, उनमें कौन सी ज़मात वालों का असर ज्य़ादा है, उनका हिसाब-किताब क्या है, उनका धंधापानी कैसा है, कभी-कभार क्या-क्या लफड़ा हो सकता है, और उनसे कैसे-कैसे निपटा जा सकता है, वगैरह-वगैरह.

आप यहाँ से देखिए- एक जगह पर खड़ी होने के बावजूद यह पिंज़रानुमा कोठरी की दुनिया लोकल ट्रेन जैसी नहीं दिखती है, जो कुछ यात्रियों को उतारती है, और नए यात्रियों को चढ़ाकर एक मशीन सी चलती रहती है.

हां भाई सुनिए... एकदम नया आया है.. गलत नहीं ले जाऊंगा चलिए... नेपाली, बंगाली, साऊथ इंडियन सब हैं... पहले देख लीजिए... 12 से 16 का है... गोरा है देखने में क्या जाता है... इधर तो धंधा चलता है... उधर भी सस्ता ही है...

पिंज़रानुमा कोठरी के सामने खड़े हुए नहीं कि एक-एक करके बहुत सारे दलाल आपको घेरने लगते हैं. यहाँ तक कि फ़ोन नम्बर वाली पर्चियां भी देने लगते हैं. इनसे बगैर उलझे आगे बढ़ना ठीक है. वैसे इनकी भी अपनी कहानियाँ हैं. मगर अभी आगे बढ़ना ठीक है.

खै़र पिंज़रानुमा कोठरी के भीतर जैसे ही जाएंगे, वैसे ही आप दूसरी दुनिया में घुस जाएंगे. यहाँ लकड़ी की सीढ़ियों से लगे कुछ कोने, कोनों से दरवाजे, दरवाजों से ताबूतनुमा कमरे और कमरों के अंधियारे से बहुत सारी औरतें दिखाई देती हैं. यहाँ तक़रीबन 25 से 30 औरतों के साथ उनकी एक घरवाली भी दिखेगी. यहाँ औरतों की तादाद और उनकी उम्र से किसी घरवाली की सत्ता और उसकी संपत्ति का पता चलता है. यहाँ तक़रीबन आधी तो 22 साल से ज्य़ादा की नहीं हैं. यहाँ का बड़ा सीधा हिसाब है- 12 से 22 साल तक को ऊँचे दामों पर बेचो, और 30 से 35 साल के बाद घरवाली बन जाओ।

अब मेरी तरह आपको भी यहाँ किसी से सीधे-सीधे यह पूछना मुश्किल हो सकता है कि- "आप यहाँ तक कैसे पहुंचीं"... "वो कौन था जिसने आपसे पहली बार कहा कि पैसे कमाने का यह भी एक तरीका हो सकता है", इसलिए मेरी तरह आप भी यहाँ पहुँचकर हो सकता है कि- ‘आपका नाम...’ ‘आप कैसे हो’ से आगे न बढ़ पाएं.

मगर दिन के उजाले में एक इज्ज़तदार कहलवाने वाला आदमी जहाँ आने से कतराता है, वहाँ से मुझे लगता है कि सुबह से शाम तक का वक़्त ज़रूर बिताया जाए. यहाँ की कुछ सच्चाईयों से दो-चार हो जाया जाए और कोई नैतिक बहस छेड़े बगैर अपना ताज़ातरीन तजुर्बा बांट लिया जाए.

बड़ी बहन, छोटी बहन और...

‘याद आ रही है, तेरी याद आ रही है...’- ‘‘सुबह-सुबह पता नहीं क्यों आ रही है’’ कहते हुए जूही ने रेडियो बंद कर दिया है. आज के दिन पता नहीं कितनों दिनों के बाद वह पूरी नींद सो जाना चाहती है. दिन को जागना उसे कभी भी अच्छा नहीं लगा है. मगर उससे तो हरदम चुस्त रहने की उम्मीद की जाती है. इस उम्मीद के बगैर भी दुनिया चल सकेगी- वह सोच भी नहीं सकती है. शहर के बहुत से ठिकाने बदलने के बाद ही तो वह यहाँ तक आई है, और अब यही की होकर रह गई है.

यहाँ उम्र के पच्चीसवें साल में भी उसने अपने सीधेपन को संभाले रखा है. उसकी सुने तो उसमें अब पहले जैसी बात नहीं है. बचपना तो बहुत पहले ही ख़त्म हो चुका था, जवानी भी ख़त्म होने ही वाली है. असल में जूही की बड़ी बहन चंपा की शादी होने वाली है, इसलिए वह यहाँ हैं. इससे पहले चंपा भी यहाँ बैठ चुकी है. जुही कहती है कि उसके घर में अब कोई फूल (छोटी बहन) नहीं बचा है, इसलिए उसकी शादी के लिए यहाँ कौन बैठने वाली है, पता नहीं है. मगर ऐसा उसने मज़ाक में कहा है या वाकई संज़ीदगी से, यह भी तो पता नहीं चलता है.

वैसे भी उसके हिस्से में दिन और रात का अंतर नहीं बचा है. मौसम के मिजाज़, छुट्टी वाले दिनों या चौपाटी जाने जैसे ख़्यालों से भी जूही का कोई लेना-देना नहीं है. ग्राहक कितना सही है-यह भी उसे नहीं जानना है. शहर के नक़्शे की बजाय उसकी दुनिया के तार तो घनी बस्ती से भी सघन उस नेटवर्क से जुड़े हुए हैं जिसमें हजार रूपए का ग्राहक ढ़ूढ़ लेना सबसे बड़ी बात मान ली जाती है.

मां की तलाश में गोमती

इधर से सबसे आख़िरी के कमरे तक अगर नज़र पहुँचे तो कोई भी यह पूछ सकता है कि उधर रौशनी क्यों नहीं है- यह बात गोमती से अच्छा भला कौन जान सकता है, जिसे 8 साल की उम्र में यहां कैद किया गया था. दरअसल, नेपाल के काठमांडू की गोमती की मम्मी बचपन में मर चुकी थी. इसलिए वह अक्सर स्कूल के बाहर ही बैठी रहती थी. इतनी नाज़ुक उम्र में उसे क्या पता था कि स्कूल या मेले की ऐसी अकेली और गुमसुम बच्चियों पर दलालों की नज़र रहती है.

