मंगलवार, 10 जनवरी 2012

नैन नचैया- नाचते रहे नैन !


भारत रंग महोत्सव का दूसरा दिन। अभिमंच सभागार में नैन नचैया। मंच पर पात्रों के साथ ही नैन भी पूरे नाटक के दौरान नाचते ही रहते हैं। रंग विदूषक के नाटकों में जो खिलंदड़ापन होता है, वो इस नाटक में शुरू से अंत तक नजर आता है, पूरी ऊर्जा और रंगमच के तमाम तत्वों के साथ। चेहरे का मेकअप पहले की तुलना में थोड़ा हलका हुआ है, जिससे मंच पर मौजूद हर कलाकार अब पहचाना जा सकता है। उसकी भाव-भंगिमाएं, करतब और हरकतें कुछ और मुखर होकर सामने आती हैं।

नाटक का केंद्रीय पात्र है बेढंग प्रसाद जो बाबा घोटालू बन जाता है। नाटक में बेढंग की याद्दाश्त खो जाती है, लेकिन उसके व्यक्तित्व का मूल प्रेम और प्रेम करने की सतत प्रवृत्ति बरकरार रहती है। बाबा घोटालू का नाटक के अलग-अलग दृश्यों में अलग-अलग नारियों के साथ प्रेम काफी रोमांचक और मजेदार अनुभव से रूबरू कराता है। बाबा घोटालू की भूमिका में रंग विदूषक के वरिष्ठ कलाकार उदय शहाणे हमेशा की तरह दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करते हैं। उदय शहाणे के संवाद और उनके हास्य पंच इतने सटीक हैं, कि लोग हंस-हंस कर लोटपोट हो जाते हैं।

राजा अटकलपुंजी तक बेढंग की पत्नी सेवनिया की फरियाद पहुंचती है और फिर राजा के आदेश से पूरे राज्य में सघन तलाशी अभियान शुरू होता है। सैनिकों की टुकड़ी जो नाटक को सूत्र में पिरोए रखती है, एक्रोबेटिक्स और लट्ठ के अलग-अलग प्रयोगों से अच्छा समा बांधती है। नाटक में फगुनिया की एंट्री के बाद नया ट्विस्ट आता है। फगुनिया पर बाबा घोटालू, राज्य के सेनापति और महाराजा के मुंहलग्गू हंसतु तीनों का दिल आ जाता है। इसके बाद तेजी से सारा घटनाक्रम बदलता है और बाबा घोटालू की याद्दाश्त वापस आ जाती है और वो सेवनिया के पास फिर पहुंच जाते हैं लेकिन फगुनिया को राजा खुद अपनी सेवा में सु्रक्षित रख लेता है।

कहानी सरल है और उसे पेश उससे भी ज्यादा सरल तरीके से किया गया है। आधुनिक संदर्भों में कुछ और मायनीखेज बनाते हुए। नाटक का निर्देशन-फरीद बज्मी का है, जो लंबे वक्त से रंग-विदूषक से जुड़े रहे हैं। फरीद बज्मी ने कलाकारों को समूह के बीच भी उनकी अलग पहचान देने की कोशिश की है। सैनिकों में कोई भूत से डरता रहता है तो एक सैनिक हमेशा अपनी शेखी बघारता रहता है। वहीं एक सैनिक बोल न पाने की वजह से सैनिकों के बीच ठिठोली का पात्र बना रहता है। हर्ष की महाराजा के तौर पर छोटी किंतु प्रभावी एंट्री है। वहीं अमित रिछारिया भी टुकड़ों-टुकड़ों में नाटक में अपनी मौजूदगी दर्ज करते रहते हैं। संगीत अंजना पुरी का है, जो काफी विविधता लिए हुए है। इसके साथ ही सुरेन्द्र वानखेड़े भी वाद्य यंत्रों के जरिए नाटक को गति देने का काम बखूबी कर गए हैं। रंगविदूषक के लिए सबसे अच्छी बात ये है कि नए कलाकारों की एक टीम फिर बन गई है, जो काफी उम्मीदें जगाती है।

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

अंधा युग- रह रह कर दोहराता है!



दिल्ली के फिरोज शाह कोटला में 'अंधा युग' एक बार फिर खुद को दोहरा रहा है। पचास साल बाद एक बार फिर किले में गूंज रहे हैं वो संवाद, जो अंदर तक झकझोर कर रख देते हैं। महाभारत के युद्ध के अट्ठारहवें दिन के घटनाक्रम को धर्मवीर भारती ने जिस रूप में पिरोया है, वो हर देश-काल में अपने मायने तलाश लेता है... आज के इस दौर में भी। आज भी जब सत्ता अपने मद में अक्सरां 'अंधी' हो जाती है और सरकार के 'महारथी' अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा की तरह या तो अपने 'पागलपन' में 'हत्यारे' की भूमिका अख्तियार कर लेते हैं, या फिर बिना विचारे अपने सारे 'ब्रह्मास्त्र' विरोधियों पर छोड़ देते हैं।

