सोमवार, 17 जनवरी 2011

रूपम पाठक और हमारी उदासीनता का अर्थ


पिछले हफ्ते अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की अपनी सहयोगियों के साथ मैं पूर्णिया गई हुई थी। वहां हमारी मुलाकात भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी पर हमला करने वाली रूपम पाठक की माताजी और उनके साथ हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोप में बंद पत्रकार नवलेश पाठक की पत्नी रोमा पाठक से हुई। हम रूपम पाठक और नवलेश पाठक से मिलना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने मिलने नहीं दिया। प्रदर्शन का यह नतीजा जरूर हुआ कि नवलेश पाठक के पास उसकी पत्नी गरम कपड़े पहुंचा सकीं। एक हफ्ते से बंद उस पत्रकार को कड़ाके की ठंड में गरम कपड़ों से वंचित रखा गया था। दूसरे दिन रोमा पाठक को एक हफ्ते बाद पहली बार अपने पति से मुलाकात का मौका मिला, लेकिन रूपम पाठक को अपनी मां और वकील से मिलने नहीं दिया गया। हमने मुख्यमंत्री सचिवालय से संपर्क किया और उसके बाद रूपम को अपने वकील से मिलने की अनुमति भी मिल गई। विधायक पर हमले के बाद उसे बहुत बुरी तरह से मारा गया था। एफआईआर के अनुसार, एक हजार लोगों ने उसे मारा, लेकिन उसे किसी प्रकार की चिकित्सा सेवा नहीं दी गई। वह भी ऐसे प्रांत में, जहां कई-कई कत्ल के आरोपी नेताओं का जेल जाने के रास्ते में स्वास्थ्य खराब होता रहा है और उन्हें तुरंत अच्छे अस्पतालों में पहुंचाया जाता रहा है, लेकिन रूपम पाठक की किस्मत में मरहम-पट्टी भी नहीं लिखी थी।

बाद में आम लोगों से मिलने पर लगा कि उनमें एक गहरी निराशा और उदासीनता थी, वे नहीं मानते कि इस मामले में कुछ होगा। निराशा इसलिए कि बड़े लोगों के तमाम पाप बहुत आसानी से माफ हो जाते है। राजनैतिक दलों के नेताओं के पीछे शासन-प्रशासन की पूरी ताकत खड़ी हो जाती है। उनके तमाम अपराधों पर पर्दा डाल दिया जाता है। पकड़े भी जाते हैं तो जल्दी छूट भी जाते हैं। उनके मरने पर भी उनकी ताकत कम नहीं होती और जिनको वह जिन्दा रहकर परेशान करते हैं, उनका उत्पीड़न उनके मरने के बाद भी जारी रहता है। राजनीति, आन्दोलन और न्याय के लिए संघर्ष के प्रति आम लोगों में उदासीनता पैदा करने का बीड़ा तो समस्त पूंजीवादी मीडिया, तमाम बुद्धिजीवियों और इस वैश्वीकरण के दौर में पनप रहे तमाम संगठनों और संस्थाओं ने उठा रखा है। इन दोनों प्रतिक्रियाओं के बीच फंसे लोग यह जान भी नहीं पाते है कि उनकी उदासीनता ही उनकी निराशा का एक बहुत बड़ा कारण है। अगर वह विरोध करना भूल जाएंगे, या अगर उनका विरोध असली दुनिया में नहीं केवल ‘वचरुअल’ दुनिया तक सीमित रह जाएगा। वे इंटरनेट पर, ज्ञापनों पर हस्ताक्षर करके या ट्विटर पर अपने आक्रोश को व्यक्त करके या फेसबुक पर अपनी टिप्पणी करके संतुष्ट हो जाएंगे कि उन्होंने कुछ कर दिया या टीवी चैनल के सवाल के जवाब में ‘हां’ या ‘न’ का एसएमएस करके अगर उन्हें तसल्ली हो जाएगी तो निश्चित ही अन्याय और अपराध का बोलबाला रहेगा।

