
ब्लॉग की दुनिया में आने का अपना ही मजा है... एक महीने में जो कुछ लिखा उसे अगर आपने पढ़ा न होता .... आपने सराहा न होता तो शायद मैं चुप बैठ गया होता। मैंने इस दौरान कई मित्रों के ब्लॉग देखे जहाँ लंबे अरसे से कोई हलचल ही नहीं दिखाई दी। खैर!
सबसे पहले शुक्रिया आदर्श का जिसने न केवल ये ब्लॉग बनवाया बल्कि मेरी हर पोस्ट पर प्रतिक्रिया भी दी। यामिनी गौर, पूनम अग्रवाल और संगीता पुरी ने ब्लॉग की दुनिया में मेरा स्वागत किया, धन्यवाद।
दूसरी पोस्ट - आतंक का एक चेहरा ये भी- एक सीरीज लिखना चाहता हूँ पर अभी दूसरी कड़ी नहीं दे पाया।
राम गोपाल वर्मा के ताज जाने पर बवाल क्यों ?
इस पोस्ट पर आप लोगों ने खट्टी - मीठी प्रतिक्रिया दी
आदर्श राठौर ने कहा…
मसाला, मसाला और मसाला....मीडिया को चाहिए मसाला । मीडिया का काम 'खबरों' को पेश करना है। लेकिन बजाए इसके मीडिया खबरें 'बनाने' में जुटा है। आम तौर पर मीडिया का काम राय बनाना नहीं होता लेकिन आज मीडिया राय बनाने का सबसे सबल हथियार है। मीडिया जो भी दिखाएगा, उसका जनता पर तुरंत प्रभाव होगा। इस घटना में भी यही हुआ। कुछ चैनलों ने इस खबर को बेवजह ही तूल दे दिया। लेकिन ये मात्र राम गोपाल वर्मा की बात नहीं है। आए दिन ऐसी घटनाएं होती रहती हैं।इस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।
ab inconvenienti ने कहा…
यह ग़लत था क्योंकि, वर्मा के साथ मुख्यमंत्री और उनका अभिनेता पुत्र था। निजी स्वार्थ की संभावना से कोई इंकार नहीं कर सकता. और यह मीडिया के सामने आ गया.वर्मा अनुमति लेकर किसी छोटे मोटे सरकारी अफसर या इंडियन होटल्स के किसी प्रतिनिधि के साथ भी जा सकते थे.और अगर सच में वहां कलाकार रामगोपाल वर्मा ही गया था बनिस्बत स्टारमेकर रामगोपाल वर्मा के, तो वह अपने निजी सहायकों के साथ चुपचाप होटल के पिछले दरवाजे से अन्दर जाता. कुछ देर ज़्यादा मुआयने में लगाता, इससे मीडिया में उसकी फोटो भी न आती, और अपनी विसिट की ख़बरों को वर्मा अफवाह बताकर खंडन भी कर सकते थे. क्या इतना भी इन तीनों को नहीं सूझा?
अभय मिश्रा ने कहा…
पशुपति जी आपने सही लिखा है लेकिन फिल्म को मीडिया मानना तो छोड़िए, पत्रकार किसी दूसरे पत्रकार को भी पसंद नहीं करते, वर्मा की बिसात ही क्या है। इस मामले में गुस्सा इतना ज्यादा था कि बात बिगड़ गई । संक्षेप में कहूं तो रामगोपाल वर्मा ने दो सरकार (फिल्म) बनाई है और एक गिराई है।
Udan Tashtari ने कहा…
मीडिया को मसाला चाहिये चाहे जहाँ से मिले। यहाँ से मिल गया तो उसे ही उछाल लिया।
-माडर्न महाजन पर लिखी पोस्ट पढने कुछ नए साथी आए। नीरज रोहिल्ला और मनोज द्विवेदी और हे प्रभु। मनोज जी आपके कहे मुताबिक माडर्न महाजन की दूसरी किश्त पोस्ट कर चुका हूँ।
-एक ख़बर न्यूज़ रूम से- कविता पढने परमजीत बाली ब्लॉग पर आए।
- यूँ न तोड़ो सपने- मनोज द्विवेदी दुबारा दिखाई दिए। कन्हैया मेरा पुराना दोस्त भी हाजिरी लगा गया।
-वो लडकी - शिरीष की कविता पर
अबयज़ ख़ान ने कहा…
अगर आप अब भी छत पर खड़े होकर इंतज़ार करते होंगे, तो कोई आपका इंतज़ार ज़रूर करता होगा। आप तो बड़े ब्लॉगिये निकले, जनाब.. गुडलक
- इस महीने मैंने कुछ मित्रों की रचनाएँ डाली हैं , आगे भी ये सिलसिला जारी रहेगा।
- पुष्यमित्र, अमित (वी ओ आई) , विश्वदीपक आदि ने भी राय मशविरा दिया।
इस पथ पर इस बटोही को हर पल आप सभी के साथ की दरकार है ।