ये महज इत्तफाक ही था, कि 18 अक्टूबर, मंगलवार की संध्या दिल्ली की कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित दर्शक दीर्घा में मौजूद थीं, और मंच से 'शासकों' के 'दोमुंहेपन' और सत्ता की 'मदांधता' पर ऐसे संवाद गूंज रहे थे, जो एक साथ कई संदर्भों में चोट कर रहे थे। सत्ता को उसकी 'मर्यादा' का पाठ पढ़ाया जा रहा था। हालांकि मुख्यमंत्री के लिए ये उत्सव है-"इस वर्ष कोटला फिरोजशाह में ऐतिहासिक परिवेश में महाभारत पर आधारित महान नाटक अंधायुग हम सभी के लिए एक अत्यंत उत्साहजनक घटना... उत्सव की बेला है यह।" (मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का संदेश, ब्रोशर से) वाकई अंधायुग सत्ता के 'अंधेपन' का 'उत्सव' है! इसमें क्या संदेह रह जाता है।

नाटक देखते हुए, कई बार हालिया टीम अन्ना का आंदोलन और उस दौरान देश की सरकार का रवैया भी समानांतर मन में कई तरह की हलचल पैदा करता रहा। ये तो एक बानगी है, देश में ऐसे कई आंदोलन चल रहे हैं और कमोबेश हर जगह सरकार की भूमिका और उसकी प्रतिक्रिया ऐसी ही रही है। शायद नाटक के निर्देशक भानु भारती का ये कथन कि उन्होंने नाटक को मौजूदा परिस्थितियों में और प्रासंगिक बनाने की कोशिश की है, इन्हीं प्रसंगों में कुछ और मायने तलाशता है।

नाटक में 'महाराज' धृतराष्ट्र का एक संवाद आता है कि वो अपनी वैयक्तिकता में इस कदर उलझे कि उन्हें न तो बाह्य मानदंडों का खयाल रह गया और न ही वो उन शब्दों के मायने समझ पाए जो 'संजय' उनके सामने बार-बार दोहरा रहे थे। सत्ता को इस बात का एहसास होने में काफी वक्त लग जाता है कि वैयक्तिक सीमाओं से बाहर भी 'सत्य' होता है। धृतराष्ट्र की भूमिका निभा रहे मोहन महर्षि ने अपने अभिनय, भंगिमाओं और हरकतों से अपनी छटपटाहट और हार की वजहों को लेकर चल रहे आत्ममंथन को दर्शकों तक काफी बेहतर तरीके से संप्रेषित किया है।

कोटला के किले में जैसे-जैसे नाटक आगे बढ़ता है, पात्रों का अंतर्द्वंद्व भी तीर्वतर होता जाता है। बिलकुल मध्य से कोरस गान, मंच के दाईं तरफ धृतराष्ट्र का महल और बाईं तरफ वो 'स्पेस' जहां अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्य अपनी इस हार से बौखलाए, पगलाए से छटपटा रहे हैं। पिता द्रोण की धोखे से हुई हत्या के बाद अश्वत्थामा ने सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया, उसके लिए बस एक ही लक्ष्य है- पाण्डवों का समूल नाश, और इसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकता है। अश्वत्थामा की भूमिका निभा रहे टीकम जोशी ने बदले की आग में जलते एक शख्स के मनोभावों को बखूबी निभाया है।

अश्वत्थामा के द्वारा संजय पर हमला, एक वृद्ध याचक का 'वध', और पांडव शिविर पर हमला। ये सारे मनोभाव और परिस्थितियां धीरे-धीरे उद्धाटित होती हैं। एक तरफ जहां, धृतराष्ट्र सैनिकों को सहला कर युद्ध की पीड़ा को महसूस कर व्यथित हो उठते हैं तो वहीं पुत्रमोह में गांधारी अश्वत्थामा के कुकृत्यों का विवरण बड़े 'रस' से सुनती रहती हैं। उन्हें इसमें विदुर की ओर से पैदा किया गया कोई व्यवधान रास नहीं आता।

गांधारी की भूमिका में उत्तरा बावकर को देखना, वाकई उस मां से होकर गुजरना है, जो युद्ध की इस बेला में अपनी हार स्वीकार नहीं कर पाती, अपने बेटे दुर्योधन को मरते हुए देखना नहीं चाहती, अपने घर आए बेटे युयुत्सु को आशीष के दो वचन नहीं सुना सकती और अंतत: उस कृष्ण को भी शापित कर देती है जिस पर पुत्र से भी ज्यादा मोह है। कृष्ण और गांधारी के बीच के संवाद में ओमपुरी की आवाज और उत्तरा बावकर के जवाब, सिहरन पैदा कर जाते हैं।

नाटक, हर पल, हर क्षण सत्ता के मद और उसके द्वारा निर्मित 'युद्ध' की परिस्थितियों पर नरम-नरम चोट करता है। इस तनाव पूर्ण परिस्थितियों में भी दो प्रहरी (मौजूदा पुलिस और प्रशासन) की विवशता कटु हास्य पैदा करती है। दाएं से बाएं और बाएं से दाएं... दाएं से बाएं और बाये से दाएं... वाकई सत्ता ने यही काम तो प्रहरियों के जिम्मे छोड़ रखा है। नाटक के एक अन्य दृश्य में युयुत्सु प्रहरियों के हथियार से आत्महत्या कर लेता है। उस वक्त प्रहरी कहते हैं- जो अस्त्र-शस्त्र दुश्मनों के लिए थे, वो अब खुद अपनों के बीच तन गए हैं, चलो अच्छा हुआ ये अस्त्र जो हमारे पास थे आज कुछ काम तो आए।

