सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

लाशें


अधजली लाशें
सड़ी लाशें
गली लाशें
लाशें ही लाशें
घाटों पर
न जाने किनकी लाशें
वो
जिन्होंने अपनों को खोया
लेकिन
नहीं जुटा पाए
चिता की लकड़ियां
नहीं जुटा पाए
पंडे की फ़ीस
मां गंगा ने
उन्हें दे दिया आसरा
आंसू की चंद बूंदों के साथ
मां को सौंप आए
अपनों की लाशें
इन लाशों के
ईद-गिर्द भटक रहा था
मोहन का मन
धड़क रहा था
सोनिया का दिल
बेचैन था
गबरू का दिमाग
मोहन, सोनिया, गबरू
न जाने कितने नाम
तैर रहे थे
गंगा की धारा में
लेकिन
इन्हें कोई शिकायत न थी शायद
मोहन, सोनिया, गबरू
जिन्होंने मौत से बदतर
जिंदगी देख रखी थी
उन्हें तो इन ठहरी लहरों में
थोड़ा सुकून ही था
लेकिन
कमजोरों और लाचारों को
कहां नसीब होता है ये सुकून
उनकी सड़ाती गंधाती लाशें भी
एक सवाल की तरह
मंडराने लगती हैं
मुसीबत बन जाती हैं
परेशान हो उठता है
एक घाट
एक शहर
एक सूबा
लाशें मौन
लेकिन
हलचल महसूस होती है
लखनऊ से दिल्ली तलक
लाशों का दर्द
सिमट आता है एक रिपोर्टर के माइक में
जिंदा हो उठती हैं लाशें
समाचार चैनलों की स्क्रीन पर
जो आंसू सूख चुके होते हैं
वो उतर आते हैं
एंकर की आंखों में
चिंता लाशों की
चिंता गांवों की
चिंता घाटों की
चिंता गंगा की
इन चिंताओं का विस्तार
हर पल के साथ होता है
टीवी की दुनिया में
समाचार के जगत में
आप महसूस करना चाहें
तो कर लें
न कर पाएं तो
इनकी बला से
ये तो लाशों को इंसाफ़
दिलाने की लड़ाई है
जिंदा लोगों के इंसाफ़ की लड़ाई
इतनी आसान कहां।
---- पशुपति शर्मा

रविवार, 4 जनवरी 2015

पीके पर 'पीके' ही कर रहे हैं हंगामा


पिछले कई दिनों से फिल्म पीके को लेकर विवाद चल रहा है। खूब हो हंगामा भी हो रहा है। शायद जो लोग हंगामा कर रहे हैं, उन्हें ये उम्मीद हो कि उन्हें भी बैठे-बिठाए 'पीके' का नाम मिल जाए, क्योंकि होश में तो ऐसी फिल्म पर हंगामा मुमकिन नहीं लगता। हंगामेबाजों को ये भी नसीब नहीं हो पा रहा, इसका उन्हें जरूर अफ़सोस होगा। हां, वो फिल्म की बिन मांगी पब्लिसिटी जरूर कर रहे हैं, जिसके लिए फिल्म की टीम को उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए।
फेस बुक पर कई साथियों ने प्रतिक्रिया दी कि अब पीके की तारीफ और उसकी आलोचना करने पर आपके सांप्रदायिक, गैर-सांप्रदायिक आदि तमगे जुड़ेंगे, फिल्म की कलात्मकता या उसके कला पक्ष की चर्चा कम होगी। ऐसा ही हो रहा है। रॉन्ग नंबर ही ज्यादा डायल हो गए हैं और रॉन्ग नंबर के ठेकेदार ही दबंगई से न्यूज रूम के स्टूडियो तक 'कांय-कांय' कर रहे हैं। खैर पीके पर सियासत करने वालों, हंगामा करने वालों को उन्हें ये फिल्म मुबारक।
पीके की कथावस्तु की बात करें तो इसमें ऐसा कुछ भी नहीं, जो हमारी आम साइकी में न हो। मंदिर से जूते चोरी, भगवान को चढ़ावा, आस्था के बिचौलिये इन सब पर तंज कसा जाता रहा है, नुक्कड़ से लेकर बड़े पर्दे तक। पीके में इसे एक साथ जमा कर सूत्र में पिरोने की कोशिश भर की गई है, जो कई मौकों पर फूहड़ सी बन पड़ी है। हिंदुस्तान एक हिंदू बहुल राष्ट्र है, हिंदू धर्म ने आलोचना का स्पेस दिया है और फिल्म ने उसका बखूबी इस्तेमाल किया है। इस पर हंगामेबाज हिंदुओं का फर्क करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने अपनी हरकतों से इसे शर्म का विषय बना लिया है। फिल्म में इस्लाम, ईसाई और सिखों के कुछ दृश्य मानो इसलिए जोड़ दिए गए हैं, ताकि एक संतुलन दिखे। जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। एक वक्त में एक तबके पर भी तंज कसते तो कोई ऐतराज न था।
निर्देशक या कथाकार ने दूसरे ग्रह के प्राणी को इस संदेश को देने के लिए क्यों चुना, ये भी समझ से परे है। एक बड़े कान और दूसरे हाथ पकड़कर मन पढ़ने की शक्ति के अलावा पीके में ऐसी कोई खूबी नहीं थी, जिससे दूसरे ग्रह के प्राणी को बुलाने की जरूरत आन पड़ी हो। फिल्म कई तरह के सरलीकरण का शिकार हो गई है। बोली के लिहाज से 'लालू स्टाइल' या 'बिहारी स्टाइल' का चुनाव कर निर्देशक ने बतौर अभिनेता आमिर खान की चुनौती कम ही कर दी। इसके अलावा जब हाथ पकड़ कर ही बोली सीखनी थी तो कुछ और बोलियां भी केरेक्टर पर आजमाई जा सकती थीं। क्षेपक के तौर पर सेक्स को भी हास्य का विषय बनाया गया है। हिलने वाली कार या कंडोम वाले दृश्यों का इस्तेमाल भी एक दूसरे तरह का सरलीकरण है, जिसके विकल्प निर्देशक को तलाशने चाहिए थे। लॉकेट का गायब होना और फिर चोर के पकड़े जाने पर वापसी के दौरान बम विस्फोट जैसे दृश्य अति नाटकीय हैं।
अभिनय के लिहाज से आमिर खान अपनी पुरानी फिल्मों से एक कदम आगे बढ़ते नज़र नहीं आते। अनुष्का शर्मा जरूर अपनी भूमिका में असर पैदा कर पाईं हैं। बतौर रिपोर्टर, एंकर उन्होंने अपने किरदार को जी लिया है। नृत्य की बात करें तो पीके और संजय दत्त दोनों के स्टेप्स अच्छे लगते हैं। फिल्म टुकड़ों-टुकड़ों में निराश करती हुई टुकड़ों-टुकड़ों में ही अपना स्पेस तलाशती है ।
पशुपति शर्मा

