सोमवार, 30 अगस्त 2010

शर्म है कि आती नहीं...


ट्रक-टैम्पो भिड़े... (तीन कॉलम, पेज-3), युवा कांग्रेस का चक्का जाम (फोटो सहित 2 कॉलम, पेज नंबर-3), इसी हेडिंग के साथ एक और खबर (3 कॉलम, 5 नंबर पेज), जागरुकता से जनसंख्या पर नियंत्रण संभव (फोटो सहित 2 कॉलम, पेज-4), बाबा स्वामी रामदेव के कार्यक्रम को ले बैठक (2 कॉलम), किसानों को दी खाद व कीटनाशक की जानकारी (फोटो सहित 2 कॉलम)... 29 अगस्त 2010 को भागलपुर से प्रकाशित हिंदुस्तान के पूर्णिया संस्करण में ऐसी ही कई खबरें थीं लेकिन वो खबर नहीं थी जिसे देखने के लिेए हममें से कई साथियों ने अखबार खरीदा और उसके पन्ने पलटते रहे। पूर्णिया में दिवंगत पत्रकार विनय तरूण को श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम हुआ लेकिन कई पत्रकारों को वहां झांकने तक की फुर्सत नहीं मिली। अफसोस कि दैनिक जागरण समेत दूसरे स्थानीय अखबारों से भी ये खबर नदारद रही।

बाकी की बात छोड़ भी दें लेकिन हिंदुस्तान की इस हरकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हिंदुस्तान के उप स्थानीय संपादक और साथी इसे कोई अपराध न माने लेकिन एक अपराध हो चुका है, भले ही किसी संविधान में उसकी कोई धारा दर्ज नहीं। पत्रकारों की बात छोड़ भी दें लेकिन एक आम पाठक को भी उस वक्त जरूर कोफ्त होगी जब यह पता चलेगा कि वो दिवंगत पत्रकार कोई और नहीं बल्कि दैनिक हिंदुस्तान, भागलपुर में काम करने वाला एक संपादकीय साथी था। उसकी मौत संस्थान की नौकरी छो़ड़ देने या अखबार से हर तरह का नाता तोड़ देने के बाद नहीं हुई थी... वो ऑफिस पहुंचने की आपाधापी में ही 22 जून 2010 को एक ट्रेन हादसे में मारा गया।

अफसोस हिंदुस्तान के संपादक विनोद बंधु समेत उनके साथ काम करने वाले तमाम साथियों ने इस युवा पत्रकार को महज दो महीने में ही बिलकुल पराया कर दिया, इतना पराया कि उनके लिए श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए दो पल भी न मिले। संपादक महोदय की व्यस्तता का आलम ये रहा कि उन्होंने तमाम स्रोतों से इस कार्यक्रम के आयोजन की सूचना मिलने के बावजूद किसी नुमाइंदे को भेजना जरूरी नहीं समझा।

28 अगस्त 2010 को पूर्णिया के बीबीएम हाईस्कूल में 100 से ज्यादा लोगों का जमावड़ा लगा। दिल्ली, पटना, रांची, जमशेदपुर, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, सहरषा, सुपौल और फारबिसगंज समेत कई जगहों से पत्रकार साथी विनय तरूण को याद करने पहुंचे। कोई 1300 किलोमीटर की यात्रा कर यहां पहुंचा तो किसी ने 300 किलोमीटर का सफर तय किया... कोई मोटरसाइकिल पर हिचकोले खाते 100-125 किलोमीटर चलकर एक सीधे-सादे सच्चे पत्रकार को श्रद्धांजलि देने पहुंचा लेकिन पता नहीं ऐसी क्या बात थी कि हिंदुस्तान के साथी एक से डेढ़ किलोमीटर का फासला भी तय नहीं कर पाए। विनय की याद में आंसू बहते रहे लेकिन इन पत्रकारों ने कलेजा कुछ ऐसा सख्त कर लिया कि ऑफिस में चुनावी जमा खर्च का हिसाब किताब होता रहा। सबसे ज्यादा दुखद बात तो ये है कि ये सब हिंदुस्तान के भागलपुर संस्करण के उप-स्थानीय संपादक विनोद बंधु की मौजूदगी में हुआ। जी हां जिस वक्त पूर्णिया के वयोवृद्ध साहित्यकार भोलानाथ आलोक, पूर्णिया आकाशवाणी के पूर्व केंद्र निदेशक विजयनंदन प्रसाद समेत तमाम पत्रकार, बुद्धिजीवी और घर परिवार के लोग एक कमरे में युवा पत्रकार विनय तरुण की मौत का मातम मना रहे थे, उसी वक्त अपने मातहत विनय तरूण की मौत का गम भुला चुके संपादक विनोद बंधु पूर्णिया में ही मीटिंग कर रहे थे।

संपादक महोदय की संवेदनशीलता का आलम ये रहा कि सुबह 11 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक चलने वाले श्रद्धांजलि समारोह के तीन सत्रों में से किसी एक सत्र के लिए भी वो दो पल का वक्त नहीं निकाल पाए। जितनी देर कार्यक्रम चला, शायद उतनी देर मीटिंग भी चलती रही। अन्यथा यकीन नहीं होता कि कोई अपने साथी को इस तरह भी भुला सकता है। यकीन नहीं होता कि एक संपादक इतना कठोर हृदय भी हो सकता है। यकीन नहीं होता कि दुनिया का दर्द अखबारों के पन्ने पर उकेरने वाली बिरादरी अपने घर के अंदर बह रहे आंसुओं की धारा से इस कदर आंख मूंद सकती है।

कुछ तो बात है कि विनय की स्मृति के कार्यक्रम से संपादक महोदय ने तौबा कर ली। क्या विनोद बंधु इस बात का जवाब दे पाएंगे कि आखिर ऐसा कौन सा डर था कि वो कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। भगवान के लिए ये मत कहें कि हमारी हिम्मत नहीं हुई... आपकी हिम्मत तो काबिले तारीफ है कि आपने 28 अगस्त को पहले पूर्णिया के कार्यक्रम में शिरकत न करने की असमर्थता जाहिर की और उसी दिन आप पूर्णिया में एक मीटिंग करने चले आए।