लोग चाहे कितने ही निराश और उदासीन बना दिए गए हों, उन्होंने अपनी संवेदनशीलता नहीं खोई है। जब रूपम पाठक द्वारा विधायक पर किए गए जानलेवा हमले की तस्वीर टीवी के स्क्रीन पर देखने के बाद, हिंसा और कानून को अपने हाथ लेने की प्रक्रिया को बिल्कुल अनुचित मानने वाले लोग भी एक ही सवाल कर रहे थे, आखिर इस सामान्य-सी दिखने वाली, अधेड़ उम्र की औरत ने ऐसा कदम क्यों उठाया? यह जानते हुए कि वह पकड़ी जाएगी, मारी भी जाएगी, बन्द कर दी जाएगी, उसने ऐसा क्यों किया? इन तमाम सवालों ने रूपम पाठक के प्रति न चाहते हुए भी एक हमदर्दी की भावना पैदा कर दी, जिसका अहसास मुङो उस पूरे सफर के दौरान हुआ जो मुङो पूर्णिया तक ले गई। कानपुर स्टेशन पर कोहरे के कहर को बर्दाश्त करने वाले रेल-कर्मियों को जब पता चला कि मैं क्यों और कहां जा रही हूं, तो उन्होंने पूर्णिया जाने वाली ट्रेन की जानकारी बड़ी तत्परता से दी। ट्रेन में मेरा आरक्षण नहीं था, लेकिन मुसाफिरों ने मुङो पहले बैठने और फिर लेटने की जगह दी।

पूर्णिया पहुंचने के बाद पता चला कि मामला तो वाकई में काफी गड़बड़ था। वह पहले ही पूर्णिया के पुलिस अधिकारी को एक पत्र लिखकर इस बात की शिकायत कर चुकी थी कि विधायक और उनके एक सहयोगी द्वारा उसका यौन शोषण किया जा रहा था। तमाम प्रयासों के बावजूद वह कभी उस अधिकारी से मिल नहीं पाई। 28 मई को रूपम की एफआईआर पूर्णिया के एक थाने में दर्ज हुई। उसमें उसने विधायक और उसके सहयोगी के खिलाफ बलात्कार और यौन शोषण करने का आरोप लगाया, जिसने कभी एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की होगी, वही इस तथ्य की अहमियत समझ सकता है। अगर तभी समय रहते कुछ हो जाता, तो शायद यह नौबत ही न आती।
सुभाषिनी सहगल अली, लेखिका एडवा की अध्यक्षा
(दैनिक हिंदुस्तान का संपादकीय पेज, 18 जनवरी 2011)

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

हत्या से उपजे सवाल



बिहार में पूर्णिया से भारतीय जनता पार्टी के विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या का पूरा विवरण तो जांच के बाद ही सामने आएगा, लेकिन पहली नजर में जो बातें सामने आई हैं, वे हमारे जनप्रतिनिधियों की आम फहम छवि को ही पुख्ता करती हैं। हमारे जनप्रतिनिधियों में बहुसंख्यक लोग निश्चय ही भले और जिम्मेदार लोग हैं, लेकिन उनमें अपराधी तत्वों की तादाद भी इतनी बड़ी है कि किसी नेता पर कोई आरोप लगे तो लोग सहज ही विश्वास कर लेते हैं। केसरी की हत्या की आरोपी महिला रूपम पाठक ने केसरी पर यौन दुराचार का आरोप लगाया था और संभवत: हत्या भी उसने समय पर सुनवाई न करने की वजह से करने की ठानी। विधायक के आसपास के लोगों का आचरण भी कानून और न्याय के प्रति उनकी उपेक्षा को ही जाहिर करता है कि उन्होंने उस महिला को इतना पीटा कि वह गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है। समूचा प्रसंग यह बताता है कि जिन लोगों के जिम्मे कानून बनाने और उसके पालन की देखरेख करने की जिम्मेदारी है, उनके आसपास कैसा अराजक और कानून का मखौल उड़ाने वाला माहौल है। यह स्पष्ट शब्दों में कहना चाहिए कि विधायक केसरी की हत्या निहायत गलत कदम है और उस महिला के आरोप अगर सच भी हों तो उसने एक गलत और गैर-कानूनी रास्ता अपनाया, लेकिन हमें इस बात पर भी फिक्रमंद होना चाहिए कि हमारे जनप्रतिनिधियों की छवि इतनी खराब है कि शायद लोग बिना किसी पुख्ता सुबूत के उस महिला के आरोपों को विश्वसनीय मान लें। ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी विधायक पर ऐसे आचरण का आरोप लगा हो। उत्तर प्रदेश में एक बसपा विधायक द्वारा कथित यौन दुराचार को लेकर बवाल मचा हुआ है। मुख्यमंत्री मायावती द्वारा सख्त कार्रवाई करने के बावजूद उत्तर प्रदेश में एकाधिक बार विधायक ऐसे मामलों में फंस चुके हैं, बल्कि लगभग हर राज्य में ऐसे कांडों की गूंज हुई है। यह कहना भी जरूरी है कि हर पार्टी में ऐसे लोग हैं और जबानी जमाखर्च के अलावा किसी पार्टी ने अपने अंदर के अपराधी तत्वों को बाहर निकालने के लिए व्यवस्थित प्रयास किए हों। हर पार्टी को राजनीति में अपराधियों का मसला तभी महत्वपूर्ण दिखाई देता है, जब विरोधी पार्टी के किसी नेता का नाम अपराध में उछलता है। सवाल सिर्फ माननीय जनप्रतिनिधियों के लिप्त होने का नहीं है, सवाल यह है कि अगर जनप्रतिनिधि ऐसे हों तो बाकी समाज में कानून के पालन की हम क्या उम्मीद कर सकते हैं।

