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मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

देश से बड़े नहीं सचिन तेंदुलकर




दक्षिण अफ्रीका के सेंचुरियन मैदान पर सचिन तेंदुलकर टेस्ट क्रिकेट में शतक की ओर बढ़ रहे थे और टेलिविजन मीडिया का विवेक विहीन उन्माद उफान पर था। चैनल में उत्सव की तैय़ारी शुरू हो गई थी। महान, महानतम, ब्रैडमैन का बाप, क्रिकेट का भगवान न जाने कितने ही जुमले हवा में उछाले जा रहे थे। मूर्तिपूजा में अंधा हो चुका नायकों से रिक्त हमारा समाज सचिन में अपना नायक देख रहा था, पिछले कई सालों से देखता आ रहा है और आने वाली नस्लें भी देखती रहेंगी। लेकिन एक सत्य जो सामने चीख-चीख कर इस उत्सव का मजाक उड़ा रहा था, उसे देखने और अफसोस जताने की चिंता किसी को नहीं थी।
 
वो सत्य दक्षिण अफ्रीका की जमीन पर भारतीय  टीम की शर्मनाक हार के रूप में पहले भी कई मर्तबा प्रकट हो चुका है। इस बार भी सामने था लेकिन सचिन रमेश तेंदुलकर के पचासवें शतक की प्रतीक्षा में अधीर लोग भला हार की ओर क्यों ध्यान देते। वैसे भी जब क्रिकेट और फिल्मों के नायक देश से बड़े हो जाएं तो राष्ट्र के अपमान और सम्मान का प्रश्न अपनी प्रासंगिकता खो देता है। यहां ऐसा ही हो रहा है। सचिन तेंदुलकर ने शतक जमाया। तालियों के शोर में सब डूब गए और दूसरी ओर से भारतीय टीम पर छाया हार का संकट धोनी के आउट होने के साथ ही गहराता  चला गया।
 
टीवी चैनल्स के तमाम तय कार्यक्रम रद्द हो चुके थे। हर चैनल पर बस सचिन थे। कहीं भगवान बनकर तो कहीं महानायक , कही महासेंचुरियन बनकर तो कहीं पचास मार खां।
 
एक टीवी चैनल ने तो हद ही कर दी। वैसे वो चैनल स्वनामधन्य है। वहां बड़े महान अंग्रेजीदां पत्रकार हैं। वैचारिक तौर पर वामपंथी, सत्य़ दिखाने वाले। वहां एक वरिष्ठ समाचार वाचक सचिन का गुणगान करने में लगे थे। तेंदुलकर के प्रशस्ति गान में डूबी उनकी वाणी दर्प से चूर थी। ऐसा आभास हो रहा था कि महाशक्ति बनने से बस फर्लांग भर की दूरी पर खड़ा है भारत। तभी टीवी स्कीन पर अचानक एक संदेश चस्पा हो गया।
 
 जिस पर लिखा था---
जेनरेशंस टू कम विल स्कार्स बिलीव दैट सच ए मैन एज़ दिस एवर इन फ्लेश एन्ड ब्लड वॉक्ड अपोन दिस अर्थ..
 
अलबर्ट आइन्सटीन
 
 ये संदेश बिना किसी प्रस्तावना के टीवी स्क्रीन पर आया और कुछ देर रुक कर विलुप्त हो गया।  बताने की जरूरत नहीं है कि ये बातें आइन्सटीन ने महात्मा गांधी के बारे में कही थीं। लेकिन भावुक पत्रकार ने सोचा होगा कि गांधी तो बीते जमाने के हो गए अब इस दौर में तो सचिन ही इस श्रद्धाभाव के हकदार हैं। आने वाली पीढ़ियां वाकई य़े सोचकर हैरान होंगी कि हाड़ मांस का बना कोई ऐसा इंसान कभी इस धऱती पर मौजूद था। 
 
अब जरा सोचिए कि नायक की परिभाषा और पहचान कैसे बदल गई। गांधी और तेंदुलकर एक ही तराजू पर तौले जा रहे हैं। भ्रष्टाचारियों के आतंक से त्रस्त भारत अब कभी सचिन रमेश तेंदुलकर में अपना नायक देखता है, तो कभी अमिताभ, शाहरुख और आमिर खान में। कभी अंबानी, कभी अजीम प्रेमजी भी नायक बन जाते हैं ।
 
 इस पूरे टेस्ट मैच में भारत की शर्मनाक हार कभी मुद्दा नहीं रही। मुद्दा ये रहा कि सचिन निजी कीर्तिमान को और कितनी ऊंचाई पर ले जा सकते हैं। वैसे उनके कीर्तिमान जब देश के काम ही न आ सकें तो व्यर्थ हैं ।
 
 ऐसे पहली बार नहीं हुआ है। कई मर्तबा सचिन को शतक बनाते हुए देखने के लिए विकल हमारी ये पीढ़ी देश की विजय या पराजय का प्रश्न भूल जाती है। इसके लिए बहुत हद तक मीडिया जिम्मेदार है। मीडिया ने उन्हें भगवान का दर्ज दे दिया है और क्रिकेट परोसने वाले चैनल उनके कीर्तिमानों से सम्मोहित हो चुके हैं।
 
 खेल के नाम पर उन्हें सिर्फ क्रिकेट दिखता है और क्रिकेट के नाम पर सिर्फ सचिन। अगर कीर्तिमानों की ही बात है तो इसी टेस्ट के दौरान राहुल द्रविड़ 12000 रन का आंकड़ा छूने वाले  दुनिया के तीसरे बल्लेबाज बन गए लेकिन उन्हें कौन पूछता है।
 
ये अंधभक्ति अब कुंठित सोच में तब्दील होती जा रही है। सचिन रमेश तेंदुलकर की महानता से भला कौन इन्कार करता है लेकिन वो देश से बड़े नहीं है। उनकी उपस्थिति इस देश से है। पहले देश है फिर सचिन तेंदुलकर हैं। अगर देश शर्मनाक हार के कगार पर है तो सचिन की व्यक्तिगत उपलब्धियां खुशी का मौका नहीं हैं।
 