एक दलाल भी गोमती को कई दिनों से बतियाता और उसे बहलाता-फुसलाता था. उसने यह भी कहा था कि वह उसकी मम्मी को भी जानता है, और अगर वह किसी को कुछ न बताए तो एक दिन मिला भी सकता है. मगर एक दिन उसने गोमती को खाने में ऐसा कुछ दिया कि वह नेपाल से मुंबई तक होश में नहीं आई. यहाँ उसे घरवाली के हाथों बेच दिया गया. घरवाली ने उसे बहुत प्यार-दुलार दिया. उसने कहा मम्मी तुझे मेरे लिए ही तो छोड़ गई है, एक दिन आएगी. मगर गोमती की मम्मी है कि आज तक नहीं आई है.

गोमती बता रही है कि ऐसी लड़कियों को सालों तक कैद करके रखा जाता है. फिर कुछ सालों बाद उसकी बोली लगायी जाती है. अगर लड़की न माने तो उसे कई दिनों तक भूखा और नंगा रखा जाता है, मारा, पीटा और तड़पाया जाता है. मगर जैसे ही लड़की एक बार तैयार हो जाती है तो उसे हाथों हाथ लिया जाता है. जब तक वह कुछ जानती-समझती नहीं है, तब तक तो उससे होने वाली कमाई केवल घरवाली के हाथों में जाती है, मगर जैसे-जैसे लड़की सियानी होती है तो वह खाने, कपड़े, लत्ते के अलावा ग्राहक के पैसे से भी अपना हिस्सा मांगने लगती हैं।

हर एक बाज़ार में नई और आर्कषक चीज़ों की माँग हमेशा बनी रहती है. सेक्स का बाज़ार भी इसी सिद्धांत पर चलता है, यहाँ भी तो ज्य़ादातर ग्राहकों को कमसिन देह ही चाहिए. इसलिए यहाँ बच्चियों के देह व्यापार में हमेशा तेजी बनी रहती है. मगर बच्चियां भी कोई दिमागी तैयारी के साथ तो देह व्यापार में उतरती नहीं हैं, जो पहले से ही उन्हें सेक्स से जुड़ी जानकारियों का ज्ञान हो. इसलिए उनमें सेक्स से जुड़ी गंभीर बीमारियों की आशंकाए बढ़ जाती हैं. लिहाजा, न जाने कितनी गोमतियां एड्स नामक हालात की गिरफ़्त में आ जाती हैं.

बची रहना बिटिया

वैसे दुर्गा जैसी कई औरतें अपनी बच्चियों को ऐसे धंधे से दूर ही रखना चाहती हैं. इसके लिए वह यहाँ से दूर भिमंडी या मीरा रोड़ जैसी जगहों में रहती हैं. दुर्गा बता रही है कि बहुत कम माँएं अपनी बच्चियों को पढ़ा पा रही हैं. एक तो उनकी आधी से ज्यादा कमाई घरवाली, दलाल, डॉक्टर और साहूकार खा जाते हैं. दूसरा यह भी कि जैसे ही वह 30 की होती हैं, तो अक्सर कई तरह की बीमारियों से घिर जाती हैं, उनके सिर पर जब तक बहुत सारा क़र्ज़ भी चढ़ चुका होता है, और जब तक उनकी बच्चियां भी 12-13 साल की हो जाती हैं, जो कभी अपनी माँओं की बीमारियों, तो कभी उनके कर्जों को उतारने के लिए उन्हीं के नक़्शे-कदमों पर चल रही होती हैं.

वैसे बच्चियां जो देखती हैं, वही करती हैं. वह बचपन से मां के जैसा मेक़अप और व्यवहार देख-देखकर उनसे काफ़ी कुछ सीखा करती हैं. इस तरह उनमें आने वाली आदतें ताज़िंदगी आसानी से नहीं जाती हैं. दूसरी तरफ, कुछ बच्चियों को अपनी माँओं का ग्राहकों के साथ जाना अच्छा नहीं लगता है. कई तो पढ़ने में भी तेज होती हैं, मगर उन्हें सही रास्ता कोई नहीं बताता है, और अगर बताए भी तो घर से उतना सहयोग भी नहीं मिलता है. अक्सर घरवाली और दलाल भी उनसे उल्टी-सीधी बातें करके हतोत्साहित किया करते हैं. इसके अलावा, माँओं के ग्राहक भी उनका यौन-शोषण करना चाहते हैं.

अपनी बच्चियों को बचाने के लिए कुछ माँएं उन्हें अपने रिश्तेदारों के पास भेज देती हैं. कुछ माँएं 14-15 साल की उम्र में शादियाँ करा देती हैं. जबकि कुछ माँएं एनजीओ के पुनर्वास केन्द्रों में भेज देती हैं. मगर अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों तक भेजने वाली माँओं को यह डर भी रहता है कि अगर उनकी बच्ची सब जानने-समझने के बाद उनके पास नहीं आयी तो ? इसलिए यह माँएं बीच-बीच में अपनी बच्चियों को पुनर्वास केन्द्रों से बुलाती रहती हैं.

पुनर्वास के बजाय फिर धंधे में

कई पुनर्वास केन्द्रों की एक दिक्कत यह भी है कि उनमें केवल 7 से 12 साल तक के बच्चों को ही रखा जाता है. जया नाम की लड़की जैसे ही 13 की हुई, वैसे ही एक एनजीओ ने उसे यह कहकर अपने पुनर्वास केन्द्र से निकाल दिया कि तुम्हारी उम्र की लड़कियों को रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. जया को उस समय पुनर्वास केन्द्र की सबसे ज्यादा ज़रुरत थी, क्योंकि उसकी मां का अपना कोई घर नहीं था और न ही वह उसे कहीं भेज सकती थी. इसलिए जया अपनी माँ के साथ रहने लगी और धीरे-धीरे उसी के धंधे में हाथ बटाने लगी. आज जया को एनजीओ वालों से नफ़रत हैं, वह एनजीओ के बारे में कहती है- "उनका काम तो सब ओर अपना काम दिखाना भर है, कोण्डम या गोली-दवाई देने के अलावा उनका कोई काम नहीं हैं."