बिहार में राजग ने अभी-अभी ऐतिहासिक जनमत हासिल किया है और इस ऐतिहासिक जनमत के पीछे एक बड़ा कारण कानून के राज की बहाली है। राजग ने बिहार में कुछ समझौते जरूर किए हैं, लेकिन राजनीति में अपराध के वर्चस्व को कम करने की नीतीश कुमार की सरकार ने काफी हद तक सफल कोशिश की है। जरूरी यह है कि जनता का विश्वास इस सरकार और कानून के राज में बना रहे और इसके लिए सरकार को इसकी निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। तय है महिला द्वारा विधायक की हत्या करने के बाद भीड़तंत्र ने उसकी खूब पिटाई की, पर उस समय सुरक्षा गार्ड क्या कर रहे थे। यह सवाल भी है। जरूरी यह है कि राजनैतिक और कानूनी प्रक्रिया में लोगों का विश्वास बना रहे, इसलिए राजनैतिक पार्टियां अपने गिरेबान में जरा झांकें।

दैनिक हिंदुस्तान का संपादकीय, 5 जनवरी, 2011

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

दिल वालों का शहर बहुत तंगदिल है


 
दिल वालों के शहर में फिर किसी की आत्मा रौंदी गई। फिर किसी की इज्जत से खेला गया। बलात्कारियों ने उसे गिद्ध की तरह नोंचा खसोंटा और सड़क पर फेंक कर चलते बने। वह मणिपुर की रहने वाली है। रोजगार की तलाश में देश की राजधानी आई थी। उसका कसूर शाय़द ये था कि देश की राजधानी में रात के बारह बजे वह दफ्तर से घर लौट रही थी। उसे शायद ये एहसास नहीं था कि दिल्ली में देर रात जब शहर की रफ्तार थम जाती है तो सरेआम इंसान की शक्ल में घूमने वाले भेड़िये, तेज निगाहों से शिकार की तलाश में निकलते हैं। हालाकि यहां दिन-रात, सुबह- दोपहर और शाम सब एक जैसे हैं। कब किसकी आबरू तार-तार हो जाए कहना मुश्किल है। हालत ये है कि फिल्मी अभिनेत्रियां तक कहने को मजबूर हो जाती हैं कि शहर की नजर में ही खोट है। हाल ही में दिल्ली में संपन्न हाफ मैराथन में गुल पनाग के साथ ही दिल्ली के मनचले छेड़खानी कर बैठे। उन्होंने कहा कि भले ही दिल्ली की सड़कें पहले से ज्य़ादा चौड़ी हो गई हों ,भले ही इस शहर की चमक दमक पहले ज्यादा बढ़ गई हो,भले ही यहां विकास के ऊंचे-ऊंचे पुल नजर आने लगे हों लेकिन शहर अब भी उतना ही पिछड़ा और असभ्य है जितना आज से दस साल पहले हुआ करता था।
 