देवांशु कुमार, एसोसिएट एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर, न्यूज 24, 9818442690

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

     गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

नायकों का हमेशा सम्मान होता है और देश के आत्माभिमान के लिए यह जरूरी भी है। लेकिन जब नायक आलोचना से परे हो जाते हैं या यूं कहा जाए कि आलोचना से परे कर दिये जाते हैं, तब उनकी अभ्यर्थना होने लगती है। वे नायक से महानायक और महानायक से अवतार हो जाते हैं। जैसे ही कोई नायक अवतार का दर्जा पाता है । देश अंधभक्ति में डूब जाता है। उसकी शख्सियत का कमजोर पहलू भी वंदना और अभिनंदन के शोर में अनसुना रह जाता है। वह महानतम हो जाता है, जैसा कि अभी सचिन तेंदुलकर के साथ हो रहा है। वे अब हमारे लिए महानतम हैं। हमारे देश ने उन्हें क्रिकेट का भगवान बना दिया है। उनकी छोटी सी आलोचना से हम तिलमिला जाते हैं। पिछले बीस वर्षों से वे क्रिकेट खेल रहे हैं। फिलहाल जिस मुकाम पर खड़े हैं वहां से उनके लिए हर रोज एक नयी मंजिल का रास्ता खुलता हैं। उनके बनाए रनों से कीर्तिमानों का एक शिखऱ सा खड़ा होता जा रहा है। लेकिन य़ह जरूरी नहीं कि जिसने कीर्तिमानों का पहाड़ खड़ा किया, वही महानतम है। उन्हें महानतम कहने से पहले क्रिकेट के इतिहास की सूक्ष्म पड़ताल जरूरी है। मौजूदा समय के शोर में दब चुके इतिहास के महानायकों से सचिन की भिड़ंत करानी होगी। तेंदुलकर को डब्ल्यूजी ग्रेस, सर डॉन ब्रैडमेन, सर गारफील्ड सोबर्स, एवॉटन वीक्स, वॉरेल, वॉलकॉट, वॉली हैमंड,ग्रीम पोलक, सर लेन हटन, सुनील गावस्कर, विवियन रिचर्ड्स और ब्रायन लारा के बरक्स देखना होगा। इस कड़ी में कई और नाम जोड़े जा सकते हैं। लेकिन ऐसा करना जरूरी नहीं है। तेंदुलकर उस दौर में क्रिकेट खेलने आए जब सुनील गावस्कर एक बेजोड़ करियर को अलविदा कह चुके थे। 1989 में पाकिस्तान के दौरे से उनके अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत हुई । शुरुआत धमाकेदार थी। सोलह वर्ष की उम्र में एक सुनहरे भविष्य की चमक साफ नजर आ रही थीं। सचिन बढ़ते चले गए। इंग्लैंड में टेस्ट क्रिकेट का पहला शतक लगाया। फिर शतकों का सिलसिला सा चल पड़ा जो अब तक जारी है और जब वे विदा होंगे तो शायद रनों की अभेद्य दीवार खड़ी होगी। लेकिन बल्लेबाज सिर्फ इसलिए महानतम नहीं होता कि उसने अपने जीवन में सबसे ज्यादा शतक लगाए या सबसे ज्यादा रन बनाए। सर डॉन ब्रैडमेन इसके अपवाद हैं। उनका बल्ला तो शायद मैदान पर गेंदबाजों को रौंदने के लिए ही बना था। बावन टेस्ट मैचों में उन्होंने जिस रफ्तार से और जिस अंदाज से रन बनाए वो इतिहास है। बल्लेबाजी के हर पैमाने को वे तोड़ते चले गए और नये पैमाने बनाते गए। सबसे बड़ी बात यह कि उनसे जब भी टीम ने उम्मीद की, वे उस उम्मीद से कहीं ज्यादा देकर गए। वे आज भी क्रिकेट की दुनिया के अपराजेय़ योद्धा हैं । सचिन ने भी अपनी जिन्दगी में बड़ी पारियां खेलीं हैं। अब तक तैतालीस शतक लगा चुके हैं लेकिन कोई तिहरा शतक नहीं लगाया है। उनका सर्वश्रेष्ठ दो सौ अड़तालीस बाग्लांदेश के खिलाफ है और फिर दो सौ बयालीस ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ। उन्होंने इतने लंबे करियर में सिर्फ चार डबल सेंचुरी लगाई है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सचिन किसी भी एक श्रृखंला में दो से ज्यादा शतक नहीं लगा सके और पांच सौ रनों का आंकड़ा तक नहीं छू सके। (यह बात हैरान करती हैं)। जब भी महान बल्लेबाजों की बात छिड़ती है तो ऐसे बल्लेबाजों की लंबी चौड़ी सूची तैयार हो जाती हैं जिन्होंने अपने बल्ले की धमक से कई श्रृंखलाओं में सामने खड़ी टीम पर राज किया है । ब्रैडमेन के अलावा सोबर्स,ग्रीम पोलक, लेन हटन, रिचर्ड्स,गावस्कर लारा, कई नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपनी बेहतरीन पारियों से सामने वाली टीम को पानी पिलाया है। और पूरी श्रृंखला में रनों का दरिया बहा दिया है। 1976 में विवियन रिचर्ड्स ने इंग्लैंड के खिलाफ चार मैचों में एक सौ अठारह के औसत से आठ सौ उनत्तीस रन बनाए। जिसमें तीन शतक शामिल हैं। उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर दो सौ इक्य़ानवे था। वेस्टइंडीज के ही थ्री ड्बल्यूज के नाम से मशहूर बल्लेबाज़ों में से एक वॉलकॉट ने 1954-55 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पांच मैचों में आठ सौ सत्ताइस रन बनाए,जिसमें पांच शतक भी शामिल थे । सोबर्स और लारा तो इस मामले में शहंशाह हैं। सोबर्स ने एक श्रृंखंला में एक बार आठ सौ से ज्यादा, दो बार सात सौ से ज्यादा, दो बार छह सौ से ज्यादा और दो बार-पांच सौ से ज्यादा रन बनाए हैं। जबकि लारा ने 1994-95 में इंग्लैंड के खिलाफ पांच मैचों की श्रृंखला में सात सौ अट्ठानवे रन बनाए जिसमें उनकी तीन सौ पचहत्तर रनों की महान पारी भी शामिल थी। कुला मिलाकर लारा ने एक श्रृंखला में दो बार सात सौ रनों का आंकड़ा पार किया है। दो बार सात सौ के करीब पहुंचे हैं और तीन बार पाच सौ रनों को पार किया है। इस मामले में गावस्कर सचिन से मीलों आगे हैं । गावस्कर दो बार सात सौ का आंकड़ा और कई बार एक ही सीरीज में पांच सौ से छह सौ रनों के पार जा चुके हैं । जबकि द्रविड़ दो बार छह सौ का आंकड़ा पार कर चुके हैं। जबकि सचिन का किसी एक श्रृंखला में अब तक का सर्वाधिक स्कोर चार सौ तिरानवे है। 