शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

     गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

नायकों का हमेशा सम्मान होता है और देश के आत्माभिमान के लिए यह जरूरी भी है। लेकिन जब नायक आलोचना से परे हो जाते हैं या यूं कहा जाए कि आलोचना से परे कर दिये जाते हैं, तब उनकी अभ्यर्थना होने लगती है। वे नायक से महानायक और महानायक से अवतार हो जाते हैं। जैसे ही कोई नायक अवतार का दर्जा पाता है । देश अंधभक्ति में डूब जाता है। उसकी शख्सियत का कमजोर पहलू भी वंदना और अभिनंदन के शोर में अनसुना रह जाता है। वह महानतम हो जाता है, जैसा कि अभी सचिन तेंदुलकर के साथ हो रहा है। वे अब हमारे लिए महानतम हैं। हमारे देश ने उन्हें क्रिकेट का भगवान बना दिया है। उनकी छोटी सी आलोचना से हम तिलमिला जाते हैं। पिछले बीस वर्षों से वे क्रिकेट खेल रहे हैं। फिलहाल जिस मुकाम पर खड़े हैं वहां से उनके लिए हर रोज एक नयी मंजिल का रास्ता खुलता हैं। उनके बनाए रनों से कीर्तिमानों का एक शिखऱ सा खड़ा होता जा रहा है। लेकिन य़ह जरूरी नहीं कि जिसने कीर्तिमानों का पहाड़ खड़ा किया, वही महानतम है। उन्हें महानतम कहने से पहले क्रिकेट के इतिहास की सूक्ष्म पड़ताल जरूरी है। मौजूदा समय के शोर में दब चुके इतिहास के महानायकों से सचिन की भिड़ंत करानी होगी। तेंदुलकर को डब्ल्यूजी ग्रेस, सर डॉन ब्रैडमेन, सर गारफील्ड सोबर्स, एवॉटन वीक्स, वॉरेल, वॉलकॉट, वॉली हैमंड,ग्रीम पोलक, सर लेन हटन, सुनील गावस्कर, विवियन रिचर्ड्स और ब्रायन लारा के बरक्स देखना होगा। इस कड़ी में कई और नाम जोड़े जा सकते हैं। लेकिन ऐसा करना जरूरी नहीं है। तेंदुलकर उस दौर में क्रिकेट खेलने आए जब सुनील गावस्कर एक बेजोड़ करियर को अलविदा कह चुके थे। 1989 में पाकिस्तान के दौरे से उनके अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत हुई । शुरुआत धमाकेदार थी। सोलह वर्ष की उम्र में एक सुनहरे भविष्य की चमक साफ नजर आ रही थीं। सचिन बढ़ते चले गए। इंग्लैंड में टेस्ट क्रिकेट का पहला शतक लगाया। फिर शतकों का सिलसिला सा चल पड़ा जो अब तक जारी है और जब वे विदा होंगे तो शायद रनों की अभेद्य दीवार खड़ी होगी। लेकिन बल्लेबाज सिर्फ इसलिए महानतम नहीं होता कि उसने अपने जीवन में सबसे ज्यादा शतक लगाए या सबसे ज्यादा रन बनाए। सर डॉन ब्रैडमेन इसके अपवाद हैं। उनका बल्ला तो शायद मैदान पर गेंदबाजों को रौंदने के लिए ही बना था। बावन टेस्ट मैचों में उन्होंने जिस रफ्तार से और जिस अंदाज से रन बनाए वो इतिहास है। बल्लेबाजी के हर पैमाने को वे तोड़ते चले गए और नये पैमाने बनाते गए। सबसे बड़ी बात यह कि उनसे जब भी टीम ने उम्मीद की, वे उस उम्मीद से कहीं ज्यादा देकर गए। वे आज भी क्रिकेट की दुनिया के अपराजेय़ योद्धा हैं । सचिन ने भी अपनी जिन्दगी में बड़ी पारियां खेलीं हैं। अब तक तैतालीस शतक लगा चुके हैं लेकिन कोई तिहरा शतक नहीं लगाया है। उनका सर्वश्रेष्ठ दो सौ अड़तालीस