मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

देश से बड़े नहीं सचिन तेंदुलकर




दक्षिण अफ्रीका के सेंचुरियन मैदान पर सचिन तेंदुलकर टेस्ट क्रिकेट में शतक की ओर बढ़ रहे थे और टेलिविजन मीडिया का विवेक विहीन उन्माद उफान पर था। चैनल में उत्सव की तैय़ारी शुरू हो गई थी। महान, महानतम, ब्रैडमैन का बाप, क्रिकेट का भगवान न जाने कितने ही जुमले हवा में उछाले जा रहे थे। मूर्तिपूजा में अंधा हो चुका नायकों से रिक्त हमारा समाज सचिन में अपना नायक देख रहा था, पिछले कई सालों से देखता आ रहा है और आने वाली नस्लें भी देखती रहेंगी। लेकिन एक सत्य जो सामने चीख-चीख कर इस उत्सव का मजाक उड़ा रहा था, उसे देखने और अफसोस जताने की चिंता किसी को नहीं थी।
 
वो सत्य दक्षिण अफ्रीका की जमीन पर भारतीय  टीम की शर्मनाक हार के रूप में पहले भी कई मर्तबा प्रकट हो चुका है। इस बार भी सामने था लेकिन सचिन रमेश तेंदुलकर के पचासवें शतक की प्रतीक्षा में अधीर लोग भला हार की ओर क्यों ध्यान देते। वैसे भी जब क्रिकेट और फिल्मों के नायक देश से बड़े हो जाएं तो राष्ट्र के अपमान और सम्मान का प्रश्न अपनी प्रासंगिकता खो देता है। यहां ऐसा ही हो रहा है। सचिन तेंदुलकर ने शतक जमाया। तालियों के शोर में सब डूब गए और दूसरी ओर से भारतीय टीम पर छाया हार का संकट धोनी के आउट होने के साथ ही गहराता  चला गया।
 
टीवी चैनल्स के तमाम तय कार्यक्रम रद्द हो चुके थे। हर चैनल पर बस सचिन थे। कहीं भगवान बनकर तो कहीं महानायक , कही महासेंचुरियन बनकर तो कहीं पचास मार खां।
 
एक टीवी चैनल ने तो हद ही कर दी। वैसे वो चैनल स्वनामधन्य है। वहां बड़े महान अंग्रेजीदां पत्रकार हैं। वैचारिक तौर पर वामपंथी, सत्य़ दिखाने वाले। वहां एक वरिष्ठ समाचार वाचक सचिन का गुणगान करने में लगे थे। तेंदुलकर के प्रशस्ति गान में डूबी उनकी वाणी दर्प से चूर थी। ऐसा आभास हो रहा था कि महाशक्ति बनने से बस फर्लांग भर की दूरी पर खड़ा है भारत। तभी टीवी स्कीन पर अचानक एक संदेश चस्पा हो गया।
 
 जिस पर लिखा था---
जेनरेशंस टू कम विल स्कार्स बिलीव दैट सच ए मैन एज़ दिस एवर इन फ्लेश एन्ड ब्लड वॉक्ड अपोन दिस अर्थ..
 
अलबर्ट आइन्सटीन
 
 ये संदेश बिना किसी प्रस्तावना के टीवी स्क्रीन पर आया और कुछ देर रुक कर विलुप्त हो गया।  बताने की जरूरत नहीं है कि ये बातें आइन्सटीन ने महात्मा गांधी के बारे में कही थीं। लेकिन भावुक पत्रकार ने सोचा होगा कि गांधी तो बीते जमाने के हो गए अब इस दौर में तो सचिन ही इस श्रद्धाभाव के हकदार हैं। आने वाली पीढ़ियां वाकई य़े सोचकर हैरान होंगी कि हाड़ मांस का बना कोई ऐसा इंसान कभी इस धऱती पर मौजूद था। 
 
अब जरा सोचिए कि नायक की परिभाषा और पहचान कैसे बदल गई। गांधी और तेंदुलकर एक ही तराजू पर तौले जा रहे हैं। भ्रष्टाचारियों के आतंक से त्रस्त भारत अब कभी सचिन रमेश तेंदुलकर में अपना नायक देखता है, तो कभी अमिताभ, शाहरुख और आमिर खान में। कभी अंबानी, कभी अजीम प्रेमजी भी नायक बन जाते हैं ।
 
