शनिवार, 15 मई 2010

बहस निकली है तो दूर तलक जाएगी...

दफ्तर से लौटते हुए शाम को थका मांदा मैं दिल्ली के यमुना बैंक स्टेशन पर बैठा तहलका पत्रिका के पन्ने पलट रहा था। मैं सीढियों पर बैठा शोमा चौधरी का एक लेख पढ़ रहा था, जिसमें नक्सलवाद से लड़ने की सरकार की नीति पर तर्क-वितर्क थे। मुझे इस बात का इल्म ही नहीं रहा कि कोई मेरे पीठ पीछे खड़ा है। 2-3 मिनट बाद एक वर्दीधारी अफसर ने टोका-क्या कुछ गंभीर पढ़ रहे हो? मुझे इस सवाल की कतई उम्मीद नहीं थी। पुलिस अफसर ने अपना सवाल दोहराया। इन दो पलों में मेरे जेहन में कई सारी चीजें घूम गईं। नक्सलवाद को लेकर मचे हो-हंगामे से लेकर सरकार की धमकी भरी चेतावनी, सब कुछ। मुझ कुछ समझ नहीं आया कि मैं उसे क्या जवाब दूं। मैंने पत्रिका उस अफसर के हाथ में सौंप दी। उसने पत्रिका को उलट-पुलट कर देखा और अजीब सी निगाहों से मुझे देखता हुआ सीढियों से उतर गया। गलियारे में मौजूद गार्ड को उसने कुछ कहा। अगले दिन मैं फिर सीढ़ियों पर बैठने लगा तो गार्ड ने मना कर दिया। पता नहीं ये नक्सलवाद पर लेख पढ़ने का असर था या फिर सुरक्षा चौकसी, लेकिन मुझे तपती गर्मी में लू के थपेड़े सहने सीढ़ियां छोड़ प्लेटफार्म पर आना पड़ा। ये तो बस बानगी भर है, अभी सरकार के उस एलान पर पूरी तरह अमल शुरू नहीं हुआ जिसमें नक्सलवाद का समर्थन या उसके समर्थक होने की बू मात्र से आप गुनहगार बन जाएंगे, पता नहीं उस दिन पुलिसवाले क्या करेंगे?

खैर! ये भी बड़ी अजीब बात है न, जिस देश में अपराधों पर लगाम लगा पाने में पुलिस नाकाम रही है, उस देश में अब उसे विचारों की निगरानी की भी जिम्मेदारी देने पर विचार चल रहा है। उस देश में जहां कत्ल की वारदात के बाद पुलिस सालों में कातिल का पता नहीं ढूंढ पाती, उस देश में विचार से होने वाले खून-खराबे को रोकने की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपी जा रही है। आज जब मैं ये लेख लिख रहा हूं, आरुषि के कत्ल को दो साल बीत गए हैं- न तो यूपी पुलिस और न ही देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी अभी तक कातिल का सुराग ढूंढ पाई है। आरुषि तो महज एक मामला है, ऐसे न जाने कितने मामले हैं जहां लोग इंसाफ के इंतजार में हैं। शायद, सरकार में बैठे साहबों को इस बात का इल्म भी न हो कि देश में महज एक-आध फीसदी लोग ही इंसाफ की लड़ाई लड़ने में यकीन रखते हैं। देश के इस छोटे से हिस्से को भी इंसाफ मुहैया करा पाने में सरकार और ये मशीनरी पूरी तरह नाकाम रही है। एक बहुत बड़ा हिस्सा तो इंसाफ की प्रक्रिया और उसमें आने वाली परेशानियों के बारे में सोच कर ही तौबा कर लेता है। ऐसे में नक्सलवाद समर्थकों की गिरफ्तारी को लेकर किए नए एलान के जरिए चिदंबरम साहब ने देश की अदालतों और थानों का बोझ कई गुना बढ़ाने का ही फैसला किया है। बल्कि इसके जरिए लोगों के शोषण और उनके दमन का एक नया हथियार पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को सौंपा है। अब तो गिरफ्तार शख्स के पास हथियार या असलाह बारूद दिखाने की जरूरत भी नहीं होगी, ये कह देना भर ही काफी होगा कि ये नक्सलवाद समर्थक है।

हो सके तो सरकारी मशीनरियों में बैठे चंद इमानदार लोग मुझे माफ करें, लेकिन सच यही है कि नक्सलवाद समर्थक शब्द की रेंज इतनी बड़ी है कि किसी को भी इसमें घसीटा जा सकता है। देश भर में चलने वाले जन आंदोलनों में से किसी पर भी नक्सल समर्थक या नक्सलियों से प्रभावित होने का लेबल बड़ी आसानी से चस्पा किया जा सकता है। हर उस शख्स पर जो नक्सलियों की ओर से उठाए जा रहे मुद्दों की बात करे, उन्हें देश के दुश्मनों की श्रेणी में डाला जा सकता है। हर वो शख्स जो किसानों की जमीन पर जबरन कब्जा किए जाने का विरोध करे, किसानों और गरीबों के हितों की लड़ाई लड़े, उसे नक्सलियों के खाते में डाला जा सकता है। ये फेहरिश्त कितनी लंबी हो सकती है शायद इसका गुमान भी गृहमंत्री को नहीं है। एक बार इस फेहरिश्त में किसी का नाम शुमार हो जाए तो फिर पुलिस के दमन चक्र से बचने का कोई उपाय नहीं। क्योंकि विचार तो ऐसे हैं कि कभी मरते नहीं खत्म नहीं होते। एक बार आप इस जुर्म में सजा काट कर आएं तो देश में नक्सलियों की किसी बड़ी घटना के साथ ही थाने में हाजिर होकर खुद ही गिरफ्तारी दे दें, वरना आपका एनकाउंटर हो सकता है। आतंकवाद निरोधक कानून पोटा के दुरुपयोग के बाद सरकार को इसे वापस लेना पड़ा था, ऐसे में नक्सल समर्थकों की गिरफ्तारी की चेतावनी देने से पहले सरकार को इसके नतीजों पर भी सोचना चाहिए था।