बाग्लांदेश के खिलाफ है और फिर दो सौ बयालीस ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ। उन्होंने इतने लंबे करियर में सिर्फ चार डबल सेंचुरी लगाई है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सचिन किसी भी एक श्रृखंला में दो से ज्यादा शतक नहीं लगा सके और पांच सौ रनों का आंकड़ा तक नहीं छू सके। (यह बात हैरान करती हैं)। जब भी महान बल्लेबाजों की बात छिड़ती है तो ऐसे बल्लेबाजों की लंबी चौड़ी सूची तैयार हो जाती हैं जिन्होंने अपने बल्ले की धमक से कई श्रृंखलाओं में सामने खड़ी टीम पर राज किया है । ब्रैडमेन के अलावा सोबर्स,ग्रीम पोलक, लेन हटन, रिचर्ड्स,गावस्कर लारा, कई नाम ऐसे हैं जिन्होंने अपनी बेहतरीन पारियों से सामने वाली टीम को पानी पिलाया है। और पूरी श्रृंखला में रनों का दरिया बहा दिया है। 1976 में विवियन रिचर्ड्स ने इंग्लैंड के खिलाफ चार मैचों में एक सौ अठारह के औसत से आठ सौ उनत्तीस रन बनाए। जिसमें तीन शतक शामिल हैं। उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर दो सौ इक्य़ानवे था। वेस्टइंडीज के ही थ्री ड्बल्यूज के नाम से मशहूर बल्लेबाज़ों में से एक वॉलकॉट ने 1954-55 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पांच मैचों में आठ सौ सत्ताइस रन बनाए,जिसमें पांच शतक भी शामिल थे । सोबर्स और लारा तो इस मामले में शहंशाह हैं। सोबर्स ने एक श्रृंखंला में एक बार आठ सौ से ज्यादा, दो बार सात सौ से ज्यादा, दो बार छह सौ से ज्यादा और दो बार-पांच सौ से ज्यादा रन बनाए हैं। जबकि लारा ने 1994-95 में इंग्लैंड के खिलाफ पांच मैचों की श्रृंखला में सात सौ अट्ठानवे रन बनाए जिसमें उनकी तीन सौ पचहत्तर रनों की महान पारी भी शामिल थी। कुला मिलाकर लारा ने एक श्रृंखला में दो बार सात सौ रनों का आंकड़ा पार किया है। दो बार सात सौ के करीब पहुंचे हैं और तीन बार पाच सौ रनों को पार किया है। इस मामले में गावस्कर सचिन से मीलों आगे हैं । गावस्कर दो बार सात सौ का आंकड़ा और कई बार एक ही सीरीज में पांच सौ से छह सौ रनों के पार जा चुके हैं । जबकि द्रविड़ दो बार छह सौ का आंकड़ा पार कर चुके हैं। जबकि सचिन का किसी एक श्रृंखला में अब तक का सर्वाधिक स्कोर चार सौ तिरानवे है। 2007-08 में आस्ट्रेलिया में उन्होंने दो शतकों के साथ ये रन बनाए थे। ऐसे भारतीय बल्लेबाजों की सूची भी बड़ी है जिन्होने अपने बल्ले के जोर से किसी खास श्रृंखला पर अपना झंडा लहराया है। ये तर्क भी जायज है कि सिर्फ एक सीरीज में रनों का अंबार लगा देना महानता का पैमाना नहीं है। लेकिन हर महान बल्लेबाज ने ऐसा किया है तो फिर पैमाना बनता है। दिलचस्प है कि सचिन अपने करियर में ऐसा कोई कारनामा करने से चूक गए हैं। सचिन को मास्टर ब्लास्टर का तमगा तो हासिल है लेकिन जरा सच पर गौर फऱमाइंये। टेस्ट क्रिकेट में एक दिन में सबसे बड़ा स्कोर करने वाले सौ खिलाड़िय़ों की सूची से सचिन गायब हैं। डॉन ब्रैडमैन ने एक ही दिन