नाटक समाप्त होता है... वहां जहां आशाओं के दीप जल रहे हैं। नाटक में हिस्सा ले रहे सभी कलाकार एक एक कर मंच के अलग-अलग कोनों से हाथ में दीप लिए आते हैं। दीवाली से पहले कोटला में एक दीपोत्सव मनता है। इस वक्त वृद्ध याचक का एक संवाद फिर मन में उठता है- हर क्षण इतिहास बदलने का क्षण होता है... लेकिन क्या वाकई इस क्षण में हम इतिहास बदलने को तैयार हैं या फिर, रह-रह कर दोहराएंगे एक और 'अंधा युग'।

पशुपति शर्मा

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

देश जागा ! ...तो मर गई सरकार !


देश के जागने पर सरकार के मरने का एहसास क्या होता है ? ये रामलीला मैदान में बैठे अन्ना हजारे और उनके लाखों समर्थकों से पूछिए। ये बात उन करोड़ों लोगों से पूछिए जो देश भर में 'अन्ना नहीं आंधी है... देश का दूसरा गांधी है...' के नारे लगा रहे हैं। ये बात उन छोटे-छोटे बच्चों से पूछिए जो 'ट्विंकल ट्विंकल लिट्ल स्टार.... खत्म हो ये भ्रष्टाचार' के बोल गुनगुना रहे हैं...! इससे पहले, कम से कम आज की युवा पीढ़ी को ये एहसास इतना तीव्रतर हो कर नस्तर की तरह नहीं चुभ रहा था कि सरकार मर चुकी है... और वो 'लोकतंत्र की चिता' पर अपनी 'अय्याशी का कबाब' सेंक रही है। हद तो ये है कि बकायदा ये 'कबाब' रामलीला मैदान में भूखे बैठे अन्ना की फिक्र छोड़कर प्रधानमंत्री की इफ्तार पार्टी में चबाया जा रहा है और लोकतंत्र का ठेका संभाले सांसदों में इसका स्वाद लेने की होड़ मची है ।

सत्ता पक्ष ने लोकतंत्र की मौत का इंतजाम किया और उसका मर्सिया पढ़ने की बारी आई तो बाकी पार्टियों को भी अपने साथ कर लिया। पहले टीम अन्ना के साथ सलमान खुर्शीद और प्रणब मुखर्जी ने जनलोकपाल पर मीटिंग-मीटिंग का नाटक खेला, सरकार के रटे-रटाए जुमले दोहराए, झूठे-सच्चे वादे किए और महज 24 घंटे में उन वादों को ऑल पार्टी मीटिंग में चाय कॉफी के साथ गटक लिया। टीम अन्ना को कह दिया कि जो मांग आप कर रहे हैं, ये मुमकिन नहीं है। एक पल में देश के लाखों करोड़ों लोगों के मन में जो उम्मीद जगी थी, सरकार में जो भरोसा जगा था, उसको लोकतंत्र के तमाम तकाजों के साथ ही कब्र में दफना दिया।


सरकार की पहली मौत

इस सरकार की धड़कन उस दिन बंद हो गई, जब पीएम को लोकपाल के दायरे से बाहर कर दिया गया। उस सरकार को जिंदा कैसे माना जा सकता है जो अपने आका को जांच से बचाने की जुगाड़ करती दिखे।
सरकार की दूसरी मौत

सरकार दूसरी बार तब मरी जब मनीष तिवारी जैसे प्रवक्ता को लड़ाई के मोर्चे पर आगे किया । लोकतांत्रिक व्यवस्था में समर्थन-विरोध की परंपरा को कुचलते हुए मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे पर ओछे आरोप लगाए।

सरकार की तीसरी मौत

सरकार की तीसरी बार मौत तब हुई जब उसने अन्ना हजारे को अनशन की जगह देने से इंकार कर दिया। सरकार ने दिल्ली पुलिस के जरिए अन्ना पर 22 नाजायज शर्तें थोप दीं। उस सरकार को कैसे जिंदा माना जाए जिसमें अपना विरोध सहने का माद्दा ना हो।

सरकार की चौथी मौत

सरकार की चौथी मौत तिहाड़ जेल में हुई । सरकार ने अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया। वो सरकार जो अपने जननायकों से ऐसा बर्ताव करे, उसे जिंदा कैसे माना जाए।

सरकार की पांचवीं मौत

सरकार की पांचवी मौत तब हुई जब सरकार के तीन-तीन मंत्री चिदंबरम, सिब्बल और अंबिका सोनी देश को अन्ना की गिरफ्तारी की मजबूरियां बताने लगे। जब देश के गृहमंत्री ये झूठ बोलने लगे कि उन्हें नहीं मालूम कि इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस क्या करती रही और अन्ना को गिरफ्तार कर कहां रखा गया। उस सरकार को जिंदा कैसे माना जाए जो देश में इतनी बड़ी उथल-पुथल से आंखें मूंदें बैठी हो।

