रविवार, 4 जनवरी 2009

स्टाइलशीटिया

पाश क्या तुम्हें पता है की दुनिया बदल रही है?
क्या तुम जानते हो पत्रकारिता के इस जगत में
सबसे खतरनाक क्या है?
सबसे खतरनाक है...
न जानना ख़बर को बस करसर घुमाना
आना और मशीन की तरह जुट जाना
सही-ग़लत भूल, वर्तनी दोहराना
फुट्टे से नाप कर
सिंगल, डीसी बनाना
ख़ुद कुछ न आए , दूसरों को सिखाना
न बोलना , न सोचना , बस आदेश बजाना
बॉस के हर अच्छे बेहूदे मजाक पर मुंह फाड़ हँसना
अठन्नी बचाने के नाम पर , हजारों का नुकसान कराना
काम के बोझ से मर जाने के नखरे कर, दूसरों पर लदवाना
घोड़े की तरह आँख के दोनों ओर तख्ती लगवा लेना
चुतियापे को स्वीकार करना , चूतियों को सर नवाना
हर प्रश्न , हर मौलिक विचार की जड़ों में मट्ठा डाल देना
अंतरात्मा की आवाज़ को अनसुना कर , सप्रयास दबाना
वास्तविक काम को स्टाइलशीट की तलवार से
चुपचाप कटते देखना
नए खून को स्टाइलशीट के रेफ्रीजरेटर में
ठंडा होते महसूस करना
बौद्धिक विद्रोह को स्टाइलशीट के रोलर तले
कुचलने में मददगार होना
ख़ुद स्वयं को मरते देखना और आंखे फेर लेना
हाँ ! सबसे खतरनाक है
एक पत्रकार का स्टाइलशीटिया हो जाना।

(ये कविता साथी राजेश डोबरियाल ने तब लिखी थी, जब वो अमर-उजाला अखबार में काम कर रहे थे. ये कविता मेरे हाथ लगी, मैंने इसे अनायास, कारवां में अनाम छापी. ये कविता मेरे लघु शोध का भी हिस्सा बनी. और अब राजेशजी की अनुमति से उनके नाम के साथ. )

3 टिप्‍पणियां:

आदर्श राठौर ने कहा…

जय हो!
सटीक प्रहार.......
मन गदगद ह गया, रोज़ इसी तरह के चूतियापे को देखकर बहुत दुख होता है। जो सपने देखकर इस क्षेत्र में आया था, अंदर आकर पता चला कि मामला तो कुछ और ही है। सब फर्ज़ी है। आवाज़ नहीं उठा सकते, कुछ कह नहीं सकते क्योंकि फ्रेशर हैं न........
लेकिन सीनियर्स भी क्या कर सकते हैं.........
विडंबना प्रभु, विडंबना....

सोतड़ू ने कहा…

पशुपति भाई ऐसा लगता है कि बात बहुत पुरानी हो गई है। ये बातें अब भी सही लगती हैं लेकिन अब उतनी आग नहीं लगातीं जितनी पहले लगाती थीं। शायद अब मैं भी आदी हो गया हूं इस चूतियापे का।
हां एक बात जिंदगी ने मुझे सिखाई है कि आप भयंकर से भयंकर दिक्कत के ज़्यादती के भी आदी हो जाते हैं.... ख़तरनाक है- लेकिन सच है। और अगर नहीं हो पाते तो या तो मर जाते हैं या आप मिसाल (legend) बन जाते हैं। बहरहाल मैं इस कविता को अपने ब्लॉग पर भी डालूंगा..... उन दिनों की सबसे शानदार कृति `तहखाना' के साथ।

deepak ने कहा…

पशुपति भाई...दिक्कत तो ये है कि ये एक मीडिया संस्थान की नहीं बल्कि सभी की कहानी है..इसीलिए मैं शुरू से ही कहता रहा हूं कि मेरे अंदर कई अवगुण है, जैसे कि मैं शराब नहीं पीता..मैं सिगरेट नहीं पीता...मैं चाय नहीं पीता..मेरे अंदर अभी भी आत्मसम्मान बचा हुआ है...मैं सिर्फ काम करना जानता हूं...अगर मेरे अंदर ये अवगुण नहीं होते तो शायद मैं भी तरक्की कर लेता...