में तिहरा शतक लगा दिया था। इस सूची में ब्रैडमेन, लारा, रिचर्ड्स, वॉली हैमंड, सोबर्स जैसों की पारियां भरी पड़ी हैं। वीरेन्द्र सहवाग भी यहां अपनी जगह बना चुके हैं। हैरानी की बात ये है कि भारतीय बल्लेबाजों की सूची भी उन्हें जगह नहीं देती। एक दिन में सर्वाधिक रन की छह पारियों में चार वीरू के नाम हैं, एक द्रविड़ के नाम और एक पारी किसी और बल्ले से निकली है। वनडे का भी कुछ यही हाल है। सबसे तेज शतक लगाने वाले बल्लेबाजों में सचिन छब्बीसवें पायदान पर हैं। फिर सचिन मास्टर ब्लास्टर कैसे हुए? ये आकंड़े साबित करते हैं कि टेस्ट क्रिकेट में भले ही सचिन ने खूब शतक लगाए लेकिन गेंदबाज़ों पर वैसा दबदबा कभी कायम नहीं कर सके जैसा ऊपरोक्त बल्लेबाज़ों ने किया है। साथ ही महानता के हगामे में कुछ ऐसी बातें उनके खाते में जुड़ गई हैं जिन पर उनका हक नहीं है। सचिन ने क्रिकेट के दोनों ही फॉरेमैट में रनों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। लेकिन उनके जीवन में ऐसे बेशुमार मौके आए जब वे उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। जब भी देश ने सचिन में एक उत्तरदायी बल्लेबाज की छवि देखनी चाही, वे धड़ाम से गिरे । और भारत के करोड़ों क्रिकेट दीवानों के चेहरे पर नाकामी का तमाचा पड़ा। सचिन ने कई मौकों पर देश को जीत का रास्ता दिखाया या इज्जत बचाई लेकिन इतने लंबे करियर में ऐसे मौके बहुत कम आए। वे रन बनाते गए। टीम को सम्मानजनक स्कोर तक भी ले गए। ऐसा कभी कभार ही हुआ, जब उन्होंने अपने बूते मैदान पर उतरकर फतह दिलाई। शारजाह की दो पारियां और बीस साल के के सफऱ में उनकी गिनी चुनी पारिय़ां अपवाद हैं। जब माइक आर्थर्टन ने हाल में ये कहा कि सचिन को महानतम कहना ठीक नहीं तो तमाम न्यूज चैनल बौखला गए। उन्होंने इतिहास के कुछ पन्नों को पलट कर सचिन की क्षमता का आकलन किया था और ये पूछा था कि जब बॉडीलाइन सीरीज हुई या जब लोग बिना हेलमेट के बल्लेबाजी करते थे, तब सचिन होते तो उनका प्रदर्शन कैसा होता। वैसे इस तर्क में कोई दम नहीं है कि ऐसा होता तो क्या होता। लेकिन यह सवाल दिलचस्प जरूर है । जब हम उन्हें महानतम कहते हैं तो इतिहास में हमें झांकना होगा। क्रिकेट के मुश्किल दौर के ताप में सचिन को जलना होगा। एक ऐसी अग्निपरीक्षा के सवालों से जूझना होगा जिनका सामना उन्होंने किया ही नहीं। जब आर्थर्टन ऐसा कह रहे हैं तो इस सच से पर्दा उठाना भी जरूरी है कि सचिन ने अपने जीवन में क्रिकेट के महानतम गेंदबाज़ों को नहीं खेला। यहां तेज गेंदबाजों का जिक्र हो रहा है। शेन वार्न उसके अपवाद हैं। सचिन का उदय हुआ तो वेस्ट इंडीज के खौफनाक गेदबाजों का करियर अस्त हो चुका था। होल्डिंग, क्राफ्ट, गार्नर, एंडी रॉबर्ट्स और मार्शल का उन्होंने अपने जीवन में कभी सामना नहीं किया। वसीम अकरम और वकार को उनके उफान पर नहीं झेला क्योंकि 1989 की श्रृंखला के बाद 1999 तक भारत-पाक के बीच कोई टेस्ट सीरीज नहीं खेली गई। इसके बावजूद टेस्ट क्रिकेट में पाकिस्तान के खिलाफ उनका औसत महज पैंतीस का है।