 इस पूरे टेस्ट मैच में भारत की शर्मनाक हार कभी मुद्दा नहीं रही। मुद्दा ये रहा कि सचिन निजी कीर्तिमान को और कितनी ऊंचाई पर ले जा सकते हैं। वैसे उनके कीर्तिमान जब देश के काम ही न आ सकें तो व्यर्थ हैं ।
 
 ऐसे पहली बार नहीं हुआ है। कई मर्तबा सचिन को शतक बनाते हुए देखने के लिए विकल हमारी ये पीढ़ी देश की विजय या पराजय का प्रश्न भूल जाती है। इसके लिए बहुत हद तक मीडिया जिम्मेदार है। मीडिया ने उन्हें भगवान का दर्ज दे दिया है और क्रिकेट परोसने वाले चैनल उनके कीर्तिमानों से सम्मोहित हो चुके हैं।
 
 खेल के नाम पर उन्हें सिर्फ क्रिकेट दिखता है और क्रिकेट के नाम पर सिर्फ सचिन। अगर कीर्तिमानों की ही बात है तो इसी टेस्ट के दौरान राहुल द्रविड़ 12000 रन का आंकड़ा छूने वाले  दुनिया के तीसरे बल्लेबाज बन गए लेकिन उन्हें कौन पूछता है।
 
ये अंधभक्ति अब कुंठित सोच में तब्दील होती जा रही है। सचिन रमेश तेंदुलकर की महानता से भला कौन इन्कार करता है लेकिन वो देश से बड़े नहीं है। उनकी उपस्थिति इस देश से है। पहले देश है फिर सचिन तेंदुलकर हैं। अगर देश शर्मनाक हार के कगार पर है तो सचिन की व्यक्तिगत उपलब्धियां खुशी का मौका नहीं हैं।
 
देवांशु कुमार, एसोसिएट एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर, न्यूज 24, 9818442690

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

पहला विनय स्मृति सम्मान शफी आलम को


कौमी तंजीम के युवा पत्रकार शफी आलम को पहला विनय स्मृति सम्मान प्रदान किया गया है। 19 दिसंबर को पूर्णिया के मिनिस्ट्रियल क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्हें ये सम्मान प्रदान किया गया। युवा पत्रकार शफी आलम को ये सम्मान पूर्णिया के बुजुर्गों की संस्था बुजुर्ग समाज की ओर से दिया गया है। बुजुर्ग समाज ने शफी आलम को संभावनाओं से भरा पत्रकार करार देते हुए उन्हें विनय स्मृति सम्मान से नवाजा।
शफी आलम फिलवक्त कौमी तंजीम के पूर्णिया के ब्यूरो चीफ हैं। पिछले 8-9 सालों से उन्होंने कौमी तंजीम के लिए संजीदा रिपोर्टिंग की है और सामाजिक बदलाव की सरोकारी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। शफी आलम ने इस सम्मान के मिलने पर खुशी जाहिर की। उनके मुताबिक स्थानीय पत्रकारों के लिए एक पेशे के तौर पर पत्रकारिता करना काफी चुनौती भरा है। इसमें करियर नहीं है लेकिन हां कुछ अच्छा करने का सुकून है और वही सबसे बड़ी ताकत है। शफी ने हाल के दिनों में पत्रकारिता में आई गिरावट को लेकर चिंता भी जाहिर की। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर काम करना होगा और राजनीतिक-प्रशासनिक प्रलोभनों से बचना होगा।
हिंदुस्तान के युवा पत्रकार विनय तरूण का इसी साल 21 जून को एक हादसे में आकस्मिक निधन हो गया था। पूर्णिया के रहने वाले विनय तरूण की याद में उनके मित्रों ने अगस्त महीने में एक कार्यक्रम रखा था। इसी कार्यक्रम में बुजुर्ग समाज के अध्यक्ष भोला नाथ आलोक ने विनय स्मृति सम्मान का एलान किया था। बुजुर्ग समाज ने पूर्णिया के साहित्यकारों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की मौजूदगी में शफी आलम को सम्मानित किया और इस परंपरा को आगे भी जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई।

शनिवार, 13 नवंबर 2010

शून्य

शून्य तो शून्य है
शून्य का क्या है,
कितना बड़ा कि इतने से इतने बड़े का क्या है ?