शनिवार, 18 अक्टूबर 2014

ये दाढ़ी कुछ तो कहती है


तीन दिन से तबीयत खराब है, सो दफ्तर जाना हो नहीं पाया। इन तीन दिनों में बहुत पुराने साथियों ने हौले-हौले से अपनी जगह हासिल कर ली। पत्नी को उनसे चिढ़ है और मुझे लगाव। पत्नी को चिढ़ इसलिए कि वो मेरी पर्सनालिटी को बिगाड़ देते हैं, और मुझे प्यार इसलिए कि वो लंबे वक्त तक मेरे व्यक्तित्वका हिस्सा रहे हैं। बात चेहरे पर उग आए उन काले-सफेद बालों के जो एक खिचड़ी से हो गए हैं, ठीक वैसे ही जैसे मन।

हाथ दाढ़ियों पर जाते हैं तो बड़ा सुकून महसूस होता है। इन दाढ़ियों के साथ काफी लंबी यादें जुड़ी हैं। पहली बार जब स्कूल के दिनों में गालों पर इक्का दुक्का बाल उगे तो कैसा महसूस हुआ, ठीक से याद नहीं। हां, जब गाल पर घने और काले बालों ने ठीक-ठाक बसेरा बना लिया तो अच्छा लगने लगा। मां ने कभी मना नहीं किया। पिता, जो बाकियों को बढ़ी दाढ़ी के लिए डांटते-फटकारते रहे थे, उन्होंने कभी-कभार ही चेहरे की रंगत सुधार लेने की नसीहत दी। कुल मुलाकर इन दाढ़ियों पर वैसी आफत नहीं टूटी कि उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए।

फिर भोपाल पहुंचे। इक्का-दुक्का मौकों को छोड़ दें तो दाढ़ी बदस्तूर गालों पर कायम रही। ये जो कल से कुछ लिखने को जी मचल रहा है, वो कुछ उन्हीं यादों के सहारे भी तो है। इन दाढ़ियों के साथ कई नाटकों की प्रस्तुतियांकीं। दस्तक के हम उम्र साथियों के बीच शायद दाढ़ियों ने समय से पहले मुझे थोड़ा बुजुर्गबना डाला था। बड़ी सी दाढ़ियां तब तक कई बार घुंघराली शक्ल ले लेती। तब चश्मे का फ्रेमभी गोल और बड़ा गोल था। हड्डियों पर मांस को बसेरा बनाने का वक्त मिलता नहीं था। पहली नज़र में बीमार समझ लिए जाने की गुंजाइश रहती थी लेकिन मन था कि कुलांचे मारता रहता। परवाह कहां थी, न मुझे, न दाढ़ियों को।

दिल्ली आए, अखबार के दिनों तक फिर भी दाढ़ी को कभी कभार मौका मिल जाया करता था, अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का लेकिन चैनलों की नौकरी ने उसे ये मौके देने भी बंद कर दिए। हां, आप वाकई बीमार पड़ जाएं, हिम्मत न हो तो दो चार दिनों के लिए दाढ़ी से याराना गांठ सकते हैं। कुछ घंटों में इन काले-उजरे बालों की विदाई हो जाएगी, लेकिन अभी तो यही मुझे अरसे बाद कुछ बतियाने का मौका दे रहे हैं।
खुद में खोए, खुद को ढूंढते दाढ़ीदार पशुपति का गुनाह माफ हो तो कुछ तस्वीरें बीच-बीच में चस्पां हैं, ख़ास आपके लिए।
-पशुपति 

सोमवार, 18 अगस्त 2014

'मोनालिसा की आंखों' के नाम एक दोपहर


नूतन डिमरी गैरोला के फेसबुक वॉल से साभार

सईद भाई का बुलावा। कवि गोष्ठी में जाऊँ या न जाऊँ, इसको लेकर असमंजस। गर्दन में दर्द की वजह से पत्नी की ना और सुभाषजी को दे दिया गया वचन। इस ‘हाँ और ना के द्वंद्व के बीच ही सुभाषजी का फोन आया और मैं पतलून और शर्ट डालकर निकल पड़ा। सुभाषजी की 'चौपहिया सेवा' ने ‘ना’ को ‘हाँ’ में तब्दील करने में बड़ी भूमिका निभाई। हम तीन बजते-बजते कवयित्री मीता पन्त के आवास आरके पुरम, सेक्टर 10 निवेदिता कुंज के जी-32 में दाखिल हो गए। वहाँ सुमन केशरी मैम थीं और साथ में पुरुषोत्तम अग्रवाल सर। कमरे में कई और भी लोग थे, लेकिन अग्रवाल सर की मौजूदगी एक सुखद आश्चर्य की तरह थी।

बहरहाल, सवा 3 बजते-बजते कार्यक्रम की शुरुआत हुई। परिचय का औपचारिक सत्र। सीमांत सोहल से आनंद कुमार शुक्ल तक सभी का सईद भाई ने अपने अंदाज में परिचय दिया, परिचय कराया। जहाँ मौका मिला, वहाँ चुहलबाजी से भी परहेज नहीं किया। ये बेतकल्लुफी ही इस तरह की अनौपचारिक गोष्ठियों को कुछ और यादगार बना जाती हैं।

काव्य गोष्ठी की शुरुआत पंखुरी सिन्हा की कविताओं से हुई। एक यायावर की झलक समेटे कुछ कविताएँ। आवाज़ की समस्या के बीच ही वो आगंतुक, अकेली औरत, तानाशाह जैसी कुछ कविताओं का पाठ कर गईं। इसके बाद जेएनयू के शोधार्थी बृजेश कुमार ने मैं एक गांव हूं, दूध और सीट कविताएं सुनाईं। उत्तराखंड से आईं डॉक्टर नूतन डिमरी गैरोला ने भिक्षुणी, प्रत्यंचा और माँ के जरिए अपने अनुभव साझा किए। भारत भूषण अग्रवाल सम्मान से सम्मानित कुमार अनुपम बरसाती में जागरण, जल, काला पानी और अशीर्षक जैसी कविताओं के जरिए श्रोताओं को किसी और ही धरातल पर लेकर चले गए। रमा भारती की कविताओं ने चिनाब और चिनार की खूबसूरत लहरों का एहसास कराया। कर्मनाशा नदी के ईर्द-गिर्द रहने वाले 'राजेश खन्ना' सिद्धेश्वर सिंह ने 'कटी पतंग' के साथ काव्य गोष्ठी को नई 'उड़ान' दी। लकड़ बाज़ार, निर्मल वर्मा के शीर्षकों को कविताओं में इस खूबसूरती से पिरोया कि मन ठहर सा गया और पंखुरी सिन्हा के हस्तक्षेप पर उनका एक मीठा सा जवाब- 'हम सभी अपने-अपने वक्त के राजेश खन्ना हैं’ हमेशा याद रहेगा। अरुण देव ने  'घड़ी के हाथ पर समय का भार' जैसी सुंदर कविता के साथ मन की कई 'खिड़कियां' खोल दीं। उनकी आवाज़ की कशिश कविता को कुछ और मानीखेज बना रही थी।