ऑस्ट्रेलिया के डेनिस लिली, ज्यॉफ थॉमसन की छाय़ा भी उनके बल्ले पर नहीं पड़ी। रिचर्ड हेडली, बॉथम, इमरान को उनके ढलान पर खेला। हालांकि उन्होंने डोनाल्ड, मैक्ग्रा ब्रेट ली और शोएब अख्तर को झेला लेकिन गिनी चुनी पारियों को छोड़कर कभी उन पर दबदबा कायम नहीं कर सके । (जिस तरह से गावस्कर ने वेस्टइंडीज के महानतम गेंदबाजों पर किया था)। सबसे बड़ी बात यह कि इनमें से मैक्ग्रा और शायद ली को छोड़कर शोएब और डोनाल्ड उस कोटि के गेंदबाज हैं ही नहीं जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। आर्थर्टन का तर्क भी कुछ इसी लाइन पर था। यह कोई साजिश नहीं कि विस्डन ने लंबे समय तक इतिहास की सौ महानतम पारियों में सचिन की किसी टेस्ट पारी को शुमार नहीं किया था। जबकि इस लिस्ट में ब्रैडमेन, सोबर्स, वॉली हैमंड, सर लेन हटन गावस्कर, लारा, रिचर्ड्स समेत तमाम लोगों की कई पारियां शामिल हैं। अगर ये पक्षपात या ज्यादती थी तब भी इतने लंबे करियर में उनकी पांच पारियां तो ऐसी होनी ही चाहिये थी जिनकी चमक के आगे विस्डन की सूची बनाने वालों की आखें चुंधिया जातीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सचिन ने टेस्ट क्रिकेट में बेशुमार रन बनाए। पर मैदान पर विपक्ष को उस तरह से ध्वस्त नहीं कर सके, जिस तरह से ब्रैडमेन,सोबर्स, लारा, वॉली हैमंड, जैसे बल्लेबाजों ने कई मर्तबा किया। उन्होंने अपने जीवन में ऐसी गिनी चुनी टेस्ट पारियां खेली हैं जिसमें शुरू से आखिर तक उनके बल्ले ने आग उगली। उन्होंने आक्रामक शॉट्स भी खेले तो बहुत संभल कर। उन्होंने हमेशा अपनी पारी को सलीके से गढ़ने की कोशिश की। उन पारियों में झंझा का वेग नहीं था और शायद झरने का प्रवाह भी नहीं। टेस्ट की कई पारिय़ों में उन्होंने आक्रामक होने की कोशिश की तो उन्हें पवेलियन लौटना पड़ा। रनों के अंबार के साथ उनके क्रिकेट करियर का एक पक्ष इतना चमकीला है कि दूसरे महान बल्लेबाज़ों की आभा फीकी पड़ने का भ्रम होने लगा है। बेशक वे रनों और शतकों के शिखर पर हैं। उनकी बल्लेबाजी में निरंतरता भी है लेकिन एक बहुत बड़ा खालीपन हैं जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। सचिन रिकॉर्ड की सबसे ऊंची चोटी पर जरूर खड़े हैं, सबसे दुर्गम चोटी पर कतई नहीं। यहां उनकी प्रतिभा पर शक नहीं किया जा रहा। इतने महान करियर को गढ़ने वाला बल्लेबाज जाहिर तौर पर असाधारण होगा लेकिन उन्हें महानतम कहना जरा जल्दबाजी है । य़ह उन बल्लेबाज़ों के साथ ज्यादती भी है जिन्होंने कभी अपने बल्ले से क्रिकेट के मैदान पर राज किया है। हम सचिन की मुक्त कंठ से तारीफ करें लेकिन उन्हें भगवान न बनाएं तो बेहतर क्योंकि क्योकि क्रिकेट के इस तथाकथित भगवान की वंदना अब कर्कश शोर में तब्दील हो गई हैं।
देवांशु कुमार झा
फोन-9818442690
प्रोड्यूर-न्यूज 24

1 टिप्पणी:

आदर्श राठौर ने कहा…

बहुत सही बात कही है आपने...