शून्य की शून्यता में इन दिनों
इस तरह समाया हुआ हूँ कि
रात और दिन के बीच कुछ नजर नहीं आता है
सिवाय शून्य के.

शून्य बाहर है कि भीतर का है या मध्य में है
शून्य शून्य भर है कि उसके भीतर समाये गए हैं
अनगिनत शून्य
और उनकी शून्यताएँ

क्या शून्य अकेला ही बढा रहा है शून्यता को या
उसके भीतर के अनगिनत शून्य मिलकर एक कर दे रहे है
धरती और नक्षत्र को.

समुद्री किनारों से इन दिनों
जब मेरे यादों के पहाड़ बदलते जा रहे हैं शून्य में
तब शून्य अपनी शून्यता में
भर रहा है मुझे भी और हर रहा है
मेरे सारे आकार-प्रकार, रंगों और रूपों को.

शिरीष खरे, क्राई, मुंबई।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

निफ्ट से गांधी जयंती पर गुजारिश

महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को देश के प्रतिष्ठित संस्थान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी के ग्रीन पार्क, दिल्ली स्थित परिसर के बाहर समाज के अलग- अलग तबकों से आए बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, छात्रों और आम लोगों ने एक मीटिंग रखी। इस मीटिंग में साल 2010 में निफ्ट में एडमिशन प्रक्रिया के दौरान आरक्षित सीटों को लेकर चर्चा हुई।
बैठक में बताया गया कि एक आरटीआई के जरिए ये पता चला है कि संस्थान में ओबीसी कोटे की सात, एससी व एसटी कोटे की एक-एक सीटें खाली हैं। इन सीटों को क्यों नहीं भरा गया इसको लेकर निफ्ट का जवाब संतोषजनक नहीं रहा है।
अलग-अलग अखबारों और वेबसाइट में छपी खबरों में निफ्ट की ओर से ये तर्क दिया गया कि
1. निफ्ट का तर्क
संस्थान सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार आरक्षण प्रक्रिया का पूरी तरह पालन कर रहा है।
सवाल-
क. क्या सर्वोच्च न्यायालय ने ये निर्देश दिया है कि मेरिट लिस्ट के छात्रों को सीटें ऑफर न की जाएं?
ख. क्या सर्वोच्च न्यायालय ने ये कहा है कि पहली लिस्ट में सीटें न भरें तो ओबीसी,एससी और एसटी कोटे के तहत सीटें खाली छोड़ दी जाएं।
2. निफ्ट का तर्क
हम दिल्ली विश्वविद्यालय या अन्य संस्थानों की तरह सीटों को भरने के लिए दूसरी या तीसरी वेटिंग लिस्ट जारी नहीं कर सकते।
सवाल-
क. संस्थान ने क्या अलग-अलग कोर्सेस के लिए अलग नियमावली बना रखी है? अगर बीएफटेक और मास्टर्स कोर्स के लिए दूसरी लिस्ट जारी हो सकती है तो फिर बी. डिजाइन में क्यों नहीं?
ख. अगर दूसरी लिस्ट जारी नहीं करनी तो मेरिट लिस्ट जारी करने का क्या फायदा है? क्यों बार-बार अभिभावकों को ये दिलासा दिया गया कि बाकी बची सीटों के लिेए दूसरी लिस्ट आएगी?
3. निफ्ट का तर्क
हम गुणवत्ता से समझौता नहीं कर सकते।
सवाल
क. क्या निफ्ट अपने द्वारा तैयार मेरिट सूची को अपनी गुणवत्ता के अनुकूल नहीं मानता?
ख. क्या ओबीसी कोटे के तहत 530 रैंक के छात्र और 531 रैंक के छात्र में गुणवत्ता का इतना फासला था कि उससे संस्थान का स्तर गिर जाता?
4. निफ्ट का तर्क
दूसरी लिस्ट जारी करने के लिए वक्त कम था?
सवाल-
क. बी.डिजाइन ओबीसी कोटे की काउंसलिंग 18 जून 2010 को खत्म हुई, पढाई 28 जुलाई 2010 को शुरू हुई, क्या वाकई 40 दिनों में मेरिट लिस्ट के बाकी छात्रों से संपर्क कर पाना नामुमकिन था?
