बुधवार, 10 दिसंबर 2008

आक्रान्ताओं से

तुम जो चाहते हो
इस पृथ्वी पर अकेले राज करना !
तो फोड़ते क्यों हो बम -
कभी- कभी
कहीं-कहीं
छिपकर पॉँच-एक ?
कुछ ऐसा फोड़ो-
एक ऐसी मिसाइल
या परमाणु बम,
जिससे बच न सके कोई भी,
सिवा तुम्हारे!
और फिर,
चढ़ जाना हिमाद्रि के
उत्तुंग शिखर पर ।
वहां नोच- नोच कर अपने बा
नोच डालना अपने वस्त्र ;
और
जोर- जोर से चिल्लाना फिर
नंगा होकर।
- किसलय
(ये कविता काफी समय पहले मेरे मित्र किसलय ने मुझे 'कारवां' के लिए भेजी थी। आज ये कविता फिर से मौजूं हो गयी है। )

1 टिप्पणी:

आदर्श राठौर ने कहा…

बेहतरीन......
मैं कुछ दिनों से आतंकवाद पर कुछ लिखने की सोच रहा था। बार-बार भाव आ रहे थे लेकिन उन्हें लिपिबद्ध नहीं कर पा रहा था। इस कविता में मेरे मनोभाव पूर्णत: प्रदर्शित हो रहे हैं।