संपादकों का एक दौर वो भी था, जब साथी पत्रकार उनसे प्रेरणा लेते थे। जब हर मुश्किल घड़ी में पत्रकारों को ये लगता था कि संपादक महोदय का हाथ उनके सिर पर है। पता नहीं इस दौर में अपने इस आचरण के जरिए विनोद बंधु कौन सी मिसाल कायम करना चाहते हैं। संपादक महोदय आपने अनजाने में नहीं बल्कि जानबूझकर पत्रकारिता की उस धारा को अपमानित किया है, जो सच्चाई, सादगी और ईमानदारी के साथ अब भी बह रही है। ये धारा इतनी पतली भी नहीं हुई कि वो आपको नजर न आए, लेकिन अगर आपने आंखों पर अपनी ठसक, अपनी कामयाबी (झूठी या सच्ची?) का काला चश्मा पहन रखा है तो फिर हम क्या कहें और किससे कहें? सच तो यही है कि ऐसी असंवेदनशीलता देख हमें तो शर्म आती है... आपकी आप जानें।

चंद्रकिशोर जायसवाल
साहित्यकार

शनिवार, 7 अगस्त 2010

निफ्ट का है अंदाज-ए-एडमिशन कुछ और...

ओबीसी कोटे की सीटें खालीं, एडमिशन क्लोज

नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ फैशन टेक्नॉलॉजी , नाम बड़ा और दर्शन छोटे । सरकारी पैसों से चलने वाले इस संस्थान में एडमिशन प्रक्रिया को देख कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ । आम सरकारी संस्थानों की तरह ही यहां भी अफसरशाही और लालफीताशाही का बोल-बाला है । यहां हम ओबीसी कोटे के तहत एडमिशन को लेकर चल रही अफरा-तफरी का जिक्र करेंगे, लेकिन उससे इस संस्थान की कार्यशैली की आपको कुछ झलक जरूर मिल जाएगी । आपको बता दें कि ओबीसी कोटे की सीटें खाली होने के बावजूद प्रवेश बंद करने की बात कही जा रही है । ये बात कोई निचले लेवल का अधिकारी नहीं बल्कि निफ्ट के डायरेक्टर धनजंय कुमार (एफ एंड ए) कर रहे हैं । वो खुले आम ये कह रहे हैं कि सीटें खाली हों तो भी एडमिशन देना या न देना हमारी मर्जी पर निर्भर करता है । आप इस बारे में कोई सवाल करें तो निफ्ट में कोई आपको तर्कों के साथ जवाब देने को तैयार नहीं ।

ओबीसी कोटे में हो रहे इस खिलवाड़ की भूमिका उसी वक्त तैयार हो चुकी थी जब काउंसलिंग के लिए पहली लिस्ट जारी की गई । बी डिजाइन के लिए ओबीसी कैटगरी में काउंसलिंग के लिए 530 छात्रों को बुलाया गया । ये कुल सीटों (345) की तुलना में महज 54 फीसदी ज्यादा छात्र थे, जबकि सामान्य कोटे में 85 फीसदी ज्यादा, एससी कोटे में 108 फीसदी ज्यादा और एसटी कैटगरी में 83 फीसदी ज्यादा छात्र काउंसलिंग के लिए बुलाए गए । अलग-अलग कैटगरी में काउंसलिंग के लिए बुलाए गए छात्रों के इस मनमाने समीकरण पर जब एडमिशन सेल (दिल्ली) में पूछताछ की गई तो बताया गया कि अगर सीटें बची रह जाएंगी तो काउंसलिंग के लिए दूसरी लिस्ट निकाली जाएगी ।

आपको बता दें कि बी डिजाइन के लिए ओबीसी की काउंसलिंग 18 जून को समाप्त हो गई लेकिन अभी तक दूसरी लिस्ट नहीं आई है । निफ्ट में बी एफटेक और मास्टर्स कोर्स के लिए काउंसलिंग की दूसरी लिस्ट जारी की गई लेकिन ओबीसी कैटगरी में दूसरी लिस्ट जारी करने की फुरसत संस्थान को नहीं मिल पा रही । इस बारे में बार-बार संपर्क करने वाले अभिभावकों को बस तारीख पर तारीख दी जाती रही लेकिन नेट पर दूसरी काउंसलिंग लिस्ट का दीदार नहीं हो पाया । जिन अभिभावकों ने फोन पर ज्यादा एतराज जताया उन्हें परेशान करने के लिए दिल्ली बुला लिया गया और यहां ये सूचना दे दी गई कि अब दूसरी लिस्ट नहीं जारी की जाएगी । ऐसा लगता है संस्थान ने वेटलिस्टेड छात्रों से संपर्क साधने का कोई गुपचुप तरीका ढूंढ निकाला है, जिसके बारे में आम अभिभावकों को जानने को कोई हक नहीं है ।

तथ्य ये भी है कि ओबीसी कैटगरी के लिए खाली सीटों के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में एडमिशन सेल ने 24 जून को ये बताया कि अलग-अलग सेंटरों में 6 सीटें खाली हैं, जिनके लिए वेटलिस्ट जारी की जाएगी । खाली सीटों का ये आंकड़ा 26 जुलाई तक आते-आते महज 4 रह गया, इस पर डायरेक्टर और निप्ट के मुख्य अपील अधिकारी धनंजय कुमार का ये दावा कि जो भी होगा नियमों के मुताबिक होगा, संदेह के दायरे में आ जाता है । निफ्ट के एडमिशन सेल में कार्यरत श्रीमती सुनीता के मुताबिक 26 जुलाई को दो सीटें कांगड़ा सेंटर में और दो सीटें शिलांग में खाली थीं, लेकिन इन सीटों पर एडमिशन कब दिया जाएगा इस पर निफ्ट ने चुप्पी साध रखी है।

ऐसा ही कुछ संदेह पटना सेंटर की डोमिसाइल सीटों को लेकर भी है । 15 जुलाई को एडमिशन सेल ने फोन पर जानकारी दी कि सीटें खाली हैं और बिहार के लोगों को प्रवेश दिया जा सकता है लेकिन 26 जुलाई आते-आते ये बयान बदल गया । पटना की डोमिसाइल सीटें कब भरी गईं और किसको एडमिशन दे दिया गया ये पहेली आप बूझ सकें तो बूझें ।

निफ्ट अधिकारियों के बार-बार बयान बदलने से कई सवाल उठते हैं-

1. जब दूसरे कोर्सेस के लिए वेटलिस्टेड काउंसलिंग लिस्ट महज 10 दिनों में आ सकती है तो बी. डिजाइन में ऐसी क्या खास बात है कि करीब 40 दिनों बाद भी इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया जा सका ?
2।

ओबीसी कैटगरी की खाली 6 सीटें 4 में कैसे बदल गईं । 2 छात्रों को किस बिना पर एडमिशन दिया गया । आखिर क्या वजह है कि निफ्ट की वेबसाइट पर कोई सूचना दिए बिना ही एडमिशन देने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है?