ख. अगर दूसरी लिस्ट नहीं निकाली जानी थी तो एडमिशन सेल ने अभिभावकों को क्यों कहा कि इंतजार कीजिए नेट पर दूसरी लिस्ट जारी होगी?
5. एडमिशन से जुड़ा तथ्य-
बी. डिजाइन के लिए ओबीसी श्रेणी में काउंसलिंग के लिए 530 छात्रों को बुलाया गया। यह संख्या कुल सीटों (356) की तुलना में महज 54 फीसदी ज्यादा छात्र है, जबकि सामान्य कोटे में 85 फीसदी ज्यादा, एससी कोटे में 108 फीसदी ज्यादा और एसटी श्रेणी में 83 फीसदी ज्यादा छात्र काउंसलिंग के लिए बुलाए गए।
निफ्ट का तर्क
पिछले रिकार्डो को देखते हुए एक अनुमान के आधार पर संस्थान काउंसलिंग के लिए बुलाए जाने वाले छात्रों की संख्या तय करती है।
सवाल-
अगर काउंसलिंग में ओबीसी कोटे के तहत कम छात्रों को बुलाए जाने का मकसद उन्हें अनावश्यक परेशानी से बचाना था तो फिर सीटें खाली रहने पर उन्हें ये सीटें ऑफर क्यों नहीं की गईं?
अफसोस कि बात है कि ज्यादातर मामलों में निफ्ट के तर्क संतोषजनक नहीं हैं और इस मामले में स्थिति स्पष्ट करने में निफ्ट के अधिकारियों की कोई दिलचस्पी नहीं है। हम अधोहस्ताक्षरी निफ्ट में आरक्षण कोटे के साथ मनमानी और खिलवाड़ की तीखी निंदा करते हैं।
हमारी विनम्र मांग यह है कि
1. निफ्ट लिखित रूप में हमारे सभी उपरोक्त सवालों का जवाब मुहैया कराए और अब इस मामले और ज्यादा देरी न की जाए।
2. संस्थान आरक्षित कोटे की बाकी बची 9 सीटों के लिए दूसरी लिस्ट जारी करे और छात्रों को फौरन दाखिला दे।
3. संस्थान ओबीसी, एससी और एसटी कोटे के साथ खिलवाड़ की निष्पक्ष जांच करे।
4. आरक्षण कोटे के साथ इस मनमाने रवैये के लिए दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करे।
5. अगर संस्थान में वाकई कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है तो इस पूरी प्रक्रिया और जांच से निकले निष्कर्षों को सार्वजनिक करे।

रविवार, 19 सितंबर 2010

निफ्ट में आरक्षित कोटे की सीटें खालीं क्यों ?

नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ फैशन टेक्नॉलॉजी में आरक्षित कोटे की सीटें खाली हैं लेकिन छात्रों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा। साल 2010 के बी डिजाइन कोर्स में दाखिले की प्रक्रिया को लेकर दायर एक आरटीआई में इस बात का खुलासा हुआ है। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक ओबीसी (नॉन क्रीमी लेयर) कोटे की 7 सीटें खाली हैं, जबकि एससी और एसटी कोटे की एक-एक सीट खाली पड़ी है।

निफ्ट के निदेशक आरएम सिंह के मुताबिक ओबीसी कोटे के तहत 2010 में 356 छात्रों को दाखिला दिया जाना था लेकिन महज 349 छात्रों को ही दाखिला दिया गया। ओबीसी कोटे के तहत काउंसलिंग में कुल 530 छात्रों को बुलाया गया था और 18 जून 2010 को 523 रैंक के छात्र को आखिरी दाखिला दिया गया। निफ्ट की ओर से जारी रैंक लिस्ट में बाकी बचे छात्र कॉल का इंतजार करते रहे लेकिन संस्थान की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। यहां तक कि कई अभिभावकों ने फैक्स के जरिए भी ये सूचना दी कि वो एडमिशन लेना चाहते हैं लेकिन संस्थान उन्हें टालता रहा। आरटीआई के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में निफ्ट ने चुप्पी लगा ली कि आखिर ये फैसला कब लिया गया कि वेटलिस्टेड छात्रों को काउंसलिंग के लिए नहीं बुलाया जाएगा।