सरकार की छठी मौत

सरकार की सांसें छठी बार तब थमीं, जब अन्ना हजारे ने तिहाड़ जेल से बाहर आने से ही मना कर दिया। जो सरकार सुबह अन्ना को देश की शांति के लिए खतरा बना कर गिरफ्तार करवा रही थी, वही सरकार शाम होने तक रिरियाती रही और अन्ना तिहाड़ जेल में ही अनशन पर डट गए।

सरकार की सातवीं मौत

सातवीं बार सरकार दिल्ली ही नहीं देश भर के कई शहरों की सड़कों पर मरी। देश भर में लोग अन्ना के समर्थन में उतर आए। सरकार के खिलाफ नारे लगने शुरू हो गए। अन्ना के समर्थन में उमड़े जनसैलाब के आगे सरकार पूरी तरह दम तोड़ गई ।

सरकार की आठवीं मौत

अन्ना के अनशन के आठवें दिन सिर्फ सरकार ही नहीं संसदीय सिस्टम की मौत हो गई। तीन दिन की छुट्टियों में पघुराए सांसद जब संसद भवन पहुंचे तो जनलोकपाल और अन्ना के अनशन पर चर्चा के बहाने राजनीतिक रोटियां सेंकने लगे और किसी ने भी खुलकर कोई स्टैंड नहीं लिया।

सरकार की नौवीं मौत

सरकार की नौवीं मौत तब हुई जब टीम अन्ना के साथ सरकार विश्वासघात और छल पर उतर आई। सरकार ने पहले दिन जो मुहजबानी वादे किए, उसे दूसरे दिन लिख कर देने से साफ मना कर दिया। ये सरकार पर भरोसे की आखिरी मौत थी...

सरकार की दसवीं मौत

सरकार की दसवीं पर शोक संवेदना व्यक्त करने के लिए आप भी आमंत्रित हैं.... तारीख आप खुद तय कर लें... ये महज एहसास का सवाल है....

पशुपति शर्मा/बजरंग झा
(अन्ना के आंदोलन पर प्रकाशित पत्रिका 'अनायास अन्ना' से उद्धृत)

बुधवार, 13 जुलाई 2011

मेट्रो ये तो बताए पचास रुपये का गुनाह क्या है ?

जिस समय सरकार देश से चार आने को विदा कर रही थी, और भारी मन से आठ आने की जान बख्स रही थी, उसी वक्त देश की राजधानी की एक बड़ी कॉरपोरेट फर्म बड़े चुपके से पचास रूपये के नोट को उसकी औकात बता रही थी। सरकार ने चवन्नी को अलविदा किया तो अखबारों में खबरें भी आईं, फीचर भी छपे ... यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी बड़े तामझाम के साथ चवन्नी की विदाई का गम या जश्न जो भी समझें, महसूस कराया। लेकिन ये क्या दिल्ली मेट्रो की छोटी से छोटी खबर को अखबार की लीड बना कर परोसने वाले मीडिया ने इस बात का जिक्र तक नहीं किया कि अब जेब में पचास रूपये का नोट लेकर मेट्रो स्मार्ट कार्ड रिचार्ज कराने पहुंच रहे लोगों को काउंटर से बैरंग लौटाया जा रहा है।

जी हां, दिहाड़ी मजदूर जो पचास रूपये का कूपन रिचार्ज करा कर दो चार दफा बिना लाइन में लगे मेट्रो का आरामदायक सफर कर लेता था, उसकी जेब में अगर सौ रूपये का नोट नहीं हो तो उसे लंबी लाइन में लग कर टोकन लेना पड़ेगा। लोग भले ही पूरे सफर एसी का मजा लेते रहें लेकिन वो बेचारा ये सोच कर ही पसीने-पसीने होते रहेगा कि दस रूपये के सफर में एक रूपये की जो बचत हो पाती, वो आज नहीं हो पाई।

यही आलम उन छात्रों का भी होगा, जो यार दोस्तों से सौ-पचास उधार लेकर कहीं घूम आने के लिए मेट्रो का इस्तेमाल किया करते थे। मैं उन रईसपुत्रों की बात नहीं कर रहा, जिनके लिए एक दिन में हजार दो हजार खर्च कर देना कोई बड़ी बात नहीं है। मैं तो यूपी और बिहार से आने वाले ऐसे छात्रों की बात कर रहा हूं जो घर से अगले ड्राफ्ट के इंतजार में बड़ी मुश्किल से अपनी जरूरतें पूरी कर पाते हैं। इन सभी जरूरतमंदों की जरूरत से बेफिक्र एसी वाली मेट्रो के एसी में पघुराते अधिकारियों ने ये फैसला कर लिया कि अब पचास रूपये से स्मार्ट कूपन रिचार्ज नहीं होगा।