और अंत में सुमन केशरी। थोड़ा सा 'सईद' बनने की ललक के साथ कविताओं का पाठ शुरू किया। रावण, कबीर-अबीर, तथागत, लोहे के पुतले, बहाने से जीवन जीती है औरत, तमगे, मोनालिसा और ऐसी ही कई कविताएँ। कभी मिथकीय आवरण लिए तो कभी आज का जीवन समेटे- स्त्री मन को छूती हुई, पुरुष मन को झकझोरती हुई छोटे से कमरे में इस वक्त तक कविता रेगिस्तान की रेत पर अपना 'घरौंदा' बना चुकी थीं, जिसमें हम सभी 'टीस भरा सुकून' महसूस कर रहे थे।

ये बिलकुल सही वक़्त था जब सईद भाई ने काव्य गोष्ठी को थोड़ा सा विराम दे दिया। मीता पंत ने तब तक समोसे, बिस्किट, नमकीन की मेज़ सजा डाली थी। समय ऐसा था कि हम ज्यादा इंतज़ार न कर सके और टूट ही पड़े। कुछ साथियों ने चाय की चुस्कियां ली। पुरुषोत्तम अग्रवाल सर ने सईद जी को चाय में देरी पर आंदोलन की धमकी तक दे डाली। इन सबके बीच जेएनयू के कुछ पुराने साथियों से गुफ्तगू।

अब वक्त था सुमन केशरी के काव्य संग्रह 'मोनालिसा की आंखें' पर परिचर्चा का। सुमन केशरी की काव्य यात्रा पर एक नज़र डालने की औपचारिक जिम्मेदारी अरुण देव ने निभाई। अरुण देव के मुताबिक सुमन केशरी की कविताएं विचार के रेडिमेड कपड़े नहीं पहनती। केशरी जी कविता की यात्रा पर हैं, किसी मंजिल पर नहीं पहुंची, ये उनके रचना संसार का एक सुखद पहलू है। अरुण देव जी ने शमशेर बहादुर सिंह के एक लेख का जिक्र किया, और उस लेख में वर्णित कसौटियों पर सुमन केशरी के काव्य संसार को कसना शुरू किया। आधुनिक विकास के अध्येता, देश विदेश के साहित्य से परिचय और हिंदी ऊर्दू की परंपरा का ज्ञान के निकष पर एक महान कवयित्री के संकेतों का जिक्र किया। उन्होंने सुमन केशरी की यात्रा को ज्ञानात्मक संवेदना से संवेदनात्मक ज्ञान की ओर मुखर बताया। उनकी नज़र में सुमन केशरी सचेत स्त्री की दृष्टि से मिथकों को देखती हैं। आलोचनात्मक दृष्टि से मिथकों का सृजनात्मक पाठ तैयार करती हैं। यह सचेत स्त्री सिमोन द बोउवार से प्रभावित नहीं है बल्कि मीरा और महादेवी से अपनी संवेदना ग्रहण करती है।
नूतन डिमरी गैरोला के फेसबुक वॉल से जहां मैं वाया मुकेश जी के पहुंचा।

इस आलेख के बाद विमर्श सवाल जवाब की तरफ बढ़ा। पंखुरी सिन्हा ने केशरी के कर्ण और दिनकर के कर्ण का अंतर पूछा तो वहीं पुरुषोत्तम अग्रवाल ने ऐसे सवालों के उत्तर खुद पाठकों को तलाश करने की नसीहत दे डाली। सिद्धेश्वर सिंह ने कवि को प्रेस कॉन्फ्रेंस की तरह सवाल जवाब के दौर में फंसाने पर चुटकी ली। वहीं नूतन जी ने 'मोनालिसा की आंखें' शीर्षक पर एक मार्मिक सा सवाल पूछ डाला। सुमन केशरी सृजन प्रक्रिया के 'एकांत' में पहुँच गईं। बेहद निजी क्षण। दफ्तर में तमाम लोगों के बीच अधिकारी की डाँट। आंखों में अटके आँसू। और उस दौरान एक कविता का सृजन। मोनालिसा की ये डबडबाई आंखें ही कवयित्री से संवाद करती हैं, बतियाती हैं, अपना दर्द साझा करती हैं। यही वजह है कि जिस मोनालिसा की मुस्कान पर नज़रें टिकती हैं, उस मोनालिसा की आंखों से गुजरती हुई सुमन केशरी एक काव्य यात्रा पर निकल पड़ती हैं।

- पशुपति शर्मा

गुरुवार, 26 जून 2014

मीडिया की निष्पक्षता के अपने-अपने मायने


(विनय स्मृति व्याख्यानमाला-5)


नई दिल्ली के दीन दयाल उपाध्याय मार्ग स्थित जवाहरलाल नेहरू नेशनल यूथ सेंटर पर 22 जून 2014 की दोपहर एक-एक कर पत्रकार साथियों का जुटान शुरू हो गया। विनय तरुण की स्मृति में ये पांचवां आयोजन था। पांच साल पहले विनय के असामयिक निधन से जो साथी सदमे में थे, वो अब विनय की यादों के बहाने साल में एक बार जमा होकर अपना मन टटोलते हैं, कि सादगी और सच्चाई कितनी बाकी है, उस पौधे में थोड़ा पानी डाल लेते हैं। प्रगतिशील मीडियाकर्मियों और संस्कृतिकर्मियों के संगठन दस्तक की ओर से आयोजित कार्यक्रम के पहले सत्र में साथियों ने  अनौपचारिक तौर पर कुछ बातें शेयर की।

4 बजते-बजते चाय का स्टॉल लग गया, दूसरे सत्र के वक्ताओं के आने का सिलसिला शुरू हो गया और कार्यक्रम अपने औपचारिक चरण की तरफ बढ़ चला। वक्ताओं में सबसे पहले आनंद प्रधान सभागृह में दाखिल हुए। फिर अध्यक्ष महोदय डॉक्टर पुरुषोत्तम अग्रवाल। मंच संचालक पुष्पेंद्र पाल सिंह पहले से मौजूद थे ही, आयोजक आश्वस्त हो गये। चाय की चुस्कियों के बीच मीडिया से जुड़े साथी कुछ निजी और कुछ वैचारिक द्वंद्व शेयर करते रहे। इस बीच सीढ़ियां चढ़ते वयोवृद्ध वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय भी हॉल में दाखिल हुए। लिफ्ट पहली मंजिल पर अटकी तो यूथ सेंटर के कर्मचारियों ने फिर इसकी सुध नहीं ली। दो वक्ता, सतीश के सिंह और भाषा सिंह आने शेष थे लेकिन अध्यक्ष महोदय ने नियत समय पर कार्यक्रम शुरू कर देने का इशारा कर दिया।