नक्सलवाद से लड़ाई के मसले पर चिदंबरम साहब के रवैये और बयान में आए उतार-चढ़ाव का भी अपना ही ग्राफ है। करीब दो महीने पहले चिदंबरम नक्सलियों से बातचीत की पेशकश कर रहे थे। दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ कैंप पर हमला होते ही चिदंबरम त्यौरियां चढ़ा कर ये बयान देने लगे कि नक्सलियों के खिलाफ हवाई हमले की नीति पर भी पुनर्विचार किया जा सकता है। इसके कुछ दिनों बाद चिदंबरम जेएनयू जैसे संस्थान में आम सभा करने पहुंचे तो उन्हें तीखा विरोध झेलना पड़ा। जेएनयू के वामपंथी संगठनों ने सभा स्थल के बाहर चिदंबरम और केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। इस विरोध के बाद ही शायद ये खबर आई कि अब नक्सल समर्थकों की भी खैर नहीं। चिदंबरम साहब को लोकतंत्र में विरोध और प्रतिरोध के ये सुर बेहद नागवार गुजरे और ये एलान हो गया कि नक्सल समर्थक जेल की हवा खाने को तैयार रहें।

जेएनयू की इस घटना को चंद दिन गुजरे ही थे कि चिदंबरम ने ये बयान दे दिया कि माओवाद से लड़ने के लिए सबसे जरूरी है जनता का भरोसा जीतना। कंफेडरनेश ऑफ इंडियन फेडरेशन के एक कार्यक्रम में चिदंबरम ने कहा-"साल 2004-09 के बीच देश ने 8.5 फीसदी की दर से विकास किया लेकिन पिछड़े राज्यों में प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा। सरकार और औद्योगिक घरानों को लोगों का भरोसा जीतने के उपाय ढूंढने होंगे।" गनीमत है कि चिदंबरम को ये एहसास हो रहा है कि बिना लोगों का विश्वास हासिल किए नक्सलवाद जैसी समस्या से नहीं निपटा जा सकता। नक्सलवाद से निपटने के लिए 'गोली' से ज्यादा जरूरत 'भरोसा' जीतने की है। चिदंबरम साहब आप जो सोच रहे हैं उसे कर दिखाइए, जंग में आपकी जीत निश्चित होगी। दो पल ठहरकर सोच लीजिए, ये रास्ता जरा लंबा है-इसमें धीरज भी चाहिए और ज्यादा आत्मबल भी। वरना गोली चलाना तो बहुत आसान है- जवानों को आदेश दिया और मरने-मारने के लिए जंग-ए-मैदान में उतार दिया। गोली की लड़ाई जवानों को लड़नी है लेकिन भरोसे की लड़ाई सरकार और सियासी पार्टियों को लड़नी है। क्या वाकई आपमें वो हिम्मत और हौसला बाकी है? क्या वाकई सरकार एक तानाशाही कानून की बजाय लोकतांत्रिक तरीके से ये लड़ाई लड़ने का माद्दा रखती है?

चिदंबरमजी आपकी नीयत को लेकर सवाल उठाने का मेरा इरादा कतई नहीं है। हो सकता है आप देश में अमनबहाली का सपना देख रहे हों पर साथ ही साथ आप ये भी तय कर लीजिए कि ये अमनबहाली कैसे और किन शर्तों पर? क्या लोकतंत्र का दम घोट कर आप नक्सलवाद की लड़ाई लड़ेंगे? क्या आप लोगों को डरा-धमका कर उनकी जुबान बंद करना चाहते हैं या फिर एक बहस के जरिए देश में आम राय बनाना चाहते हैं? सीआईआई के एक कार्यक्रम में आपने खुद कहा है कि माओवाद के मुद्दे पर दो तरह की राय है। एक धड़ा ये मानता है कि मौजूदा सरकार बुरी है और दूसरा धड़ा सरकार के साथ खड़ा है। मतभेद हो सकते हैं, लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है। विचारों की इस भिन्नता को ये कहकर खत्म मत कीजिए कि चुप रहो वरना सलाखों के पीछे डाल दिए जाओगे। जिस देश में हर मुजरिम को बचाव के लिए एक वकील मुहैया कराने की व्यवस्था है, वहां किसी मुद्दे या शख्स के पक्ष-विपक्ष में बहस पर रोक मत लगाइए। देश की आजाद आबोहवा और लोकतांत्रिक परंपराओं का गला मत घोटिए, बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश बने रहने दीजिए, देश आपको दुआएं देगा।

पशुपति शर्मा

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

टोपी उतारो फिर लड़ो इंसाफ की जंग

“आदमी को तोड़ती नहीं है
लोकतांत्रिक पद्धतियां
केवल पेट के बल उसे झुका लेती हैं
धीरे धीरे अपाहिज
धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए” (राजकमल चौधरी)

आज सुबह हिंदुस्तान (2 अप्रैल, 2010, दिल्ली संस्करण, रिपोर्टर सत्यप्रकाश) की एंकर खबर देखी तो बरबस राजकमल चौधरी की ये पंक्तियां दिमाग में कौंधने लगी। लोकतांत्रिक पद्धतियों के पेट के बल झुका लेने के हुनर की एक और मिसाल मेरे सामने थी। ये मिसाल पेश की लोकतंत्र के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित मंदिर ने। देश के सर्वोच्च न्यायालय के कारिंदों ने एक लॉ इंटर्न को टोपी लगाकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने से रोक दिया।

कभी पढा था कि अंग्रेजों के जमाने में कई क्लब के आगे लिखा होता था कि यहां हिंदुस्तानियों और कुत्तों का प्रवेश वर्जित है। ये एक तरह की शासकीय ठसक थी, सामंती नजरिया था और दूसरों को उसकी औकात में रखने की पद्धति थी। देश की आजादी के बाद ये पद्धति बदलनी चाहिए थी, ये नजरिया बदलना चाहिए था लेकिन अफसोस ऐसा हो न सका। आज सुप्रीम कोर्ट के अंदर कानून के एक छात्र को टोपी उतारने के लिए मजबूर किया जाता है तो कई सवाल जेहन में कौंधते है। ये और मसला है कि इन सवालों के बाद सर्वोच्च अदालत के कारिंदों की बजाय आप कठघरे में खड़े कर दिए जाएं।