महीने में अपने पतियों के साथ एक बार घर से बाहर निकलने वाली गृहणियों के लिए भी मेट्रो का ये फैसला किसी झटके से कम नहीं। घर के बजट से जोड़-जाड़ के, पति से लड़-झगड़ कर उन्होंने अपना मेट्रो कार्ड बनवाया था, जिसे वो सहेज कर रखतीं। घूमना-फिरना होता तो अपना कार्ड लेकर चलतीं और पचास रूपये रिचार्ज करवा कर घर तक लौट आतीं। पचास रूपये के रिचार्ज कूपन की अहमियत क्या होती है, मेट्रो अधिकारियों को एक बार इन महिलाओं से भी पूछ कर देख लेना चाहिए था। ऐसी न जाने कितनी महिलाएं होंगी, जो पहली दफा मेट्रो काउंटर पर हाथ से लिखी नई नोटिस देखकर मायूस होकर लौटीं होंगी... इसका हिसाब मेट्रो के पास कतई नहीं होगा। हां, उनसे आप पूछें न पूछें, आनंदविहार से वैशाली तक मेट्रो चालू होते ही पहले दिन कितने और लोगों ने मेट्रो का खजाना भरा, ये आंकड़ा वो आपके बिना पूछे भी मुहैया करा देंगे।

कोई मेट्रो अधिकारियों से ये पूछेगा कि आखिर क्या सोच कर उन्होंने मेट्रो स्मार्ट कार्ड के रिचार्ज वैल्यू से पचास रूपये को विदा कर दिया? जो मेट्रो दस-दस रूपये के कूपन काउंटर से बेच रहा है, उसे एक मुसाफिर के पचास रूपये के रिचार्ज को नकारने का अधिकार किसने दिया ? वो मुसाफिर जिसने सौ रुपये में पहली बार मेट्रो स्मार्ट कार्ड खरीदा था, उसकी अनुमति के बिना उसका पचास का रिचार्ज क्यों बंद किया गया? क्या ये उपभोक्ताओं के अधिकार का हनन नहीं ? क्या ये मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा नहीं ? क्या ये देश की अर्थव्यवस्था में प्रचलित नोटों को मनमाने तरीके से अपमानित और अवमूल्यित करने की साजिश नहीं ?

लेकिन मेट्रो के सौ गुनाह भी माफ हैं... क्योंकि ई श्रीधरन जैसे काबिल लोगों ने रिकॉर्ड समय में मेट्रो का काम पूरा कर इसे विश्वस्तरीय उपलब्धि बना दिया है। ऐसे ग्लोबल उत्साह में किसी आम आदमी की मायूसी से उपजे सवालों पर चर्चा करना ही गुनाह है। कम से कम हमारे मीडिया में ऐसे सवालों के लिए कोई नहीं जगह नहीं, क्योंकि मेट्रो के पीआर अधिकारियों ने सब कुछ इतनी खूबसूरती से मैनेज कर रखा है कि मेट्रो मतलब... सुहाना ही सुहाना... मेट्रो मतलब खजाना ही खजाना.... ऐसे में आठ आने के सौ गुना मूल्य वाले पचास के नोट को मेट्रो स्मार्ट कार्ड काउंटर से बेआबरू होकर लौट आना पड़े तो किसी को मायूस नहीं होना चाहिए... लोगों को तो बस इस बात पर खुश होते रहना चाहिए कि मेट्रो ने पचास के नोट को इतनी इज्जत बख्स रखी है कि वो अकेले नहीं, एक हमसफर के साथ आए और सौ रुपये का रिचार्ज करा कर लौट जाए।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

ये दाग दाग उजाला

युवा साथी विश्वदीपक ने जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन की एक 'सुबह' को कुछ यूं बयां किया।

कैमरे खामोश थे. और मीडिया वाले ऊंघ रहे थे. कुछ चाय की चुस्कियों से अपनी थकान मिटाने की कोशिश कर रहे थे. तो कुछ चहलकदमी करके पैरो में सिमट आई एकरसता तोड़ रहे थे. सूरज आसमान में चढ़ रहा था. और जिंदगी फुटपाथ पर उतरने लगी थी. सुबह साफ और चमकदार थी. ये अन्ना के आमरण अनशन की पहली सुबह थी।

पिछले चौबीस घंटे से जो 129 लोग आमरण अनशन पर थे उनके चेहरे पर थोड़ी थकान थी. अन्ना अभी तक मंच पर नहीं थे. मंच के नीछे कुछ जाने पहचाने चेहरे मिले. कुछ ने गले लगाकर स्वागत किया तो कुछ ने बस एक मीठी मुस्कान का तोहफा दिया. शायद लगा कि हां, सुबह जानदार है. शायद इसी तरह कोई सुबह आएगी जब भ्रष्टाचार की सियाही मिट जाएगी।

अन्ना के अनशन के समर्थन में बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर के बैनर भी मंच के ऊपर लहरा रहा है. पुलिस की मौजूदगी न के बराबर है। लगता है यूपीए सरकार भी अपरोक्ष रूप से अनशन में शामिल है. वक्त की सुई थोड़ा और आगे खिसकती है. सूरज थोड़ा और ऊपर चढ़ता है.लोगों की आवक जावक थोड़ी और बढ़ती है. कि तभी लोग मंच की तरफ भगाने लगते हैं. पता चलता है कि अन्ना मंच पर आ चुके हैं।

कल के अन्ना और आज के अन्ना में एक महीन सा फर्क नजर आता है. उनकी चमड़ी का रंग थोड़ा और तांबई हो गया है. लेकिन हौसला और पक्का लग रहा है। मंच के पास जाने का हौसला नहीं होता क्योंकि वहां की जगह कैमरों ने छीन ली है. खुद को लोकतंत्र का चौथा खंभा कहने वाला मीडिया किस तरह अराजक है ये एक बार फिर स्थापित हुआ. हर कोई अन्ना से कुछ एक्सक्लूसिव चाह रहा था. जबकि इसमें कुछ भी एक्सक्लूसिव हो ही नहीं सकता।