2007-08 में आस्ट्रेलिया में उन्होंने दो शतकों के साथ ये रन बनाए थे। ऐसे भारतीय बल्लेबाजों की सूची भी बड़ी है जिन्होने अपने बल्ले के जोर से किसी खास श्रृंखला पर अपना झंडा लहराया है। ये तर्क भी जायज है कि सिर्फ एक सीरीज में रनों का अंबार लगा देना महानता का पैमाना नहीं है। लेकिन हर महान बल्लेबाज ने ऐसा किया है तो फिर पैमाना बनता है। दिलचस्प है कि सचिन अपने करियर में ऐसा कोई कारनामा करने से चूक गए हैं। सचिन को मास्टर ब्लास्टर का तमगा तो हासिल है लेकिन जरा सच पर गौर फऱमाइंये। टेस्ट क्रिकेट में एक दिन में सबसे बड़ा स्कोर करने वाले सौ खिलाड़िय़ों की सूची से सचिन गायब हैं। डॉन ब्रैडमैन ने एक ही दिन में तिहरा शतक लगा दिया था। इस सूची में ब्रैडमेन, लारा, रिचर्ड्स, वॉली हैमंड, सोबर्स जैसों की पारियां भरी पड़ी हैं। वीरेन्द्र सहवाग भी यहां अपनी जगह बना चुके हैं। हैरानी की बात ये है कि भारतीय बल्लेबाजों की सूची भी उन्हें जगह नहीं देती। एक दिन में सर्वाधिक रन की छह पारियों में चार वीरू के नाम हैं, एक द्रविड़ के नाम और एक पारी किसी और बल्ले से निकली है। वनडे का भी कुछ यही हाल है। सबसे तेज शतक लगाने वाले बल्लेबाजों में सचिन छब्बीसवें पायदान पर हैं। फिर सचिन मास्टर ब्लास्टर कैसे हुए? ये आकंड़े साबित करते हैं कि टेस्ट क्रिकेट में भले ही सचिन ने खूब शतक लगाए लेकिन गेंदबाज़ों पर वैसा दबदबा कभी कायम नहीं कर सके जैसा ऊपरोक्त बल्लेबाज़ों ने किया है। साथ ही महानता के हगामे में कुछ ऐसी बातें उनके खाते में जुड़ गई हैं जिन पर उनका हक नहीं है। सचिन ने क्रिकेट के दोनों ही फॉरेमैट में रनों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। लेकिन उनके जीवन में ऐसे बेशुमार मौके आए जब वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। जब भी देश ने सचिन में एक उत्तरदायी बल्लेबाज की छवि देखनी चाही, वे धड़ाम से गिरे । और भारत के करोड़ों क्रिकेट दीवानों के चेहरे पर नाकामी का तमाचा पड़ा। सचिन ने कई मौकों पर देश को जीत का रास्ता दिखाया या इज्जत बचाई लेकिन इतने लंबे करियर में ऐसे मौके बहुत कम आए। वे रन बनाते गए। टीम को सम्मानजनक स्कोर तक भी ले गए। ऐसा कभी कभार ही हुआ, जब उन्होंने अपने बूते मैदान पर उतरकर फतह दिलाई। शारजाह की दो पारियां और बीस साल के के सफऱ में उनकी गिनी चुनी पारिय़ां अपवाद हैं। जब माइक आर्थर्टन ने हाल में ये कहा कि सचिन को महानतम कहना ठीक नहीं तो तमाम न्यूज चैनल बौखला गए। उन्होंने इतिहास के कुछ पन्नों को पलट कर सचिन की क्षमता का आकलन किया था और ये पूछा था कि जब बॉडीलाइन सीरीज हुई या जब लोग बिना हेलमेट के बल्लेबाजी करते थे, तब सचिन होते तो उनका प्रदर्शन कैसा होता। वैसे इस तर्क में कोई दम नहीं है कि ऐसा होता तो क्या होता। लेकिन यह सवाल दिलचस्प जरूर है । जब हम उन्हें महानतम कहते हैं तो इतिहास में हमें झांकना होगा। क्रिकेट के मुश्किल दौर के ताप में सचिन को जलना होगा। एक ऐसी अग्निपरीक्षा के सवालों से जूझना होगा जिनका सामना उन्होंने किया ही नहीं। जब आर्थर्टन ऐसा कह रहे हैं तो इस सच से पर्दा उठाना भी जरूरी है कि सचिन ने अपने जीवन में क्रिकेट के महानतम गेंदबाज़ों को नहीं खेला। यहां तेज गेंदबाजों का जिक्र हो रहा है। शेन वार्न उसके अपवाद हैं। सचिन का उदय हुआ तो वेस्ट इंडीज के खौफनाक गेदबाजों का करियर अस्त हो चुका था। होल्डिंग, क्राफ्ट, गार्नर, एंडी रॉबर्ट्स और मार्शल का उन्होंने अपने जीवन में कभी सामना नहीं किया। वसीम अकरम और वकार को उनके उफान पर नहीं झेला क्योंकि 1989 की श्रृंखला के बाद 1999 तक भारत-पाक के बीच कोई टेस्ट सीरीज नहीं खेली गई। इसके बावजूद टेस्ट क्रिकेट में पाकिस्तान के खिलाफ उनका औसत महज पैंतीस का है।ऑस्ट्रेलिया के डेनिस लिली, ज्यॉफ थॉमसन की छाय़ा भी उनके बल्ले पर नहीं पड़ी। रिचर्ड हेडली, बॉथम, इमरान को उनके ढलान पर खेला। हालांकि उन्होंने डोनाल्ड, मैक्ग्रा ब्रेट ली और शोएब अख्तर को झेला लेकिन गिनी चुनी पारियों को छोड़कर कभी उन पर दबदबा कायम नहीं कर सके । (जिस तरह से गावस्कर ने वेस्टइंडीज के महानतम गेंदबाजों पर किया था)। सबसे बड़ी बात यह कि इनमें से मैक्ग्रा और शायद ली को छोड़कर शोएब और डोनाल्ड उस कोटि के गेंदबाज हैं ही नहीं जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। आर्थर्टन का तर्क भी कुछ इसी लाइन पर था। यह कोई साजिश नहीं कि विस्डन ने लंबे समय तक इतिहास की सौ महानतम पारियों में सचिन की किसी टेस्ट पारी को शुमार नहीं किया था। जबकि इस लिस्ट में ब्रैडमेन, सोबर्स, वॉली हैमंड, सर लेन हटन गावस्कर, लारा, रिचर्ड्स समेत तमाम लोगों की कई पारियां शामिल हैं। अगर ये पक्षपात या ज्यादती थी तब भी इतने लंबे करियर में उनकी पांच पारियां तो ऐसी होनी ही चाहिये थी जिनकी चमक के आगे विस्डन की सूची बनाने वालों की आखें चुंधिया जातीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सचिन ने टेस्ट क्रिकेट में बेशुमार रन बनाए। पर मैदान पर विपक्ष को उस तरह से ध्वस्त नहीं कर सके, जिस तरह से ब्रैडमेन,सोबर्स, लारा, वॉली हैमंड, जैसे बल्लेबाजों ने कई मर्तबा किया। उन्होंने अपने जीवन में ऐसी गिनी चुनी टेस्ट पारियां खेली हैं जिसमें शुरू से आखिर तक उनके बल्ले ने आग उगली। उन्होंने आक्रामक शॉट्स भी खेले तो बहुत संभल कर। उन्होंने हमेशा अपनी पारी को सलीके से गढ़ने की कोशिश की। उन पारियों में झंझा का वेग नहीं था और शायद झरने का प्रवाह भी नहीं। टेस्ट की कई पारिय़ों में उन्होंने आक्रामक होने की कोशिश की तो उन्हें पवेलियन लौटना पड़ा। रनों के अंबार के साथ उनके क्रिकेट करियर का एक पक्ष इतना चमकीला है कि दूसरे महान बल्लेबाज़ों की आभा फीकी पड़ने का भ्रम होने लगा है। बेशक वे रनों और शतकों के शिखर पर हैं। उनकी बल्लेबाजी में निरंतरता भी है लेकिन एक बहुत बड़ा खालीपन हैं जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। सचिन रिकॉर्ड की सबसे ऊंची चोटी पर जरूर खड़े हैं, सबसे दुर्गम चोटी पर कतई नहीं। यहां उनकी प्रतिभा पर शक नहीं किया जा रहा। इतने महान करियर को गढ़ने वाला बल्लेबाज जाहिर तौर पर असाधारण होगा लेकिन उन्हें महानतम कहना जरा जल्दबाजी है । य़ह उन बल्लेबाज़ों के साथ ज्यादती भी है जिन्होंने कभी अपने बल्ले से क्रिकेट के मैदान पर राज किया है। हम सचिन की मुक्त कंठ से तारीफ करें लेकिन उन्हें भगवान न बनाएं तो बेहतर क्योंकि क्योकि क्रिकेट के इस तथाकथित भगवान की वंदना अब कर्कश शोर में तब्दील हो गई हैं।
देवांशु कुमार झा
फोन-9818442690
प्रोड्यूर-न्यूज 24