साढ़े चार बजते ही दस्तक परिवार की साथी और आयोजन के संयोजक की भूमिका संभाल रहीं शेफाली चतुर्वेदी ने विनय तरुण की यादें शेयर की, अतिथियों का स्वागत किया और मंच माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक पुष्पेंद्र पाल सिंह के हवाले कर दिया। मीडिया चुनाव और निष्पक्षता पर औपचारिक परिचर्चा शुरू हो गई। मंच संचालन और आधार वक्तव्य की दोहरी जिम्मेदारी को सहजता से स्वीकार करते हुए पुष्पेंद्र पाल सिंह ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि निष्पक्षता के शाब्दिक अर्थ पर जाएं तो ये पूर्वाग्रह से ग्रस्त हुए बिना, किसी के प्रभाव के दबाव में आए बिना और तटस्थता के साथ अपनी बात रखना है। उन्होंने कहा कि आर्थिक और राजनीतिक दबावों के बीच इस निष्पक्षता को बनाए रखना एक चुनौती है। 2014 के चुनावों के दौरान एक बड़े मीडिया हाउस के मार्केटिंग टीम को जारी सर्कुलर के जरिए उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाई। मीडिया हाउस ने अपनी मार्केटिंग टीम और संपादकीय टीम को ये निर्देश दिया कि हर चुनाव क्षेत्र के हर उम्मीदवार में चुनाव के आखिरी दौर तक जीत की उम्मीद कायम रखनी है ताकि विज्ञापन का सिलसिला अंतिम घड़ी तक जारी रहे। जाहिर है इसका पालन किया गया और खबरों के प्रस्तुतिकरण में सभी उम्मीदवारों को लगभग बराबर का स्पेस देकर चुनावी फाइट में अपने फायदे के लिए बनाए रखने का तिकड़म चलता रहा।


पहले वक्ता के तौर पर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन के व्याख्याता आनंद प्रधान ने विनय तरुण की स्मृति को प्रणाम करते हुए अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा, हिन्दी पत्रकारिता का चरित्र विनय तरुण जैसे एक्टीविस्ट पत्रकार ही बनाते हैं। सामाजिक सक्रियता और पत्रकारिता का तालमेल बना रहना एक सुखद विषय है। मैं निष्पक्षता की यांत्रिक अवधारणा के विरुद्ध हूं। प्रोफेशनलिज्म के नाम पर निष्पक्षता थोपी जा रही है। कोई भी पत्रकार निष्पक्ष नहीं हो सकता, हां रिपोर्टिंग का तौर तरीका जरूर ऑब्जेक्टिव होना चाहिए।

आनंद प्रधान ने परिचर्चा के दौरान 'मीडियाटाइज्ड पॉलिटिक्स' के जुमले के जरिए अपनी बात आगे बढ़ाई। पॉलिटिकल पार्टी और आम लोगों के बीच मीडिया अब मध्यस्थ की भूमिका में आ चुका है। मीडिया इन दोनों के रिश्तों को तय करने में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। टेलीविजन पर दिखने वाले नेता, बिना जनाधार के ही रातों रात राष्ट्रीय नेता बन जा रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने चुनावों के दौरान इवेंट कवरेज पर भी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि मीडिया एटेंशन हासिल करने के लिए पार्टियां अब इवेंट क्रिएट करने के फॉर्मूले पर काम कर रही हैं। नेताओं के लुक से लेकर कैमरा एंगल तक सियासी पार्टियों के वॉर रूम में बैठे एक्सपर्ट तय कर रहे हैं। उत्पादित मुद्दों पर प्राइम टाइम चैनलों में बहस हो रही है।

आउटलुक की सहायक संपादक भाषा सिंह ने कहा कि पत्रकार में निष्पक्षता नहीं होनी चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी ये पता लगाना है कि मौजूदा चुनावों में पत्रकारों और मीडिया घरानों की पक्षधरता कहां रही। मीडिया कॉरपोरेट पूंजी का जरिया बन चुका है और उनके हितों का असर चुनावी कवरेज पर पड़ना लाजिमी है। चुनाव परिणाम के आने के साथ ही मीडिया हाउसेस की शेयर होल्डिंग बदलती है, खरीद फरोख़्त शुरू हो जाती है। नई सरकार के दागी मंत्रियों पर खामोशी, फेसबुक कमेंट पर गिरफ़्तारियों पर बेशर्म सी चुप्पी ये एक अनकहे नेक्सस का ही नतीजा माना जा सकता है। थ्रेट टू इकॉनॉमिक सेक्युरिटी, नेशनल इंटरेस्ट जैसे नए जुमले उछालकर नई सरकार विरोध के स्वर दबाने का एक टूल बना रही है, जिस पर सवाल न उठना एक खतरनाक संकेत है।

लाइव इंडिया के ग्रुप एडिटर इन चीफ़ सतीश के सिंह ने खुद पर तंज के साथ माहौल को थोड़ा हलका किया। उन्होंने कहा कि गंभीर मुद्दे पर छिछले माध्यम के प्रतिनिधि के तौर पर बात शुरू कर रहा हूं। उन्होंने पक्षधरता में स्वच्छता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पत्रकार में स्वच्छ निष्पक्षता होनी चाहिए। आनंद प्रधान ने चुनावी कवरेज के जरिए बाय-पोलर पॉलिटिक्स का माहौल बनाने के लिए मीडिया की भूमिका पर जो सवाल उठाये थे, सतीश के सिंह ने उस चर्चा को आगे बढ़ाया। सतीश के सिंह ने कहा कि मीडिया की भूमिका है लेकिन वो सीमित है। अगर ऐसा न होता तो बायपोलर पॉलिटिक्स का तथाकथित मुहावरा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और ओडिशा में बेअसर न हो जाता। इसी सिलसिले में उन्होंने दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सफलता का भी जिक्र किया। सतीश के सिंह ने कहा कि जिस मीडिया पर मोदी का जरूरत से ज्यादा कवरेज करने का आरोप लग रहा है, उसी मीडिया ने 'महंगे दिन आ गए' की रिपोर्टिंग के जरिए मोदी सरकार पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। सतीश के सिंह ने सभाकक्ष में मौजूद युवा साथियों से एक पीआईएल के जरिए चुनावी खर्चों पर श्वेत पत्र की मांग करने का सुझाव भी दिया।

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने विनय तरुण की स्मृति को प्रणाम किया। इसके बाद उन्होंने ओशो से किए गए एक सवाल को सामने रखा- सत्य क्या है? इस पर ओशो का जवाब था-'सत्य बताया नहीं जा सकता, उसके रास्ते बताए जा सकते हैं, उसे अनुभव किया जा सकता है।' रामबहादुर राय ने इस जवाब को मौजूदा विषय से जोड़ा- करीब-करीब यही स्थिति निष्पक्षता के साथ भी है। रामबहादुर राय के मुताबिक पत्रकार का काम किसी का झंडा ढोना नहीं है। पत्रकार के लिए पत्रकार होना जरूरी है जबकि मालिक का लक्ष्य उसे एक 'मीडिया' भर बनाने का होता है।

पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के एक धड़े द्वारा मोदी की जीत को नकारने पर रामबहादुर राय ने सवाल उठाए। उन्होंने इस तरह के विश्लेषण पर तिरछी निगाहें डालीं कि 2014 के चुनाव में 69 फ़ीसदी लोगों ने मोदी को रिजेक्ट किया। उन्होंने मोदी की जीत को कॉरपोरेट हाउसेस की जीत बताने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ये अनकहा नियम है कि कॉरपोरेट घराने सत्तारुढ़ दल को ज्यादा पैसा देते हैं और विपक्ष  को कम। रामबहादुर राय ने चुनावों में किए गए खर्च की हेराफेरी पर भी चिंता जाहिर की। उन्होंने इस लिहाज से केजरीवाल को भी ईमानदार मानने से इंकार कर दिया। रामबहादुर राय के मुताबिक बनारस में केजरीवाल ने अपने चुनावी खर्चे का सही-सही ब्यौरा आयोग को नहीं दिया।

डॉक्टर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने 50 मिनट की क्लास की अपनी आदत और टेलीविजन के 20 सेकंड में बात रखने के विरोधाभासी चरित्र पर चुटकी के साथ माइक संभाला। उन्होंने मीडिया पर बात करने का हक सिर्फ मीडियाकर्मियों को देने से इंकार कर दिया, क्योंकि इसकी जद में हर व्यक्ति आता है, शहर से गांव तक हर किसी के जीवन को मीडिया प्रभावित करता है। मीडिया की निष्पक्षता को असंभव मानने से इंकार करते हुए उन्होंने राजेंद्र माथुर का जिक्र किया, जिन्होंने वीपी समर्थक होने के बावजूद उनके ख़िलाफ़ लिखे जाने वाले तमाम लेखों को अखबार में जगह दी। न्यूज और व्यूज में फर्क करने की जरूरत को पुरुषोत्तम अग्रवाल ने रेखांकित तो किया लेकिन इस सीमा के साथ कि टेलीविजन में ये इतनी आसानी से मुमकिन नहीं। उन्होंने कहा कि एक वो दौर था जब सेठ- 'अखबार अखबार की तरह चलेगा, और कारोबार कारोबार की तरह' की सोच रखते थे, लेकिन अब अखबार को कारोबार की तरह चलाने का चलन आ गया है। पुरुषोत्तम अग्रवाल के मुताबिक टेलीविजन की थोथी पकड़ ने लोगों के जीवन में गहरी समस्या पैदा की है। चैनल ने लोगों से उनका एकांत छीन लिया है।

परिचर्चा के बीच में कुछ सवालों का दौर भी चला। कुंदन शशिराज ने एक निजी चैनल की एंकर तनु शर्मा की खुदकुशी की कोशिश और उस पर मीडिया हाउसेस में पसरे सन्नाटे का सवाल भी छेड़ा। सतीश के सिंह ने इस पर मीडिया की सीमाओं का जिक्र किया तो वहीं आनंद प्रधान ने कहा- कुछ सवालों में उनके जवाब भी निहित होते हैं। एबीपी के संदीप ने भी हस्तक्षेप किया।

कुछ और साथी सवालों की बारी का इंतज़ार करते रहे और समय की सीमा को देखते हुए धन्यवाद ज्ञापन के लिए अनुराग द्वारी ने माइक थाम लिया। विनय की यादें, गीत के दो बोल, फिर एक और चाय का बुलावा।

पशुपति शर्मा
8826972867


सोमवार, 30 सितंबर 2013

शिरीष खरे की पुस्तक 'तहकीकात' का विमोचन

इंदौर. युवा पत्रकार और मध्य प्रदेश में तहलका के वरिष्ठ संवाददाता शिरीष खरे की खोजी पत्रकारिता पर आधारित पहली पुस्तक ‘तहकीकात’ का विमोचन किया गया. इस दौरान देश के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई, दूरदर्शन के महाप्रबंधक त्रिपुरारी शरण, जाने-माने न्यूज एंकर आशुतोष, एक्सचेंज फॉर मीडिया के संपादक अनुराग बत्रा, सकाल (मराठी) के सलाहकार संपादक विजय नायक, नई दुनिया के समूह संपादक श्रवण गर्ग, अजय उपाध्याय, सुरेश बाफना और सीमा मुस्तफा जैसी हस्तियां मौजूद थीं. ‘तहकीकात’ पुस्तक में मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई बड़े घोटालों के खुलासों से जुड़ी बातों पर प्रकाश डाला गया है. यह पुस्तक युवा पत्रकार की उन विशेष रिपोर्टों पर आधारित हैं जो उन्होंने बीते दो सालों के दौरान इन राज्यों में पत्रकारिता करते हुए तैयार की हैं. इसमें खास तौर से इन राज्यों के राजनीतिक मूल्यों में आई गिरावट को समझने की कोशिश की गई है और उन्हें संदर्भों सहित रखा गया है.

गौरतलब है कि मीडिया के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी यह सभी हस्तियां  इंदौर के होटल फॉरच्यून लेंड मार्क में इंदौर प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित ‘पत्रकारिता की नई चुनौतियां’ में शामिल हुई थीं. इस दौरान उन्होंने खास तौर से युवा पत्रकारों के सामने आ रही चुनौतियों को लेकर अपने अनुभव और विचारों को भी लोगों के साथ साझा किया.

पुस्तक के बारे में :
'तहकीकात' यह पुस्तक मुखौटों के पीछे का ऐसा सच है जिसमें रिपोर्ट दर रिपोर्ट कई बड़े घोटालों का खुलासा हुआ है. साथ ही भ्रष्ट व्यवस्था के ऊंचे सोपान पर बैठे व्यक्तियों के दोहरे चरित्र की पड़ताल भी की गई है. यह पुस्तक मुख्यतः उन विशेष रिपोर्टों पर आधारित है जो लेखक ने बीते दो सालों में मध्य प्रदेश और राजस्थान रहते हुए लिखी थीं. अपने समय की तस्वीरें बताती हैं कि देश के विकसित होते इन राज्यों में आर्थिक घटनाक्रम किस तेजी से बदल रहा है. इसकी वजह से खास तौर पर राजनीतिक मूल्यों में किस हद तक गिरावट आई है. रिपोर्टिंग के पीछे मकसद था कि ऐसी स्थितियों की प्रक्रियाओं को जाना जाए और उन्हें संदर्भ के रुप में रखा जाए. दूसरे शब्दों में यह अपने समय का लघु दस्तावेज है. एक युवा पत्रकार के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है कि पत्रकारिता के पहले ही दौर में उसने जो लिखा उसकी गूंज सियासी गलियारों से लेकर सदन तक हुई. इस मामले में मध्य प्रदेश के साथ ही राजस्थान के उन संस्कारों का धन्यवाद जहां असली शक्ल दिखाने के बावजूद आईना तोड़ने का चलन अभी पनपा नहीं है. उम्मीद है कि यह प्रयास अपने समय के मुद्दों को संदर्भ और विश्लेषण के साथ समझने में मदद करेगा.