कल जब अन्ना ने् अनशन का ऐलान किया था तब करीब दो हजार लोग जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए थे. हर वो आदमी जो किसी भी तरह से इस व्यवस्था के नीचे घुटन महसूस करता है अन्ना के अनशन से राहत महसूस कर रहा है। अन्ना से बातचीत की इच्छा दबाए वापस लौट पड़ता हूं. रास्ते में वो कुछ भी नहीं मिलता जो जाते वक्त मिला था. न वो हौसला और न ही वो उम्मीद। शायह हर यात्रा का अंत ऐसे ही होता है... तो क्या अन्ना की यात्रा का भी यही अंत होगा...?

मंगलवार, 29 मार्च 2011

खेल को 'खेल' रहने दो


जो तुमसे बना है

उसे झुकाओ मत

जरा सम्मान दो

थोड़ी तारीफ करो।


वो हमसे अलग नहीं

रूप-रंग एक है

खेल भी है एक

इसे बस खेल रहने दो

युद्ध न बनाओ।


ये नेताओं की रोटी है

उन्हें ही हज़म होती है

अगर खेल से बात बनती है

तो खेलो

भावना के मैदान पर।


जीत की जिद बेकार है

और दो दिन का है

हार का मातम

काश ऐसा हो

एक दूसरे का दिल जीतें

भारत और पाकिस्तान

प्रेम का रिश्ता हो आबाद

गले मिलें

दिल्ली और इस्लामाबाद।


भारत-पाक 'युद्ध' के बीच कविताई के ये बोल एक टीवी चैनल पर सुनाई दें तो थोड़ा अचरज होता है। थोड़ी हैरानी होती है, लेकिन एक सुखद एहसास भी होता है। भीड़ के शोर में कहीं कोई आवाज तो है, जिसमें किसी पत्रकार के एहसास और उसके तर्क सांसें ले रहे हैं। मोहाली में मुंबई की 'टीस' निकाल रहे टीवी शोज के बीच 29 मार्च (विश्वकप की सबसे बड़ी जंग से एक दिन पहले) को सीएनईबी ने एक कार्यक्रम पेश किया- खेल को खेल ही रहने दो, उससे खिलवाड़ मत करो। ये वाकई साहस का काम है। ये साहस टीआरपी की दौड़ में न होने की वजह से है या फिर अपनी अलग पहचान की तलाश की वजह से... वजह चाहे जो भी हो कार्यक्रम काबिले तारीफ जरूर है।

कहां मिसाइलें दागी जा रहीं हैं, रणभेरी बज रही है... तोप और टैंकर निकल गए हैं और कहां एक चैनल प्राइम टाइम में दिल्ली और इस्लामाबाद के दिल मिलाने की बात कर रहा है। कहते हैं भीड़ की एक साइक्लॉजी होती है, जिसमें सारे सही और गलत काम होते चले जाते हैं और किसी को कोई अपराध बोध नहीं होता। यही वजह है कि ज्यादातर बड़े चैनलों में मोहाली का मैच 'महासंग्राम' बन चुका है और खिलाड़ी 'योद्धा'। शब्दावली लगभग एक सी है, उन्माद लगभग एक सा है, अपराधबोध लगभग सभी जगह सिरे से नदारद।


बहरहाल सीएनईबी ने मंगलवार की रात 8.30 से 9.30 के बीच एक ऐसा शो प्रसारित किया, जिसे कम से कम मीडियाकर्मी मीडिया की संजीदगी की मिसाल के तौर पर पेश कर सकेंगे। भारत-पाक मैच को खेल भावना के तौर पर देखने की वकालत करते इस शो में वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र रंजन और सीएनईबी के वरिष्ठ संपादकीय सहयोगी देवांशु झा ने बड़े संतुलित तरीके से दर्शकों के मानस को झकझोरा। सत्येंद्र रंजन ने बेहद वाजिब सवाल उठाया कि पिछले 3-4 दिनों से जो उन्माद फैलाया जा रहा है, कल मैच के बाद अगर उसकी परिणति किसी हिंसक घटना के रूप में हुई तो उसका जिम्मेदार कौन होगा ?


सत्येंद्र रंजन ने मीडिया की दिक्कतों का भी हवाला दिया और कहा कि जब क्रिेकेट पर लगातार कवरेज होगी तो अलग-अलग एंगल निकालने ही होंगे। ऐसे में कब पत्रकारीय मर्यादा की सीमाएं दरक जाती हैं, पता ही नहीं चलता। जाहिर है, जब मनुष्य की आदिम हिंसा भड़कती है तो वो बढ़ती ही चली जाती है। तीर, तलवार से तोप तक पहुंचती है और फिर बम गोला बारूद से होती हुई मिसाइल हमले शुरू कर देती है। अभी क्रिकेट के पिच पर परमाणु बम फटने बाकी हैं। सचिन के शतकों के शतक के साथ हो सकता है, मोहाली की पिच पर जापान का रेडिएशन भी पसर जाए।


शो के दौरान देवांशु झा ने दोस्ती की पिच पर 'हरी घास' के बेहद संवेदनशील जुमले का इस्तेमाल किया। वाकई खून के लाल रंग के बीच दोस्ती की हरी घास आंखों को काफी सुकून दे जाती है। देवांशु झा ने कहा कि क्रिकेट को हमारी कुंठा निकालने का मौका नहीं समझना चाहिए। उनका सवाल बेहद वाजिब है कि मैदान में क्रिकेट खेल रहे शाहिद आफरीदी किस ब्रिगेड में शामिल हैं, उमर गुल फौज की किस आर्टिलरी का हिस्सा हैं?