नाम न छापने की शर्त पर एक पीड़ित अभिभावक ने आरोप लगाया कि ओबीसी कोटे के साथ हो रहे इस खिलवाड़ की भूमिका उसी वक्त तैयार हो चुकी थी जब काउंसलिंग के लिए पहली लिस्ट जारी की गई। बी डिजाइन के लिए ओबीसी कैटगरी में काउंसलिंग के लिए 530 छात्रों को बुलाया गया। ये कुल सीटों (345) की तुलना में महज 54 फीसदी ज्यादा छात्र थे, जबकि सामान्य कोटे में 85 फीसदी ज्यादा, एससी कोटे में 108 फीसदी ज्यादा और एसटी कैटगरी में 83 फीसदी ज्यादा छात्र काउंसलिंग के लिए बुलाए गए। अलग-अलग कैटगरी में काउंसलिंग के लिए बुलाए गए छात्रों के इस अंतर पर जब एडमिशन सेल (दिल्ली) में पूछताछ की गई तो बताया गया कि अगर सीटें बची रह जाएंगी तो काउंसलिंग के लिए दूसरी लिस्ट निकाली जाएगी, लेकिन ये दूसरी लिस्ट अभी तक नहीं आई।

आपको बता दें कि बी डिजाइन के लिए ओबीसी की काउंसलिंग 18 जून को समाप्त हो गई थी और यहां पढ़ाई 28 जुलाई से शुरू हुई। करीब 40 दिनों के इस अंतराल में निफ्ट ओबीसी की 7 सीटों को भरने की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सका। निफ्ट में बी एफटेक और मास्टर्स कोर्स के लिए काउंसलिंग की दूसरी लिस्ट जारी की गई लेकिन ओबीसी कैटगरी में दूसरी लिस्ट जारी करने में टालमटोल भरा रवैया बदस्तूर जारी है।

पशुपति शर्मा

सोमवार, 30 अगस्त 2010

शर्म है कि आती नहीं...


ट्रक-टैम्पो भिड़े... (तीन कॉलम, पेज-3), युवा कांग्रेस का चक्का जाम (फोटो सहित 2 कॉलम, पेज नंबर-3), इसी हेडिंग के साथ एक और खबर (3 कॉलम, 5 नंबर पेज), जागरुकता से जनसंख्या पर नियंत्रण संभव (फोटो सहित 2 कॉलम, पेज-4), बाबा स्वामी रामदेव के कार्यक्रम को ले बैठक (2 कॉलम), किसानों को दी खाद व कीटनाशक की जानकारी (फोटो सहित 2 कॉलम)... 29 अगस्त 2010 को भागलपुर से प्रकाशित हिंदुस्तान के पूर्णिया संस्करण में ऐसी ही कई खबरें थीं लेकिन वो खबर नहीं थी जिसे देखने के लिेए हममें से कई साथियों ने अखबार खरीदा और उसके पन्ने पलटते रहे। पूर्णिया में दिवंगत पत्रकार विनय तरूण को श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम हुआ लेकिन कई पत्रकारों को वहां झांकने तक की फुर्सत नहीं मिली। अफसोस कि दैनिक जागरण समेत दूसरे स्थानीय अखबारों से भी ये खबर नदारद रही।