 आंकड़े गवाह हैं कि दिल्ली में हवस के भूखे किस तरह से लड़कियों और महिलाओं को तार तार करते रहे हैं। साल 2010 के शुरुआती छह महीनों में बलात्कार के 277 मामले सामने आ चुके हैं। पूरे साल का आंकड़ा आना अभी बाकी है। 2009 में बलात्कार के 452 मामले सामने आए थे। 2008 में  466 लड़कियों और महिलाओं की आबरू लूटी गई। 2007 में अस्मत लूटे जाने के 581 मामले सामने आए जबकि 2005 में 600 से ज्य़ादा बलात्कार की घटनाएं हुईं। 
 
उत्तर पूर्व से आने वाली लड़कियों के साथ य़े शहर सबसे खराब सलूक करता है। उनकी वेशभूषा देखकर इस शहर का विकृत दिमाग ये सोचता है कि हर लड़की बिस्तर पर जाने के लिए ही  है। उन पर फिकरे-फब्तियां कसना, बसों में उन्हें छेड़ना, राह चलते परेशान करना और मौका मिलने पर उनकी इज्जत पर हमला करना इस शहर का पसंदीदा शगल है।
 
 आम तौर पर ये सोचा जाता है कि मुंबई में बिहारी और उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ नाइंसाफी होती है। उन्हें पीटा जाता है,सताया जाता है और भगाया भी जाता है। इसमें कोई शक नहीं कि ठाकरे की बददिमाग सेना ऐसी हरकतें करती है लेकिन शहर के आम लोगों का व्यवहार कतई ऐसा नहीं है। दिल्ली में कोई ठाकरे की संगठित सेना नहीं है लेकिन ठाकरे से भी विकृत दिमाग वालों की बड़ी तादाद है। वो राह चलते कभी भी, किसी भी शक्ल में आपके सामने हाजिर होकर आपको हैरान कर सकते हैं। क्या इस शहर में बिहारियों को कम मानसिक हमले झेलने पड़ते हैं।  बिहारी  शब्द यहां अब भी गाली की तरह है और जरा ये भी देखिये कि बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश से आने वाले गरीब मेहनतकश मजदूरों,रिक्शावालों के साथ दिल्ली के लोग कैसे पेश आते हैं।
 
 लक्ष्मी नगर में हुआ हादसा इस बात की तस्दीक करता है कि दिल्ली सरकार को  बिहारी-बंगाली मजदूरों से कोई लेना देना नहीं है। दो साल पहले तो शीला दीक्षित ने यहां तक कह दिया था कि दिल्ली की समस्या, बिहार और उत्तर प्रदेश से आने वाले लोगों से बढ़ रही है। लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि लक्ष्मी नगर जैसे हादसों की जड़ में कौन है। उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि दिल्ली की सबसे ऊंची और शानदार इमारत, सिविक सेंटर में बैठने वालों का सिविक सेंस इतना खराब क्यों है। लक्ष्मी नगर की भयावह घटना इसलिए संभव हुई कि एमसीडी की रग रग में रिश्वतखोरी समाई हुई है। सत्तर से ज्यादा लोग मारे गए। खानदान के खानदान तबाह हो गए तब भी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित मौका ए वारदात पर चौदह घंटे बाद नमूदार हुईं। मरने वालों को दो-दो लाख का मुआवजा देकर उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों से छुट्टी पा ली। अब वो तमाम दुखियारे एक सामुदायिक भवन में सड़ रहे हैं। उनके सामने जिन्दगी सवाल बन कर खड़ी है। न रोजगार है, न रिश्तेदार हैं। गांव लौटने की कोई वजह नहीं है क्योकि वहां दो जून रोटी नहीं मिल सकती और यहां रहने का कोई बहाना नहीं है।
 
