सोमवार, 16 मार्च 2009

गोंडनी मां

काम से लौटी
थकी, एक अधेड़ गोंडनी
अपने चौथे बच्चे को
बेधड़क दूध पिला रही है।

देवदूत, परियां और
उनके किस्से
श्लोक, आयतें और
आश्वासन
सब झूठे हैं
स्तनों से बहा
खून का स्वाद
चोखा है।

'तीस रूपैया'
दिहाडी के साथ मिली
ठेकेदार की
अश्लील फब्तियों से
अनजान है बच्चा।

नींद में
उसकी मुस्कान
नदी की रेत पर
चांदनी सी फैली है।

धरती पर बैठी
देखती मां
बेतहाशा चूमती है
उसके सारे दुख और
सपने!
- शिरीष खरे ( क्राई में कार्यरत, मुंबई)

1 टिप्पणी:

आदर्श राठौर ने कहा…

भावपूर्ण रचना