यौनकर्मी बनने की बहुत सारी कहानियाँ पारिवारिक हिंसा-दुत्कार, अपराध, बलात्कार और ख़रीद-फ़रोख्त से भी जुड़ी हैं. मगर बाज़ार की फ़ितरत के हिसाब से यहाँ भी शोषण के लिए ज्य़ादातर उन लड़कियों को चुन लिया जाता है, जो पिछड़े और गरीब तबक़े से आती हैं. उनकी मज़बूरियों के ख़िलाफ उनके सारे सपने बहुत सस्ते और थोक में जो ख़रीद लिए जाते हैं.

भारत में यौनव्यापार को रोकने के लिए ‘भारतीय दण्ड विधान, 1860’ से लेकर ‘वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक, 1956’ बनाये गए हैं. इनदिनों कानून में बदलाव की चर्चाएं भी ज़ोरों पर चल रही हैं. मगर इस स्थिति की जड़ें तो बेकारी और पलायन से जुड़ी हुई हैं. इन उलझनों के आपसी जुड़ाव को अनदेखा किया जा रहा है. असलियत यह है कि यहाँ की औरतें घर पर बहुत सारा पैसा भेजने की बजाय दो टाइम की रोटी के लिए जूझ रही हैं. इसलिए नीतियों में इनके जीवन-स्तर को उठाने की बजाय इन्हें जीने के मौके देने वाले नियमों की बात हो तो बात बने भी.

कमाठीपुरा की गलियों से गुज़रते हुए आप कुछ और पिंज़रानुमा कोठरियों में भी घुस सकते हैं, कुछ और चरित्रों से भी बतिया सकते हैं. यहाँ के इन भागों को उनकी संपूर्णता में भी देख सकते हैं. दृश्यों को केवल दृश्य भर न मानकर, उनका विश्लेषण भी कर सकते हैं. बहुत सारे बिन्दुओं के मेलजोल से, एक कहानी को उपन्यास में भी बदल सकते हैं. मगर मेरे भीतर से कागज के फ़ूल, पाक़ीजा, उमराव ज़ान जैसी ओल्ड और गोल्ड फ़िल्मों की हिरोइनें हवा हो चुकी हैं... मेरे सामने केवल मंटो की काली सलवारें लटकी हैं.

मंगलवार, 22 जून 2010

ये ट्रेन मिस कर दो विनय!



(माखनलाल चतुर्वेदी का पूर्व छात्र, दस्तक का साथी, हिंदुस्तान भागलपुर का पत्रकार और सबसे बढ़कर सबका प्यारा विनय चला गया, हमेशा-हमेशा के लिए)


मंगलवार की रात 9 बजे फास्ट ट्रैक का बुलेटिन चल रहा था। मैं पीसीआर में बुलेटिन करवा रहा था इसी दौरान प्रवीण का फोन आया, मैंने काट दिया। दूसरी बार, तीसरी बार घंटी बजी लेकिन मैंने फोन काट दिया। फिर मनोज भाई का फोन आया, वो फोन भी मैं नहीं उठा सका। बुलेटिन खत्म हुआ तो संतोष का फोन आया कि विनय नहीं रहा, विनय हम सभी को छोड़ कर चला गया। विनय तु्म्हारी मौत की खबर भी इस न्यूज बुलेटिन ने मुझ तक पहुंचाने में आधे घंटे की देर कर दी।

सुबह पता चला कि तुम भी ऑफिस पहुंचने की आपाधापी में ही ....। पुष्य ने बताया कि ऑफिस में देर हो रही थी और शायद तुम्हारी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। पटना से तुम भागलपुर के लिए चले थे लेकिन नाथनगर में पता नहीं तुमने चलती ट्रेन से उतरने की कोशिश की या फिर कुछ और.... लेकिन तुम ऑफिस नहीं पहुंच पाए। अब कभी नहीं पहुंच पाओगे। ऑफिस से लौटते हुए जो बात मुझे बहुत ज्यादा कचोट रही थी कि मैं फोन क्यों नहीं उठाया वो अब कुछ और ज्यादा तकलीफ दे रही है। पता नहीं किस हालात और किन दबावों में हम काम करते हैं कि .... खैर! ये वक्त इस बात का नहीं लेकिन पुष्य समेत अपने तमाम साथियों के जेहन में न जाने ऐसे ही कई सवाल उठ रहे हैं।

मेट्रो से घर पहुंचने तक कई मित्रों के फोन आए- किसी के पास कहने को कुछ नहीं था। सब एक दूसरे से एक-दो लाइनों में बात करते और फिर शब्द गुम हो जाते। अखिलेश्वर का मेरठ से फोन आया-भैया विनय नहीं.... उसके बाद न वो कुछ बोल सका और न मैं। इसी तरह ब्रजेन्द्र, उमेश ... सभी इस खबर के बाद अजीब सी मनस्थिति में थे.... शिरीष से बात की और ये सूचना दी तो वो भी सन्न रह गया। विनय अब तुम से तो कोई सवाल नहीं कर सकता लेकिन एक दूसरे से ताकत बटोरने की कोशिश कर रहे हैं... विनय ऐसी भी क्या जल्दी थी... एक दिन ऑफिस छूट ही जाता तो क्या होता... लेकिन हादसों के बारे में क्या कहा जा सकता है... तुमने भी तो शायद ये नहीं सोचा था कि चलती ट्रेन के पहिए तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं...

तुम्हारा चेहरा रात से बार-बार मेरे सामने घूम रहा है... सीधा, सपाट और बिलकुल बेबाक विनय और उसकी उतनी ही प्यारी मुस्कुराहट अब कभी देखने को नहीं मिलेगी... वो विनय जो चंद मुलाकातों में ही बिलकुल अपना सा हो गया था वो पता नही कहां गुम हो गया... बंदर मस्त कलंदर का गोडसे उड़न छू हो गया... विनय वो तुम ही तो थे जो बैक स्टेज पर हंसते मुस्कुराते और मंच पर जाते ही गोडसे के चरित्र में ढ़ल जाते थे... तुम्हीं ने राजकमल नायक के साथ एक अलग ही परसाई की कहानी के कैरेक्टर में कमाल की जान डाल दी थी... आज बेजान पड़े हो... बिना किसी रिहर्सल के जिंदगी के नाटक का पटाक्षेप कर दिया...