 दिल्ली एक अजीब पुरुषवादी दंभ से भऱा शहर है। इसकी फितरत ही मर्दाना है।  ये बात बात पर उलझना जानता है। सड़कों पर छोटी-छोटी बात पर फसाद करते हुए लोग यहां बड़ी आसानी से दिख जाते  हैं। सड़क पर आपकी गाड़ी या मोटर साइकिल से सामने वाले को जरा सी खरोंच क्या लगी, समझ लीजिए आफकी शामत है। वो बात करने से पहले हाथ चलाते हैं। शिष्टाचार का इस शहर से कोई लेना देना नहीं। मेट्रो में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों पर पुरुष बड़े चैन से बैठे देखे जा सकते हैं। बसों में कंडक्टरों का गाली गलौच करना आम बात है। लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद ये दिल वालों का शहर है। अगर दिल वालों का शहर ऐसा ही होता है तो फिर दूसरे शहर बेहतर हैं,जहां लोगों का दिल जरा छोटा है लेकिन इंसानियत का आय़तन जरूर बड़ा है।  
 
देवांशु कुमार, न्यूज 24 में बतौर एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर कार्यरत। मोबाइल-9818442690
 

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

देश से बड़े नहीं सचिन तेंदुलकर




दक्षिण अफ्रीका के सेंचुरियन मैदान पर सचिन तेंदुलकर टेस्ट क्रिकेट में शतक की ओर बढ़ रहे थे और टेलिविजन मीडिया का विवेक विहीन उन्माद उफान पर था। चैनल में उत्सव की तैय़ारी शुरू हो गई थी। महान, महानतम, ब्रैडमैन का बाप, क्रिकेट का भगवान न जाने कितने ही जुमले हवा में उछाले जा रहे थे। मूर्तिपूजा में अंधा हो चुका नायकों से रिक्त हमारा समाज सचिन में अपना नायक देख रहा था, पिछले कई सालों से देखता आ रहा है और आने वाली नस्लें भी देखती रहेंगी। लेकिन एक सत्य जो सामने चीख-चीख कर इस उत्सव का मजाक उड़ा रहा था, उसे देखने और अफसोस जताने की चिंता किसी को नहीं थी।
 
वो सत्य दक्षिण अफ्रीका की जमीन पर भारतीय  टीम की शर्मनाक हार के रूप में पहले भी कई मर्तबा प्रकट हो चुका है। इस बार भी सामने था लेकिन सचिन रमेश तेंदुलकर के पचासवें शतक की प्रतीक्षा में अधीर लोग भला हार की ओर क्यों ध्यान देते। वैसे भी जब क्रिकेट और फिल्मों के नायक देश से बड़े हो जाएं तो राष्ट्र के अपमान और सम्मान का प्रश्न अपनी प्रासंगिकता खो देता है। यहां ऐसा ही हो रहा है। सचिन तेंदुलकर ने शतक जमाया। तालियों के शोर में सब डूब गए और दूसरी ओर से भारतीय टीम पर छाया हार का संकट धोनी के आउट होने के साथ ही गहराता  चला गया।
 
टीवी चैनल्स के तमाम तय कार्यक्रम रद्द हो चुके थे। हर चैनल पर बस सचिन थे। कहीं भगवान बनकर तो कहीं महानायक , कही महासेंचुरियन बनकर तो कहीं पचास मार खां।
 
एक टीवी चैनल ने तो हद ही कर दी। वैसे वो चैनल स्वनामधन्य है। वहां बड़े महान अंग्रेजीदां पत्रकार हैं। वैचारिक तौर पर वामपंथी, सत्य़ दिखाने वाले। वहां एक वरिष्ठ समाचार वाचक सचिन का गुणगान करने में लगे थे। तेंदुलकर के प्रशस्ति गान में डूबी उनकी वाणी दर्प से चूर थी। ऐसा आभास हो रहा था कि महाशक्ति बनने से बस फर्लांग भर की दूरी पर खड़ा है भारत। तभी टीवी स्कीन पर अचानक एक संदेश चस्पा हो गया।
 
 जिस पर लिखा था---
जेनरेशंस टू कम विल स्कार्स बिलीव दैट सच ए मैन एज़ दिस एवर इन फ्लेश एन्ड ब्लड वॉक्ड अपोन दिस अर्थ..
 