लेखक के बारे में :
जनपक्षीय पत्रकारिता में बीते बारह सालों से सक्रिय. इस दौरान दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के गांवों को देखा-समझा. गरीबी, समाज के उत्पीडि़त वर्ग पर होने वाले अत्याचारों और सत्ता के ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की अराजकता की वजह से आम आदमी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को पत्रकारिता का विषय बनाया. 2002 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विष्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त की. प्रतिष्ठित लाडली मीडिया पुरस्कार और सेंट्रल स्टडी ऑफ डवल्पमेंट सोसाइटी, नई दिल्ली द्वारा मीडिया फेलोशिप सम्मान.
(मेल से प्राप्त... इसे विज्ञप्ति की श्रेणी में रखा जा सकता है।)

बुधवार, 10 जुलाई 2013

केसला के वो दो दिन

सुखतवा, केसला के जंगलों को रात के अंधेरे में चीरती हुई हमारी गाड़ी रात करीब डेढ से दो बजे के बीच प्रदान के कैंपस में पहुंची। पेट में चूहे दौड़ रहे थे और उनींदी सी रोली शिवहरे पुरानी चिरपरिचित गर्मजोशी से सभी साथियों का स्वागत कर रहीं थीं। बावजूद इसके इतनी रात गए ये बेतकल्लुफी कौन करता... कौन ये कहता कि हमें भूख भी लग रही है, सो हम सभी अपने-अपने कमरों में जा विराजे। कुछ देर बाद अखलाक ने मेरा दरवाजा खटखटाया, वो बिस्किट का एक डिब्बा कहीं से जुगाड़ लाया था। तब तक मैं भी अपने बैग से बिस्किट के एक आध-पैकेट ढूंढ चुका था। खैर, दो चार बिस्किट चबाए, पानी गटका और सो गए।
 


सुबह नींद खुली तो... सतपुड़ा के जंगलों का पिछले साल सा एहसास। आंखें रूम के कमरों से ही वो पंडाल भी ढूंढने लगीं जो पचमढ़ी में तना था। नास्ता हुआ और कुछ देर बाद हम उस हॉल में जा पहुंचे, जहां सातवां विकास संवाद शुरू हो चुका था। साथियों के परिचय का सिलसिला जारी था। सत्र की औपचारिक शुरुआत के साथ ही संचालक चिन्मय मिश्र ने वो बात कह डाली, जो मन में उमड़-घुमड़ रही थी- पचमढ़ी का एक्सटेंशन है केसला। सच, वही सतपुड़ा की पहाड़ियां और वैसे ही सघन सत्र। बंदरों की धींगामुश्ती इस बार के सत्रों में व्यवधान उत्पन्न नहीं कर पाई क्योंकि पंडाल का विस्तार प्रदान के पक्के सभागृह में तब्दील था।

सुनील भाई ने 'संघर्षों के राष्ट्रीय संदर्भ' से अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि निराशाजनक संकेतों के साथ ही आशाजनक संकेत भी मिल रहे हैं। विकास के मौजूदा ढांचे और उसके गुणगान पर उन्होंने सवाल उठाए। विकास की बलि चढ़ने वाले लोग कोई और हैं और उनका फायदा गिनाने वाले कोई और। मीडिया के चरित्र की विडंबना को उन्होंने रेखांकित किया। नक्सली आंदोलन में जब बड़ी हिंसात्मक घटना होती है तो पूरा मीडिया उस पर टूट पड़ता है लेकिन अहिंसक तरीके से चलने वाले आंदोलन और अनशन के कवरेज की मीडिया को फुर्सत नहीं होती। 'शक्तिमान' परियोजना के उद्धाटन की मिसाल पेश करते हुए उन्होंने कहा कि इस दौरान मुकेश खन्ना की मौजूदगी का 'स्टार कवरेज' हुआ लेकिन परियोजना का विरोध कर रहे लोगों, उनके धरने और उनकी गिरफ्तारी के लिए एक दो लाइन लिखना भी पत्रकारों ने मुनासिब नहीं समझा। मंच से उन्होंने अन्ना और उनके साथियों के लिए एक सवाल भी उछाल दिया- भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन को व्यापक कवरेज मिली लेकिन आंदोलनकारियों ने इसके बाद भ्रष्टाचार की जड़ें कहां हैं, इस पर कोई सेमिनार क्यों नहीं करवाया?

'संवैधानिक तंत्र का बदलता चेहरा' विषय पर परिचर्चा की शुरुआत माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति वी के कुठियालाजी की 'सुख की अनुभूति' के साथ हुई। कुठियालाजी ने अपने व्याख्यान को इतने आयाम और इतना विस्तार दे दिया कि उनकी 'सुख की अनुभूति' में श्रोता अपने लिए 'सुख' तलाशते रह गए। स्वतंत्रता प्राप्ति का नशा ख़त्म होने के बाद के लोगों के इस जमावड़े के सामने उन्होंने मछलियों को डूबने से बचाने के बंदर के प्रयास की मिसाल रखी। वैज्ञानिक विकास, हरित क्रांति, न्यूक्लियर विकास से लेकर क्रायोजेनिक ईंजन तक कई मोर्चों पर मिली विजय को उन्होंने बड़ी उपलब्धि बताया। मनुष्य के नवजात शिशु को उन्होंने सबसे ज्यादा हेल्पलेस प्राणी करार दिया और इस सिलसिले में संवाद की महती भूमिका को रेखांकित किया।

संचालक चिन्मय मिश्र ने रवीन्द्र नाथ टैगोर की एक कविता से कुठियालाजी के भाषण का समअप किया, लेकिन इस दौरान माइक ने व्यवधान पैदा कर दिया। तभी भीड़ से एक जुमला उछला- 'ये वर्तमान मीडिया की कविता है।' हल्की-फुल्की टिप्पणियों के इस मिजाज को अगले वक्ता अनिल बैरवाल ने अपने अंदाज में 'मैनटेन' किये रखा। हॉल में बैठे एक साथी की टी शर्ट पर लिखी चंद लाइनों पर उनकी नज़रें जा टिकीं- 'लव इज़ लाइक चाइनीज़ मोबाइल, नो गारंटी।' इसे उन्होंने विस्तार दे दिया- 'पॉलिटिक्स इज़ लाइक चाइनीज़ मोबाइल, नो गारंटी।' हालांकि उनका अपना ऑब्जर्बेशन कुछ ऐसा है कि आज़ादी के पहले प्यार और पॉलीटिक्स दोनों ही चाइनीज़ मोबाइल की तरह नहीं थे।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और नेशनल इलेक्शन वॉच, जैसे मिनी मूवमेंट चला रहे अनिल बैरवाल ने बातों ही बातों में मौजूदा राजनीतिक तंत्र और राजनेताओं की कुंठाओं और विंडबनाओं को भी बेपर्दा करना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया कि कैसे संसद में एक दूसरे के ख़िलाफ़ हो-हंगामा मचाने वाले राजनीतिक दल, तब एक सुर में बातें करने लगते हैं, जब उनकी जवाबदेही तय करने का सवाल सामने आता है। 1991 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने एक पीआईएल दायर कर चुनावी मैदान में उतरने वाले प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि सार्वजनिक करने की मांग उठाई थी। साल 2002 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मांग को जायज ठहराया। सारे राजनीतिक दल इस मुद्दे पर एक हो गए और हाईकोर्ट के फ़ैसले को बेअसर करने के लिए एक अध्यादेश लेकर आए। राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार इस पर हस्ताक्षर नहीं किया, तो कैबिनेट ने दोबारा इसे उनके पास भेजा। हालांकि सरकारी ये कोशिशें सुप्रीम कोर्ट में जाकर बेकार साबित हुईं। राजनेताओं को जवाबदेह बनाना इस वक़्त की सबसे बड़ी चुनौती है।

