गुरुवार, 11 दिसंबर 2008

जल डमरू बाजे

कल अचानक एक नया नाटक देखने का मौका लग गया। मैं, विश्वदीपक और सचिन मंडी हाउस में जमा हुए थे, विचार था संगीत नाटक अकेडमी के कार्यक्रम में जाने का लेकिन पहुंच गए nsd.
पता चला अभिमंच में जल डमरू बाजे नाटक है।
हम काफी देर तक इंतज़ार करते रहे, जब अंदर गए तो abhimanch का नक्शा ही बदला हुआ था। कोशी की धार दूर से आती हुई साफ नज़र आ रही थी। सेट लाजवाब था। नाटक कोशी के प्रकोप और उस के बीच बिहार के लोगों की जिजीविषा के ताने बाने के साथ बुना गया था।
बाढ़ की विभीषिका भी थी और जीने की ललक भी। बाढ़ नदी में थी तो गाँव की जवान होती गहना में भी। सिर्फ़ नदियों की धारा ही नहीं, गहना भी मदमस्त हो घूमती फिरती, इश्क लड़ाती, कई तटबंध तोड़ जाती है।
नाटक में जाति का सवाल भी उठता है और जमींदारी प्रथा का भी। स्त्री पुरूष संबंधों की बात भी होती है और स्त्री मन की भी कई परतें खुलती हैं। और इस सबके बीच बाढ़ से पीड़ित लोगों का दर्द बार-बार उभर उठता है।
रामगोपाल बजाज के निर्देशन में एक और अच्छा नाटक, जो बिहार के लोगों की पीड़ा अभिव्यक्त करता है। सविता का अभिनय अच्छा है। सेट नाटक का मुख्य आकर्षण है। संजय उपाध्याय का संगीत नाटक के सूत्रों को ही नहीं जोड़ता बल्कि इलाके के साथ भी संवाद स्थापित करता है।

1 टिप्पणी:

आदर्श राठौर ने कहा…

आपसे आग्रह है अगली बार मंडी हाउस जाने का कार्यक्रम बने तो मुझे बताना मत भूलना। मैं इस तरह के अवसरों की तलाश में रहता हूं। जैसे ही शिफ्ट चेंज होगी, ऑफिस से सीधा मंडी हाउस का रुख किया करूंगा।