बहरहाल, अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई कर रहा मंसूर अहमद इन दिनों अजीब से हालात में फंस गया है। मंसूर 10 मार्च से सुप्रीम कोर्ट में इंटर्नशीप कर रहा है। वो यहां इंसाफ की लड़ाई के तौर-तरीके सीखने आया है लेकिन उसके पहले कोर्ट के आला अधिकारी उसे इंसाफ का शिष्टाचार सिखा रहे हैं। वो उसे ये पाठ पढ़ा रहे हैं कि वकीलों को कोर्ट में टोपी लगाने का हक है लेकिन एक इंटर्न को नहीं। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार की नसीहत भी लाजवाब है-“ बेटे तुम यहां ट्रेनिंग के लिए आए हो। तुम अपना मन उसी में लगाओ। टोपी नहीं लगाओगे तो क्या होगा? ” मी लार्ड माफ करें, पेट के बल झुकने में थोड़ा वक्त तो लगता है। लॉ के नए रंगरूट ने आरटीआई दायर कर टोपी की लड़ाई आगे बढ़ाई लेकिन महानिबंधक एम पी भद्रन ने जवाब भेजा- “यह कोर्ट के शिष्टाचार का मामला है।”

जाहिर है कश्मीर के बड़गाम जिले के निवासी मंसूर अहमद की भावनाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट में कोई जगह नहीं है। पता नहीं उसकी टोपी में ऐसी क्या बात है कि सुप्रीम कोर्ट के गुंबद को वो रास नहीं आ रही। मंसूर को टोपी लगाने का हक मिलेगा, फिलहाल इसकी गुंजाइश कम है। हां मंसूर के साथ सर्वोच्च न्यायालय में इंटर्नशीप कर रहे उसके 82 साथियों को पहला सबक जरूर मिल गया। इंसाफ की लड़ाई लड़ो मगर टोपी उतारकर, कमर झुकाकर।

शनिवार, 27 मार्च 2010

कैसे बांधोगे नर्मदा की प्रतिरोध-धारा


पिछले दिनों विकास संवाद के एक कार्यक्रम में महेश्वर जाने का मौका मिला। इस कार्यक्रम में काफी तादाद में मीडियाकर्मी जमा हुए। यूं तो बहस का एजेंडा- मीडिया के मानक और लोग- था, लेकिन चूंकि ये इलाका नर्मदा पर बन रहे बांध की वजह से नर्मदा बचाओ आंदोलन की कर्मभूमि है, सो फिजा में डूब से प्रभावित लोगों का सवाल भी घुला रहा। खुद आयोजकों ने भी कार्यक्रम कुछ इस तरह से ऱखा कि मीडियाकर्मी नर्मदा पर बन रहे बांध और उससे प्रभावित लोगों की हकीकत से दो-चार हुए और उन्हें ये मुद्दा उद्वेलित कर गया।

12 मार्च 2010 को 5 टोलियों में बंटे लोग महेश्वर डैम और डूब प्रभावित गांवों की ओर निकले। नर्मदा बचाओ आंदोलन से महेश्वर डैम के निर्माण से जुड़े लोग किस कदर दहशत में है, इसकी पहली झलक हमें निर्माण स्थल पर पहुंचते ही मिली। एक दस्ता तो किसी तरह गेट के अंदर दाखिल होने में कामयाब हो गया, लेकिन बाकी लोगों को गेट पर ही रोक दिया गया। एस कुमार्स कंपनी के प्रशासनिक अधिकारियों और गार्ड्स ने हमारे तमाम अनुरोध को दरकिनार कर अंदर दाखिल होने से साफ-साफ मना कर दिया। उनका सीधा तर्क था कि आप मीडियाकर्मी हैं तो क्या फिलहाल नर्मदा बचाओ आंदोलन के लोगों के साथ हैं, इसलिए अंदर जाने नहीं दिया जाएगा। उस समय तो सभी साथियों को बुरा लगा, लेकिन मुझे नर्मदा बचाओ आंदोलन की शक्ति की पहली झलक मिल गई थी। एक अहिंसक आंदोलन से ये खौफ साफ दर्शा गया कि एस कुमार्स कंपनी के लोगों का भरोसा कितना डिगा हुआ है और एनबीए के लोगों की पकड़ इलाके में कितनी मजबूत है।

महेश्वर डैम से हम सभी बैरंग लौटे और हमारी टोली पथराना गांव पहुंची। रास्ते में एक साथी ने नाराजगी में ये कहा कि डैम को बम लगाकर उड़ा देना चाहिए, एस कुमार्स के लोगों को मार-पीटकर बराबर कर देना चाहिए था, वगैरह-वगैरह। वो बिलकुल भन्नाया हुआ था, लेकिन बावजूद इसके मुझे उसकी ये राय नागवार गुजरी। ये चंद पलों का उफान क्या सालों से चले आ रहे किसी आंदोलन का विकल्प हो सकता है? खैर, गांव पहुंचे तो गांव के एक सज्जन ने कहा-“ अच्छा हुआ- आप लोगों ने झगड़ा नहीं किया, वरना आंदोलन का नाम खराब होता। ” मेरे लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन की कार्यशैली को लेकर खुश होने का ये दूसरा मौका था। ये बात उस गांव का एक शख्स बोल रहा था जो 13 सालों से अपने वजूद की, अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है। वो किसी उतावलेपन में नहीं है, वो अपने हक की लड़ाई को आड़ेचंद पलों में समेटना नहीं चाहता बल्कि उसकी लड़ने की ताकत अदम्य है, असीम है।

