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सोमवार, 7 मई 2012

गाड़ी रांची जा रही है...

पेड़वा कटाइल हो रामा' (नुक्कड़)- जवाहर नवोदय विद्यालय पूर्णिया की पेशकश। नुक्कड़ जाम। बहुत भीड़। कुछ साइकिल, कुछ आदमी। साइकिलें कम, आदमी ज्यादा। बहुत शौकीन हैं लोग यहां के। पसंद करते हैं।

अभी शोर है। कई तरह की आवाजें आ रही हैं। एक आवाज- चल न यार फोर स्टार (सिनेमा) आई लव यू कि....कि..... किरण (डर) लगा है। ठहर यार दूसरा शो देखेंगे। नुक्कड़ देख लेते हैं। नुक्कड़ क्या होता है यार ? मुझे भी पता नहीं। भीड़ है इसलिए हूं। दोनों किशोर।

जवाहर नवोदय विद्यालय, पूर्णिया- सर्वेश्रेष्ठ। प्रतियोगिता थी न। अब ये टीम बाहर जाएगी। विद्यालय में थोड़ा-बहुत इधर-उधर, सभी खुश। आगे जाने के लिए पहले तो ना नुक्कड़ हुई लेकिन अंततः अनुमति मिल ही गई। नुक्कड़ पार्टी बहुत खुश थी। गाड़ी खुल गई।
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सबरंगा यात्री। एक-आध जगह छोड़कर पूरी गाड़ी यात्रियों से सजी थी। नौजवान, बूढे-बच्चे, अच्छे-बुरे, सब। चहकते-गाते, हंसते सभी खुश। एक अनूठा नौजवान। उम्र बाइस-तेइस की रही होगी।

बहुत अच्छा था बेचारा। बहुत बोलता था। दिन-रात, रात-रात भर बोलने की आदत सी पड़ गई थी। आप थोड़ी सी बातें करो, वह बोलता रहेगा। आप तंग हो जाओगे, वह थकेगा नहीं। पढ़ा-लिखा थोड़ा कम था। टूटी-फूटी लेकिन फटाफट हिन्दी बोलता था। पूरे शरीर से बोलता था न इसलिए बहुत देर तक बोल लेता था शायद। ओठ पूरा खुलता था, सभी दांत देख सकते थे आप- सफेद... भुट्टा के दाने जैसे। गुलाबी मसूरे भी अपने आप को प्रदर्शन के योग्य समझ रहे थे। हाथ-पांव सभी सजीव हो जाते थे हंसते समय। बहुत अच्छा किरदार था। कोई फिल्मवाला होता तो जरूर आजमाता उसे। "पंद्रह बोझा पटुआ भैया ले लिए हैं। बेईमानी करते हैं। मैं भी पटुआ बेचूंगा। " बार-बार यही किस्सा दुहराता था बेचारा।

शरीर पर कुछ नहीं था, एक लंगोट था बस। शीत ऋतु - गाड़ी का सफर, फिर भी खुश था। यात्री मज़ाक उड़ाते, बच्चे (नुक्कड़ वाले) तंग करते। उसे कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था। उसके दो रिश्तेदार उसे हमेशा पकड़े रहते, फिर भी वह गाड़ी में इधर-उधर करता। कभी वानर की भांति उछलता तो कभी शंतानी भैंस की तरह बैठकर जुगाली करता। बच्चों (नुक्कड़ पार्टी) का भरपूर मनोरंजन करता। दोनों रिश्तेदार काफी परेशान दिखते थे। नजर हमेशा उसी पर रहती। केवल रिश्तेदार ही दुखी थे और सभी खुश... यात्री और सारे यात्री।

वह कभी लालू यादव, मुख्यमंत्री, बिहार (उस समय) की बातें करता, तो कभी पी वी नरसिंहा राव, प्रधानमंत्री (उस समय) को फोन पर बुलाता। जैसे की 'रावजी' उसके कोई दोस्त हों और वह किसी मुसीबत में फंस गया हो। कभी तेंदुलकर के साथ क्रिकेट खेलता, तो कभी फुटबॉल के मैदान में अपने आप को आजमाता।

उसकी मुखाकृति पर पर इस तरह की कई रेखाएं थीं, जिससे साफ झलकता था कि किसी ने उसके साथ बेईमानी की है। यह सारा कुछ जबरन छीन लिया है उससे। यहां के हंगामे इंसान से बहुत कुछ छीन लेते हैं।

रिश्तेदार कहते हैं- "दिमाग कमजोर हो गया है... अबकी ठीक हो जाएगा।" यात्री कहते हैं-बेचारा पागल है। तब नुक्कड़ पार्टी में से किसी ने हंसकर कहा कि अतः सिद्ध हुआ कि गाड़ी रांची जा रही है। ... और नुक्कड़ पार्टी एक साथ गुनगुना उठी-

"पड़वा कटाइल हो रामा।
आदमियो कटा गेल।।"

- कन्हैया लाल सिंह
सरसी, पूर्णिया के निवासी। फिलहाल स्वतंत्र पत्रकार।