हालांकि अभी दो दिन पहले तक सीएनईबी की जुबान पर भी दबे सुर में ही सही रण के शोले सुलग जरूर रहे थे... आप खुद देखिए चैनल पर प्रसारित इन पंक्तियों में कैसे 'सब के सब के मारे जाने' की धमकी छिपी है....

रण में जब तुम उतरोगे

मन डोल डोल जाएगा

सब व्यूह छिन्न हो जाएंगे

सब के सब मारे जाएंगे

गनीमत ये है कि 'युद्ध' के अंत से पहले चैनल की चेतना जाग गई... उन्हें ये एहसास हो गया कि बाजार की भाषा और भाव तो हर दिन हावी रहते हैं एक दिन अंतरात्मा की आवाज सुनने में क्या हर्ज है... एक दिन दोस्ती का तराना गुनगुनाने से क्यों गुरेज करें?

पशुपति शर्मा

रविवार, 13 मार्च 2011

हिन्दी को मांजो... रगड़ो... बदलो... और चला दो


('हिन्दी बदलेगी तो चलेगी!' विषय पर 12 मार्च की शाम दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में हुई परिचर्चा पर एक रिपोर्ट।)

12 मार्च की शाम, इंडिया हैबिटेट सेंटर के एम्फी थियेटर में हिन्दी को बदलने और बदल कर चलाने की फिक्र में हिन्दी जगत के सुधी पाठक, लेखक और शुभचिंतकों की जमात जमा हुई। कार्यक्रम की शुरुआत वैशाली माथुर की चंद लाइनों से हुईं। वैशाली ने हिन्दी के 'महानुभावों' का स्वागत करते हुए कार्यक्रम का संचालन पेंगुइन हिन्दी के संपादक सत्यानंद निरुपम को सौंप कर अपना 'पिंड' छुड़ाया।

सत्यानंद निरुपम ने माइक थामते ही एक 'सत्यनुमा' सवाल दागा या यूं कहें कि एक बयान दे डाला कि - 'हिंदी जैसे चल रही है, वैसे नहीं चल सकती।' दूसरी बात उन्होंने कही कि हिन्दी के साथ कई दिक्कतें हैं, जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। सत्यानंद निरुपम के मुताबिक हिंदी के सबसे बड़े हितैषी अकादमिक क्षेत्र के लोग हैं। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी चिंता जाहिर की कि हिन्दी में कोई ऐसी पत्रिका क्यों नहीं जिसे एक लाख लोग खरीद कर पढ़ते हों। परिचर्चा के दौरान बीच-बीच में निरुपम कुछ ऐसे ही 'तराने' छेड़ते रहे जिससे 'हिन्दी मन' उद्वेलित होता रहा। जाहिर है उनके हर बयान से सहमति और असहमति दोनों की पर्याप्त गुंजाइश थी और शायद यही निरुपम का मकसद भी था। बहस चल निकली और बड़ी गर्मजोशी के साथ चलती रही।

दिल्ली विश्वविद्यालय के व्याख्याता आशुतोष कुमार ने पहली पंक्ति में हिन्दी साहित्य का हिन्दी समाज से रिश्ता तोड़ डाला। उनकी माने तो अब साहित्य और समाज में वो जान-पहचान नहीं रही जो इस भाषा की जान भी थी और पहचान भी। इसके लिए उन्होंने रामचंद्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास को अकादमिक क्षेत्र का बुनियादी ग्रंथ बनाए जाने को जिम्मेदार ठहराया। आशुतोष कुमार के मुताबिक रामचंद्र शुक्ल के इतिहास ने खड़ी बोली की परंपरा को हिन्दी के इतिहास से बाहर निकाल दिया। दूसरी तरफ बोलियों के 'क्लासिकल' साहित्य को इतिहास में समाहित किया लेकिन आधुनिक साहित्य को सिरे से खारिज कर दिया। इससे हिन्दी भाषा की रवानगी और उसका सहज विकास बाधित हुआ। इसके साथ ही आशुतोष ने अखबारी हिन्दी में 'ग्लोबिश भाषा' के बनते या बिगड़ते स्वरूप को समझने और गंभीरता से देखने की जरूरत पर जोर दिया। उनका धाराप्रवाह विचार कुछ देर और प्रवाहित हो सकता था लेकिन निरुपम ने 'रुकावट के लिए खेद है' के अंदाज में दखल दे दिया।