बहरहाल, रात का खाना हमने जिस घर में खाया, वहां बुजुर्गों से बात हुई। घर के युवाओं, माताओं-बहनों के बीच हमने करीब आधे घंटे से ज्यादा वक्त गुजारा। गांव उजड़ने की चिंता तो थी लेकिन उनके अंदर मुझे हताशा का वो भाव नहीं दिखा, जो मेरे अंदर इस गांव के डूबने की फिक्र से ही घर करने लगा था। इन लोगों ने बताया कि कैसे आधे घंटे की नोटिस पर पूरा गांव जमा हो जाता है। कैसे संघर्ष के लिए गांव-गांव फौरन खबर भेजी जाती है। कैसे मिल-जुलकर वो अपनी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं। घर के मुखिया ने बताया कि इस आंदोलन के दौरान वो कई बार जेल भी जा चुके हैं, लेकिन कभी भी वो प्रशासन के आगे गिरगिराकर या पैसे जमाकर अपनी जमानत नहीं करवाते, खुद ही जब जेल अधिकारियों या प्रशासन का जी भर जाता है उन्हें आजाद कर दिया जाता है। गांधी के सत्याग्रह की तरह अपनी बात पर डटे रहने का ये साहस नर्मदा बचाओ आंदोलन की एक और उपलब्धि नहीं तो क्या है?

चौपाल पर जब बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो गांव के लोगों ने आंदोलन से जुड़े तथ्यों को इतनी संजीदगी से रखा कि पत्रकारों की बोलती बंद हो गई। हर सवाल का मुकम्मल जवाब। गांव की गलियों से लेकर संसद के गलियारे तक नर्मदा बचाओ आंदोलन को लेकर क्या चल रहा है, इसकी पूरी डिटेल गांववालों के पास मौजूद थी। हाल में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश के दफ्तर से जारी चिट्ठी तक का हवाला इस चर्चा में दिया गया। गांववालों ने बताया कि ग्राम सभा ने पुनर्वास परियोजना में अनियमितता को लेकर प्रस्ताव पारित किया है और उसे सभी अधिकारियों और मंत्रियों तक पहुंचाया गया है। ये और बात है कि गांधी के नाम पर सत्ता सुख भोगने वाली पार्टी को ग्राम स्वराज का ये हस्तक्षेप रास नहीं आ रहा, लेकिन गांववालों को इसकी ताकत से रूबरू कराने वाले एनबीए को साधुवाद देने से आप खुद को कैसे रोक सकते हैं?

सूचना का अधिकार से लेकर ग्राम स्वराज तक हर मोर्चे पर एनबीए ने गांववालों को सशक्त किया और उनको आगे लाकर अपनी लड़ाई की कमान उनके हाथों में सौंपी है, इसका एहसास मुझे पहली बार पथराना के दौरे के बाद ही हुआ। बावजूद इसके कई सवाल मेरे और साथियों के मन में घुमड़ते रहे। 13 मार्च को मेधा पाटकर जब हम सभी से रूबरू हुईं तो सवालों की बौछार लग गई- नर्मदा बचाओ आंदोलन कोई परिणाम देने में कामयाब क्यों नहीं हुआ? क्या नर्मदा बचाओ आंदोलन को एस कुमार जैसी कंपनियों से पैसा मिलता है, ताकि प्रोजेक्ट डिले हो और उनकी कमाई का जरिया बना रहे। आदि-आदि। इन सभी सवालों का मेधाजी ने बिना किसी झिझक के जवाब दिया। पता नहीं मेरे साथी उन जवाबों से संतुष्ट हैं या नहीं, पर मुझे नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं और उसकी कार्यशैली ने काफी प्रभावित किया।

क्या आप इस बात से असहमत हो सकते हैं कि एनबीए ने गांववालों की लड़ाई लड़ने का ठेका नहीं लिया बल्कि हर गांव वाले को एक योद्धा की तरह अपनी लड़ाई लड़ने का हुनर सिखाया? क्या ये कोई उपलब्धि नहीं कि अपने हक की लड़ाई लड़ने वाले ये गांववासी आज किसी भी अधिकारी, राजनेता या मंत्री से आंख से आंख मिलाकर बात करने का साहस रखते हैं, इनका नैतिक बल उन पर भारी पड़ता है? क्या इस बात को नजरअंदाज किया जा सकता है कि नर्मदा के लोग अपने हक के लिए हर कुर्बानी को तैयार हैं? क्या ये हम सभी को शक्ति नहीं देता कि नर्मदा तट के जीवट लोगों में सालों की लड़ाई के बाद भी सालों लंबी लड़ाई का माद्दा अब भी बाकी है?

नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथियों ने नर्मदा के तट पर केवल प्रतिरोध खड़ा नहीं किया बल्कि प्रतिरोध की एक संस्कृति पैदा की है, जिसे नर्मदा पर बनने वाला कोई बांध नहीं बांध पाएगा, वो हर बांध के बावजूद अपनी गति से बहती रहेगी- हर सुबह, हर शाम। इस अनवरत धारा को शत शत सलाम।

सोमवार, 22 मार्च 2010

मीडिया के मानक और लोग

आम तौर पर यह कह दिया जाता है कि मीडिया के अब कोई मानक नहीं बचे तो इन पर बहस की गुंजाइश ही कहां बचती है। कुछ हद तक ये बात सही है, लेकिन क्या इसके उलट ऐसा नहीं लगता कि अब मानकों पर और ज्यादा गंभीरता से सोचने और विचारने की जरूरत आन पड़ी है। आप और हम सबसे ज्यादा मीडिया के बदलते मानकों से ही प्रभावित हो रहे हैं।