बाकी की बात छोड़ भी दें लेकिन हिंदुस्तान की इस हरकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हिंदुस्तान के उप स्थानीय संपादक और साथी इसे कोई अपराध न माने लेकिन एक अपराध हो चुका है, भले ही किसी संविधान में उसकी कोई धारा दर्ज नहीं। पत्रकारों की बात छोड़ भी दें लेकिन एक आम पाठक को भी उस वक्त जरूर कोफ्त होगी जब यह पता चलेगा कि वो दिवंगत पत्रकार कोई और नहीं बल्कि दैनिक हिंदुस्तान, भागलपुर में काम करने वाला एक संपादकीय साथी था। उसकी मौत संस्थान की नौकरी छो़ड़ देने या अखबार से हर तरह का नाता तोड़ देने के बाद नहीं हुई थी... वो ऑफिस पहुंचने की आपाधापी में ही 22 जून 2010 को एक ट्रेन हादसे में मारा गया।

अफसोस हिंदुस्तान के संपादक विनोद बंधु समेत उनके साथ काम करने वाले तमाम साथियों ने इस युवा पत्रकार को महज दो महीने में ही बिलकुल पराया कर दिया, इतना पराया कि उनके लिए श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए दो पल भी न मिले। संपादक महोदय की व्यस्तता का आलम ये रहा कि उन्होंने तमाम स्रोतों से इस कार्यक्रम के आयोजन की सूचना मिलने के बावजूद किसी नुमाइंदे को भेजना जरूरी नहीं समझा।

28 अगस्त 2010 को पूर्णिया के बीबीएम हाईस्कूल में 100 से ज्यादा लोगों का जमावड़ा लगा। दिल्ली, पटना, रांची, जमशेदपुर, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, सहरषा, सुपौल और फारबिसगंज समेत कई जगहों से पत्रकार साथी विनय तरूण को याद करने पहुंचे। कोई 1300 किलोमीटर की यात्रा कर यहां पहुंचा तो किसी ने 300 किलोमीटर का सफर तय किया... कोई मोटरसाइकिल पर हिचकोले खाते 100-125 किलोमीटर चलकर एक सीधे-सादे सच्चे पत्रकार को श्रद्धांजलि देने पहुंचा लेकिन पता नहीं ऐसी क्या बात थी कि हिंदुस्तान के साथी एक से डेढ़ किलोमीटर का फासला भी तय नहीं कर पाए। विनय की याद में आंसू बहते रहे लेकिन इन पत्रकारों ने कलेजा कुछ ऐसा सख्त कर लिया कि ऑफिस में चुनावी जमा खर्च का हिसाब किताब होता रहा। सबसे ज्यादा दुखद बात तो ये है कि ये सब हिंदुस्तान के भागलपुर संस्करण के उप-स्थानीय संपादक विनोद बंधु की मौजूदगी में हुआ। जी हां जिस वक्त पूर्णिया के वयोवृद्ध साहित्यकार भोलानाथ आलोक, पूर्णिया आकाशवाणी के पूर्व केंद्र निदेशक विजयनंदन प्रसाद समेत तमाम पत्रकार, बुद्धिजीवी और घर परिवार के लोग एक कमरे में युवा पत्रकार विनय तरुण की मौत का मातम मना रहे थे, उसी वक्त अपने मातहत विनय तरूण की मौत का गम भुला चुके संपादक विनोद बंधु पूर्णिया में ही मीटिंग कर रहे थे।

संपादक महोदय की संवेदनशीलता का आलम ये रहा कि सुबह 11 बजे से लेकर शाम के 5 बजे तक चलने वाले श्रद्धांजलि समारोह के तीन सत्रों में से किसी एक सत्र के लिए भी वो दो पल का वक्त नहीं निकाल पाए। जितनी देर कार्यक्रम चला, शायद उतनी देर मीटिंग भी चलती रही। अन्यथा यकीन नहीं होता कि कोई अपने साथी को इस तरह भी भुला सकता है। यकीन नहीं होता कि एक संपादक इतना कठोर हृदय भी हो सकता है। यकीन नहीं होता कि दुनिया का दर्द अखबारों के पन्ने पर उकेरने वाली बिरादरी अपने घर के अंदर बह रहे आंसुओं की धारा से इस कदर आंख मूंद सकती है।