अनिल बैरवाल ने सवाल उठाया कि राजनीतिक दल इस बात के लिए राजी क्यों नहीं होते कि उन्हें आरटीआई के दायरे में लाया जाए? राजनीतिक दल ये बताने को तैयार क्यों नहीं होते कि उनके पास पैसा कहां से आ रहा है? राजनीतिक दल ये क्यों नहीं बताते कि सरकार से उन्हें कितना पैसा या सुविधाएं मिल रही हैं? सुप्रीम कोर्ट जब आरटीआई के दायरे में आ सकता है तो फिर राजनीतिक पार्टियां इसके लिए क्यों हामी नहीं भरतीं? इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जब सज़ायाफ़्ता चुनाव नहीं लड़ सकते तो फिर सज़ा के एलान के बाद विधायकों सांसदों को हटाए जाने की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं?

भोजन के पूर्व सत्र के आख़िरी वक्ता के तौर पर दैनिक हिंदुस्तान के पूर्व संपादक अरविंद मोहन ने मंच संभाला। संवैधानिक तंत्र के बदलते चेहरे पर बेहद अहम टिप्पणी के साथ उन्होंने अपनी बात शुरू की- अब कानून अपराधियों के साथ कॉरपोरेट हाउस और उनके दलाल बना रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की मजबूती को देश की जनता में स्थापित करने के लिए टी एन शेषन की तारीफ की तो वहीं सीएजी रिपोर्ट के जरिए एक के बाद एक प्राकृतिक संसाधनों की सार्वजनिक लूट को जगजाहिर करने के लिए विनोद राय के काम की सराहना की। हालांकि इस सिलसिले में मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर चुटकी भी ली- 'वो तो प्लानिंग कमीशन में बेरोजगारी के दिन काट रहे हैं वरना देश के वित्त मंत्री होते'।

अरविंदजी ने कहा कि जेनुइन डेमोक्रेसी की लड़ाई अभी बाकी है लेकिन अन्ना के आंदोलन से ये भरोसा भी पैदा होता है कि कोई भी पीढ़ी ख़ामोश नहीं रहती, वो हस्तक्षेप जरूर करती है। डेमोक्रेसी की परिभाषा को उन्होंने दो स्तरों पर समझाया- एक तो सांस्थानिक डेमोक्रेसी और दूसरी- दिल की डेमोक्रेसी। जब तक हम दिल से लोकतंत्र को स्वीकार नहीं करते, अपने व्यवहार में उसे नहीं लाते, सांस्थानिक लोकतंत्र मजबूत होता नहीं दिखेगा।

भोजन उपरांत का सत्र- 'बाबा बागदेव' के पाठ के साथ हुआ। पचमढ़ी में भवानी प्रसाद मिश्र की कविता 'सतपुड़ा के घने जंगल' का जो वाचन प्रशांत ने किया था, यहां उसे कश्मीर उप्पल ने अपनी ही कविता के जरिए विस्तार दिया।

----

कभी किसी ने

बाघ नहीं कहा उन्हें

न ही कहा शेर

बाबा के बारे में

बोलते लोगों की आंखें

चमकने लगतीं

सांस भर आती

....

बाबा मायाराम ने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों और उनकी नियति पर संक्षेप में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ये अजीब विडंबना है कि मानव एक तरफ मंगल पर जीवन तलाश रहा है और दूसरी तरफ पृथ्वी पर जीवन के ख़ात्मे में सहभागी बना बैठा है। टाइगर रिजर्व में वन विभाग के अधिकारियों की एक अजीबोगरीब दलील का जिक्र किया- मछली से बाघ चमकता है इसलिए मछली पालन का काम इस इलाके से ख़त्म कर दिया जाए। विस्थापन के नाम पर आदिवासियों के साथ हो रही लूट-खसोट को उन्होंने बेहद दुखद घटना बताया।

इसके बाद फागराम ने आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि लकड़ी-गट्ठे के झूठे केस में पुलिस ने उन्हें जेल भेजा और सताया। ग्रामीण शिक्षा के बारे में बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि 150 बच्चों पर एक गुरूजी। ऐसे में गुरूजी की हालत बेहद दयनीय हो जाती है- इते देखईं कि उते देखईं। अब ऐसे में मास्टरसाहब क्या तो 'मास्टरप्लान' समझेंगे और समझाएंगे। बिना लड़े इस देश में कुछ नहीं मिलता, राह-ए-संघर्ष चुननी ही पड़ेगी।

चाय के उपरांत, दिन के तीसरे सत्र में 'मौजूदा दलीय लोकतंत्र-कितना संवैधानिक' विषय पर 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के संपादक अरुण त्रिपाठी ने अपनी बातें रखीं। उन्होंने 1975 और उसके बाद 1992 को भारतीय लोकतंत्र के लिहाज़ से दो ख़तरनाक 'काल' बताया। देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को परिवारवाद, पक्षपात, तानाशाही का गढ़ बताया तो वहीं क्षेत्रीय दलों के उभार का भी जिक्र किया। इस बात पर अफसोस भी जाहिर किया कि उत्तरप्रदेश जैसे सूबे की दो बड़ी पार्टियां चाहें सवारी हाथी या साईकिल की कर रही हों, परसुराम जयंती मनाने में दोनों ही दलों के कार्यकर्ताओं का उत्साह एक सा है।

बातचीत के क्रम में अरुण त्रिपाठी ने बीडी शर्मा का एक कथन उद्धृत किया- संविधान ने लोगों को आज़ादी दी, आदिवासियों को गुलामी। इसके साथ ही इस बात पर चिंता भी जाहिर की कि देश की सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका ऐसी भी लंबित है, जिसमें संविधान से 'समाजवाद' शब्द को हटाने की गुहार लगाई गई है। त्रिपाठीजी ने कहा कि अब लोकतंत्र में भागीदारी के लिए भी बड़ी पूंजी चाहिए। दिनोंदिन पूंजी का बोलबाला बढ़ा है और बौद्धिक लोगों की उपेक्षा हर मोर्चे और हर पार्टी में नजर आने लगी है। सबसे बड़ी विडंबना तो ये है कि देश का नेता भी विदेश में तय होने लगा है।