3। एडमिशन की इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जा रही है?

4। 28 जुलाई से निफ्ट सेंटर पर क्लासेस शुरू हो चुकी हैं, ऐसे में आखिर कब तक छात्रों को निफ्ट अधिकारियों की चिट्ठी का इंतजार करना होगा?

सवाल कई हैं लेकिन निफ्ट अधिकारी इसका जवाब देने को तैयार नहीं । संस्थान जनता के पैसे से भले ही चलता हो लेकिन यहां सब कुछ अफसरशाही अंदाज में होता है । अगर कभी आप एडमिशन को लेकर किसी परेशानी में पड़ जाएं तो भूले से भी इन अफसरों से सवाल पूछने की गुस्ताखी मत कर बैठिएगा- वरना घूमते रह जाएंगे ।

पशुपति शर्मा

शनिवार, 31 जुलाई 2010

चंद पल में दिल जीतने वाला जादूगर कहां गया?


दुबेजी के जाने का समाचार सबके लिए तो धक्का है लेकिन मेरे लिए बड़ा धक्का है.. जिंदगी में कुछ लोग ऐसे होते है जो कुछ ही पल साथ रहते है लेकिन दिल में जिंदगीभर के लिए साथ हो जाते है.. दुबेजी ऐसे ही लोगो में से थे.. मेरी और उनकी मुलाकात व साथ 2 दिनों का है लेकिन सम्बन्ध ऐसे बन गए कि जैसे सालो से हों..
महेश्वर में आयोजित प्रोग्राम के लिए जब मै इंदौर से निकलने वाला था राकेशभाई का कॉल आया कि दिल्ली से कुछ साथी आ रहे है आप उनके साथ आ जाना.. उनमे एक दुबेजी काफी सीनियर है.. मैंने तुरंत प्रतिप्रश्न किया कि कहा फंसवा रहे हो मुझे उनके साथ.. उनका जवाब था काफी अच्छे है वो.. आप एडजस्ट हो जाओगे.. मै आपको उनका और उन्हें आपका नम्बर दे रहा हूँ.. थोड़ी देर बाद ही पशुपति भाई और दुबेजी से मोबाइल पर चर्चा हुई..
रेलवे स्टेशन पर जैसे ही पहली बार हमारी मुलाकात हुयी वैसे ही लगा कि पशुपति भाई और दुबेजी से पट जायेगी..
उसके बाद मुलाक़ात का दौर शुरू हुआ..कहा हो.. क्या करते हो.. जैसे प्रश्नों से लेकर मानसिकता तक के प्रश्न दुबेजी ने अपने अंदाज़ में दागे और उत्तर जाने.. मै भी उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक था.. और जाना भी.. ख़ास बात यह बताना चाहता हूँ कि न केवल उत्तर बल्कि उन प्रश्नों के उत्तर जानने के बाद उन्होंने सही गलत को सही तरह से समझाया भी..
मेरे साथ-साथ इंदौर के बारे में भी वह जानना चाहते थे और पहले से जितना जानते थे.. उसको क्रास चेक भी करते जा रहे थे.. बहुत सी चीजों में उनको मैंने अपडेट किया तो बहुत बातो में उन्होंने भी मुझे अपडेट किया.. 110 किलोमीटर के रास्ते में उनसे स्नेह का नया रिश्ता बना.. महेश्वर पहुँचने के बाद जब गाँवों में जाने के लिए अलग-अलग ग्रुप बनाये गए तो मै और दुबेजी दोनों एक ही ग्रुप चाहते थे.. लेकिन पहले से निश्चित ग्रुप के कारण एक साथ नहीं हो पाए.. तो उन्होंने और मैंने दोनों ने राकेशभाई से एक ही ग्रुप में रखने का आग्रह किया.. जो अस्वीकार हो गया.. महेश्वर डेम और उसके बाद रात को लौटने के बाद तक उन्हें और मुझे इस बात का अफ़सोस रहा..
खैर रात को गाँव से मै पहले आ गया था और फिर होटल भी चला गया.. मै रूम में अकेला था और दुबेजी या पशुपतिजी का साथ चाहता था.. पशुपतिजी अपने दोस्तों के साथ गेस्ट हाउस में ही रुक गए थे... दुबेजी से बात नहीं हो पायी.. रात को १२.३० बजे मेरे रूम का दरवाजा किसी ने खटखटाया.. मैंने उन्हें कह दिया यहाँ पर तो कोई और भी है.. वो आ रहे है.. तब तक दुबेजी के आने की सूचना नहीं थी और ना बात हुयी थी... लेकिन थोड़ी देर बाद फिर से किसी ने आवाज़ लगायी.. दरवाजा खोला तो दुबेजी थे.. मै और वो दोनों प्रसन्न थे कि एक साथ रहेंगे.. उन्होंने अपने लिए जगह रोकने के लिए मुझे काफी दुआएं भी दी..
रात में देर तक उनसे कई मुद्दों पर चर्चा हुयी.. Discovery से लेकर धर्म-परिवार तक पर उनके विचार लोगो से अलग थे और ख़ास बात उनका ज्ञान और अपनी बात पर सही व सटीक विश्लेषण के साथ के दमदार उदाहरण... मुझे उन्होंने काफी प्रेरित किया... बार बार कहा कि यंग journalist के साथ ही यंग लेकिन सुलझी हुयी अनुभवी सोच भी है तुममे.. सुबह नाश्ते के समय एक महाशय से उनकी मुग़ल इतिहास पर काफी लम्बी बहस भी हुई.. और उन्हें मानना पड़ा कि दुबेजी के तर्क सही है.. मुझे भी उन्होंने कई बार इस बहस में शामिल किया..
महेश्वर से अचानक आ जाने के बाद उनसे मुलाकात नहीं हो पायी.. हां आते समय जरुर उनसे मुलाक़ात करना नहीं भूला था.. इसके बाद एक दिन दिल्ली से उनका फ़ोन आया.. करीब 30 मिनट तक बात हुई.. काफी बातें समझाईं और टिप्स भी दिए.. वो कुछ लेख भी मुझे प्रिंट के लिए भेजने वाले थे.. ख़ास बात यह रही कि उन्होंने मेरी न्यूज़ नेट पर देखी और उस बारे में भी वो मुझे दाद देने में नहीं चुके.. एक बार और उनसे बात हुई.. और अब उनके जाने का समाचार सुना..
दुबेजी जैसे इंसान से जो सिखने को मिला वो हमेशा प्रेरणा देता रहेगा.. मेरी दिल से श्रद्धांजलि और नमन..