मीडिया के सैद्धांतिक मानकों और व्यावहारिक मानकों में काफी अंतर आ गया है। व्यावहारिक मानकों के कर्ता-धर्ता कामयाबी के शिखर पर खड़े हो जनता का मुंह चिढ़ा रहे हैं तो सैद्धांतिक मानकों के पक्षधर पाताल की खाइयों में खड़े जनता के हितों की दुहाई दे रहे हैं। इन दोनों के बीच अटका है 'लोग'। लोग, जो हर मानक के प्रयोग का आधार है। लोग, जो मानकों के नतीजों को प्रभावित करता है। लोग, जो चैनलों की टीआरपी तय करता है। लोग, जो अखबारों की प्रसार संख्या घटाने-बढ़ाने की शक्ति रखता है, लेकिन अफसोस उस लोग की भूमिका मीडिया के मानक तय करते वक्त कम से कमतर होती जा रही है।

बहरहाल, बात मीडिया की मानकों की करें तो सबसे बड़ा बदलाव तो ये है कि मानक-लोग, लोकहित से शिफ्ट कर गए हैं, अब बाजार और उपभोक्ता नए मानक बन गए हैं। नई परिभाषा-जो बाजार को भाए वही खबर है। जो मुनाफा दे, वही खबर है। जो विज्ञापनदाताओं के हितों का पोषण करे, वही खबर है। ऐसे में खबरों के मानक तय करने की शक्ति संपादकों के हाथ से फिसलकर मार्केटिंग डिवीजन के हाथ में जा रही है तो कैसा अचरज?

अब बात एक दो उदाहरणों से की जाए तो शायद परिदृश्य और स्पष्ट हो। विकास संवाद के मीडिया सम्मेलन के लिए इंदौर आ रहा था कि रास्ते में नई दुनिया का अखबार खरीदा। 12 मार्च 2010 की नई दुनिया की लीड खबर- अखबारों में छपने से कुछ नहीं होता। मध्यप्रदेश के आदिम जाति व अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री विजय शाह से जुड़ी खबर लीड बनी थी। मुद्दा बस इतना था कि मलगांव मेले में बेले डांस को लेकर मीडिया ने उन पर चौतरफा हमला किया तो वो भी मीडिया की औकात बनाने पर उतारू हो गये। मीडिया और मंत्रीजी की टशन में लीड खबर बन गई। यहां मानक न तो लोग था, न लोक हित। यहां दो सत्ता प्रतिष्ठानों के ईगो की लड़ाई थी। मीडिया की सत्ता को मंत्री ने चुनौती दी तो लीड खबर बन गई।

इसी क्रम में एक खबर मुझे पिछले दिनों बिहार के सीवान जिले (जीरादेई) के विधायक के ठुमके वाली ध्यान में आ रही है। इसे चैनल वालों ने बार-बार दिखाया। बार बालाओं के साथ ठुमके लगाते विधायक श्याम बहादुर सिंह के विजुअल में बड़ा दम था, बिकाउ था सो खूब चला। अगले दिन विधायक जी ने माफी मांगी- फिर वही डांस के विजुअल चले। तीसरे दिन श्याम बहादुर सिंह ने कहा- नाच कर मैंने कोई गलती नहीं की, मैं फिर ठुमके लगाऊंगा। खबर तीसरी बार भी चली- क्योंकि खबर से ज्यादा दम और रस बार बालाओं के ठुमकों में था। मीडिया में ऐसे में कई बार विधायक या मंत्रीजी के हाथ का एक खिलौना बस नजर आता है। वो जब चाहें खबर चलवा लें। आप ऊपर के दो उदाहरणों में खुद ही तय करें कि खबर के मानक क्या हैं?

तमिलनाडु पत्रकार यूनियन ने पेड न्यूज को लेकर एक सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण के मुताबिक लोकसभा चुनावों के दौरान तमिलनाडु के अखबारों ने पेड न्यूज के नाम पर 350 करोड़ रुपयों का वारा-न्यारा किया। लोक सभा चुनावों में राजनेताओं और राजनीतिक दलों से मार्केटिंड डिवीजन ने डील की और खबरें धड़ल्ले से छपती रहीं। कभी-कभी तो एक ही संस्करण में एक ही क्षेत्र के दो प्रतिद्वंद्वियों को एक साथ कागज में जिता दिया गया। लोगों और लोक हित के लिहाज से उम्मीदवारों का विश्लेषण नहीं हुआ, पैसों के लिहाज से हार-जीत तय हो गई।

मार्च महीने (2010) में कुछ संगठनों ने प्रेस क्लब में एक प्रेस वार्ता रखी। इस प्रेस वार्ता में जस्टिस राजेंद्र सच्चर, अरुंधति राय समेत कई लोगों ने अपनी बात रखी। अरुंधति राय ने इस बात पर हैरानी जाहिर की कि मीडिया नक्सलवाद के मामले में सरकारी वर्जन को ही अंतिम मानकर खबरों का प्रसारण कर रहा है। इतना ही नहीं, दूर-दराज के इलाकों के उन सभी जन संगठनों को नक्सलवादियों की कतार में खड़ा कर दिया गया है जो जनता के हितों की बात करते हैं। जहां मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए वहां वो अगर सरकार के हाथ की कठपुतली बन जाए तो फिर कहना ही क्या?

ऐसे में मानकों का सवाल बार-बार उठता है और जरूरी भी है, लेकिन सवाल है कि क्या इन मानकों को कोई मानेगा? जिन लोगों ने मीडिया के मानकों को दफन कर दिया है क्या वो फिर से मानकों की रूह को कब्र से बाहर आने देंगे?