कई सारी बातें ध्यान में आ रही हैं... बिलकुल बेतरतीब... तुम्हारा भोपाल का कमरा, जहां तुमने मुझे खिचड़ी का न्योता दिया। हबीबगंज स्टेशन पर ट्रेन सीटी बजा रही थी लेकिन तुम्हारे कुकर की सीटी नहीं बज रही थी। बिना खिचड़ी खाए जाना मुमकिन नहीं था... जब तक हम स्टेशन की ओर बढ़ते तब तक ट्रेन जा चुकी थी... तुमने बड़े प्यार से कह दिया- ठीक है एक दिन और रूक जाइए... मेरा मन भी नहीं था कि आप जाएं...

ऐसी ही चंद मुलाकातें बार-बार जेहन में कौंध रही है... तुम्हारी प्रवीण के साथ नोक-झोंक, भागलपुर स्टेशन पर पुष्य के साथ खबरों को लेकर खींचतान... भागलपुर का वो कमरा जो तुमने तीसरी या चौथी मंजिल पर ले रखा था... जिसका पूरा व्याकरण तुमने अपने मुताबिक गढ़ रखा था... विनय तुम सबसे जुदा थे... सबसे अलग.... तुम्हारा स्नेह, तुम्हारा प्यार.... तुम्हारी बहस और तुम्हारे सवाल सब तुम्हारे साथ ही गायब हो रहे हैं... कैसे कहूं- हो सके तो लौट आओ मेरे भाई... तुम्हारे हाथ की खिचड़ी खाने का फिर से मन हो रहा है... क्या तुम मौत की ट्रेन मेरे लिए मिस नहीं कर सकते।

पशुपति शर्मा

शनिवार, 15 मई 2010

बहस निकली है तो दूर तलक जाएगी...

दफ्तर से लौटते हुए शाम को थका मांदा मैं दिल्ली के यमुना बैंक स्टेशन पर बैठा तहलका पत्रिका के पन्ने पलट रहा था। मैं सीढियों पर बैठा शोमा चौधरी का एक लेख पढ़ रहा था, जिसमें नक्सलवाद से लड़ने की सरकार की नीति पर तर्क-वितर्क थे। मुझे इस बात का इल्म ही नहीं रहा कि कोई मेरे पीठ पीछे खड़ा है। 2-3 मिनट बाद एक वर्दीधारी अफसर ने टोका-क्या कुछ गंभीर पढ़ रहे हो? मुझे इस सवाल की कतई उम्मीद नहीं थी। पुलिस अफसर ने अपना सवाल दोहराया। इन दो पलों में मेरे जेहन में कई सारी चीजें घूम गईं। नक्सलवाद को लेकर मचे हो-हंगामे से लेकर सरकार की धमकी भरी चेतावनी, सब कुछ। मुझ कुछ समझ नहीं आया कि मैं उसे क्या जवाब दूं। मैंने पत्रिका उस अफसर के हाथ में सौंप दी। उसने पत्रिका को उलट-पुलट कर देखा और अजीब सी निगाहों से मुझे देखता हुआ सीढियों से उतर गया। गलियारे में मौजूद गार्ड को उसने कुछ कहा। अगले दिन मैं फिर सीढ़ियों पर बैठने लगा तो गार्ड ने मना कर दिया। पता नहीं ये नक्सलवाद पर लेख पढ़ने का असर था या फिर सुरक्षा चौकसी, लेकिन मुझे तपती गर्मी में लू के थपेड़े सहने सीढ़ियां छोड़ प्लेटफार्म पर आना पड़ा। ये तो बस बानगी भर है, अभी सरकार के उस एलान पर पूरी तरह अमल शुरू नहीं हुआ जिसमें नक्सलवाद का समर्थन या उसके समर्थक होने की बू मात्र से आप गुनहगार बन जाएंगे, पता नहीं उस दिन पुलिसवाले क्या करेंगे?

खैर! ये भी बड़ी अजीब बात है न, जिस देश में अपराधों पर लगाम लगा पाने में पुलिस नाकाम रही है, उस देश में अब उसे विचारों की निगरानी की भी जिम्मेदारी देने पर विचार चल रहा है। उस देश में जहां कत्ल की वारदात के बाद पुलिस सालों में कातिल का पता नहीं ढूंढ पाती, उस देश में विचार से होने वाले खून-खराबे को रोकने की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपी जा रही है। आज जब मैं ये लेख लिख रहा हूं, आरुषि के कत्ल को दो साल बीत गए हैं- न तो यूपी पुलिस और न ही देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी अभी तक कातिल का सुराग ढूंढ पाई है। आरुषि तो महज एक मामला है, ऐसे न जाने कितने मामले हैं जहां लोग इंसाफ के इंतजार में हैं। शायद, सरकार में बैठे साहबों को इस बात का इल्म भी न हो कि देश में महज एक-आध फीसदी लोग ही इंसाफ की लड़ाई लड़ने में यकीन रखते हैं। देश के इस छोटे से हिस्से को भी इंसाफ मुहैया करा पाने में सरकार और ये मशीनरी पूरी तरह नाकाम रही है। एक बहुत बड़ा हिस्सा तो इंसाफ की प्रक्रिया और उसमें आने वाली परेशानियों के बारे में सोच कर ही तौबा कर लेता है। ऐसे में नक्सलवाद समर्थकों की गिरफ्तारी को लेकर किए नए एलान के जरिए चिदंबरम साहब ने देश की अदालतों और थानों का बोझ कई गुना बढ़ाने का ही फैसला किया है। बल्कि इसके जरिए लोगों के शोषण और उनके दमन का एक नया हथियार पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को सौंपा है। अब तो गिरफ्तार शख्स के पास हथियार या असलाह बारूद दिखाने की जरूरत भी नहीं होगी, ये कह देना भर ही काफी होगा कि ये नक्सलवाद समर्थक है।