रफ़ी मोहम्मद शेख
दैनिक भास्कर इंदौर
098263-87809

विचार नहीं प्लानिंग और एक्शन चाहते थे दुबे सर


नोएडा में एक मकान का बेसमेंट. किसी इंटरनेट कैफे की तरह सजाए गये आठ-दस क्यूबिकल और उन्हीं क्यूबिकलों के एक मेज जिस पर कम्प्यूटर नहीं था, उसी पर बैठते थे कृष्णन दुबे. यह 2003 की बात है जब रविवार के मिजाज की एक पत्रिका निकालने की कवायद उस कमरे में चल रही थी और अपने मित्र पशुपति के जरिये मुझे उस टीम में शामिल होने का मौका मिला था. वहीं कृष्णन दुबे जी से मुझे परिचित होने का सौभाग्य मिला था. फिर कई मुलाकातें हुईं, लोकायत के दौरान, उसके बाद, पशुपति की शादी में. मगर उन्हें जानने समझने का मौका मिला उनसे आखिरी मुलाकात के दौरान महेश्वर में यमुना के किनारे.
विकास संवाद नामक संस्था मीडिया के मानक और लोग पर सेमिनार करवा रही थी. दुबे सर भी संयोग से पहुंचे थे. हमारे मित्र राकेश मालवीय ने परंपरा का निर्वाह करते हुए आधार वक्तव्य पेश किया और उस वक्तव्य में उन्होंने विस्तार से प्रकाश डाला कि मीडिया के मानकों में किस तरह ह्रास आ रहा है. दुबे सर मंच पर बैठे थे, उन्होंने राकेश के वक्तव्य के खत्म होने का इंतजार तक नहीं किया और मंच संचालक से माइक मांग कर बोल पड़े, "सवाल यह नहीं है कि किस तरह मीडिया के मानकों में गिरावट आई है, इस पर बात कर समय बर्बाद करने से बेहतर है कि हम यह बात करें कि हमें करना क्या है. क्योंकि यहां बैठे लोगों में से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसे इस गिरावट को लेकर कोई शुबहा होगा, इसलिए इस गिरावट पर चर्चा करने से बेहतर है गिरने से बचाने के उपाय ढूंढे और काम शुरू करें."
उसी वक्त उन्होंने यह भी कह डाला कि हम ये-ये कर सकते हैं. उन्होंने दो उपाय बताये
1. सबसे जरूरी है पत्रकारों का एकजुट होना और यूनियन बनाना. इसके बगैर मीडिया कभी भी कारपोरेट के चंगुल से मुक्त नहीं हो पाएगा और कारपोरेट घराने हमारा शोषण करते रहेंगे.
2. वैकल्पिक मीडिया को मजबूत करना. पश्चिमी देशों में छोटे-छोटे साइट्स और कम्युनिटी रेडियोज का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है और आने वाले दिनों में मीडिया जगत में यही रूल करेंगे.
उस पूरे सेमिनार में उन्हें जब-जब मौका मिला, उन्होंने यही बातें उठाईं और जाते वक्त आयोजकों से कह गये कि एक मैगजीन की प्लानिंग करो एक लाख रुपया मैं दूंगा.
आज के जमाने में ऊंची बातें और आदर्शों की दुहाई देकर दुनिया को बदलने की योजना बच्चा-बच्चा जान गया है और हम सब समझते हैं कि इस तरीके से हमारा नाम तो चमक सकता है मगर हमारा उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता है. मगर उस 79 साल के युवा ने अपनी बातें जिस इमानदारी से रखीं उसे भूल पाना नामुमकिन है. वह अनुभव मेरे लिये एक बड़ी सीख है अगर मैं इसे अपना सका तो मेरा जीवन भी थोड़ा सुगंधित हो सकता है.

पुष्यमित्र
प्रभात खबर डॉट कॉम के संपादकीय विभाग में कार्यरत

स्नेह का सोता न जाने कहां गुम हो गया....