अलबर्ट आइन्सटीन
 
 ये संदेश बिना किसी प्रस्तावना के टीवी स्क्रीन पर आया और कुछ देर रुक कर विलुप्त हो गया।  बताने की जरूरत नहीं है कि ये बातें आइन्सटीन ने महात्मा गांधी के बारे में कही थीं। लेकिन भावुक पत्रकार ने सोचा होगा कि गांधी तो बीते जमाने के हो गए अब इस दौर में तो सचिन ही इस श्रद्धाभाव के हकदार हैं। आने वाली पीढ़ियां वाकई य़े सोचकर हैरान होंगी कि हाड़ मांस का बना कोई ऐसा इंसान कभी इस धऱती पर मौजूद था। 
 
अब जरा सोचिए कि नायक की परिभाषा और पहचान कैसे बदल गई। गांधी और तेंदुलकर एक ही तराजू पर तौले जा रहे हैं। भ्रष्टाचारियों के आतंक से त्रस्त भारत अब कभी सचिन रमेश तेंदुलकर में अपना नायक देखता है, तो कभी अमिताभ, शाहरुख और आमिर खान में। कभी अंबानी, कभी अजीम प्रेमजी भी नायक बन जाते हैं ।
 
 इस पूरे टेस्ट मैच में भारत की शर्मनाक हार कभी मुद्दा नहीं रही। मुद्दा ये रहा कि सचिन निजी कीर्तिमान को और कितनी ऊंचाई पर ले जा सकते हैं। वैसे उनके कीर्तिमान जब देश के काम ही न आ सकें तो व्यर्थ हैं ।
 
 ऐसे पहली बार नहीं हुआ है। कई मर्तबा सचिन को शतक बनाते हुए देखने के लिए विकल हमारी ये पीढ़ी देश की विजय या पराजय का प्रश्न भूल जाती है। इसके लिए बहुत हद तक मीडिया जिम्मेदार है। मीडिया ने उन्हें भगवान का दर्ज दे दिया है और क्रिकेट परोसने वाले चैनल उनके कीर्तिमानों से सम्मोहित हो चुके हैं।
 
 खेल के नाम पर उन्हें सिर्फ क्रिकेट दिखता है और क्रिकेट के नाम पर सिर्फ सचिन। अगर कीर्तिमानों की ही बात है तो इसी टेस्ट के दौरान राहुल द्रविड़ 12000 रन का आंकड़ा छूने वाले  दुनिया के तीसरे बल्लेबाज बन गए लेकिन उन्हें कौन पूछता है।
 
ये अंधभक्ति अब कुंठित सोच में तब्दील होती जा रही है। सचिन रमेश तेंदुलकर की महानता से भला कौन इन्कार करता है लेकिन वो देश से बड़े नहीं है। उनकी उपस्थिति इस देश से है। पहले देश है फिर सचिन तेंदुलकर हैं। अगर देश शर्मनाक हार के कगार पर है तो सचिन की व्यक्तिगत उपलब्धियां खुशी का मौका नहीं हैं।
 
देवांशु कुमार, एसोसिएट एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर, न्यूज 24, 9818442690