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

जरनैल ये तूने क्या किया?

जरनैल सिंह
तुम भी अजीब आदमी हो
भरी महफिल में
देश के गृहमंत्री पर जूता चला दिया?
किस युग में जीते हो
जरनैल?
क्या तुम्हें नहीं मालूम
यहां सब कुछ सोच समझ कर
किया जाता है
प्यार ही नहीं, गुस्सा भी
समर्थन ही नहीं, विरोध भी
और तुम हो
कि भावना में बह जाते हो?

वाकई अजीब हो जरनैल
तुम्हें इस बात का भी एहसास नहीं
कि तुम एक पत्रकार हो
पत्रकार जो कहीं नौकरी करता है
पत्रकार जिसकी कुछ मर्यादाएं तय हैं
पत्रकार जो निष्पक्ष कहा जाता है
लेकिन तुम तो
किसी मुद्दे पर भावनात्मक हो जाते हो
उबल पड़ते हो
जूता पहनकर पीसी में चले जाते हो
और गुस्सा आने पर
चला भी देते हो जूता
आखिर कैसे पत्रकार हो तुम?

जरनैल सिंह
क्या तुमने अपने मालिक से पूछा था?
क्या तुमने अपने संपादक को बताया था
कि तुम पीसी में चलाने वाले हो जूता?
नहीं न
तो अब उनसे सुनो
पत्रकारिता का पाठ
उनसे सीखो
पत्रकारिता की मर्यादा
उनसे सीखो
कैसे किया जाता है कलम का इस्तेमाल
उनसे सीखो
कैसे जलते मुद्दों पर साधी जाती है गुम्मी
उनसे सीखो
कैसे बरती जाती है खामोशी
और अगर नहीं सीख सकते
तो फिर तैयार हो जाओ
क्योंकि
वो अब बताएंगे
तुम्हें तुम्हारी औकात
वो बताएंगे
एक पत्रकार की हैसियत
गृहमंत्री ने माफ कर दिया तो क्या
वो देंगे तुम्हें
तुम्हारे 'जुल्म' की सजा?
आखिर वो कैसे बनने दे सकते हैं
तुम्हें एक मिसाल
मिसाल
एक गुस्से की
मिसाल
एक बेचारगी की
मिसाल
एक पीड़ित के दर्द की
मिसाल
मुद्दे उठाने की तड़प की
आखिर
उन्हें भी तो साबित करनी है
अपनी वफादारी
उन्हें भी तो बताना है कि
उन्हें फिक्र है पत्रकारिता की
पत्रकारों की
और सबसे ज्यादा इस
बात की फिक्र कि
हिंदुस्तान इराक नहीं
यहां विरोध के दूसरे तरीके
आजमाए जा सकते हैं
लेकिन
यहां नहीं पैदा हो सकता कोई
मुंतजर अल जैदी?

बहुत बोल रहा हूं न
क्या करूं
जब से तुम्हारे जूते को देखा है
वो काटने को दौड़ रहा है
मुझे गुस्सा आ रहा है कि
मालिकों और संपादकों का पाठ
पढ़ने से पहले
काश ! तुमने पढ़ लिया होता
तुलसी को
काश ! तुमने जान लिया होता कि
समरथ का कोई दोष नहीं होता
या तुमने
धूमिल से लोकतंत्र में जीना ही सीख लिया होता
कमर झुका कर
टूटने से बचा ही लिया होता खुद को...
बहरहाल
अब जब तुमने जूता चला ही दिया
जब तुमने हंगामा खड़ा कर ही दिया
तो बस
पत्रकारों के लिए
इतना और करना
इस जूते पर किसी
ब्रांड की मोहर मत लगने देना
किसी को मत खरीदने देना
अपना गुस्सा
अपनी तड़प
अपनी बेचारगी
अपना हौसला
और
लड़ने की ताकत।
- १० अप्रैल २००९