फ्रेंड, फिलॉसफर, गाइड । दुबे सर को क्या कहें, ये दुविधा मेरी नहीं उनकी है जिन्होंने मेरा तार्रुफ दुबे सर से कराया । आनंदजी (आनंद प्रकाश श्रीवास्तव, मौजूदा एसोसिएट एडिटर, द संडे इंडियन) के साथ ही दुबे सर से पहली मुलाकात हुई और आखिरी भी । आनंद सर सदमे में हैं और अभी इससे उबर नहीं पाए हैं । बुधवार (28 जुलाई 2010) सुबह 6 बजे करीब दुबे सर के नंबर से फोन आया । इतनी सुबह फोन देख जो डर मन में कौंधा अगले पल कुछ लफ्जों ने वही बात दोहरा दी । तुरंत आनंद सर का फोन आया और हम दुबे सर के घर पहुंचे । जो सीढ़ियां चढ़ते हुए हम ऊपर उनके कमरे तक पहुंचते थे, वहां सन्नाटा पसरा था और दुबे सर खामोश थे । वो होते तो न जाने देखते ही कितनी बातें कह जाते । जब भी मिले बड़ी गर्मजोशी से और बड़ी जिंदादिली से । एक रिश्ता स्नेह का था... जो सारे रिश्ते से कहीं बढ़कर था ।
दुबे सर से पहली मुलाकात की पृष्ठभूमि और पूरा प्रकरण भी काफी रोचक है । बात करीब 7 साल पुरानी है । कुछ निजी कारणों से उन्हें उन दिनों बिहारियों से बड़ी चिढ़ हो गई थी । लोकायत में कुछ संपादकीय सहयोगियों की जरूरत थी और मैंने एक झूठ के सहारे उनसे ये नौकरी मांगी । मैंने कहा कि मैं राजस्थान से हूं । हालांकि ये आंशिक रूप से सच था फिर भी झूठ ही था । इसी तरह पुष्यमित्र ने भी खुद को मध्यप्रदेश का बता कर उनकी टीम ज्वाइन की । हालांकि दुबे सर किसी भी शख्स से इतने सारे सवाल करते हैं कि ये झूठ बहुत दिनों तक नहीं चल सका । फिर तो वो जब न तब ठहाके लगाते और हमें ताना मारते- तुम बिहारियों से मैं बचना चाहता था और तुम्हीं लोगों ने मुझे घेर लिया ।
लोकायत की ये नौकरी बहुत दिनों तक नहीं चली । पत्रिका के पहले इश्यू के साथ ही दुबे सर ने पत्रिका को अलविदा कर दिया । इस पत्रिका में काम करने की सबसे बड़ी उपलब्धि दुबे सर से परिचय ही रहा । इसके बाद उनसे निजी मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ और एक अजीब सी आत्मीयता बनती चली गई । दुबे सर के यहां ज्यादातर आनंद सर के साथ ही जाना होता था । दरअसल उनकी बातचीत का दायरा इतना बड़ा होता था कि मुझे हर वक्त डर लगता रहता, पता नहीं कब कौन सा सवाल दाग दें । हालांकि थोड़ी सी झिड़क के साथ ही फिर वो विस्तार से सब कुछ समझा कर ही दम लेते ।
दुबे सर ने काफी स्नेह और प्यार दिया । मेरी नौकरी को लेकर चिंतित रहते और जब नौकरी हो गई तो शादी को लेकर सलाह देने लगे । शादी पक्की हुई और मैंने उन्हें सूचना दी तो कहा मैं जरूर जाऊंगा पूर्णिया । तब मैं और दुबे सर एक साथ ही घर गए थे । तिलक से लेकर रिसेप्शन तक हर फंक्शन में दुबे सर शामिल हुए । डायबिटीज की शिकायत के बावजूद मिठाइयां जमकर खाईं और बारात में ठुमके भी लगाए । घर का हर छोटा- बड़ा दुबे सर का ये जोश और उनका प्यार देख दंग था । मैं मन ही मन गदगद ।
दुबे सर के साथ दूसरी यात्रा महेश्वर की रही । अभी मार्च महीने की ही तो बात है । दुबे सर के सामने मैंने महेश्वर जाने का प्रस्ताव रखा और वो फट से तैयार हो गए । कब और कैसे जाना है फटाफट प्रोग्राम बनाया और चल पड़े। महेश्वर विजिट के दौरान काफी बातें हुईं । मीडियाकर्मियों के हालात और उनके संगठन को लेकर वो काफी फिक्रमंद थे । वहां हर किसी के साथ काफी गर्मजोशी से मिले और कई सारे सवाल भी रखे । मुझसे कहा कि विकास संवाद वालों से बात कर अगली बार एक सत्र अपने मन के मुताबिक रखवाऊंगा और उसका संचालन भी खुद ही करूंगा । सचिन जी के साथ भी काफी बातें की... लेकिन ये अगला साल नहीं आ सका ।
दुबे सर के साथ आखिरी मुलाकात विनायक अस्पताल में हुई । इधर-उधर की बातों के बाद मेरे घर के बारे में पूछने लगे । कहने लगे सर्बानी को बी एड करवा दो । मेरी पत्नी सर्बानी के करियर को लेकर वो शुरू से ही काफी फिक्रमंद रहे । उसने लॉ कर लिया है अब कुछ करवाते क्यों नहीं ? कुछ नहीं तो बी एड करवाओ... नौकरी लगवाओ.. सर्बानी से भी फोन पर ये सब बात दोहराते । वो इस बात के पक्षधर थे कि महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हों और घरेलू हिंसा या दमन का शिकार न हो । गाहे-बगाहे कई उदाहरणों से वो मुझे भी ताकीद करते रहते थे ।
दुबे सर का जाना... स्नेह के एक साये का उठ जाना है... अब वो बस यादों में ही रहेंगे... कभी हम उस कमरे में बैठ कर घंटों गप्प नहीं लड़ा सकेंगे जहां पता नहीं कितनी- कितनी बार हमने अड्डा जमाया... अब दुबे सर के साथ स्लमडाग मिलेनियर भी नहीं देख पाएंगे... अब कभी मन घबराया तो कहां जाएंगे सर... एक घर था अपना वो तो उजड़ गया... पिता तो मीलों दूर हैं.... एक पिता जो थोड़े से फासले पर बैठा था उसने भी अपना हाथ सिर से उठा लिया... हम स्वार्थी हैं सर... इसलिए भी आपको काफी-काफी मिस करेंगे... आपकी तरह निर्लिप्त और निर्मोही नहीं कि पल भर में टाटा-बाय कर चलते बने....

पशुपति शर्मा
मीडियाकर्मी और दुबेजी के स्नेह का चिर आकांक्षी

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

दुबे जी आप सुबह बहुत याद आओगे


मौत हमारे लिए खबर होती है। कई बार तो मौत ही हमारे लिए खबर होती है। दुबे जी के साथ भी यही हुआ। कृष्णन दुबे जी के साथ। दुबे जी अब नहीं रहे। इसके पहले के कुछ दिनों में वे क्या सोच रहे थे? दुनिया को किस ढंग से देख रहे थे? कितने उदास थे और कितने ऊर्जावान, इसकी कोई खबर नहीं है। बीते पांच सालों में उनसे कम ही मुलाकातें हुई, लेकिन वे हर बार ऊर्जा और अपनत्व से भरे हुए मिले। उनका न रहना अपूरणीय क्षति नहीं है, क्योंकि वे महान नहीं थे। इंसान थे। गलतियों से सीखने वाले और हर समय नये नये सपनों में रंग भरने वाले इंसान। वे कहते थे- हर कोई पत्रकार, नेता, डॉक्टर, इंजीनियर होना चाहता है, लेकिन इसके लिए जरूरी शर्त इंसान होना है। यह शर्त दुबे जी पूरी करते थे। वे भरपूर इंसान थे। सुख में हंसने और दुख में रोने वाले इंसान।