इसके बाद बारी लेखिका नूर जहीर की आई। नूर ने भाषा को मजहब से जोड़ने को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि मजहब के साथ जुड़कर दोनों ही भाषाओं का नुकसान हुआ है। आज दोनों भाषाओं के पैरोकार अंग्रेजी के करीब जाने में हिचक महसूस नहीं करते लेकिन एक-दूसरे से 'भाषाई दुश्मनी' बखूबी निभा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उर्दू जबान में 'सेक्रेटरी' का इस्तेमाल तो हो सकता है लेकिन 'सचिव' से तौबा कर ली गई है। हालांकि उन्होंने इसके लिए 'राजनीति' से ज्यादा व्यक्तिगत 'ईगो' को जिम्मेदार बताया।

कवयित्री अनामिका ने अपने छोटे से भाषण में प्रेशर कुकर की एक सीटी में पकने वाली 'भाषा की खिचड़ी' सिझाई और उसे सुपाच्य बना कर लोगों के गले से नीचे 'ससार' दिया। उन्होंने कहा कि हिन्दी में जितने भी भाषा के शब्द 'फेटे' जा सकते हैं, फेटे जाने चाहिए। उन्होंने अपने वक्तव्य में भी 'टुईयां', 'ठस्सा' और 'धड़का' जैसे शब्द फेटे और भाषा की ताकत का एहसास कराया। सबसे अच्छी बात ये रही कि उन्होंने भाषा को लेकर, बोली को लेकर मन का 'धड़का' खत्म करने की वकालत की। वाकई अगर ये धड़का खत्म हो गया तो फिर हिन्दी और हिन्दीवालों की कई सारी दिक्कतें खुद ब खुद हल हो जाएंगी।

'सराय' के साथ लंबे वक्त से जुड़े रविकांत ने हिन्दी भाषा की शब्दावली को लेकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कंप्यूटर जैसे नए क्षेत्रों के लिए अपनी जबान की शब्दावली होनी ही चाहिए। उन्होंने 'इनबॉक्स' के लिए 'आई डाक' और 'आउट बॉक्स' के लिए 'गई डाक' जैसे शब्द बनाने, तलाशने और तराशने के अपने अनुभव साझा किए। हालांकि दीर्घा में मौजूद फिल्मकार के विक्रम सिंह को उनका ये प्रयोग 'दकियानूसी' लगा। के विक्रम सिंह ने ये सवाल उठाया कि आखिर हिन्दी वालों को 'इन बॉक्स' और 'आउट बॉक्स' से परेशानी क्यों होती है? जाहिर है, विक्रम सिंह जैसे लोगों का एक वर्ग है जो ये मानता है कि अगर चलने के लिए हिन्दी को बदलना है तो उसे ऐसे 'शब्दों' या 'बदलावों' से परहेज क्यों?

आखिर में हिन्दी के 'एलिट' मीडियाकर्मी रवीश कुमार (आपकी स्वीकारोक्ति है) ने 'हिन्दी में अंग्रेजी झाड़ने' का अपना अनुभव भी साझा किया और मीडिया में हिन्दी को बतौर भाषा बरतने को लेकर अपनी चिंता भी जाहिर भी की। 'जापान में कुदरत का डबल अटैक' जब टेलीविजन की स्क्रीन पर नजर आता है तो हिन्दी जबान और उसकी संवेदनात्मक, भावात्मक अभिव्यक्ति की क्षमता को भी 'दिल का डबल अटैक' पड़ता है, लेकिन ये बात कोई समझने को तैयार नहीं। 'माइग्रेशन' के साथ भाषा में बन रही खिचड़ी का सौंधापन रवीश कुमार को भी पसंद है लेकिन जब ये भाषा 'संघर्ष' के बजाय 'समझौते पर समझौते' करने लगती है तो उनका मन कहीं कचोटता जरूर है।

मंच पर आसीन 'महानुभावों' के बोल चुकने के बाद दीर्घा में बैठे महानुभावों की बारी आई। इनमें वरिष्ठ पत्रकार अजीत राय की टिप्पणी विशेष तौर पर उल्लेखनीय है। अजीत राय का दर्द ये है कि हिन्दी में नाट्य समीक्षा, फिल्म समीझा की कोई कद्र नहीं है। इसके साथ ही वो ये कहना भी नहीं भूलते- "अगर मैंने हिन्दी में किए अपने काम की तुलना में 5 फीसदी काम भी अंग्रेजी में किया होता तो आज यहां नहीं होता... आज आपका भाषण नहीं सुन रहा होता... कहीं और होता....।" हिन्दी वाले की 'कहीं ओर चले जाने की ललक' भी लगता है हिन्दी का थोड़ा बहुत नुकसान तो कर ही रही है।

खैर! बहस दो जाम साथ लगाने की अर्जी के साथ खत्म हो गई। एक जाम शायद उस सवाल के नाम की कि जब बहस हिन्दी पर हो रही है तो मंच के पीछे लगे बोर्ड पर हिन्दी का कोई शब्द क्यों नहीं? और दूसरा जाम 'बदलने का सबक' सीखने के लिए। आखिर अंग्रेजी के साथ चलने के लिए हिन्दी को कुछ नए 'दस्तूर' भी तो सीखने होंगे। वरना हिन्दी पट्टी में किसी संगोष्ठी के बाद खुले तौर पर जाम का न्यौता कहां मिल पाता है?

- पशुपति शर्मा