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

हिरन की खाल की खंजड़ी और राम कथा

"छापक पेड़ त पतवल गहबर हो। तारि ढाढि़ हरिनिया हरिना बाट जोहत हो। ,यानी पलाश के पेड़ के नीचे हिरनी अपने हिरन की राह देख रही है। हिरन ने अपनी हिरनी से पूछा- क्या तुम्हारा चरहा सूख गया या पानी के बिना तुम्हारा चेहरा मुरझा गया है। हिरनी बोली- न मेरा चरहा सूखा न पानी के बिन मेरा चेहरा मुरझाया। आज राजा जी छट्ठी है वे तुम्हें मार डालेंगे।। कौशल्या रानी मचिया पर बैठी थीं। उनसे हिरनी ने प्रार्थना की. रानी मांस तो रसोई में पक रहा है, हमें खाल दे दो। मैं पेड़ से खाल लटका लूंगी और खाल देख-देखकर मन को समझा लूंगी कि मेरा हिरन अभी जीवित है। रानी बोली-हिरनी तू अपने घर जा। हिरन की खाल से मैं अपने राम के लिए खंजड़ी मढ़वाऊंगी तो मेरे राम उससे खेलेंगे।"
एक मशहूर पत्रकार और बौद्धिक(मुद्राराक्षस) ने इस लोककथा और सौहर के सहारे राम को खंडित करने का प्रयास किया है। विचार के केन्द्र में बीजेपी और राम हैं लेकिन आत्मा लेख की यह है कि राम महल वालों के देवता हैं । यानी बूर्जुआ। उन्हें दलितों, गरीबों से कोई मतलब नहीं था। उन्होंने लिखा है-'काश भारतीय जनता पार्टी या विश्व हिन्दू परिषद के लोग यह समझ पाते कि यह दर्द किसका है और क्यों कर है तो निश्चय़ ही इस देश के करोड़ों लोगों की तकलीफ में वे सीधे हिस्सेदारी करते। वे यह भी समझते कि राम के प्रति पेरियार के क्षोभ की वजह क्या हो सकती है।' बड़ा दिलचस्प विचार है। लेखक के मुताबिक पिछड़ों, जनजातियों और दलितों में राम तुच्छ हैं। अवध क्षेत्र में बच्चे की छट्ठी पर गाए जाने वाले इस सौहर के सहारे उन्होंने राम के पूरे व्यक्तित्व को ही खंडित कर दिया। सबसे पहली बात तो यह कि अवध के किस क्षेत्र में यह सौहर गाया जाता है उसका पता नहीं। लेकिन उन्होंने गजब के आत्मविश्वास के साथ पूरे अवध की महिलाओं के मन की बात जान ली। ये भी समझ गए कि राम सिर्फ उच्च जातियों के देवता है, आदर्श हैं।
चलिए ये मान भी लिया कि सौहर में घोर दुख झलकता है। लेकिन इस सौहर और लोककथा का राम से क्या? उनकी माता ने हिरनी से कहा कि हिरन की खाल से खंजड़ी मढ़वाकर वो राम को देंगी, राम उससे खेलेंगे। चूंकि राम की माता को हिरनी का दर्द नजर नहीं आया इसलिए लेखक के मुताबिक राम भी बेदर्द हो गए। क्या यह बताना भी जरूरी है राम इसलिए राम नहीं थे कि कौशल्या उनकी माता थीं और दशरथ उनके पिता। चारों भाइयों में राम विशिष्ट थे और पूर्ण थे इसलिए वो महामानव हुए। उनकी विमाता कैकयी ने राम के लिए वनवास मांगा तो राम ने क्या किया ये कहने और स्पष्ट करने की जरूरत नहीं है। यह बताने की भी जरूरत नहीं है कि केवट, शबरी और अहिल्या के लिए उन्होंने क्या किया था।राम के मन में पिछड़ों के लिए कोई दर्द नहीं था इसीलिए जब वो केवट से विदाई ले रहे थे तो उन्होंने कहा- तुम मम प्रिय भरत हि सम भ्राता। क्या राम का दोष इसलिए था कि वो राजा के महल में पैदा हुए। बुद्ध बनने से पहले उनके पिता शुद्धोदन ने उन्हें तमाम राजसी प्रवृतियों की ओर धकेलने की कोशिश की तो क्या उनके पिता की ख्वाहिशों के लिए उन्हें कुसूरवार ठहरा दिय़ा जाए। बुद्ध का अपना अलग और महान व्यक्तित्व था।
सबसे बड़ी बात ये है कि इन लोकगीतों के गाये जाने का इतिहास क्या है और आज के समय अर्थ क्या है, इसका पता लगाना बेहद मुश्किल है। अगर राम के प्रति अवध की महिलाओं में इतना ही विकार है तो अपने बच्चे की छट्ठी पर वो इस दर्द भऱे सौहर को गाती क्यों हैं। इस सौहर का एक अर्थ तो ये भी हो सकता है कि तमाम माताएं ऐसी ही खंजड़ी अपने बच्चों के लिए मढ़वाना चाहती हों।राम के प्रति घृणा का सौहर इतने अच्छे मौके पर गाये जाने का कोई औचित्य नहीं दिखता।बचपन से आज तक जिस समाज में रहते आए हैं उसी समाज में राम के प्रति अगाध आस्था देखी है। उस समाज में गरीब. दलित, पिछड़े सभी शुमार हैं। बल्कि उनके मन में राम के प्रति अनंत आस्था देखी है। श्रद्धा की वो गहराई देखी है जो अगड़ों में नहीं नजर आती । पिछड़े तबके की औरतों को सैकड़ों बार राम के गीत गाते देखा और सुना है।