पहली मुलाकात रांची में हुई थी। 'पब्लिक एजेंडा' मैगजीन के प्रकाशन से पूर्व संभावनाओं और योजनाओं को जमीनी स्तर पर टटोलने के लिए वे हैन्सन जी के साथ पहुंचे थे। महाराजा होटल में। पशुपति जी ने फोन पर बताया था कि उनसे मिल लेना। शाम को फोन किया तो बोले कि झारखंड के विभिन्न इलाकों में घूमने और अखबारी साथियों से मिलने का प्रोग्राम है। साथ चलने का प्रस्ताव रखा तो मना नहीं कर सका और दूसरे दिन सुबह सबेरे उनसे मिलने पहुंचा। मेरी सेहत पर नर्म टिप्पणी करते हुए नाश्ता मंगवाया और चल दिये। 8 बजे हम डाल्टेनगंज यानी मेदिनीनगर के लिए निकले। गर्मी खासी थी सो एसी चल रहा था। रातू रोड पार करते करते उन्होंने कार की खिड़की खोल ली। ताजी हवा के लिए। सिगरेट भी सुलगा चुके थे।

76 वर्षीय दुबे जी किस्सों के साथ ताजा राजनीतिक घटनाओं का मार्क्सवादी विश्लेषण करते जाते थे। उनकी जानकारी और अध्ययन प्रवृत्ति के बारे में सुन रखा था लेकिन वे सुने से कहीं ज्यादा पढ़ाकू थे। हर विषय पर स्पष्ट राय और उत्साहित करने वाली जानकारी उनके पास थी। मेरे लिए यह मजेदार सफर होने वाला था। उन्होंने रोडमैप तैयार कर रखा था। किस शहर में किससे मिलना है, क्या बात करनी है? कौन सी इन्फारमेशन निकालनी है? कहां कितना रुकना है और अगले शहर तक पहुंचने के लिए कम से कम कितने बजे निकलना है, से लेकर कहां नाश्ता और कहां खाना-खाना है, तक को वे मोटे तौर पर निर्धारित कर चुके थे।

डाल्टेनगंज, गढ़वा, गुमला, राउरकेला, सिमडेगा के हालात पर चर्चा होती रही। कई खबरों के बारे में और रांची के अखबारों के बारे में भी। प्रभात खबर में छपने वाली छोटी-छोटी खबरों के बारे में उनकी मायनीखेज टिप्पणी आज भी नहीं भूलती कि-''अखबार को रोजनामचा होने से बचना चाहिए। कौन सी खबर पढ़ानी है इसकी समझ संपादकीय साथियों को जरूर होनी चाहिए। पेज पर ज्यादा खबरें देना संपादकीय अयोग्यता ही है।"

हम शाम तक लातेहार और डॉल्टेनगंज का काम निपटा कर गढ़वा पहुंच चुके थे। इस बीच मांडर, चान्हो, कुडू, मनिका में भी रुके। सिगरेट और राजनीतिक बातचीत चलती रही। अखबारी दुनिया पर टिप्पणी के साथ वनस्पितियों के बारे में भी दुबे जी बताते जा रहे थे। हैन्सन शाम की 'व्यवस्था' के लिए परेशान थे। गढ़वा के राज होटल में रुके थे हम। मच्छरों ने सारी रात परेशान किया और सुबह-सुबह बिना चाय पिये ही हम सरगुजा की ओर चले। रंका पहुंचकर चाय नाश्ता किया और आगे बढ़े। रामानुजगंज से छत्तीसगढ़ शुरू हो जाता है। हम रामानुजगंज से तकरीबन 10-15 किलोमीटर आगे तक निकल गये थे। यहां एक गांव था, नाम याद नहीं आ रहा। वहां जाम लगा था सो लौट लिये।

दुबे जी की इच्छा थी कि रुककर इंतजार करते हैं जाम खुलने का। पता चला जाम ग्रामीणों ने लगाया है। कोई ट्रक किसी पशु को टक्कर मारकर चला गया था, जिसके विरोध में जाम लगा था। धूप बढ़ती जा रही थी और जाम खुलने के आसार नहीं थे। सो लौट लिये। गढ़वा की ओर। रास्ते में तय हुआ कि नेतरहाट चलते हैं। गढ़वा के पहले ही कोलिबिरा जाने वाली रोड पर मुड़ गये और तकरीबन पांच बजे शाम को हम नेतरहाट की पहाड़ी पर थे। झारखंड की खूबसूरती का एक शानदार नमूना। यहां के प्रभात होटल में रुके। शाम आठ बजे तक पहाड़ी से दूर तक फैले खेत और पहाड़ों को ताकते हुए हमने कई सिगरेटें सुलगाई और बातचीत का सिलसिला लगातार चलता रहा।

नक्सलवाद पर हैन्सन और दुबे जी के बीच थ्योरिटीकल बातचीत होती रही। बीच-बीच में मैंने स्थानीय हकीकतों को जस्टीफाई किया तो दुबे जी तकरीबन भड़क गये। वे मानने को तैयार नहीं थे कि नक्सल पॉलिटिक्स में आपराधिक तत्व हो सकते हैं। उन्हें गुरिल्ला वॉरफेयर के चेक्स एंड कंट्रोल पर पूरा भरोसा था। दरहकीकत वे अपनी खीज मिटा रहे थे। चांदनी रात में शराबनोशी के साथ उन्होंने सीपीआई और सीपीएम की पॉलिटिक्स को जमकर लताड़ा। हिंदुस्तान में रेवोल्यूशनरी पॉलिटिक्स की कमी और टैक्टिस पॉलिटिक्स की हालिया खामियों पर बोलते रहे।