कुछ तो बात है कि विनय की स्मृति के कार्यक्रम से संपादक महोदय ने तौबा कर ली। क्या विनोद बंधु इस बात का जवाब दे पाएंगे कि आखिर ऐसा कौन सा डर था कि वो कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। भगवान के लिए ये मत कहें कि हमारी हिम्मत नहीं हुई... आपकी हिम्मत तो काबिले तारीफ है कि आपने 28 अगस्त को पहले पूर्णिया के कार्यक्रम में शिरकत न करने की असमर्थता जाहिर की और उसी दिन आप पूर्णिया में एक मीटिंग करने चले आए।

संपादकों का एक दौर वो भी था, जब साथी पत्रकार उनसे प्रेरणा लेते थे। जब हर मुश्किल घड़ी में पत्रकारों को ये लगता था कि संपादक महोदय का हाथ उनके सिर पर है। पता नहीं इस दौर में अपने इस आचरण के जरिए विनोद बंधु कौन सी मिसाल कायम करना चाहते हैं। संपादक महोदय आपने अनजाने में नहीं बल्कि जानबूझकर पत्रकारिता की उस धारा को अपमानित किया है, जो सच्चाई, सादगी और ईमानदारी के साथ अब भी बह रही है। ये धारा इतनी पतली भी नहीं हुई कि वो आपको नजर न आए, लेकिन अगर आपने आंखों पर अपनी ठसक, अपनी कामयाबी (झूठी या सच्ची?) का काला चश्मा पहन रखा है तो फिर हम क्या कहें और किससे कहें? सच तो यही है कि ऐसी असंवेदनशीलता देख हमें तो शर्म आती है... आपकी आप जानें।

चंद्रकिशोर जायसवाल
साहित्यकार

शनिवार, 7 अगस्त 2010

निफ्ट का है अंदाज-ए-एडमिशन कुछ और...

ओबीसी कोटे की सीटें खालीं, एडमिशन क्लोज

नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ फैशन टेक्नॉलॉजी , नाम बड़ा और दर्शन छोटे । सरकारी पैसों से चलने वाले इस संस्थान में एडमिशन प्रक्रिया को देख कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ । आम सरकारी संस्थानों की तरह ही यहां भी अफसरशाही और लालफीताशाही का बोल-बाला है । यहां हम ओबीसी कोटे के तहत एडमिशन को लेकर चल रही अफरा-तफरी का जिक्र करेंगे, लेकिन उससे इस संस्थान की कार्यशैली की आपको कुछ झलक जरूर मिल जाएगी । आपको बता दें कि ओबीसी कोटे की सीटें खाली होने के बावजूद प्रवेश बंद करने की बात कही जा रही है । ये बात कोई निचले लेवल का अधिकारी नहीं बल्कि निफ्ट के डायरेक्टर धनजंय कुमार (एफ एंड ए) कर रहे हैं । वो खुले आम ये कह रहे हैं कि सीटें खाली हों तो भी एडमिशन देना या न देना हमारी मर्जी पर निर्भर करता है । आप इस बारे में कोई सवाल करें तो निफ्ट में कोई आपको तर्कों के साथ जवाब देने को तैयार नहीं ।

ओबीसी कोटे में हो रहे इस खिलवाड़ की भूमिका उसी वक्त तैयार हो चुकी थी जब काउंसलिंग के लिए पहली लिस्ट जारी की गई । बी डिजाइन के लिए ओबीसी कैटगरी में काउंसलिंग के लिए 530 छात्रों को बुलाया गया । ये कुल सीटों (345) की तुलना में महज 54 फीसदी ज्यादा छात्र थे, जबकि सामान्य कोटे में 85 फीसदी ज्यादा, एससी कोटे में 108 फीसदी ज्यादा और एसटी कैटगरी में 83 फीसदी ज्यादा छात्र काउंसलिंग के लिए बुलाए गए । अलग-अलग कैटगरी में काउंसलिंग के लिए बुलाए गए छात्रों के इस मनमाने समीकरण पर जब एडमिशन सेल (दिल्ली) में पूछताछ की गई तो बताया गया कि अगर सीटें बची रह जाएंगी तो काउंसलिंग के लिए दूसरी लिस्ट निकाली जाएगी ।