हो सके तो सरकारी मशीनरियों में बैठे चंद इमानदार लोग मुझे माफ करें, लेकिन सच यही है कि नक्सलवाद समर्थक शब्द की रेंज इतनी बड़ी है कि किसी को भी इसमें घसीटा जा सकता है। देश भर में चलने वाले जन आंदोलनों में से किसी पर भी नक्सल समर्थक या नक्सलियों से प्रभावित होने का लेबल बड़ी आसानी से चस्पा किया जा सकता है। हर उस शख्स पर जो नक्सलियों की ओर से उठाए जा रहे मुद्दों की बात करे, उन्हें देश के दुश्मनों की श्रेणी में डाला जा सकता है। हर वो शख्स जो किसानों की जमीन पर जबरन कब्जा किए जाने का विरोध करे, किसानों और गरीबों के हितों की लड़ाई लड़े, उसे नक्सलियों के खाते में डाला जा सकता है। ये फेहरिश्त कितनी लंबी हो सकती है शायद इसका गुमान भी गृहमंत्री को नहीं है। एक बार इस फेहरिश्त में किसी का नाम शुमार हो जाए तो फिर पुलिस के दमन चक्र से बचने का कोई उपाय नहीं। क्योंकि विचार तो ऐसे हैं कि कभी मरते नहीं खत्म नहीं होते। एक बार आप इस जुर्म में सजा काट कर आएं तो देश में नक्सलियों की किसी बड़ी घटना के साथ ही थाने में हाजिर होकर खुद ही गिरफ्तारी दे दें, वरना आपका एनकाउंटर हो सकता है। आतंकवाद निरोधक कानून पोटा के दुरुपयोग के बाद सरकार को इसे वापस लेना पड़ा था, ऐसे में नक्सल समर्थकों की गिरफ्तारी की चेतावनी देने से पहले सरकार को इसके नतीजों पर भी सोचना चाहिए था।

नक्सलवाद से लड़ाई के मसले पर चिदंबरम साहब के रवैये और बयान में आए उतार-चढ़ाव का भी अपना ही ग्राफ है। करीब दो महीने पहले चिदंबरम नक्सलियों से बातचीत की पेशकश कर रहे थे। दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ कैंप पर हमला होते ही चिदंबरम त्यौरियां चढ़ा कर ये बयान देने लगे कि नक्सलियों के खिलाफ हवाई हमले की नीति पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है। इसके कुछ दिनों बाद चिदंबरम जेएनयू जैसे संस्थान में आम सभा करने पहुंचे तो उन्हें तीखा विरोध झेलना पड़ा। जेएनयू के वामपंथी संगठनों ने सभा स्थल के बाहर चिदंबरम और केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। इस विरोध के बाद ही शायद ये खबर आई कि अब नक्सल समर्थकों की भी खैर नहीं। चिदंबरम साहब को लोकतंत्र में विरोध और प्रतिरोध के ये सुर बेहद नागवार गुजरे और ये एलान हो गया कि नक्सल समर्थक जेल की हवा खाने को तैयार रहें।

जेएनयू की इस घटना को चंद दिन गुजरे ही थे कि चिदंबरम ने ये बयान दे दिया कि माओवाद से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है जनता का भरोसा जीतना। कंफेडरनेश ऑफ इंडियन फेडरेशन के एक कार्यक्रम में चिदंबरम ने कहा-"साल 2004-09 के बीच देश ने 8.5 फीसदी की दर से विकास किया लेकिन पिछड़े राज्यों में प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। सरकार और औद्योगिक घरानों को लोगों का भरोसा जीतने के उपाय ढूंढने होंगे।" गनीमत है कि चिदंबरम को ये एहसास हो रहा है कि बिना लोगों का विश्वास हासिल किए नक्सलवाद जैसी समस्या से नहीं निपटा जा सकता। नक्सलवाद से निपटने के लिए 'गोली' से ज्यादा जरूरत 'भरोसा' जीतने की है। चिदंबरम साहब आप जो सोच रहे हैं उसे कर दिखाइए, जंग में आपकी जीत निश्चित होगी। दो पल ठहरकर सोच लीजिए, ये रास्ता जरा लंबा है-इसमें धीरज भी चाहिए और ज्यादा आत्मबल भी। वरना गोली चलाना तो बहुत आसान है- जवानों को आदेश दिया और मरने-मारने के लिए जंग-ए-मैदान में उतार दिया। गोली की लड़ाई जवानों को लड़नी है लेकिन भरोसे की लड़ाई सरकार और सियासी पार्टियों को लड़नी है। क्या वाकई आपमें वो हिम्मत और हौसला बाकी है? क्या वाकई सरकार एक तानाशाही कानून की बजाय लोकतांत्रिक तरीके से ये लड़ाई लड़ने का माद्दा रखती है?

चिदंबरमजी आपकी नीयत को लेकर सवाल उठाने का मेरा इरादा कतई नहीं है। हो सकता है आप देश में अमनबहाली का सपना देख रहे हों पर साथ ही साथ आप ये भी तय कर लीजिए कि ये अमनबहाली कैसे और किन शर्तों पर? क्या लोकतंत्र का दम घोट कर आप नक्सलवाद की लड़ाई लड़ेंगे? क्या आप लोगों को डरा-धमका कर उनकी जुबान बंद करना चाहते हैं या फिर एक बहस के जरिए देश में आम राय बनाना चाहते हैं? सीआईआई के एक कार्यक्रम में आपने खुद कहा है कि माओवाद के मुद्दे पर दो तरह की राय है। एक धड़ा ये मानता है कि मौजूदा सरकार बुरी है और दूसरा धड़ा सरकार के साथ खड़ा है। मतभेद हो सकते हैं, लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है। विचारों की इस भिन्नता को ये कहकर खत्म मत कीजिए कि चुप रहो वरना सलाखों के पीछे डाल दिए जाओगे। जिस देश में हर मुजरिम को बचाव के लिए एक वकील मुहैया कराने की व्यवस्था है, वहां किसी मुद्दे या शख्स के पक्ष-विपक्ष में बहस पर रोक मत लगाइए। देश की आजाद आबोहवा और लोकतांत्रिक परंपराओं का गला मत घोटिए, बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश बने रहने दीजिए, देश आपको दुआएं देगा।

पशुपति शर्मा

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

टोपी उतारो फिर लड़ो इंसाफ की जंग

“आदमी को तोड़ती नहीं है
लोकतांत्रिक पद्धतियां
केवल पेट के बल उसे झुका लेती हैं
धीरे धीरे अपाहिज
धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए” (राजकमल चौधरी)