10 बजते बजते वे तकरीबन एकालाप की स्थिति में थे। यह गुस्सा था जो निकल रहा था। वे करीब 12 बजे सोये। सुबह-सबेरे वे जागे और हैन्सन व मुझे जगाया। घूमने निकले और स्थानीय लोगों से बातचीत की शुरुआत की। दोपहर के खाने से पहले तक यह सिलसिला चलता रहा। आदिवासियों के बीच हनुमान की मूर्तियों को लेकर दुबे जी खासे आतंकित थे। वे इस रूपांतरण के आर्थिक और राजनीतिक आधार देख रहे थे। चर्च की भूमिका और हिंदू संगठनों के कार्यों से वे साथ-साथ नाराजगी जाहिर कर चुके थे।

इसी दिन शाम में हम गुमला पहुंच चुके थे। बीच में छऊ नाच की एक मंडली से यादगार भेंट, सिमडेगा में जनी शिकार पर निकली महिलाओं के फोटो और खेतों में घूमने की रंगतों के बीच देर रात को हम राऊरकेला में थे। यहां की झारखंडी पॉपुलेशन, सर्कुलेशन और खबरों के रिवाज को परखते - परखते रात के तीन बज गये थे। हम सो गये। दूसरे दिन ताजा दम हो तकरीबन दस बजे फिर निकले इस बार बिरमित्रपुर होते हुए हमें कोलिबिरा पहुंचना था। रास्ते में ग्रामीणों से बातचीत और मुकेश के गानों पर भी बातचीत होती रही। ओपी नैयर की धुनों के दीवाने दुबे जी भारतीय संगीत के अच्छे श्रोताओं में से एक थे। वे गीतों को गुनगुनाते हुए लय और ताल का पूरा ख्याल रखते थे। अपनी उम्र को छकाते हुए वे जबरदस्त स्टेमिना के साथ गाते थे।

उनकी स्टेमिना का दूसरा नमूना पूर्णिया में मिला। पशुपति जी की शादी में। बारात पूर्णिया से रायगंज, पश्चिम बंगाल जानी थी। हम कुछ दोस्त एक गाडी में बैठ गये। दुबे जी को छोड़ दिया तो बीच में जब नाश्ते के लिए रुके तो वे हमारे साथ हो लिये। जब मैंने कहा कि दुबे जी आपको बुजुर्गों के साथ रहा चाहिए। तो बोले- वहां खतरा ज्यादा है। मैंने कहा कि- लौंडों की सोहबत में ढेले की सनसनाहट भी सुननी पड़ती है। तो मुस्कुराते हुए बोले- ढेले हमने भी फेंके हैं और यकीन मानो तुम लोगों से ज्यादा सनसनाहट पैदा की है।

पूरे कार्यक्रम के दौरान वे उत्साह से भरपूर रहे। शादी के बाद जब हम कुछ मित्र भागलपुर गये तो वे पूर्णिया में ही रुक गये। दूसरे दिन मैं लौटा तो उपाध्याय जी और वे भिडे हुए थे। उपाध्यायजी खांटी संघी और दुबे जी क्लासिकल मार्क्सवादी। दोनों ने एक साथ पूरा दिन कैसे गुजारा होगा यह मैं अनुमान लगा सकता था, लेकिन साथ मुझे दिल्ली तक की यात्रा करनी थी। यह सोचकर मैं सिहर गया। पूरी यात्रा के दौरान दुबे जी चालू रहे। संघी सोच के तर्कों को उदाहरणों और यकीनी जनवाद से रौंदते हुए वे थोड़े पजेसिव भी लगे , लेकिन उनका मार्क्सवाद में विश्वास ताकत देता था।

बाद में छुटपुट मुलाकातें उनके घर और पूसा रोड स्थित पब्लिक एजेंडा के ऑफिस में होती रही। खाने और पीने के शौकीन दुबे जी के साथ पब्लिक एजेंडा ऑफिस में हुई मुलाकात मेरे लिए अपनी सबसे अच्छी दोपहरों में से एक रही है। अब अंधेरी कोठरी का वह रोशनदान बंद हो चुका है, लेकिन जो रोशनी उन्होंने फैलायी वह यकीनन भरोसा देते है, उजाले का। इस रात में जब हर तरफ रोशनी की दरकार शिद्दत से महसूस की जा रही है, दुबे जी याद आते हैं। उन्हे यकीन था कि सुबह होगी। वे सुबह का इंतजार कर रहे थे। रोशनी को बचाने की जुगत भी कर रहे थे। अफसोस वे सुबह के पहले ही चले गये, इस काली रात में। सुबह जब रोशनी होगी, तब आप बहुत याद आओगे दुबे जी।

सचिन श्रीवास्तव
गाजियाबाद से प्रकाशित 'एक कदम आगे' के संपादकीय साथी और दुबेजी के युवा मित्रों में एक।

दुबेजी, हम करेंगे आपके सपने पूरे


दुबे जी ने कहा था आप लोग शुरू करो,दिल्ली से हर संभव मदद दिलाने का मैं वायदा करता हूं। अफसोस उनके सपनों को हम छोटी-मोटी कोशिशों से साकार कर पाते इससे पहले ही वह चले गए। उम्र के इस मुकाम पर पहुंचकर भी उनके अंदर के जज्बात,हौसले, उर्जा, उनके सपनों, स्नेह और सम्मान को समझा जा सकता था।

आज सुबह सचिन भाई (नई इबारतें वाले)की पोस्ट से जब यह सूचना मिली तो पूरा दफ्तर सन्न था। हम सभी के लिए यह एक गहरा आघात था। केवल एक व्यक्ति के रूप में ही नहीं, मीडिया के बदलते परिवेश में वह उन चंद लोगों में थे जो अब भी अखबारनवीसों की ताकत के एकजुट होने की बात कहते थे, मीडिया में बदलाव की बात करते थे, मानकों की बात करते थे। महेश्वर में मीडिया सम्मेलन के बाद दुबे जी हमारे लिए एक प्रेरणा पुरूष बन गए थे।

दुबेजी से कोई बहुत पुराना नाता नहीं थी। इसी साल जब विकास संवाद के सालाना सम्मेलन के लिए लोगों से बातचीत हो रही थी तो पशुपति भाई ने दुबेजी के बारे में बताया था। भाई प्रशांत दुबे ने उनसे बात की तो पहला फोन ही लगभग पौन घंटे की अवधि का रहा होगा। इसी से उनकी जिज्ञासा को समझा जा सकता है।