आपको बता दें कि बी डिजाइन के लिए ओबीसी की काउंसलिंग 18 जून को समाप्त हो गई लेकिन अभी तक दूसरी लिस्ट नहीं आई है । निफ्ट में बी एफटेक और मास्टर्स कोर्स के लिए काउंसलिंग की दूसरी लिस्ट जारी की गई लेकिन ओबीसी कैटगरी में दूसरी लिस्ट जारी करने की फुरसत संस्थान को नहीं मिल पा रही । इस बारे में बार-बार संपर्क करने वाले अभिभावकों को बस तारीख पर तारीख दी जाती रही लेकिन नेट पर दूसरी काउंसलिंग लिस्ट का दीदार नहीं हो पाया । जिन अभिभावकों ने फोन पर ज्यादा एतराज जताया उन्हें परेशान करने के लिए दिल्ली बुला लिया गया और यहां ये सूचना दे दी गई कि अब दूसरी लिस्ट नहीं जारी की जाएगी । ऐसा लगता है संस्थान ने वेटलिस्टेड छात्रों से संपर्क साधने का कोई गुपचुप तरीका ढूंढ निकाला है, जिसके बारे में आम अभिभावकों को जानने को कोई हक नहीं है ।

तथ्य ये भी है कि ओबीसी कैटगरी के लिए खाली सीटों के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में एडमिशन सेल ने 24 जून को ये बताया कि अलग-अलग सेंटरों में 6 सीटें खाली हैं, जिनके लिए वेटलिस्ट जारी की जाएगी । खाली सीटों का ये आंकड़ा 26 जुलाई तक आते-आते महज 4 रह गया, इस पर डायरेक्टर और निप्ट के मुख्य अपील अधिकारी धनंजय कुमार का ये दावा कि जो भी होगा नियमों के मुताबिक होगा, संदेह के दायरे में आ जाता है । निफ्ट के एडमिशन सेल में कार्यरत श्रीमती सुनीता के मुताबिक 26 जुलाई को दो सीटें कांगड़ा सेंटर में और दो सीटें शिलांग में खाली थीं, लेकिन इन सीटों पर एडमिशन कब दिया जाएगा इस पर निफ्ट ने चुप्पी साध रखी है।

ऐसा ही कुछ संदेह पटना सेंटर की डोमिसाइल सीटों को लेकर भी है । 15 जुलाई को एडमिशन सेल ने फोन पर जानकारी दी कि सीटें खाली हैं और बिहार के लोगों को प्रवेश दिया जा सकता है लेकिन 26 जुलाई आते-आते ये बयान बदल गया । पटना की डोमिसाइल सीटें कब भरी गईं और किसको एडमिशन दे दिया गया ये पहेली आप बूझ सकें तो बूझें ।

निफ्ट अधिकारियों के बार-बार बयान बदलने से कई सवाल उठते हैं-

1. जब दूसरे कोर्सेस के लिए वेटलिस्टेड काउंसलिंग लिस्ट महज 10 दिनों में आ सकती है तो बी. डिजाइन में ऐसी क्या खास बात है कि करीब 40 दिनों बाद भी इस बारे में कोई फैसला नहीं लिया जा सका ?
2।

ओबीसी कैटगरी की खाली 6 सीटें 4 में कैसे बदल गईं । 2 छात्रों को किस बिना पर एडमिशन दिया गया । आखिर क्या वजह है कि निफ्ट की वेबसाइट पर कोई सूचना दिए बिना ही एडमिशन देने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है?

3। एडमिशन की इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता क्यों नहीं बरती जा रही है?

4। 28 जुलाई से निफ्ट सेंटर पर क्लासेस शुरू हो चुकी हैं, ऐसे में आखिर कब तक छात्रों को निफ्ट अधिकारियों की चिट्ठी का इंतजार करना होगा?

सवाल कई हैं लेकिन निफ्ट अधिकारी इसका जवाब देने को तैयार नहीं । संस्थान जनता के पैसे से भले ही चलता हो लेकिन यहां सब कुछ अफसरशाही अंदाज में होता है । अगर कभी आप एडमिशन को लेकर किसी परेशानी में पड़ जाएं तो भूले से भी इन अफसरों से सवाल पूछने की गुस्ताखी मत कर बैठिएगा- वरना घूमते रह जाएंगे ।

पशुपति शर्मा