आज सुबह हिंदुस्तान (2 अप्रैल, 2010, दिल्ली संस्करण, रिपोर्टर सत्यप्रकाश) की एंकर खबर देखी तो बरबस राजकमल चौधरी की ये पंक्तियां दिमाग में कौंधने लगी। लोकतांत्रिक पद्धतियों के पेट के बल झुका लेने के हुनर की एक और मिसाल मेरे सामने थी। ये मिसाल पेश की लोकतंत्र के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मंदिर ने। देश के सर्वोच्च न्यायालय के कारिंदों ने एक लॉ इंटर्न को टोपी लगाकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने से रोक दिया।

कभी पढा था कि अंग्रेजों के जमाने में कई क्लब के आगे लिखा होता था कि यहां हिंदुस्तानियों और कुत्तों का प्रवेश वर्जित है। ये एक तरह की शासकीय ठसक थी, सामंती नजरिया था और दूसरों को उसकी औकात में रखने की पद्धति थी। देश की आजादी के बाद ये पद्धति बदलनी चाहिए थी, ये नजरिया बदलना चाहिए था लेकिन अफसोस ऐसा हो न सका। आज सुप्रीम कोर्ट के अंदर कानून के एक छात्र को टोपी उतारने के लिए मजबूर किया जाता है तो कई सवाल जेहन में कौंधते है। ये और मसला है कि इन सवालों के बाद सर्वोच्च अदालत के कारिंदों की बजाय आप कठघरे में खड़े कर दिए जाएं।

बहरहाल, अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई कर रहा मंसूर अहमद इन दिनों अजीब से हालात में फंस गया है। मंसूर 10 मार्च से सुप्रीम कोर्ट में इंटर्नशीप कर रहा है। वो यहां इंसाफ की लड़ाई के तौर-तरीके सीखने आया है लेकिन उसके पहले कोर्ट के आला अधिकारी उसे इंसाफ का शिष्टाचार सिखा रहे हैं। वो उसे ये पाठ पढ़ा रहे हैं कि वकीलों को कोर्ट में टोपी लगाने का हक है लेकिन एक इंटर्न को नहीं। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार की नसीहत भी लाजवाब है-“ बेटे तुम यहां ट्रेनिंग के लिए आए हो। तुम अपना मन उसी में लगाओ। टोपी नहीं लगाओगे तो क्या होगा? ” मी लार्ड माफ करें, पेट के बल झुकने में थोड़ा वक्त तो लगता है। लॉ के नए रंगरूट ने आरटीआई दायर कर टोपी की लड़ाई आगे बढ़ाई लेकिन महानिबंधक एम पी भद्रन ने जवाब भेजा- “यह कोर्ट के शिष्टाचार का मामला है।”

जाहिर है कश्मीर के बड़गाम जिले के निवासी मंसूर अहमद की भावनाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट में कोई जगह नहीं है। पता नहीं उसकी टोपी में ऐसी क्या बात है कि सुप्रीम कोर्ट के गुंबद को वो रास नहीं आ रही। मंसूर को टोपी लगाने का हक मिलेगा, फिलहाल इसकी गुंजाइश कम है। हां मंसूर के साथ सर्वोच्च न्यायालय में इंटर्नशीप कर रहे उसके 82 साथियों को पहला सबक जरूर मिल गया। इंसाफ की लड़ाई लड़ो मगर टोपी उतारकर, कमर झुकाकर।

शनिवार, 27 मार्च 2010

कैसे बांधोगे नर्मदा की प्रतिरोध-धारा


पिछले दिनों विकास संवाद के एक कार्यक्रम में महेश्वर जाने का मौका मिला। इस कार्यक्रम में काफी तादाद में मीडियाकर्मी जमा हुए। यूं तो बहस का एजेंडा- मीडिया के मानक और लोग- था, लेकिन चूंकि ये इलाका नर्मदा पर बन रहे बांध की वजह से नर्मदा बचाओ आंदोलन की कर्मभूमि है, सो फिजा में डूब से प्रभावित लोगों का सवाल भी घुला रहा। खुद आयोजकों ने भी कार्यक्रम कुछ इस तरह से ऱखा कि मीडियाकर्मी नर्मदा पर बन रहे बांध और उससे प्रभावित लोगों की हकीकत से दो-चार हुए और उन्हें ये मुद्दा उद्वेलित कर गया।

12 मार्च 2010 को 5 टोलियों में बंटे लोग महेश्वर डैम और डूब प्रभावित गांवों की ओर निकले। नर्मदा बचाओ आंदोलन से महेश्वर डैम के निर्माण से जुड़े लोग किस कदर दहशत में है, इसकी पहली झलक हमें निर्माण स्थल पर पहुंचते ही मिली। एक दस्ता तो किसी तरह गेट के अंदर दाखिल होने में कामयाब हो गया, लेकिन बाकी लोगों को गेट पर ही रोक दिया गया। एस कुमार्स कंपनी के प्रशासनिक अधिकारियों और गार्ड्स ने हमारे तमाम अनुरोध को दरकिनार कर अंदर दाखिल होने से साफ-साफ मना कर दिया। उनका सीधा तर्क था कि आप मीडियाकर्मी हैं तो क्या फिलहाल नर्मदा बचाओ आंदोलन के लोगों के साथ हैं, इसलिए अंदर जाने नहीं दिया जाएगा। उस समय तो सभी साथियों को बुरा लगा, लेकिन मुझे नर्मदा बचाओ आंदोलन की शक्ति की पहली झलक मिल गई थी। एक अहिंसक आंदोलन से ये खौफ साफ दर्शा गया कि एस कुमार्स कंपनी के लोगों का भरोसा कितना डिगा हुआ है और एनबीए के लोगों की पकड़ इलाके में कितनी मजबूत है।

महेश्वर डैम से हम सभी बैरंग लौटे और हमारी टोली पथराना गांव पहुंची। रास्ते में एक साथी ने नाराजगी में ये कहा कि डैम को बम लगाकर उड़ा देना चाहिए, एस कुमार्स के लोगों को मार-पीटकर बराबर कर देना चाहिए था, वगैरह-वगैरह। वो बिलकुल भन्नाया हुआ था, लेकिन बावजूद इसके मुझे उसकी ये राय नागवार गुजरी। ये चंद पलों का उफान क्या सालों से चले आ रहे किसी आंदोलन का विकल्प हो सकता है? खैर, गांव पहुंचे तो गांव के एक सज्जन ने कहा-“ अच्छा हुआ- आप लोगों ने झगड़ा नहीं किया, वरना आंदोलन का नाम खराब होता। ” मेरे लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यशैली को लेकर खुश होने का ये दूसरा मौका था। ये बात उस गांव का एक शख्स बोल रहा था जो 13 सालों से अपने वजूद की, अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है। वो किसी उतावलेपन में नहीं है, वो अपने हक की लड़ाई को आड़ेचंद पलों में समेटना नहीं चाहता बल्कि उसकी लड़ने की ताकत अदम्य है, असीम है।

