रविवार, 7 दिसंबर 2008

राम गोपाल वर्मा के ताज जाने पर बवाल क्यों ?

राम गोपाल वर्मा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख (तत्कालीन) के साथ ताज होटल गए तो हंगामा मच गया। सबसे ज्यादा ये खबर मीडिया में उछली। कहा गया कि एक फिल्ममेकर को लेकर विलासराव का ताज जाना सही नहीं था। राम गोपाल वर्मा मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले को लेकर फिल्म बनाना चाहते हैं। और ऐसे ही न जाने क्या-क्या सवाल मीडिया ने उठाए?
ये खबर सबसे ज्यादा उस मीडिया में उछली जो इन दिनों खुद को कुछ ज्यादा ही जिम्मेदार मान बैठा है। वो अपने अलावा किसी और माध्यम को मौजूं ही नहीं मानता। उसे लगता है कि जो वो कह रहा है, सोच रहा है, दिखा रहा है वही अंतिम सत्य है।
मेरे मन में इस खबर को देख कर बार-बार ये खयाल आता रहा कि
-आखिर राम गोपाल वर्मा को क्यों नहीं ताज होटल जाना चाहिए?
-वो क्यों नहीं उस जगह जा सकते जहां मुख्यमंत्री के साथ कई चैनलों के कैमरे जा सकते हैं?
- फिल्म भी एक मास मीडिया है... एक निर्देशक को इस अधिकार से क्यों और कैसे वंचित किया जा सकता है कि वो घटनास्थल का नजदीक से मुआयना करे...
- इसे एक मुद्दे की तरह क्यों उछाला जा रहा है... मुख्यमंत्री और ऐसे ही दूसरे महत्वपूर्ण लोगों के साथ मीडिया के प्रतिनिधि हर जगह जाने को तैयार रहते हैं लेकिन वो यही अधिकार दूसरे को देने को क्यों नहीं तैयार?
- ताज जाना एक निर्देशक की ललक थी... उसने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अगर मौका-ए-वारदात का मुआयना कर भी लिया तो इसमें ऐसा क्या गुनाह हो गया?
- ये क्या मुंबई आतंकवादी हमलों को लेकर चल रही खबरों में महज एक और रंग जोड़ देने भर की कोशिश नहीं ?
बहरहाल, मेरे कई सवालों का जवाब आपके पास भी होगा... आप इसे जस्टिफाई कर सकते हैं कि मीडिया ने देशमुख को टारगेट किया है रामगोपाल वर्मा को नहीं... लेकिन बहस के केंद्र में रामगोपाल वर्मा ही तो हैं।
हमें ये भी सोचना चाहिए कि आखिर ऐसी क्या बात है कि रामगोपाल वर्मा ने मीडिया को आतंकवादी से ज्यादा खतरनाक करार दे दिया।
या फिर हम ये कह कर अपना पल्ला झाड़ सकते हैं हमें ऐसी टिप्पणियों की कोई परवाह ही नहीं है।

5 टिप्‍पणियां:

आदर्श राठौर ने कहा…

मसाला, मसाला और मसाला....
मीडिया को चाहिए मसाला
मीडिया का काम 'खबरों' को पेश करना है। लेकिन बजाए इसके मीडिया खबरें 'बनाने' में जुटा है। आम तौर पर मीडिया का काम राय बनाना नहीं होता लेकिन आज मीडिया राय बनाने का सबसे सबल हथियार है। मीडिया जो भी दिखाएगा, उसका जनता पर तुरंत प्रभाव होगा। इस घटना में भी यही हुआ। कुछ चैनलों ने इस खबर को बेवजह ही तूल दे दिया। लेकिन ये मात्र राम गोपाल वर्मा की बात नहीं है। आए दिन ऐसी घटनाएं होती रहती हैं।
इस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।

ab inconvenienti ने कहा…

यह ग़लत था क्योंकि, वर्मा के साथ मुख्यमंत्री और उनका अभिनेता पुत्र था. निजी स्वार्थ की संभावना से कोई इंकार नहीं कर सकता. और यह मीडिया के सामने आ गया.

वर्मा अनुमति लेकर किसी छोटे मोटे सरकारी अफसर या इंडियन होटल्स के किसी प्रतिनिधि के साथ भी जा सकते थे.

और अगर सच में वहां कलाकार रामगोपाल वर्मा ही गया था बनिस्बत स्टारमेकर रामगोपाल वर्मा के, तो वह अपने निजी सहायकों के साथ चुपचाप होटल के पिछले दरवाजे से अन्दर जाता. कुछ देर ज़्यादा मुआयने में लगाता, इससे मीडिया में उसकी फोटो भी न आती, और अपनी विसिट की ख़बरों को वर्मा अफवाह बताकर खंडन भी कर सकते थे.

क्या इतना भी इन तीनों को नहीं सूझा?

अभय मिश्रा ने कहा…

पशुपति जी आपने सही लिखा है लेकिन फिल्म को मीडिया मानना तो छोड़िए, पत्रकार किसी दूसरे पत्रकार को भी पसंद नहीं करते, वर्मा की बिसात ही क्या है। इस मामले में गुस्सा इतना ज्यादा था कि बात बिगड़ गई । संक्षेप में कहु तो रामगोपाल वर्मा ने दो सरकार (फिल्म)बनाई है और एक गिराई है।

आदर्श राठौर ने कहा…

पशुपति जी मैंने उस कविता में सुधार करने की कोशिश तो की लेकिन कर नहीं पाया। क्योंकि मूल रचना के बिना ये संभव नहीं हो पाएगा। वर्तनी के अलावा फॉर्मेट में भी कुछ त्रुटियां हैं जिन्हें जल्द ही ठीक कर दूंगा।

Udan Tashtari ने कहा…

मीडिया को मसाला चाहिये चाहे जहाँ से मिले..यहाँ से मिल गया तो उसे ही उछाल लिया.