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

पहला विनय स्मृति सम्मान शफी आलम को


कौमी तंजीम के युवा पत्रकार शफी आलम को पहला विनय स्मृति सम्मान प्रदान किया गया है। 19 दिसंबर को पूर्णिया के मिनिस्ट्रियल क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्हें ये सम्मान प्रदान किया गया। युवा पत्रकार शफी आलम को ये सम्मान पूर्णिया के बुजुर्गों की संस्था बुजुर्ग समाज की ओर से दिया गया है। बुजुर्ग समाज ने शफी आलम को संभावनाओं से भरा पत्रकार करार देते हुए उन्हें विनय स्मृति सम्मान से नवाजा।
शफी आलम फिलवक्त कौमी तंजीम के पूर्णिया के ब्यूरो चीफ हैं। पिछले 8-9 सालों से उन्होंने कौमी तंजीम के लिए संजीदा रिपोर्टिंग की है और सामाजिक बदलाव की सरोकारी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। शफी आलम ने इस सम्मान के मिलने पर खुशी जाहिर की। उनके मुताबिक स्थानीय पत्रकारों के लिए एक पेशे के तौर पर पत्रकारिता करना काफी चुनौती भरा है। इसमें करियर नहीं है लेकिन हां कुछ अच्छा करने का सुकून है और वही सबसे बड़ी ताकत है। शफी ने हाल के दिनों में पत्रकारिता में आई गिरावट को लेकर चिंता भी जाहिर की। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर काम करना होगा और राजनीतिक-प्रशासनिक प्रलोभनों से बचना होगा।
हिंदुस्तान के युवा पत्रकार विनय तरूण का इसी साल 21 जून को एक हादसे में आकस्मिक निधन हो गया था। पूर्णिया के रहने वाले विनय तरूण की याद में उनके मित्रों ने अगस्त महीने में एक कार्यक्रम रखा था। इसी कार्यक्रम में बुजुर्ग समाज के अध्यक्ष भोला नाथ आलोक ने विनय स्मृति सम्मान का एलान किया था। बुजुर्ग समाज ने पूर्णिया के साहित्यकारों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की मौजूदगी में शफी आलम को सम्मानित किया और इस परंपरा को आगे भी जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।

शनिवार, 13 नवंबर 2010

शून्य

शून्य तो शून्य है
शून्य का क्या है,
कितना बड़ा कि इतने से इतने बड़े का क्या है ?

शून्य की शून्यता में इन दिनों
इस तरह समाया हुआ हूँ कि
रात और दिन के बीच कुछ नजर नहीं आता है
सिवाय शून्य के.

शून्य बाहर है कि भीतर का है या मध्य में है
शून्य शून्य भर है कि उसके भीतर समाये गए हैं
अनगिनत शून्य
और उनकी शून्यताएँ

क्या शून्य अकेला ही बढा रहा है शून्यता को या
उसके भीतर के अनगिनत शून्य मिलकर एक कर दे रहे है
धरती और नक्षत्र को.

समुद्री किनारों से इन दिनों
जब मेरे यादों के पहाड़ बदलते जा रहे हैं शून्य में
तब शून्य अपनी शून्यता में
भर रहा है मुझे भी और हर रहा है
मेरे सारे आकार-प्रकार, रंगों और रूपों को.