बहरहाल, रात का खाना हमने जिस घर में खाया, वहां बुजुर्गों से बात हुई। घर के युवाओं, माताओं-बहनों के बीच हमने करीब आधे घंटे से ज्यादा वक्त गुजारा। गांव उजड़ने की चिंता तो थी लेकिन उनके अंदर मुझे हताशा का वो भाव नहीं दिखा, जो मेरे अंदर इस गांव के डूबने की फिक्र से ही घर करने लगा था। इन लोगों ने बताया कि कैसे आधे घंटे की नोटिस पर पूरा गांव जमा हो जाता है। कैसे संघर्ष के लिए गांव-गांव फौरन खबर भेजी जाती है। कैसे मिल-जुलकर वो अपनी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं। घर के मुखिया ने बताया कि इस आंदोलन के दौरान वो कई बार जेल भी जा चुके हैं, लेकिन कभी भी वो प्रशासन के आगे गिरगिराकर या पैसे जमाकर अपनी जमानत नहीं करवाते, खुद ही जब जेल अधिकारियों या प्रशासन का जी भर जाता है उन्हें आजाद कर दिया जाता है। गांधी के सत्याग्रह की तरह अपनी बात पर डटे रहने का ये साहस नर्मदा बचाओ आंदोलन की एक और उपलब्धि नहीं तो क्या है?

चौपाल पर जब बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो गांव के लोगों ने आंदोलन से जुड़े तथ्यों को इतनी संजीदगी से रखा कि पत्रकारों की बोलती बंद हो गई। हर सवाल का मुकम्मल जवाब। गांव की गलियों से लेकर संसद के गलियारे तक नर्मदा बचाओ आंदोलन को लेकर क्या चल रहा है, इसकी पूरी डिटेल गांववालों के पास मौजूद थी। हाल में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के दफ्तर से जारी चिट्ठी तक का हवाला इस चर्चा में दिया गया। गांववालों ने बताया कि ग्राम सभा ने पुनर्वास परियोजना में अनियमितता को लेकर प्रस्ताव पारित किया है और उसे सभी अधिकारियों और मंत्रियों तक पहुंचाया गया है। ये और बात है कि गांधी के नाम पर सत्ता सुख भोगने वाली पार्टी को ग्राम स्वराज का ये हस्तक्षेप रास नहीं आ रहा, लेकिन गांववालों को इसकी ताकत से रूबरू कराने वाले एनबीए को साधुवाद देने से आप खुद को कैसे रोक सकते हैं?

सूचना का अधिकार से लेकर ग्राम स्वराज तक हर मोर्चे पर एनबीए ने गांववालों को सशक्त किया और उनको आगे लाकर अपनी लड़ाई की कमान उनके हाथों में सौंपी है, इसका एहसास मुझे पहली बार पथराना के दौरे के बाद ही हुआ। बावजूद इसके कई सवाल मेरे और साथियों के मन में घुमड़ते रहे। 13 मार्च को मेधा पाटकर जब हम सभी से रूबरू हुईं तो सवालों की बौछार लग गई- नर्मदा बचाओ आंदोलन कोई परिणाम देने में कामयाब क्यों नहीं हुआ? क्या नर्मदा बचाओ आंदोलन को एस कुमार जैसी कंपनियों से पैसा मिलता है, ताकि प्रोजेक्ट डिले हो और उनकी कमाई का जरिया बना रहे। आदि-आदि। इन सभी सवालों का मेधाजी ने बिना किसी झिझक के जवाब दिया। पता नहीं मेरे साथी उन जवाबों से संतुष्ट हैं या नहीं, पर मुझे नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं और उसकी कार्यशैली ने काफी प्रभावित किया।

क्या आप इस बात से असहमत हो सकते हैं कि एनबीए ने गांववालों की लड़ाई लड़ने का ठेका नहीं लिया बल्कि हर गांव वाले को एक योद्धा की तरह अपनी लड़ाई लड़ने का हुनर सिखाया? क्या ये कोई उपलब्धि नहीं कि अपने हक की लड़ाई लड़ने वाले ये गांववासी आज किसी भी अधिकारी, राजनेता या मंत्री से आंख से आंख मिलाकर बात करने का साहस रखते हैं, इनका नैतिक बल उन पर भारी पड़ता है? क्या इस बात को नजरअंदाज किया जा सकता है कि नर्मदा के लोग अपने हक के लिए हर कुर्बानी को तैयार हैं? क्या ये हम सभी को शक्ति नहीं देता कि नर्मदा तट के जीवट लोगों में सालों की लड़ाई के बाद भी सालों लंबी लड़ाई का माद्दा अब भी बाकी है?

नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथियों ने नर्मदा के तट पर केवल प्रतिरोध खड़ा नहीं किया बल्कि प्रतिरोध की एक संस्कृति पैदा की है, जिसे नर्मदा पर बनने वाला कोई बांध नहीं बांध पाएगा, वो हर बांध के बावजूद अपनी गति से बहती रहेगी- हर सुबह, हर शाम। इस अनवरत धारा को शत शत सलाम।

सोमवार, 22 मार्च 2010

मीडिया के मानक और लोग

आम तौर पर यह कह दिया जाता है कि मीडिया के अब कोई मानक नहीं बचे तो इन पर बहस की गुंजाइश ही कहां बचती है। कुछ हद तक ये बात सही है, लेकिन क्या इसके उलट ऐसा नहीं लगता कि अब मानकों पर और ज्यादा गंभीरता से सोचने और विचारने की जरूरत आन पड़ी है। आप और हम सबसे ज्यादा मीडिया के बदलते मानकों से ही प्रभावित हो रहे हैं।