दरअसल इस दृष्टांत से सिर्फ यही समझ में आता है कि इन दिनों राम को जबरन उच्चवर्गीय समाज तक सीमित करने की घिनौनी कोशिश की जा रही है। किसी न किसी बहाने राम को हेठा साबित करने का फैशन सा चल पड़ा है। जब राम सेतु का मुद्दा छिड़ा, तब भी एक खास वर्ग ने राम सेतु को तुरंत नष्ट करने की वकालत की थी क्योंकि अत्यंत वैज्ञानिक विचारों से लैस इन बौद्धिकों के लिए राम तो काल्पनिक पात्र हैं। उनका कोई इतिहास नहीं मिलता। लेकिन उन्हें कौन समझाए कि भारत की संस्कृति और जीवन शैली तो इन्ही काल्पनिक पात्रों और कथानकों के सहारे जीवन ग्रहण करती रही है। तमाम कमियों और वर्णव्यवस्था की खामियों के बावजूद इस देश का सौन्दर्य बचा हुआ है तो उसकी वजह आध्यात्मिकता है। हमारी संस्कृति का खंभा वही है। लॉर्ड मैकाले ने जब हिन्दुस्तान का दौरा किया तो उन्हें इस समाज को गुलाम बनाने में यहां का आध्यात्म सबसे बड़ा रोड़ा दिखा था। क्योंकि मैकाले ने महसूस कर लिया था कि लोग अंदरूनी तौर पर इसी आध्यात्म से शक्ति पाते हैं।
बहरहाल आगे राजनीति का जिक्र करते हुए मुद्राराक्षस ने लिखा कि भाजपा और कांग्रेस ने इस पूरे क्षेत्र में अपनी जड़े सुखा लीं क्योंकि वो उन तमाम हिरनियों का दर्द नहीं देख सकी और काशीराम के आंदोलन ने जड़े जमाईं। दो दशकों में ही वो इस पूरे क्षेत्र के नायक बन कर उभर गए। इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि कांशीराम का आंदोलन फैला और उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ताकतवर बन कर उभऱी। लेकिन पिछले चुनाव की बात को दरकिनार कर दें तो क्या यह बताना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश में पिछले पंद्रह वर्षों के दौरान राजनीति कितनी उथल पुथल भऱी रही है। मुलायम सिंह और मायावती ने सत्ता का सफर तय किया तो इसकी वजह लोगों में राम के प्रति नाराजगी या घृणा नहीं बल्कि सामाजिक, और जातीय समीकरण हैं। अभी मायावती ने सत्ता कैसे हासिल की यह भी सब जानते हैं। उन्हें बहुजन से सर्वजन का नारा देना पड़ा। और दिलचस्प बात ये भी है कि मायावती ऐसी तमाम हिरनियों का दर्द कितना महसूस करती रही हैं यह भी किसी से छिपा नहीं है। बिहार में लालू प्रसाद यादव ने भी पीड़ितों का दर्द महसूस किया था लेकिन पंद्रह साल तक राज्य को चूसने के बाद जब जनता का मोहभंग हुआ तो पिछले चुनाव में उन्हें दर्द हो गया। वो भी पीड़ितों के मसीहा बन कर उभरे थे लेकिन जब पीड़ितों ने महसूस कर लिया कि उनकी पीड़ा से लालू प्रसाद का कोई सरोकार नहीं तो उन्होंने खुद को उनसे दूर कर लिया। सत्ता राम से नहीं बल्कि काम से चलती है। जब बीजेपी ने राम के बूते सत्ता हासिल की और फिर लंबी तान कर सो गई तो जनता उन्हें दोबारा क्यों मौका देती।
हैरान करने वाली बात ये भी है कि राम के खिलाफ आग उगलने वाले तमाम लोगों और संगठनों ने राम को बीजेपी का देवता बना दिया है। ऐसा लगता है जैसे राम की पहचान बीजेपी से है। अगर चंद सनकी हिंदू संगठन राम के नाम पर हंगामा करते हैं तो क्या इसमें राम का दोष है॥ उनकी छोटी सोच और उनके राष्ट्रवाद का सिद्धांत बेहद संकीर्ण है। अगर वो अपने मकसद के लिए राम के नाम का बेजा इस्तेमाल करते हैं तो इससे राम छोटे नहीं हो जाते। राम एक जीवनशैली हैं। एक आदर्श जीवनशैली। कमियां तो शायद उनके व्यक्तित्व में भी निकाली जा सकती हैं लेकिन राम के आदर्श इतने महान हैं कि कमियों की कोई जगह नहीं। वो हमारे दिल में इसलिए नहीं है कि कौशल्या उनकी माता थीं बल्कि इसलिए हैं कि उन्होंने माता, पिता, पत्नी, सखा, शत्रु के साथ आदर्श संबंध की मिसाल पेश की थी। वो महान इसलिए हैं कि उन्होंने खुद त्याग कर दूसरों को सुख देने में एक बार भी विचार नहीं किया था। उन्हें सिर्फ इसलिए खंडित करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिये कि वो महल में पैदा हुए। वो सदियों से करोड़ों दिलों में बसे हैं और आने वाली सदियों तक बसे रहेंगे। बेहतर यही है कि हमारा समाज उनके जीवन से कुछ सीखे। हम जिस हिंसक दौर में जी रहे हैं उसमें राम प्रासंगिक ही नहीं अनिवार्य भी हैं।
देवांशु कुमार (न्यूज २४ में बतौर प्रोड्यूसर कार्यरत)
( 205/2, कीर्ति अपार्टमेंटमयुर विहार फेज-1 नई दिल्ली-91 फोन-९८१८४४२६९०)