पशुपति शर्मा
मीडियाकर्मी
9868203840

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

बेटी, औरत और दादी

१) बेटी
कोई पैमाना नहीं है
जो बेटे के मुकाबले
घटा बड़ा कर
नापी जाए।

२) औरत
कोई मर्द की नाक नहीं है
जो इज्जत के हिसाब से
जोड़ काट कर
रखी जाए

३) दादी
कोई फ्रेम में लगी फोटो नहीं है
जिसे दीवार पर सजाओ
फिर अपनी सहूलियत से
चाहो तो देखो या न देखो।
शिरीष खरे
Shirish KhareC/0- Child Rights and You189/A, Anand EstateSane Guruji Marg(Near Chinchpokli Station)Mumbai-400011

शनिवार, 26 दिसंबर 2009

एक जवाब के लिए

वह वहीं थी
पर किसी की नजर उस पर नहीं थी।
कई सारी परछाइयों के बीचोंबीच
एक परछाई सी थी वह।
यह बहुत पहले की बात है
इतनी कि तब दिन की रौशनी नहीं थी।
इतनी कि तब किसी रंग के लिबास में
लिपटी नहीं थी वह।
एक रोज़ सूरज को तो निकलना ही था
उसके निकलते ही पहाड़ों से जा टकराई और
दुनिया के पहले चित्र सी बन गई वह।
उसका शरीर कुदरत का हिस्सा था
जो कई सारे रिक्त स्थानों से भरा था
फिर पता नहीं किसने हांड मांस से भर दिया उसको
उसकी आँखों को किसने आकार दे दिया।
किसने होठ खीच दिए।
किसने गोल माथे को देखकर बिंदी चिपका दी।
फिर माला, सिन्दूर और देखते ही देखते
जिसको जो लगा वो वो
उसके अंगों पर चिपकाता गया।
इन सबके बीच
क्या कोई ऐसा भी था जिसने उसकी आँखों में
उसकी ख़ुशी, उसके सपने, उसकी ख्वाहिश देखी थी ?
जिसने उससे कहा हो कि
अगर यह चीजें तुम्हे भारी लगती हो तो
उतार क्यों नहीं फेंकती
उड़ क्यों नहीं जाना चाहती
जहां चाहे इस जहान में....
तब से अब से
या कब कब से
कितनी कितनी औरतें
सिर्फ इतना भर सुनने के लिए खड़ी रही हैं ?
- शिरीष खरे
Shirish KhareC/0- Child Rights and You189/A, Anand EstateSane Guruji Marg(Near Chinchpokli Station)Mumbai-400011