मीडिया के सैद्धांतिक मानकों और व्यावहारिक मानकों में काफी अंतर आ गया है। व्यावहारिक मानकों के कर्ता-धर्ता कामयाबी के शिखर पर खड़े हो जनता का मुंह चिढ़ा रहे हैं तो सैद्धांतिक मानकों के पक्षधर पाताल की खाइयों में खड़े जनता के हितों की दुहाई दे रहे हैं। इन दोनों के बीच अटका है 'लोग'। लोग, जो हर मानक के प्रयोग का आधार है। लोग, जो मानकों के नतीजों को प्रभावित करता है। लोग, जो चैनलों की टीआरपी तय करता है। लोग, जो अखबारों की प्रसार संख्या घटाने-बढ़ाने की शक्ति रखता है, लेकिन अफसोस उस लोग की भूमिका मीडिया के मानक तय करते वक्त कम से कमतर होती जा रही है।

बहरहाल, बात मीडिया की मानकों की करें तो सबसे बड़ा बदलाव तो ये है कि मानक-लोग, लोकहित से शिफ्ट कर गए हैं, अब बाजार और उपभोक्ता नए मानक बन गए हैं। नई परिभाषा-जो बाजार को भाए वही खबर है। जो मुनाफा दे, वही खबर है। जो विज्ञापनदाताओं के हितों का पोषण करे, वही खबर है। ऐसे में खबरों के मानक तय करने की शक्ति संपादकों के हाथ से फिसलकर मार्केटिंग डिवीजन के हाथ में जा रही है तो कैसा अचरज?

अब बात एक दो उदाहरणों से की जाए तो शायद परिदृश्य और स्पष्ट हो। विकास संवाद के मीडिया सम्मेलन के लिए इंदौर आ रहा था कि रास्ते में नई दुनिया का अखबार खरीदा। 12 मार्च 2010 की नई दुनिया की लीड खबर- अखबारों में छपने से कुछ नहीं होता। मध्यप्रदेश के आदिम जाति व अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री विजय शाह से जुड़ी खबर लीड बनी थी। मुद्दा बस इतना था कि मलगांव मेले में बेले डांस को लेकर मीडिया ने उन पर चौतरफा हमला किया तो वो भी मीडिया की औकात बनाने पर उतारू हो गये। मीडिया और मंत्रीजी की टशन में लीड खबर बन गई। यहां मानक न तो लोग था, न लोक हित। यहां दो सत्ता प्रतिष्ठानों के ईगो की लड़ाई थी। मीडिया की सत्ता को मंत्री ने चुनौती दी तो लीड खबर बन गई।

इसी क्रम में एक खबर मुझे पिछले दिनों बिहार के सीवान जिले (जीरादेई) के विधायक के ठुमके वाली ध्यान में आ रही है। इसे चैनल वालों ने बार-बार दिखाया। बार बालाओं के साथ ठुमके लगाते विधायक श्याम बहादुर सिंह के विजुअल में बड़ा दम था, बिकाउ था सो खूब चला। अगले दिन विधायक जी ने माफी मांगी- फिर वही डांस के विजुअल चले। तीसरे दिन श्याम बहादुर सिंह ने कहा- नाच कर मैंने कोई गलती नहीं की, मैं फिर ठुमके लगाऊंगा। खबर तीसरी बार भी चली- क्योंकि खबर से ज्यादा दम और रस बार बालाओं के ठुमकों में था। मीडिया में ऐसे में कई बार विधायक या मंत्रीजी के हाथ का एक खिलौना बस नजर आता है। वो जब चाहें खबर चलवा लें। आप ऊपर के दो उदाहरणों में खुद ही तय करें कि खबर के मानक क्या हैं?

तमिलनाडु पत्रकार यूनियन ने पेड न्यूज को लेकर एक सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण के मुताबिक लोकसभा चुनावों के दौरान तमिलनाडु के अखबारों ने पेड न्यूज के नाम पर 350 करोड़ रुपयों का वारा-न्यारा किया। लोक सभा चुनावों में राजनेताओं और राजनीतिक दलों से मार्केटिंड डिवीजन ने डील की और खबरें धड़ल्ले से छपती रहीं। कभी-कभी तो एक ही संस्करण में एक ही क्षेत्र के दो प्रतिद्वंद्वियों को एक साथ कागज में जिता दिया गया। लोगों और लोक हित के लिहाज से उम्मीदवारों का विश्लेषण नहीं हुआ, पैसों के लिहाज से हार-जीत तय हो गई।

मार्च महीने (2010) में कुछ संगठनों ने प्रेस क्लब में एक प्रेस वार्ता रखी। इस प्रेस वार्ता में जस्टिस राजेंद्र सच्चर, अरुंधति राय समेत कई लोगों ने अपनी बात रखी। अरुंधति राय ने इस बात पर हैरानी जाहिर की कि मीडिया नक्सलवाद के मामले में सरकारी वर्जन को ही अंतिम मानकर खबरों का प्रसारण कर रहा है। इतना ही नहीं, दूर-दराज के इलाकों के उन सभी जन संगठनों को नक्सलवादियों की कतार में खड़ा कर दिया गया है जो जनता के हितों की बात करते हैं। जहां मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए वहां वो अगर सरकार के हाथ की कठपुतली बन जाए तो फिर कहना ही क्या?

ऐसे में मानकों का सवाल बार-बार उठता है और जरूरी भी है, लेकिन सवाल है कि क्या इन मानकों को कोई मानेगा? जिन लोगों ने मीडिया के मानकों को दफन कर दिया है क्या वो फिर से मानकों की रूह को कब्र से बाहर आने देंगे?

पशुपति शर्मा
मीडियाकर्मी
9868203840

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

बेटी, औरत और दादी

१) बेटी
कोई पैमाना नहीं है
जो बेटे के मुकाबले
घटा बड़ा कर
नापी जाए।

२) औरत
कोई मर्द की नाक नहीं है
जो इज्जत के हिसाब से
जोड़ काट कर
रखी जाए

३) दादी
कोई फ्रेम में लगी फोटो नहीं है
जिसे दीवार पर सजाओ
फिर अपनी सहूलियत से
चाहो तो देखो या न देखो।
शिरीष खरे
Shirish KhareC/0- Child Rights and You189/A, Anand EstateSane Guruji Marg(Near Chinchpokli Station)Mumbai-400011