शिरीष खरे, क्राई, मुंबई।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

निफ्ट से गांधी जयंती पर गुजारिश

महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को देश के प्रतिष्ठित संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी के ग्रीन पार्क, दिल्ली स्थित परिसर के बाहर समाज के अलग- अलग तबकों से आए बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, छात्रों और आम लोगों ने एक मीटिंग रखी। इस मीटिंग में साल 2010 में निफ्ट में एडमिशन प्रक्रिया के दौरान आरक्षित सीटों को लेकर चर्चा हुई।
बैठक में बताया गया कि एक आरटीआई के जरिए ये पता चला है कि संस्थान में ओबीसी कोटे की सात, एससी व एसटी कोटे की एक-एक सीटें खाली हैं। इन सीटों को क्यों नहीं भरा गया इसको लेकर निफ्ट का जवाब संतोषजनक नहीं रहा है।
अलग-अलग अखबारों और वेबसाइट में छपी खबरों में निफ्ट की ओर से ये तर्क दिया गया कि
1. निफ्ट का तर्क
संस्थान सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार आरक्षण प्रक्रिया का पूरी तरह पालन कर रहा है।
सवाल-
क. क्या सर्वोच्च न्यायालय ने ये निर्देश दिया है कि मेरिट लिस्ट के छात्रों को सीटें ऑफर न की जाएं?
ख. क्या सर्वोच्च न्यायालय ने ये कहा है कि पहली लिस्ट में सीटें न भरें तो ओबीसी,एससी और एसटी कोटे के तहत सीटें खाली छोड़ दी जाएं।
2. निफ्ट का तर्क
हम दिल्ली विश्वविद्यालय या अन्य संस्थानों की तरह सीटों को भरने के लिए दूसरी या तीसरी वेटिंग लिस्ट जारी नहीं कर सकते।
सवाल-
क. संस्थान ने क्या अलग-अलग कोर्सेस के लिए अलग नियमावली बना रखी है? अगर बीएफटेक और मास्टर्स कोर्स के लिए दूसरी लिस्ट जारी हो सकती है तो फिर बी. डिजाइन में क्यों नहीं?
ख. अगर दूसरी लिस्ट जारी नहीं करनी तो मेरिट लिस्ट जारी करने का क्या फायदा है? क्यों बार-बार अभिभावकों को ये दिलासा दिया गया कि बाकी बची सीटों के लिेए दूसरी लिस्ट आएगी?
3. निफ्ट का तर्क
हम गुणवत्ता से समझौता नहीं कर सकते।
सवाल
क. क्या निफ्ट अपने द्वारा तैयार मेरिट सूची को अपनी गुणवत्ता के अनुकूल नहीं मानता?
ख. क्या ओबीसी कोटे के तहत 530 रैंक के छात्र और 531 रैंक के छात्र में गुणवत्ता का इतना फासला था कि उससे संस्थान का स्तर गिर जाता?
4. निफ्ट का तर्क
दूसरी लिस्ट जारी करने के लिए वक्त कम था?
सवाल-
क. बी.डिजाइन ओबीसी कोटे की काउंसलिंग 18 जून 2010 को खत्म हुई, पढाई 28 जुलाई 2010 को शुरू हुई, क्या वाकई 40 दिनों में मेरिट लिस्ट के बाकी छात्रों से संपर्क कर पाना नामुमकिन था?
ख. अगर दूसरी लिस्ट नहीं निकाली जानी थी तो एडमिशन सेल ने अभिभावकों को क्यों कहा कि इंतजार कीजिए नेट पर दूसरी लिस्ट जारी होगी?
5. एडमिशन से जुड़ा तथ्य-
बी. डिजाइन के लिए ओबीसी श्रेणी में काउंसलिंग के लिए 530 छात्रों को बुलाया गया। यह संख्या कुल सीटों (356) की तुलना में महज 54 फीसदी ज्यादा छात्र है, जबकि सामान्य कोटे में 85 फीसदी ज्यादा, एससी कोटे में 108 फीसदी ज्यादा और एसटी श्रेणी में 83 फीसदी ज्यादा छात्र काउंसलिंग के लिए बुलाए गए।
निफ्ट का तर्क
पिछले रिकार्डो को देखते हुए एक अनुमान के आधार पर संस्थान काउंसलिंग के लिए बुलाए जाने वाले छात्रों की संख्या तय करती है।
सवाल-
अगर काउंसलिंग में ओबीसी कोटे के तहत कम छात्रों को बुलाए जाने का मकसद उन्हें अनावश्यक परेशानी से बचाना था तो फिर सीटें खाली रहने पर उन्हें ये सीटें ऑफर क्यों नहीं की गईं?
अफसोस कि बात है कि ज्यादातर मामलों में निफ्ट के तर्क संतोषजनक नहीं हैं और इस मामले में स्थिति स्पष्ट करने में निफ्ट के अधिकारियों की कोई दिलचस्पी नहीं है। हम अधोहस्ताक्षरी निफ्ट में आरक्षण कोटे के साथ मनमानी और खिलवाड़ की तीखी निंदा करते हैं।
हमारी विनम्र मांग यह है कि
1. निफ्ट लिखित रूप में हमारे सभी उपरोक्त सवालों का जवाब मुहैया कराए और अब इस मामले और ज्यादा देरी न की जाए।
2. संस्थान आरक्षित कोटे की बाकी बची 9 सीटों के लिए दूसरी लिस्ट जारी करे और छात्रों को फौरन दाखिला दे।
3. संस्थान ओबीसी, एससी और एसटी कोटे के साथ खिलवाड़ की निष्पक्ष जांच करे।
4. आरक्षण कोटे के साथ इस मनमाने रवैये के लिए दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करे।
5. अगर संस्थान में वाकई कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है तो इस पूरी प्रक्रिया और जांच से निकले निष्कर्षों को सार्वजनिक करे।