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

     गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

नायकों का हमेशा सम्मान होता है और देश के आत्माभिमान के लिए यह जरूरी भी है। लेकिन जब नायक आलोचना से परे हो जाते हैं या यूं कहा जाए कि आलोचना से परे कर दिये जाते हैं, तब उनकी अभ्यर्थना होने लगती है। वे नायक से महानायक और महानायक से अवतार हो जाते हैं। जैसे ही कोई नायक अवतार का दर्जा पाता है । देश अंधभक्ति में डूब जाता है। उसकी शख्सियत का कमजोर पहलू भी वंदना और अभिनंदन के शोर में अनसुना रह जाता है। वह महानतम हो जाता है, जैसा कि अभी सचिन तेंदुलकर के साथ हो रहा है। वे अब हमारे लिए महानतम हैं। हमारे देश ने उन्हें क्रिकेट का भगवान बना दिया है। उनकी छोटी सी आलोचना से हम तिलमिला जाते हैं। पिछले बीस वर्षों से वे क्रिकेट खेल रहे हैं। फिलहाल जिस मुकाम पर खड़े हैं वहां से उनके लिए हर रोज एक नयी मंजिल का रास्ता खुलता हैं। उनके बनाए रनों से कीर्तिमानों का एक शिखऱ सा खड़ा होता जा रहा है। लेकिन य़ह जरूरी नहीं कि जिसने कीर्तिमानों का पहाड़ खड़ा किया, वही महानतम है। उन्हें महानतम कहने से पहले क्रिकेट के इतिहास की सूक्ष्म पड़ताल जरूरी है। मौजूदा समय के शोर में दब चुके इतिहास के महानायकों से सचिन की भिड़ंत करानी होगी। तेंदुलकर को डब्ल्यूजी ग्रेस, सर डॉन ब्रैडमेन, सर गारफील्ड सोबर्स, एवॉटन वीक्स, वॉरेल, वॉलकॉट, वॉली हैमंड,ग्रीम पोलक, सर लेन हटन, सुनील गावस्कर, विवियन रिचर्ड्स और ब्रायन लारा के बरक्स देखना होगा। इस कड़ी में कई और नाम जोड़े जा सकते हैं। लेकिन ऐसा करना जरूरी नहीं है। तेंदुलकर उस दौर में क्रिकेट खेलने आए जब सुनील गावस्कर एक बेजोड़ करियर को अलविदा कह चुके थे। 1989 में पाकिस्तान के दौरे से उनके अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत हुई । शुरुआत धमाकेदार थी। सोलह वर्ष की उम्र में एक सुनहरे भविष्य की चमक साफ नजर आ रही थीं। सचिन बढ़ते चले गए। इंग्लैंड में टेस्ट क्रिकेट का पहला शतक लगाया। फिर शतकों का सिलसिला सा चल पड़ा जो अब तक जारी है और जब वे विदा होंगे तो शायद रनों की अभेद्य दीवार खड़ी होगी। लेकिन बल्लेबाज सिर्फ इसलिए महानतम नहीं होता कि उसने अपने जीवन में सबसे ज्यादा शतक लगाए या सबसे ज्यादा रन बनाए। सर डॉन ब्रैडमेन इसके अपवाद हैं। उनका बल्ला तो शायद मैदान पर गेंदबाजों को रौंदने के लिए ही बना था। बावन टेस्ट मैचों में उन्होंने जिस रफ्तार से और जिस अंदाज से रन बनाए वो इतिहास है। बल्लेबाजी के हर पैमाने को वे तोड़ते चले गए और नये पैमाने बनाते गए। सबसे बड़ी बात यह कि उनसे जब भी टीम ने उम्मीद की, वे उस उम्मीद से कहीं ज्यादा देकर गए। वे आज भी क्रिकेट की दुनिया के अपराजेय़ योद्धा हैं । सचिन ने भी अपनी जिन्दगी में बड़ी पारियां खेलीं हैं। अब तक तैतालीस शतक लगा चुके हैं लेकिन कोई तिहरा शतक नहीं लगाया है। उनका सर्वश्रेष्ठ दो सौ अड़तालीस बाग्लांदेश के खिलाफ है और फिर दो सौ बयालीस ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ। उन्होंने इतने लंबे करियर में सिर्फ चार डबल सेंचुरी लगाई है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सचिन किसी भी एक श्रृखंला में दो से ज्यादा शतक नहीं लगा सके और पांच सौ रनों का आंकड़ा तक नहीं छू सके। (यह बात हैरान करती हैं)। जब भी महान बल्लेबाजों की बात छिड़ती है तो ऐसे बल्लेबाजों की लंबी चौड़ी सूची तैयार हो जाती हैं जिन्होंने अपने बल्ले की धमक से कई श्रृंखलाओं में सामने खड़ी टीम पर राज किया है । ब्रैडमेन के अलावा सोबर्स,ग्रीम पोलक, लेन हटन, रिचर्ड्स,गावस्कर लारा, कई नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपनी बेहतरीन पारियों से सामने वाली टीम को पानी पिलाया है। और पूरी श्रृंखला में रनों का दरिया बहा दिया है। 1976 में विवियन रिचर्ड्स ने इंग्लैंड के खिलाफ चार मैचों में एक सौ अठारह के औसत से आठ सौ उनत्तीस रन बनाए। जिसमें तीन शतक शामिल हैं। उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर दो सौ इक्य़ानवे था। वेस्टइंडीज के ही थ्री ड्बल्यूज के नाम से मशहूर बल्लेबाज़ों में से एक वॉलकॉट ने 1954-55 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पांच मैचों में आठ सौ सत्ताइस रन बनाए,जिसमें पांच शतक भी शामिल थे । सोबर्स और लारा तो इस मामले में शहंशाह हैं। सोबर्स ने एक श्रृंखंला में एक बार आठ सौ से ज्यादा, दो बार सात सौ से ज्यादा, दो बार छह सौ से ज्यादा और दो बार-पांच सौ से ज्यादा रन बनाए हैं। जबकि लारा ने 1994-95 में इंग्लैंड के खिलाफ पांच मैचों की श्रृंखला में सात सौ अट्ठानवे रन बनाए जिसमें उनकी तीन सौ पचहत्तर रनों की महान पारी भी शामिल थी। कुला मिलाकर लारा ने एक श्रृंखला में दो बार सात सौ रनों का आंकड़ा पार किया है। दो बार सात सौ के करीब पहुंचे हैं और तीन बार पाच सौ रनों को पार किया है। इस मामले में गावस्कर सचिन से मीलों आगे हैं । गावस्कर दो बार सात सौ का आंकड़ा और कई बार एक ही सीरीज में पांच सौ से छह सौ रनों के पार जा चुके हैं । जबकि द्रविड़ दो बार छह सौ का आंकड़ा पार कर चुके हैं। जबकि सचिन का किसी एक श्रृंखला में अब तक का सर्वाधिक स्कोर चार सौ तिरानवे है। 