इस सत्र में हस्तक्षेप के तौर पर एशियन ह्यूमन राइट्स के सदस्य समर अनार्य ने अन्ना के आंदोलन को मौजूदा दौर का सबसे गैर-लोकतांत्रिक आंदोलन बताया। सत्र की अध्यक्षता कर रहे अखलाक अहमद ने कहा कि विदेशी शक्तियों का दखल केंद्र सरकार ही नहीं राज्य सरकारों का मुखिया तय करने में भी बढ़ रहा है, जो चिंता का विषय है। पहले दिन का आखिरी और खुला सत्र कश्मीर उप्पल, रजनी बख्शी, सुनील, सचिन जैन और राकेश दीवान की टिप्पणियों के साथ समाप्त हुआ।

दूसरे दिन के पहले सत्र की शुरुआत गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अनुपम मिश्र के प्रजेंटेशन से हुई। पानी और उनके संरक्षण के कई उदाहरण चित्रों के जरिए सामने आए और उनके साथ अनुपमजी की लाइव कमेंट्री चलती रही। पानी के संरक्षण को जितने सुंदर चित्रों में सहेजा गया था, उतनी ही कोमल वाणी में उसका महात्म्य बखाना जा रहा था। हॉल में बैठे लोग मंत्रमुग्ध से कभी सेलुलाइड के चित्रों को और कभी अनुपम मिश्र को निहार रहे थे। पानी के इसी जनतांत्रिक संरक्षण के जरिए उन्होंने 'समाज के लोकतंत्र और संवैधानिक लोकतंत्र' के फर्क को बड़ी सरलता और सहजता से मन में उतार दिया।

इस सत्र में कश्मीर उप्पल ने नागार्जुन, श्रीकृष्ण कुमार और सच्चिदाननंद सिन्हा के कुछ पत्रों का वाचन किया। ये वो पत्र थे, जिनसे पत्रकारिता के क्षरण का इतिहास झांक रहा था। पशुपति शर्मा ने बतौर हस्तक्षेप एक पत्रकार के स्टाइलशीटिया बन जाने पर अफसोस जताया। अख़बारों के संपादकों से जैसा तादात्म्य आम लोगों का था, ठीक वैसा ही चैनलों के संपादकों के साथ क्यों नहीं?, ये सवाल भी उठाया।

इस सत्र के खत्म होते-होते हॉल में वो शख्स दाखिल हो गया, जो पत्रकारिता जगत में एक आदर्श नायक की तरह स्थापित है। 70 के दशक के अमिताभ (गरीब, मजलूम और किसानों के हक की लड़ाई का प्रतीक नायक) सरीखा कद हासिल कर चुके पी साईंनाथ मंच पर आसीन थे। 'कॉरपोरेट हस्तक्षेप और मीडिया' पर अपनी बात इस मुनादी के साथ शुरू की कि असहमति का कोई भी सुर, कोई भी सवाल बीच व्याख्यान में मुमकिन है। पी साईंनाथ ने कहा कि विकास संवाद की परिचर्चा के इन तीन दिनों में देश में समानांतर रूप से जो कुछ घटित हो रहा है, वो काफी चिंतनीय है। इन तीन दिनों में देश के 147 किसान आत्महत्या कर चुके होंगे, इन तीन दिनों में 3000 बच्चे कुपोषण और उसकी वजह से होने वाली बीमारियों से दम तोड़ चुके होंगे।


मीडिया को उन्होंने राजनीतिक रूप से स्वतंत्र लेकिन मुनाफे का गुलाम बताया। शारदा चिटफंड से लेकर एनडीटीवी प्रॉफिट से पत्रकारों की छंटनी का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की नौकरी की किसी को चिंता नहीं है बल्कि इस पूरे गोरखधंधे में मीडिया हाउसेस कॉरपोरेट घरानों की मनमर्जी और इशारे के तहत काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने मीडिया मॉनोपॉली को कॉरपोरेट मोनोपॉली का एक हिस्सा बताया।

पी साईंनाथ ने कहा कि अब मीडिया हाउसेस रिपोर्टिंग पर खर्च कम करते जा रहे हैं। यही वजह है कि चैनलों पर टॉक शो की बाढ़ आ गई है क्योंकि इसमें खर्च कम है। इसी तरह संपादकों की जगह सीईओ, मैनेजिंग एडिटर, एक्जक्यूटिव एडिटर जैसे पदों के गठन को भी उन्होंने पत्रकारिता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। मीडिया हाउसेस और कॉरपोरेट हाउसेस के बीच होने वाली 'प्राइवेट ट्रीटी' को भी उन्होंने पत्रकारिता की आजादी में बाधक बताया। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे मीडिया घरानों के हित बाजार के हित के साथ जुड़ते जाएंगे, एक तरह का खतरनाक नेक्सस खबरों को दबाने, छिपाने और उन्हें विकृत करने में सक्रिय होता जाएगा।

पी साईंनाथ ने कहा कि हाल के दिनों में इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कोई बड़ी ख़बर ब्रेक की हो, इसके उदाहरण बेहद कम मिलते हैं। मीडिया के पतन के साथ पत्रकार 'कॉमेडियन रिलीफ' देने का काम करते नजर आते हैं। ऐसे में पत्रकारों को गुरिल्ला जर्नलिज्म की आदत डाल लेनी चाहिए। संस्थानों में रहते हुए वो कैसे समाज और आम आदमी की बात सामने रख पाते हैं, ये उनकी निजी काबिलियत का विषय है।

इसके साथ ही उन्होंने पेड न्यूज को लेकर भी अपनी राय रखी। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इलेक्शन के दौरान पेड न्यूज की पकड़ आसान हो जाती है लेकिन बहुत बड़ा हिस्सा नॉन इलेक्शन पेड न्यूज का भी है। उन्होंने पत्रकारिता जगत में आने वाले युवाओं से वैकल्पिक मीडिया को अपनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि एक पत्रकार को एक से ज्यादा हुनर का मास्टर होना चाहिए ताकि वो अलग-अलग माध्यमों से अपनी बात कह सके। उन्होंने अपनी ओर से किए जा रहे आर्काइव प्रोग्राम की एक झलक भी दिखाई। पी साईंनाथ ने उन लोगों के दिमाग के तारों को झंकृत कर दिया जो न्यूज रूम के शोर में भी सोने की आदत पाले बैठे हैं।

विकास संवाद में इसके बाद के सत्रों में भी कुछ बातें हुईं लेकिन पी साईंनाथ ने मीडिया के इतने आयाम खोल दिए कि दिमाग में लंबे समय तक वो उमड़ते घुमड़ते रहेंगे।

केसला से वापसी में एक अलग तरह की भूख का एहसास तीव्रतर हो गया। 'भूख' उदर से कुछ ऊपर शिफ्ट हो चुकी थी। विकास संवाद की सार्थकता बस इतनी है कि वो इस भूख को जगा तो सकता है मिटा नहीं सकता। भूखे पेट भजन भले न हो भूखे मन में नए गीत गूंजते हैं... शायद हममें से कोई साथी कभी ऐसा ही कोई नया गीत गुनगुनाएं तो इस आयोजन की सार्थकता और ज्यादा बढ़ जाएगी।

पशुपति शर्मा