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

स्लमडॉग मिलयनेयर में किसकी जय

स्लमडॉग मिलियनेयर ने इतिहास रच दिया। गोलड्न गोल्ब, बाफ्टा और आखिरकार वो पुरस्कार मिल गया, जिसके इंतजार में भारतीय सिनेमा के कई दशक गुजर गए। सबसे बड़ी कामयाबी ये कि एक भारतीय संगीतकार को एक साथ दो-दो ऑस्कर मिल गए। विश्व सिनेमा में भारतीय सिनेमा का डंका बज गया। एक झटके में ए आर रहमान इतिहास रच गए। भारतीय सिनेमा को कुछ ऐसा दे गए जिसे हासिल करने में अब तक बड़े-बड़े भारतीय दिग्गज नाकाम रहे थे। लेकिन इस कामयाबी को जरा ध्यान से परखने की जरूरत है। क्या वाकई स्लमडॉग मिलियनेयर ऐसी उम्दा फिल्म है कि कामयाबी इसके पांव चूमने लगी.. क्या इस फिल्म का संगीत इतना दमदार है कि वो भारतीय फिल्म संगीत के गौरवशाली इतिहास में मील का पत्थर साबित हो गया...
ए आर रहमान की काबिलियत पर कोई शक नही है। वो इस दौर के बेहतरीन संगीतकार हैं। उन्होंने वाकई अच्छी धुनें बनाई हैं। लेकिन स्लमडॉग मिलयनेयर की कामयाबी को विश्व सिनेमा की बदलती तस्वीर और भारत सिनेमा के लगातार बढ़ते कद से जोड़ कर देखना होगा। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सिनेमा की अपील वैश्विक हुई है। विदेशों में प्रोमोशन और बॉलीवुड के सितारों की बढ़ती लोकप्रियता ने पश्चिम के फिल्मकारों और प्रोड्यूसरों का ध्यान खींचा है। वो भारतीय पृष्ठभूमि पर फिल्में बनाने की दिशा में गंभीरता से काम करने लगे हैं। कई फिल्में बनीं हैं, और बनने की प्रक्रिया में शामिल हैं। वार्नर ब्रदर्स से लेकर तमाम दूसरी प्रोडक्शन कंपनिया यहां पैसा लगाने में दिलचस्पी ले रही हैं। आर्थिक मंदी के इस दौर में भारत एक बड़ा बाजार बन कर उभरा है। ये महज इत्तेफाक नहीं है कि स्लमडॉग मिलयनेयर अचानक कामयाब हो गई। इसकी कामयाबी को बाजार की बदलती तस्वीर और विश्व सिनेमा के धरातल पर भारत की मजबूत होती पकड़ के बीच देखना होगा । अचानक ऐसा क्या हुआ कि पश्चिमी फिल्मकारों और आलोचकों को सल्मडॉग मिलयनेयर में वो तमाम खूबियां दिख गईं जो अब तक नजर नहीं आई थी।
इस बात से भी इनकार करना लगभग नामुमकिन है कि अगर ये फिल्म पूरी तरह भारतीय होती तो ऑस्कर में ऐसी कल्पनातीत सफलता मिली होती। धारावी की झुग्गियों पर सुधीर मिश्रा नब्बे के दशक में ही एक अच्छी फिल्म बना चुके हैं लेकिन तब उसका नामलेवा भी कोई नहीं था। फिल्म को रिलीज करवाने में ही उन्हें एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा। कड़ी मशक्कत के बाद दो चार सिनेमाघरों में फिल्म रिलीज भी हुई तो एक सप्ताह में ही उतर गई। ऑस्कर में ले जाने की बात भी दूर थी। पिछले साल की ही बेहतरीन फिल्म तारे जमीं पर आस्कर में प्रवेश पाने में भी नाकाम रही। आखिर क्यों..वो फिल्म हर लिहाज से उम्दा फिल्म थी। तकनीकी तौर से भी फिल्म अच्छी बन पड़ी थी, फिल्म का संगीत उम्दा था, अभिनय, निर्देशन सब कुछ अच्छा था लेकिन पश्चिम के फिल्मकारों, आलोचकों ने इसे दरकिनार कर दिया। ऐसी ही फिल्मों की फेहरिस्त बड़ी है जो दमदार होने के बावजूद ऑस्कर में औधें मुंह गिरती रही हैं। लेकिन स्लमडॉग मिलयनेयर का सिक्का चल गया। यहां इस फिल्म को कमतर साबित करने की कोई मंशा नहीं है। लेकिन सवाल उठाना लाजिमी है कि डैनी बॉय़ल का इससे जुड़ा होना इसकी कामयाबी में किस हद तक मददगार है.. स्लमडॉग मिलयेनर एक अच्छी फिल्म है लेकिन अच्छा होना आस्कर में इसकी कामयाबी की वजह नहीं जान पड़ती। ये उस बाजार में फिल्म निर्माण की नई संभावनाओं की तलाश का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है जहां से फिल्मों के गोलबाइजेशन की प्रकिया शुरू होती है। यहां से पश्चिमी फिल्मकारों की दिलचस्पी शुरू होती है। उस बाजार पर कब्जा करने की कोशिश की ये पहली सीढ़ी है जहां कामयाबी की अपार संभावनाएं दिखने लगी हैं।