2007-08 में आस्ट्रेलिया में उन्होंने दो शतकों के साथ ये रन बनाए थे। ऐसे भारतीय बल्लेबाजों की सूची भी बड़ी है जिन्होने अपने बल्ले के जोर से किसी खास श्रृंखला पर अपना झंडा लहराया है। ये तर्क भी जायज है कि सिर्फ एक सीरीज में रनों का अंबार लगा देना महानता का पैमाना नहीं है। लेकिन हर महान बल्लेबाज ने ऐसा किया है तो फिर पैमाना बनता है। दिलचस्प है कि सचिन अपने करियर में ऐसा कोई कारनामा करने से चूक गए हैं। सचिन को मास्टर ब्लास्टर का तमगा तो हासिल है लेकिन जरा सच पर गौर फऱमाइंये। टेस्ट क्रिकेट में एक दिन में सबसे बड़ा स्कोर करने वाले सौ खिलाड़िय़ों की सूची से सचिन गायब हैं। डॉन ब्रैडमैन ने एक ही दिन में तिहरा शतक लगा दिया था। इस सूची में ब्रैडमेन, लारा, रिचर्ड्स, वॉली हैमंड, सोबर्स जैसों की पारियां भरी पड़ी हैं। वीरेन्द्र सहवाग भी यहां अपनी जगह बना चुके हैं। हैरानी की बात ये है कि भारतीय बल्लेबाजों की सूची भी उन्हें जगह नहीं देती। एक दिन में सर्वाधिक रन की छह पारियों में चार वीरू के नाम हैं, एक द्रविड़ के नाम और एक पारी किसी और बल्ले से निकली है। वनडे का भी कुछ यही हाल है। सबसे तेज शतक लगाने वाले बल्लेबाजों में सचिन छब्बीसवें पायदान पर हैं। फिर सचिन मास्टर ब्लास्टर कैसे हुए? ये आकंड़े साबित करते हैं कि टेस्ट क्रिकेट में भले ही सचिन ने खूब शतक लगाए लेकिन गेंदबाज़ों पर वैसा दबदबा कभी कायम नहीं कर सके जैसा ऊपरोक्त बल्लेबाज़ों ने किया है। साथ ही महानता के हगामे में कुछ ऐसी बातें उनके खाते में जुड़ गई हैं जिन पर उनका हक नहीं है। सचिन ने क्रिकेट के दोनों ही फॉरेमैट में रनों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। लेकिन उनके जीवन में ऐसे बेशुमार मौके आए जब वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। जब भी देश ने सचिन में एक उत्तरदायी बल्लेबाज की छवि देखनी चाही, वे धड़ाम से गिरे । और भारत के करोड़ों क्रिकेट दीवानों के चेहरे पर नाकामी का तमाचा पड़ा। सचिन ने कई मौकों पर देश को जीत का रास्ता दिखाया या इज्जत बचाई लेकिन इतने लंबे करियर में ऐसे मौके बहुत कम आए। वे रन बनाते गए। टीम को सम्मानजनक स्कोर तक भी ले गए। ऐसा कभी कभार ही हुआ, जब उन्होंने अपने बूते मैदान पर उतरकर फतह दिलाई। शारजाह की दो पारियां और बीस साल के के सफऱ में उनकी गिनी चुनी पारिय़ां अपवाद हैं। जब माइक आर्थर्टन ने हाल में ये कहा कि सचिन को महानतम कहना ठीक नहीं तो तमाम न्यूज चैनल बौखला गए। उन्होंने इतिहास के कुछ पन्नों को पलट कर सचिन की क्षमता का आकलन किया था और ये पूछा था कि जब बॉडीलाइन सीरीज हुई या जब लोग बिना हेलमेट के बल्लेबाजी करते थे, तब सचिन होते तो उनका प्रदर्शन कैसा होता। वैसे इस तर्क में कोई दम नहीं है कि ऐसा होता तो क्या होता। लेकिन यह सवाल दिलचस्प जरूर है । जब हम उन्हें महानतम कहते हैं तो इतिहास में हमें झांकना होगा। क्रिकेट के मुश्किल दौर के ताप में सचिन को जलना होगा। एक ऐसी अग्निपरीक्षा के सवालों से जूझना होगा जिनका सामना उन्होंने किया ही नहीं। जब आर्थर्टन ऐसा कह रहे हैं तो इस सच से पर्दा उठाना भी जरूरी है कि सचिन ने अपने जीवन में क्रिकेट के महानतम गेंदबाज़ों को नहीं खेला। यहां तेज गेंदबाजों का जिक्र हो रहा है। शेन वार्न उसके अपवाद हैं। सचिन का उदय हुआ तो वेस्ट इंडीज के खौफनाक गेदबाजों का करियर अस्त हो चुका था। होल्डिंग, क्राफ्ट, गार्नर, एंडी रॉबर्ट्स और मार्शल का उन्होंने अपने जीवन में कभी सामना नहीं किया। वसीम अकरम और वकार को उनके उफान पर नहीं झेला क्योंकि 1989 की श्रृंखला के बाद 1999 तक भारत-पाक के बीच कोई टेस्ट सीरीज नहीं खेली गई। इसके बावजूद टेस्ट क्रिकेट में पाकिस्तान के खिलाफ उनका औसत महज पैंतीस का है।ऑस्ट्रेलिया के डेनिस लिली, ज्यॉफ थॉमसन की छाय़ा भी उनके बल्ले पर नहीं पड़ी। रिचर्ड हेडली, बॉथम, इमरान को उनके ढलान पर खेला। हालांकि उन्होंने डोनाल्ड, मैक्ग्रा ब्रेट ली और शोएब अख्तर को झेला लेकिन गिनी चुनी पारियों को छोड़कर कभी उन पर दबदबा कायम नहीं कर सके । (जिस तरह से गावस्कर ने वेस्टइंडीज के महानतम गेंदबाजों पर किया था)। सबसे बड़ी बात यह कि इनमें से मैक्ग्रा और शायद ली को छोड़कर शोएब और डोनाल्ड उस कोटि के गेंदबाज हैं ही नहीं जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। आर्थर्टन का तर्क भी कुछ इसी लाइन पर था। यह कोई साजिश नहीं कि विस्डन ने लंबे समय तक इतिहास की सौ महानतम पारियों में सचिन की किसी टेस्ट पारी को शुमार नहीं किया था। जबकि इस लिस्ट में ब्रैडमेन, सोबर्स, वॉली हैमंड, सर लेन हटन गावस्कर, लारा, रिचर्ड्स समेत तमाम लोगों की कई पारियां शामिल हैं। अगर ये पक्षपात या ज्यादती थी तब भी इतने लंबे करियर में उनकी पांच पारियां तो ऐसी होनी ही चाहिये थी जिनकी चमक के आगे विस्डन की सूची बनाने वालों की आखें चुंधिया जातीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सचिन ने टेस्ट क्रिकेट में बेशुमार रन बनाए। पर मैदान पर विपक्ष को उस तरह से ध्वस्त नहीं कर सके, जिस तरह से ब्रैडमेन,सोबर्स, लारा, वॉली हैमंड, जैसे बल्लेबाजों ने कई मर्तबा किया। उन्होंने अपने जीवन में ऐसी गिनी चुनी टेस्ट पारियां खेली हैं जिसमें शुरू से आखिर तक उनके बल्ले ने आग उगली। उन्होंने आक्रामक शॉट्स भी खेले तो बहुत संभल कर। उन्होंने हमेशा अपनी पारी को सलीके से गढ़ने की कोशिश की। उन पारियों में झंझा का वेग नहीं था और शायद झरने का प्रवाह भी नहीं। टेस्ट की कई पारिय़ों में उन्होंने आक्रामक होने की कोशिश की तो उन्हें पवेलियन लौटना पड़ा। रनों के अंबार के साथ उनके क्रिकेट करियर का एक पक्ष इतना चमकीला है कि दूसरे महान बल्लेबाज़ों की आभा फीकी पड़ने का भ्रम होने लगा है। बेशक वे रनों और शतकों के शिखर पर हैं। उनकी बल्लेबाजी में निरंतरता भी है लेकिन एक बहुत बड़ा खालीपन हैं जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। सचिन रिकॉर्ड की सबसे ऊंची चोटी पर जरूर खड़े हैं, सबसे दुर्गम चोटी पर कतई नहीं। यहां उनकी प्रतिभा पर शक नहीं किया जा रहा। इतने महान करियर को गढ़ने वाला बल्लेबाज जाहिर तौर पर असाधारण होगा लेकिन उन्हें महानतम कहना जरा जल्दबाजी है । य़ह उन बल्लेबाज़ों के साथ ज्यादती भी है जिन्होंने कभी अपने बल्ले से क्रिकेट के मैदान पर राज किया है। हम सचिन की मुक्त कंठ से तारीफ करें लेकिन उन्हें भगवान न बनाएं तो बेहतर क्योंकि क्योकि क्रिकेट के इस तथाकथित भगवान की वंदना अब कर्कश शोर में तब्दील हो गई हैं।
देवांशु कुमार झा
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