पशुपति भाई के साथ जब दुबे जी 14-15 घंटे का लंबा सफर तय करके महेश्वर पहुंचे थे। उनको देखा तो एकबारगी सोच में पड़ गया कि आखिर कौन सी उर्जा है इस व्यक्ति के अंदर जो इस अवस्था में इतने कष्ट सहने के बाद एक सम्मेलन में शरीक होने चला आया है।

इस बार सम्मेलन में हमने नर्मदा घाटी के पांच गांवों में चलने की यात्रा करने की योजना तैयार की थी। बातचीत के बाद तय किया गया था कि पहले ही दिन गांवों में जाया जाए, वहां लोगों से बात करें। घाटी के लोगों ने हमसे पहले ही वायदा ले लिया था कि मेहमानों को हम ही भोजन कराएंगे। पांच समूह निकले थे। तीन जीप से और दो बस से। मैं जिस जीप में था उसकी अगली सीट पर दुबेजी विराजमान थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यकर्ता रामकुंवर भी साथ थीं। बीच की सीट पर राकेश दीवान, रितुजी, रानूजी, सीमाजी बैठे थे। पीछे शेख भाई, आसिफ भाई, आशीष अंशु भाई और मैं ठुसे हुए थे। खास बात यह थी कि हमारा गांव मरदाना सबसे दूर था और रास्ता बेहद खराब। लगभग तीन घंटे की थका देने वाली यात्रा के बाद हम गांव में पहुंचे थे। लगभग आठ बजे हमने एक घर में चाय पी। उनसे सामान्य बातचीत होती रही। यह घर बेहद जुदा अंदाज में बना हुआ था। दुबे जी घर की उसारी में पड़े झूले पर बैठे। चाय पी। इसके बाद हमें नर्मदा किनारे एक मंदिर में जाना थां। अंधेरे के कारण इस घाट के सौंदर्य को तो हम नहीं देख सके, लेकिन दाल-बाटी और चावल खाना बहुत राहत भरा था। मंदिर से लौटते-लौटते नौ बज गए थे। इस बीच पूरे गांव में खबर हो गई थी और लोग बातचीत के लिए जमा थे। कोई घरों की टिपटियों पर, कोई फट्टों पर और कोई अपने जूतों और चप्पलों को ही नीचे दबाकर बैठा था।

गांव वाले पूरे तथ्यों और आंकड़ो के साथ अपनी-अपनी बातें कह रहे थे। इतनी कहानियां, इतनी बातें थी कि पूरी रात भी बैठक चल सकती थी। मुझे बीच में आना पड़ा और मैंने निवेदन किया कि दुबेजी सहित सभी लोग काफी दूर-दूर से आए हैं, थके हुए हैं और अभी लंबा सफर तय करके वापस महेश्वर भी जाना है। आखिरी वक्ता के रूप में दुबेजी ही सामने आए थे। वह अभिभूत थे। इस पूरी लड़ाई को और लड़ने वालों को उन्होंने प्रणाम किया था। उन्होंने आशा भी जताई थी कि एक न एक दिन यह लड़ाई जरूर बेहतर परिणाम की तरफ जाएगी। उन्होंने कहा था आज मुझे लग रहा है कि हम दिल्ली में बैठकर कुछ भी नहीं कर रहे, असली लड़ाई जो है वह आप लोग ही लड़ रहे हैं।

पूरे रास्ते भर आते-जाते उन्होंने बातचीत में एक सूत्रधार की भूमिका अदा की। नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ राकेश भैया का एक लंबा रिश्ता रहा है। उनके पास आंदोलन की कहानियों का विशाल भंडार है। राकेश भैया की जान-पहचान और दोस्ती का दायरा भी बहुत बड़ा है, लेकिन दुबेजी से उनकी भी यह पहली मुलाकात थी। बात जब इधर-उधर के चुटकुलों से आंदोलन की कहानियों पर आई तो राकेश भैया एक के बाद एक सुनाते चले गए। कहानियों में हुंकारा भरने वालों में भी दुबे जी सबसे आगे थे। इतनी लंबी यात्रा के बाद उनका शरीर भले ही थक-थक जा रहा हो, लेकिन वह नहीं थके थे। महेष्वर से 12 किमी दूर एक जगह हमने गाड़ी रोककर चाय पी। महेश्वर पहुंचे तो हमारे अलावा बाकी के सभी लोग कहीं पहले पहुंच गए थे। कई बिस्तरों में जा पहुंचे थे। अजीत सर, अखलाक भाई, पुष्यमित्र ने बाहर मंडली जमा रखी थी।

दूसरे दिन आधार वक्तव्य के बाद कृष्णन दुबेजी ने भी अपनी बात रखी थी। उन्होंने कहा था कि सभी को मालूम है कि समस्या क्या है, हमें उसके हल की तरफ बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा था कि मौजूदा दौर में ट्रेड यूनियन या तो खत्म हो गए हैं या निष्क्रिय हैं। सबसे पहले जरूरत इस बात की है कि जगह-जगह ट्रेड यूनियन का गठन किया जाए ताकि पत्रकार तो कम से कम अपने पर हो रहे अन्याय का विरोध कर सके। दूसरे उपाय के तौर पर उन्होंने वैकल्पिक मीडिया के बढ़ावे की बात कही थी। इसके लिए एक लाख रूपए की मदद दिल्ली स्तर पर करने की बात भी की थी।

पूरे सम्मेलन में वह सबकी बातों को ध्यान से सुनते रहे। कभी हॉल में बैठकर, थक जाते तो बाहर कुर्सी लगाकर बैठ जाते।
सम्मेलन से लौटकर दुबे जी ने सम्मेलन की थीम मीडिया के मानक और समाज पर हमें एक लंबा आलेख भेजा था। लगभग आठ पेज के इस आलेख में उनकी सोच,सपने और नजरिया साफ झलकता है।

दुबे जी का चले जाना एक खालीपन के आ जाने जैसा है। अलग-अलग लोगों के साथ उनके कितने-कितने अनुभव थे। दुबे जी आप याद आते रहेंगे। आपकी बातें हम सभी के लिए हमेशा प्रेरणा रहेंगी। दुबे जी को विकास संवाद परिवार की भावभीनी श्रद्धांजलि।

-राकेश मालवीय, विकास संवाद, भोपाल