जरा याद कीजिये 1990 का दशक। भारतीय हुस्नपरियों की कामयाबी का दौर था वो दशक। सुष्मिता सेन, ऐश्वर्य राय.. लारा दत्ता, डायना हेडन, प्रियंका चोपड़ा, युक्ता मुखी और न जाने कितनी ही सुंदरियां मिस वर्ल्ड और मिस युनिवर्स बन गईं। जैसे पिछले दशक में अचानक भारतीय सुंदरियों के नैन नक्श पश्चिम के सौन्दर्य उपासकों को लुभाने लगे थे। उसी तरह स्लमडॉग में उन्हें अपनी फिल्मों का सुनहरा भविष्य दिखने लगा है। उपभोक्तावाद की फैलती बेल के बीच भारत अब एक बड़े चट्टान की तरह दिखने लगा है, जिस पर बाजार के विस्तार की अपार संभावनाएं है। भारत का विकट सामाजिक समीकरण, रंगीन सांस्कृतिक मिज़ाज पश्चिम के फिल्मकारों को अचानक लुभाने लगा है। क्योंकि वे जानते हैं कि सिनेमा की भाषा बदलने लगी है। अंग्रेजीदां लोगों का एक विशाल तबका हिन्दुस्तान में मौजूद है जो उनकी जरूरतों को बखूबी पूरा कर सकता है।
स्लमडॉग मिलयनेयर का संगीत अच्छा है बेहतरीन नहीं। ए आर रहमान ने इससे कहीं बेहतर धुनें पहले तैयार की हैं। और अगर भारतीय फिल्म संगीत की धारा पर नजर डालें तो स्लमडॉग मिलयनेयर का संगीत कहां ठहरता है। शंकर जयकिशन, मदनमोहन, सलिल चौधुरी, एसडी बर्मन, सी रामचंद्र नौशाद, गुलाम मोहम्मद, पंचम जैसे दिग्गज संगीतकारों की कालजय़ी धुनें आज भी जुबां पर चढ़ी हुई हैं लेकिन वो ऑस्कर से महरूम रह गईं। हालांकि ऑस्कर में उन्हें ले जाने की इतनी जद्दोजहद भी पहले कभी नहीं की गई। और अगर भारतीय फिल्में वहां गई भी तो हश्र हमेशा बुरा ही हुआ।
स्लमडॉग के परिप्रेक्ष्य में भारतीय फिल्म जगत की व्यग्रता और मीडिया का उन्मादी स्वर भी ध्यान देने के लायक है। ऐसा लगा जैसे हमारी कला तो बस ऑस्कर की मोहताज है। अगर ऑस्कर नहीं मिला तो हम नाकाम। हमारे फिल्मकार हेठे और उनकी कला कच्ची। हैरान करने वाली बात ये भी है कि बॉलावुड का भी एक बड़ा तबका ऑस्कर के लिए तरस रहा था। वो इस अंदाज में बातें कर रहा था जैसे उन्हें अपनी क्षमता पर कोई भरोसा ही न हो। हालांकि एक तबका ऐसा भी था जो दबी जुबां में ही सही लेकिन ये कह जरूर रहा था कि ऑस्कर हमारी श्रेष्ठता का प्रमाण-पत्र नहीं है। आखिर हम क्यों ऑस्कर के मोहताज हैं..। जैसे महान फिल्मकार फेलिनी, गोदार और सत्यजीत रे की महानता ऑस्कर की दास नहीं थी उसी तरह आज के दौर की बेहतर फिल्मों को ऑस्कर का मोहताज नहीं होना चाहिये। विश्व सिनेमा में अपनी पहचान बनाना अच्छी बात है लेकिन उस पहचान के लिए अपनी निजता का अर्पण कर देना ठीक नहीं है। जब भी स्लमडॉग की कामयाबी और संगीत पर चर्चा छिड़ी, इस तबके ने तमाम विरोधी स्वरों को कुंठित करार दे दिया। ये कह कर उन्हें खामोश कर दिया कि वो इस कामयाबी को पचा नहीं पा रहे।
स्लमडॉग मिलयनेयर की कामयाबी भारतीय सिनेमा का महत्वपूर्ण पड़ाव है। कामयाबी का जश्न मनाना भी वाजिब है। आखिरकार ये एक भारतीय संगीतकार और टेकनीशयन की स्वर्णिम सफलता का वक्त है। ये मुमकिन है कि स्लमडॉग के बाद भारतीय सिनेमा की पैकेजिंग ऑस्कर में बेहतर हो जाय। भारतीय सिनेमा को शायद एक बेहतर प्लैटफॉर्म भी मिल जाए। लेकिन सवाल ये है किक्या ये वक्त के साथ लगातार तरक्की कर रहे भारतीय फिल्म उद्योग में घुसपैठ कर अपनी संभावनाओँ का बाजार विकसित करने की पश्चिमी सोच नहीं है।जय़ हो.. कहने से पहले ये विचार करना होगा कि स्लमडॉग से किसकी जय हो रही है। क्या ये वाकई रहमान की महानता औऱ भारतीय कला की जय है या पश्चिमी फिल्मकारों की सोची समझी रणनीति की जय जय।
देवांशु कुमार
(न्यूज २४ में बतौर प्रोड्यूसर कार्यरत हैं देवांशु कुमार)